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Sunday, January 31, 2010

अमां मुर्गों की लडाई देख रिया था, लो खां तुम भी देखो, वो मुटल्ले को देखो कैसे फडक रिया है ...


         अबे पकड ना उसको, साला देखता नहीं क्या रकत आ रेला है। जा ले जा के मालिश कर। थोडा पानी जास्ती मार।

           ये वह शब्द थे जो मैंने कुछ मुर्गे लडाने वालों के मुंह से सुने थे जो कि बजरंगबली के मंदिर के पास एक सूनसान जगह पर जमा थे। उन सबके पास बहुत ही तगडे मुर्गे थे और सब जैसे कुछ ठान कर आए थे। मुर्गों के पैरों में एक कपडे का फीता कस कर लपेटा गया था। पूछने पर पता चला कि यह लडते वक्त उनके नाखुनों को आपस में फंसने से बचाने के लिये लपेटा गया है।

      एक मुर्गे लडाने वाले से मैंने थोडा पता किया किया कि यह आज किस खुशी में मुर्गे लडाये जा रहे हैं। तो वह बोला -

   - आज तो खाली फडक है। मुर्गा लोग को आज फडक करवा के जोडा बनाने का है। एकवीस दिन के बाद ये लोग में से तपास के एक मस्त जोडी निकालने का अउर बाद में वो लोग का मेन फाईट होने वाला है।

        मै थोडा हैरान हुआ, क्योंकि मुर्गे लडाना मैंने सुना है कि गैरकानूनी है।  उस शख्स से बातचीत चलती रही। बीच बीच में उन लोगों के मुर्गों को लडते देख रहा था। मुर्गों के कई जगह से छिल जाने के भी निशान दिख रहे थे। जो मुर्गे लड लेते उनको पानी भरी बाल्टी के पास ले जाकर पानी से तर किया जाता और उनकी मालिश की जाती। मालिश करने वाले को देख रहा था तो वह अपना पानी लगा गीला हाथ मुर्गे की पीठ पर से सहलाते हुए उसकी गर्दन की ओर ले जाता और कलगी को एकाएक उपर की ओर उठा मुंह से टॉ की आवाज निकालता। इधर मुर्गा भी शायद इस टॉ की आवाज का मतलब समझता था और उतनी ही जोर से बांग देता। पंख फडफडाता। लेकिन रहता मालिक के कब्जे में ही।

         मैं सोच रहा हूं कि भाषा और प्रांत के नाम पर लोगों को लडा रहे नेताओं और इन मुर्गा लडाने वालों में कितनी साम्यता है। मुर्गे लडाना भी गैरकानूनी है औऱ लोगों को आपस में लडाना भी गैरकानूनी। फिर जब मुर्गे थक जाते हैं लडते लडते तो उन्हें बाकायदा टिटकारी देते हुए मालिश भी की जाती है। आम जनता के साथ भी यही सब हो रहा है। टिटकारी दे दे कर आपस में तैयार किया जा रहा है। फडक करवाया जा रहा है। कलगी को सहलाया जा रहा है।  औऱ जनता है कि इन मुर्गों की तरह कूकडाने भी लगती है। क्या किया जाय।

     बजरंगबली जी भी चुप हैं। उन्हीं के प्रांगण में यह खेल खेला जा रहा है। बाकायदा इक्कीस दिनों बाद तैयारी करके फैसला होगा। ये 21, 51,101,111......वाले अंक किसी भी गलत सलत काम को सही ठहराने का ठप्पा लिये क्यों रहते हैं ?  
  
       अभी तो आप यहां खींचे गए कुछ चित्रों को देखिये। मेरा कादरखान कैमरा अब दिन में भी कम ही देख पाता है। जी हां मेरे कैमरे का नाम मैंने कादरखान रखा है। एक फिल्म में, रोज शाम को छह बजे के बाद कादरखान को दिखना बंद हो जाता है। वही हाल मेरे कैमरे का भी है, इसलिये उसे मैं कादरखान कहता हूं। आजकल वह दिन में भी कादरखान होने लगा है :)




पानी भरी बाल्टी और टिटकारी वाला जोश............ 


मैं तेरा खून पी जाउंगा.........





जियो मेरे लाल, जंग जीतने पर एक झप्पी तो बनती है.......



