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Saturday, February 27, 2010

1411: गुलजार के लिखे 'दिल तो बच्चा है' वाला गीत सुन कर जब एक बाघ को बीडी जलाने की इच्छा होने लगे तो........सतीश पंचम


और भई बाघ, इस खडखडीया दोपहरी में कहां मारे मारे फिर रहे हो ?
गुलजार जी को ही ढूँढ रहा हूँ।
 
क्यों, तुम गुलजार को क्यों ढूँढ रहे हो भई।

उन्हें ढूँढ रहा हूँ क्योंकि वही हैं जो कि हमारे बाघों के  मन की बात पढ लेते हैं और न सिर्फ पढ लेते हैं बल्कि गीत भी लिखते हैं।

गुलजार तुम बाघों के मन की बात पढ लेते हैं। विश्वास नहीं होता यार। वह शहर के रहवइया, तुम जंगल के…….कहां मेल है आप लोगों के बीच।

    वह मैं नहीं जानता कि गुलजार हम बाघों की बात कैसे समझ लेते हैं लेकिन समझते हैं खूब इतना पता है, तभी तो हम लोगों से संबंधित दिल तो बच्चा है जैसा गीत लिखते हैं।

क्या – दिल तो बच्चा है वाला गीत बाघों से संबंधित है ?

हां और क्या।

कैसे ?

वो ऐसे कि गुलजार जी लिखते हैं -

ऐसी उलझी हैं नजरें कि हटती नहीं
रेशमी डोर दांतों से कटती नहीं

मतलब -

   मतलब ये कि अब हम बाघ लोग संख्या में इतने कम हो गये हैं कि बडी बडी कंपनीयां अपने प्रॉडक्ट की डायरेक्ट मार्केटिंग छोड, बाघों की संख्या पर लोगों को उलझाये हुए हैं। जहां देखो वहां बडे बडे बैनरों पर हमें दिखाया जा रहा है कि हम सिर्फ 1411 बचे हैं। बाघ बचाओ, बाघ बचाओ।  उधर हालत ये है कि  वन विभाग और शिकारीयों के बीच रिश्वत की रेशमी डोर दिन ब दिन मजबूत होती जा रही है। इसे कौन काटे। कौन से दांत लाउं कि यह रेशमी डोर कटे।  यदि सिर्फ यह रेशमी डोर भर कट जाय तो हमारी संख्या बढ जाय।

       हां, बात तो सच है। ये रिश्वत और काहिली की रेशमी डोर ही है जो वन विभाग और शिकारीयों को जोडे हुए है। सही कहा है गुलजार ने आगे क्या कहा है बाघों के बारे में …….

गुलजार जी आगे लिखते हैं कि -

उम्र कब की बरस के सुफेद हो गई 
कारी बदरी जवानी की छंटती नहीं
चेहरे की रंगत   उडने लगी है
खाओगे धोखे इस उम्र में आकर
डर लगता है तनहा सोने में जी……
दिल तो बच्चा है जी

मैंने पूछा -   इसका क्या  मतलब हुआ ?

मतलब ये कि हम लोगों की संख्या इतनी कम हो गई है कि हम अपनी तमाम उम्र बीताते हुए बूढे हो जाते हैं लेकिन अपनी बाघिन के साथ संबंध बनाने में असफल रहते हैं। जवानी की कारी बदरी बुढापे में भी हम पर छाई रहती है।  

लेकिन बाघिन के साथ तुम लोग संबंध क्यों नहीं बना पाते हो।

वो इसलिये कि हमारे समाज में भी इंसानों की कुछ बुराईयां घर कर गई हैं। हमारे यहां भी बाघ की संख्या के मुकाबले बाघिन की संख्या कम होती जा रही है। सेक्स रेशियो में हेर फेर हो रहा है। दो बाघ में एक बाघिन……अब तुम ही बताओ कैसे गुजर हो।

हाँ ये बात तो है, ऐसे में गुजर होना तो मुश्किल ही है।

अब इस उम्र में, अपने चेहरे की उडी रंगत लिये जब भी जंगल में किसी बाघिन को देख उससे संबंध बनाने जाते भी हैं तो पता चलता है उसे शिकारियों ने हमें धोखा देने के लिये रख छोडा है। बाघिन हमें झांसा देते हुए शिकारियों के इलाके तक ले जाती है और वहीं हम धर लिये जाते हैं। और तब हम खुद से ही कह उठते हैं कि अपने दिल पर हमें काबू रखना चाहिये था। ये दिल तो बच्चे की तरह है, किसी पर भी आ सकता है…..तभी तो गुलजार साहब ने दिल तो बच्चा है वाले गीत में शिकारीयों और उनके द्वारा तैयार बाघिन के प्रेम जाल से सावधान करते हुए लिखा है कि -

