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Thursday, February 4, 2010

सोचते रहना भी एक कला है....... प्याज, अमर सिंह, राहुल गांधी, ईब्नबतूता, शरद पवार, बीटी बैंगन.....और मैं:)

       यह सोच भी बडी अजीब चीज है।  आप बाल संवारते वक्त भी सोचते रहते है, शर्ट पहनते वक्त,  चश्मा पहनते वक्त, चप्पल पहनते वक्त यानि हर वक्त सोचते रहते हैं। सोच…..सोच……..और सोच।  

        चाय पीते वक्त प्लेट में चाय उडेल कर ठंडा करते हैं, उससे निकलती भाप को देख उसमें विचार वाष्प खोजने लगते हैं। इधर चाय के कप में सतह पर एक परत बनने लगती है और आप की बुद्धि पर सोचवाई की परत जमने लगती है। पत्नी आवाज देती है कि आते वक्त आधा किलो भिंडी लेते आना। सुनकर लगता है, कप में बन रही परत, एकाएक दरक गई है । खीझ होती है कि मैं एक ओर तो अपनी सोच को छील रहा हूं और ये है कि भिन्डी में ही मुझे उलझाये रखे है।
 
      अखबार खोलता हूं, तो एक खबर दिखती है कि बीटी बैंगन पर बवाल मचा है। उसे खाने से ये हो जायगा, उसे खाने से वो हो जायगा। याद आया कि गांवों में अब भी फोता वृद्धि (अंडवृद्धि) का  कारण ज्यादा बैंगन खाने  को माना जाता हैं।  किसी को हाईड्रोसील हुआ नही कि कमेंट मिलना शुरू हो जायगा – जियादे बैंगन मत खाईयेगा………न फोता बढ जाएगा। साला फोता न हुआ महंगाई हो गई। सोचते सोचते एकाएक झपकी सी आ गई। अचानक ही झपकी में एक सपने की माईक्रो रील चलने लगी।  
  
     देखा कि राहुल गांधी विवाह रचाने जा रहे हैं। शादी की पोषाक धारण किये है। उनके  शादी की तैयारी धूमधाम से चल रही है। खाने पीने का अच्छा प्रबंध चल रहा है। बीटी बैंगन का ढेर लगा है। जयराम रमेश हर बैंगन को उलट पलट कर देख रहे हैं। खाद्य मंत्रालय से कई अफसरान इस मौके पर आये हैं। मूंज वाली खटिया पर आलथी पालथी मार कर बैठे शरद पवार शक्कर तौलवा रहे हैं। अमर सिंह और दिग्विजय सिंह आपस में टाईम पास कर रहे हैं। एक कहता कि आओगे क्या मेरे गोल में तो दूसरा कहता बुलाओगे क्या अपने गोल में। बेमतलब, बेहिसाब टाईम पास। उधर अमर सिंह बीच बीच में ब्लॉग भी लिख रहे हैं। टिप्पणीयां भी आ रही हैं दनादन। एक टिप्पणीकर्ता  ने लिखा -

  मेरे हिसाब से समाजवादी पार्टी एक प्याज की तरह है।


      पहले वह प्याज जब हरे हरे समाजवाद की फुनगी लिये किसानों की बात करता था, गंवई स्तर पर अपनी बात करता था तब उसे किसानों और जमीन से जुडे लोगों का समर्थन मिला।   वहीं ब्राहमण तबका इस समय भी लहसुन प्याज से परहेज करता था। सो वह काहे इस प्याज से जुडता। अलग रहा।
  
       बाद में वही प्याज यह जान की ब्राहमण तो उसकी कद्र करने से रहे, सो मुसलमानों का समर्थन लेने के लिये मटन भरी देग में चला गया, स्वाद तो बढना ही था, आखिर बिना प्याज कौन सा मटन अच्छा लगता।
फिर उस प्याज ने चमकदार ग्लैमर का वरक ओढ लिया। सोचा कि इससे गंवई किसान, जमीन से जुडे लोग और प्रभावित होंगे,मान करेंगे । लेकिन चमकदार वर्क से किसान को क्या करना था, उसे तो अपना पेट भरने से मतलब। वर्क लग जाने से अब किसान उस प्याज को छूते हुए भी डरता था कि कहीं मैले न हो जांय। ग्लैमर वाला प्याज जो ठहरा।
       