  आज टनकपुर और हरीपुर के बीच फैसला होकर रहेगा......



  तमाशबीन............


18 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे said...

मैं सोच रहा हूं कि भाषा और प्रांत के नाम पर लोगों को लडा रहे नेताओं और इन मुर्गा लडाने वालों में कितनी साम्यता है। मुर्गे लडाना भी गैरकानूनी है औऱ लोगों को आपस में लडाना भी गैरकानूनी। फिर जब मुर्गे थक जाते हैं लडते लडते तो उन्हें बाकायदा टिटकारी देते हुए मालिश भी की जाती है। आम जनता के साथ भी यही सब हो रहा है। टिटकारी दे दे कर आपस में तैयार किया जा रहा है।
बहुत शानदार पोस्ट. और जानदार तस्वीरें. बधाई.

मनोज कुमार said...

शानदार!!
जीत ही उनको मिली जो हार से जमकर लड़े हैं,
हार के भय से डिगे जो, वे घराशायी पड़े हैं।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

बेचारे! सही में लड़ रहे हैं। दो बांके होते तो मुला खूब स्वांग रच्यो कहने का अवसर मिलता!

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

और कादरखान तो ठीक ठाक है ब्लॉगिंग के लिये!

Vivek Rastogi said...

बेचारों को सच में लड़ना पड़ रहा है, अपनी मालिकों की मर्जी पर...

Arvind Mishra said...

वेन्यू क्या है इस ब्लॉगर मीट का ?

डॉ. मनोज मिश्र said...

मुर्गा लड़ाई का रोचक सफरनामा,पसंद आया.

Satish Pancham said...

@ Arvind mishra ji


blogger meet ke naam par badiya chutki .....

bahut khoob.

गिरिजेश राव said...

टिप्पणी ऑफ द डे
"वेन्यू क्या है इस ब्लॉगर मीट का ?"

पोस्ट तो अद्भुत है। पंचम दा पूरे सुर में हैं।
कहाँ कहाँ से ऐसी रपटें ढूढ़ लाते हैं?

और भाषिक झगड़ों से सममिति का लेखन तो दंग कर गया। बधाई।

बी एस पाबला said...

मैंने देखा, अरविन्द मिश्रा जी मेरी बात को उड़ा ले गए,मैं पढ़ता ही रह गया :-)

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत जबरदस्त लेख, मजा आगया पढकर. वैसे मिश्र जी की बात का जवाब है क्या कुछ?:)

रामराम.

सतीश पंचम said...

ताउ जी,

मैंने ब्लॉगर मीट वगैरह के एंगल से इन चित्रों को नहीं देखा था, लेकिन मिश्र जी ने उस ओर चिन्हित किया और जब फिर उन चित्रों को दिये गये टाईटल और ब्लॉगिंग में चल रहे घमासान के आलोक में पढा तो काफी साम्य नजर आया। इस बात की ओर पाबला जी ने भी इशारा किया है और मैं हैरान हूं कि चित्र ब्लॉगिंग के घमासान से इतने ज्यादा मेल खा रहे हैं।

ताऊ रामपुरिया said...

@ सतीश जी

इसे ही तो कहते हैं कि आदमी को अपने परिवेश का एहसास अंजाने मे होता रहता है. और उसी ने आपसे अंजाने मे ही सही वैसी ही सामयिक चित्रों वाली पोस्ट लगवा दी. बहुत लाजवाब लगी ये पोस्ट.

रामराम.

अर्कजेश said...

बेचारे मुर्गे --- जो मजबूर हैं लडने के लिए और इंकार नहीं कर सकते लडने से ;;; एक दूसरे के खिलाफ ,,,,,,,,,,

Udan Tashtari said...

मिश्र जी ने सोच को एक नई दिशा दी.. :)

परमजीत बाली said...

आपने सही लिखा है.." मैं सोच रहा हूं कि भाषा और प्रांत के नाम पर लोगों को लडा रहे नेताओं और इन मुर्गा लडाने वालों में कितनी साम्यता है। .....।"

बढिया पोस्ट।बधाई।

kase kahun?by kavita. said...

bahut badiya post.

Rahul Singh said...

यह बम्‍बई में भी, हमने तो सिर्फ बस्‍तर में देखा था.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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