दिल धडकता है तो ऐसे लगता है वो
आ रहा है यहीं देखता ना हो वोह
प्रेम की मारे कटार रे……

वाह, गुलजार ने तो बिल्कुल आप लोगों के लिये ही यह गीत लिखा है। सच में। लेकिन ये बताओ कि तुम गुलजार से मिलकर कहोगे क्या।

यही, कि एक और गीत बाघ समाज को डेडिकेट करते हुए लिखें -


हम तुम एक पिंजरे में बंद हों
और पब्लिक हट जाय
बाघों  की घटती संख्या में,
और दो चार नंबर जुड जाय

धीरे धीरे ही सही पुरवैया में
हमरी भी बीडी जल जाय
रेशमी डोर दांतों से कटे ना कटे
बीडी से तो आखिर वो जल जाय

बाघों  की घटती संख्या में,
और दो चार नंबर जुड जाय
बाघों  की घटती संख्या में,
और दो चार नंबर जुड जाय

   अभी मैं बाघ के गीत सुन ही रहा था कि मोबाईल बज उठा। अरे……. लगता है ज्यादा देर सो गया था। और ये क्या सपना देख रहा था…..जंगल…….बंदूक……. बाघ…….. बीडी….उफफ्………

हलो, हां यार आ रहा हूँ, बस आँख लग गई थी।

   क्या…………बाघों की संख्या पर सेमिनार हो रहा है। अच्छा, चलो आता हूँ तो बात करते हैं। आँखें मलते हुए इधर मैं अपने चप्पलों को ढूँढने में लगा था जो कि सोने से पहले चारपाई के पास यहीं कहीं उतारे थे कि तभी एसएमएस आया – just 1411 left. Save Tigers.

    मैं तब से सोच में पड गया हूँ…..सोते में तो बाघ के लिये मैं चिंतित ही था……जागते हुए भी बाघों की चिंता करूँ…………….मेरे हाथ भगवान की ओर प्रार्थना करते खुद ब खुद जुड गये………. गुलजार जी के बीडी जलईलै वाले गीत को हकीकत में तब्दील कर दो भगवान नहीं तो न ये रेशमी डोर कटेगी और न मैं चैन से सो पाउंगा……..बीडी जलईलै जिगर से पिया, जिगर मां बडी आग है……जिगर मां बडी आग है………जय भोले भण्डारी………..………

- सतीश पंचम

चित्र : साभार इंटरनेट से

7 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

मैं तब से सोच में पड गया हूँ…..सोते में तो बाघ के लिये मैं चिंतित ही था……जागते हुए भी बाघों की चिंता करूँ…………….मेरे हाथ भगवान की ओर प्रार्थना करते खुद ब खुद जुड गये………. गुलजार जी के बीडी जलईलै वाले गीत को हकीकत में तब्दील कर दो भगवान नहीं तो न ये रेशमी डोर कटेगी और न मैं चैन से सो पाउंगा……..बीडी जलईलै जिगर से पिया, जिगर मां बडी आग है……जिगर मां बडी आग है………जय भोले भण्डारी………..………
जय हो...
होली की शुभकामनाएं..

Udan Tashtari said...

अब जाकर समझ आया..सही है, खोजने दिजिये बाघ को गुलजार साहब को!! मस्त व्याख्या की है जी!!



ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
गले लगा लो यार, चलो हम होली खेलें.


आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

-समीर लाल ’समीर’

rashmi ravija said...

बेचारे बाघों का दर्द किसी ने तो समझा...:)
व्यंग के माध्यम से अच्छा प्रकाश डाला है स्थितियों पर...
अच्छा लगा,पढना...बोरियत हो गयी थी documentary जैसे विवरण पढ़ पढ़ के

डा० अमर कुमार said...


बड़ी दूर की कौड़ी लाये हो, गुरु !
इतनी तिरछी धार है कि ?




























कि, हमारी तो भँग उतर गयी, जरा वतन के हुक्मरानों की भँग उतार कर दिखाओ ।
हैप्पी होली !

डॉ .अनुराग said...

हम तो गुलज़ार साहब के बड़े पंखे है जी.....

अभिषेक ओझा said...

क्या बढ़िया मेल बिठाया है जी.

शरद कोकास said...

ओहो.... यह बात है ..सही है मर्द कितना भी बूढ़ा हो जाये अपने आप को बाघ ही समझता है ..गुलज़ार जी ने सही लिखा है /..और आपने भी सही चीर्फाड-अ की है

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