         इधर मुसलमान अलग शंका में पडा कि ग्लैमर के वर्क लगे प्याजों को मटन वाली देग में डालने से कहीं मटन का स्वाद बिगड न जाय। लोगों ने मिठाई पर वर्क लगाना तो सुना था, पर वर्क लगा प्याज पहली बार देखा वह भी समाजवादी प्याज।  किसान ने वर्क लगे प्याज को खरीदने से इनकार कर दिया। नतीजा, समाजवादी प्याज की सरकार नहीं बनी। सो, प्याज बिचारे को कोल्ड स्टोरेज में रखवाना पडा। अब वर्क लगा प्याज भला अंधेरे कोल्ड स्टोरेज में कैसे रहता। उसे तो ग्लैमरस दिखना था। चमकता हुआ लोगों के बीच दिखना था। काफी उहापोह की स्थिति थी। इसी बीच कोल्ड स्टोरेज को लंबे समय तक ठंडा रखने वाली बिजली मायावती ने काट दी। अब सडांध तो होनी ही थी।
      

          सो एक एक कर वर्क वाले प्याज बाहर आते गये।   जो कोल्ड स्टोरेज में रह गये अभी वह न जाने कितने दिन और वहां रहें। इस बीच बिजली वापस आई तो ठीक, वरना तो …….
   
            फिलहाल आपकी पोस्ट को पढ मुझे वह बात याद आ रही है कि प्याज को छीलने से छिलके ही छिलके निकलेंगे। वही बात यहां हो रही है। एक प्रकरण पर बात हुई, दुसरे पर बात हुई, तीसरे पर….और छिलके जमा होते गये।

            - सतीश पंचम  


   दिग्विजय सिंह इस टिप्पणी को देख बोले – अरे अमर भाई, इस  टिप्पणी के बारे में कुछ कहो यार। अमर सिंह तपाक से बोले – अरे इसमें गलत क्या है। आजकल मैं खुद अपने हाथों से आ रही प्याज वाली गंध छुडा रहा हूं। कभी मायावती का दुख समझने लगता हूं तो कभी सपा का नाम भी जुबान से न लेने की ठान लेता हूँ। आजकल इसी में टाईम पास चल रहा है।  
 
        उधर मनमोहन सिंह अलग ही हलकान थे। अभी तक कद्दू वाली गाडी नहीं आई थी। शरद पवार की ओर बार बार इस आशा में देखते कि वह कुछ कहेंगे…लेकिन वो तो शक्कर औऱ दूध को मिलाकर एक नये किस्म की शिकंजी बना रहे थे। इधर मनमोहन जी के माथे पर शिकन बढती जा रही थी। कद्दू न आया तो क्या होगा। बहुत छीछालेदर होगी। गुस्से में कुछ बोल भी नहीं पा रहे हैं। ज्यादा बोलेंगे तो उनकी सौम्य इमेज बिगडने का डर है। न बोलेंगे तो कद्दू न आने का डर है। क्या करें।

     उधर देखा तो ईब्नबतूता जी जूता उतार कर लहसुन छील रहे है।  नाखुन जल्दी ही कटे थे सो लहसुन छीलने में परेशानी हो रही थी।  तभी अचानक पत्नी की आवाज सुनाई दी।

    - अरे सोना हो तो ठीक से जूते उतार कर सो जाओ, ये क्या कि कुर्सी पर बैठे बैठे उंघ रहे हो और ईब्न बतूता, जूता, शक्कर, पवार बडबडाए जा रहे हो।

     सोचता हूं, कि यह सोच भी कितनी घातक चीज है। कम्बख्त सपने में भी अपनी परछाईं को मानस पटल पर टहलने भेज देती है :)
 

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जिसे कभी अंग्रेजों ने दहेज में दे दिया था।

समय – वही, जब देश विभाजन  के कगार पर खडा था और माउंटबेटन अपनी कलम  को ऱफ कागज पर चला, एक तरह से तस्दीक कर रहे थे कि कहीं हस्ताक्षर के वक्त कलम दगा न दे जाय।

(यह प्याज वाली टिप्पणी मैंने ही अमर सिंह जी के ब्लॉग पर लिखी थी। सोचा कि इस सोच को  आप लोगों से बांटता चलूं.......देखिये  फिर वही सोच :)
 
 THINKER का चित्र इंटरनेट से साभार.....

15 comments:

Suresh Chiplunkar said...

ज्यादा मत सोचिये… धड़ से लिख डालिये या थूक दीजिये… :) :) वैसे भी जिन महान आत्माओं के बारे में आपने सपना देखा है, वे हैं भी इसी लायक… :)

डॉ .अनुराग said...

हम बहुत सोच में पड़ गये है जी ...अस्सी साल का बुजुर्ग अखबार में अब भी इतालवी इतालवी चिल्लाता है ....काहे कुर्सी वास्ते ...उसके चेले कहते है बिहारियों को कश्मीर असम भेजो ......पांच हज़ार गुंडे खुलेआम देश को हड़का रहे है .....बड़ी सोच है जी....

Arvind Mishra said...

टिप्पणी तो है जोरदार मगर अमर कोइ जवाब दिए
इस नूरा कुश्ती में हम काहें अपनी प्रतिभा को हलकान करें

सतीश पंचम said...

@ अरविंद जी,

जवाब देना तो दूर की बात है, मेरी टिप्पणी को अमर सिंह ने अपने ब्लॉग पर आने दिया वही बडी बात है।
बडे लोग इस तरह की टिप्पणी पर न बोलना ही अपनी शान समझते हैं :)

देखिये न कैसे कांग्रेस जन समूचे मुंबई मामले पर किस तरह कन्नी काटते हुए कहते हैं कि वह ठाकरेस का लिहाज करते हैं और इस मसले पर जवाब देना ठीक नहीं मानते, भले ही वोट मांगने में उन्हें शर्म न आती हो।

सतीश पंचम said...

aur me oon jaise busy shaks se, ek choti si tippani ke liye javab ki ummeed bhi nahi rakhta :)

पी.सी.गोदियाल said...

सुरेश जी को follow करता हूँ !:)

बी एस पाबला said...

क्या सोच है!?

बी एस पाबला

नीरज गोस्वामी said...

जोरदार ही नहीं धाँसू पोस्ट...कुछ भी कहें आप सोचते बहुत अच्छा हैं...सोचते रहिये लिखते रहिये...गुदगुदाते रहिये....
नीरज

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत मजेदार पोस्ट.!!!
बहुत धाँसू सोच..ऐसे ही सोचते-सोचते आँख बचाकर सपने देख लिया करिए. अगली बार टमाटर खरीदने की बात आएगी तो देख लीजियेगा.

गिरिजेश राव said...

हम सोच रहे हैं
कि ऐसे ही तोहरे फैन नहीं बन गए।

मनोज कुमार said...

बहुत-बहुत धन्यवाद

डॉ. मनोज मिश्र said...

यह भी रोचक रहा ,आभार.

मो सम कौन ? said...

गजब तमासा भाई जी, कमेंट ही नहीं सूझ रहा है।
बी.टी.बैंगन के दुष्प्रभाव बताते-बताते शादी की दावत में बी.टी.बैगन का ढेर और फ़िर पटरी बदल ली। ’बिट्वीन द लाईंस’ समझने वाले तो पता नही क्या-क्या छिलके उतार गये और हम जैसे आप के साथ चल दिये, जिधर आप ले गये। आनन्द आ गया।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

भारत तथाकथित सुधरे हुए समाज का एक हिस्सा है
भारत का इतिहास इसी तरह के विभाजन और आपसी लड़ाई झगड़ों की दास्ताँ लिए हुए है
२०१० का समय भी ये धर्म, क्षेत्रीयतावाद ,
जात पांत के भेद भावों को मिटा न पाया
उसका बहुत अफ़सोस है -
-- हर देश भक्त को नमन --
भारतीय जनता कब संगठित होगी ? बातें करने का समय कब का बीत चूका है ...
अब तो , कायरता का त्याग करो ...नेता क्या करेंगें ? सिर्फ टेक्स लेंगें आपसे ..
जनता जनार्दन कब जागेगी ?
- लावण्या

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) said...

काहे सोचते हैं इतना...

और तो और, इतने महान लोगों का सपना देख के अपनी नींद का ऐसेई कबाड़ा करेंगे तो खुदा न करे ट्रेंकुलाइजर लेना पड़ेगा.. हाँ

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