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Thursday, January 14, 2010

डुबकी लगाना भी एक कला है। थोडा पाप, थोडा पुण्य और ढेरों अहमक बातें....

      कुंभ के समय डुबकी लगाना भी एक कला है। यकीं न हो तो एक बार आप भी हो आओ कुंभ। समझ जाएंगे कि आखिर यह कला क्यों हैं।  कोई  कुलांचे मारते हुए डुबकी लगाता है, तो कोई खडे खडे तो कभी उ हू हू कर ठंड में सिकुडते हुए। ऐसे में पानी की धार अपना अलग गुल खिलाती है।  लिजिये मेरी डुबकीयों का विवरण पेश है।

पहली डुबकी – शरद पवार के लिये। चाहता हूँ कि कुछ समय क्रिकेट विभाग के अलावा कृषि विभाग को भी देंगे और देश का उद्धार करेंगे।

दूसरी डुबकी  – अमर-मुलायम के लिये, ताकि दोनों के रोज रोज वाले रियेलिटी शोज बंद हों और टीवी पर कुछ और खबरें दिखें।

तीसरी डुबकी – राठौरवा के लिये (उसका मुस्कराना नेहरू से प्रेरित न होकर  क्विक गन मुरूगन से प्रेरित हो, माईंड इट)

चौथी डुबकी – हॉकी इंडिया के लिये (ताकि उसे हाकी की सहायता के नाम पर आगे आने की बयानबाजी कर अपना प्रचार करने वालों से सचमुच की धन सहायता मिल सके, केवल लफ्फाजी नहीं )

पाँचवी डुबकी – और नहीं, अब सर्दी लग जाएगी :)

छठी डुबकी – आप लोग लगाईये, मैं तो चला किनारे की ओर।

- अरे, मेरे कपडे कहां गये, यहीं घाट के किनारे ही तो रखे थे।

- भाई साहब आपने मेरे कपडे देखे क्या…..भाई साहब आपने….आपने…..जी आपने ……किसी ने नहीं…..फिर कपडे गये तो कहां गये….

 - अरे वो तो कुछ कुछ मेरे कपडों सा लग रहा है, इतना फट कैसे गया, कुछ गंदला भी हो गया है। जरूर लोगों के पैरों तले आ गया होगा। कैसे कैसे लोग हैं, कपडे देख कर भी नहीं चलते।

- क्या कहा,  मेरे कपडे आपको चाहिये। आप ही ने इसे लोगों के पैरों तले कुचलवाया है। क्यों भई, मेरे से तुम्हारी कोई दुश्मनी है क्या जो मेरे कपडे यथास्थान से उठाकर राहगीरों के पैरों तले कुचलने के लिये फेंक
दिया।

-  अरे यार फैशन इंडस्ट्री से हो तो क्या किसी के भी कपडे यूँ ही उठाकर उसी से फैशन चलवाओगे क्या……अजीब अहमक हो यार तुम भी। और मेरे कपडों में ऐसा कौन सा लुक है जो फैशनेबल लग रहा है।

  - ‘कुंभा टच’, ये क्या है। फैशन टर्म। समझा नहीं।

- अरे मैंने ‘गन शॉट’…… ‘बुलेट शॉट जीन्स’ के बारे में ही अब तक सुना था यार जिसमें जीन्स को बुलेट से छेदवाकर मार्केट में दुगुने तीगुने दाम पर बेचा जाता है, लेकिन ये क्या कुंभ के मेले में भीड भाड से गंदला हो चुका - ‘कुंभा टच कलेक्शन’।

- अरे यार, कुंभ के नाम पर तुम लोग सिर्फ अपना बाजार फैला रहे हो, किसी के कपडे में फूल पत्तियों की रगड दिखा कर ‘फ्लोरा इंडियाना’ नाम दे देते हो तो कभी किसी के कपडों में मिट्टी की छुअन के नाम पर ‘मड्डी टच कलेक्शन’ निकलवा देते हो। अब ये कुंभा टच का अलग नाटक शुरू कर रहे हो। तुम लोगों को क्रियेटिवीटी के नाम पर और कोई काम है कि नहीं।

- अरे फ्लोरा इंडियाना ही चाहीये तो माली से ले लो न, उसकी तो फूल पत्तों में ही रहबर है, उससे ज्यादा तो फ्लोरा टच कपडे किसी और में नहीं होंगे। और मड्डी टच चाहिये तो किसान  से ले लो, उसका जीवन ही मड्डी हो चला है। तुम फैशन इंडस्ट्री वालों को तो बस बेचने का बहाना चाहिये।

- और मेरे कपडे लोगों से कुचलवा कर तुम्हें ये कुंभा टच से तुम्हें क्या लाभ।

- क्या कहा, इसके खरीददार इसका दाम लाखों देंगे। कुंभ में आए नहीं लेकिन वहां के टच वाले कपडे को अपने कलेक्शन में दिखाएंगे।

- एक मिनट, मैं जरा एक और डुबकी लगा आता हूँ। तुम फैशन इंडस्ट्री वाले तो बस……..

- अरे ये क्या, अब तो डुबकी के लिये लाइसेंस लेने की जरूरत है। डुबकी की राशनिंग शुरू हो गई है। प्रत्येक भक्त को सिर्फ तीन डुबकी लगाने की इजाजत है ताकि भीड काबू में रहे। चलिये मैं तो चला म्यूनिसपैलिटी के नल की ओर। रोज रोज हमारा उद्धार तो वही करता है। गंगा जी, आप तो सालों में एक ही बार उद्धार करती हैं , महान वह म्युनिस्पैलिटी का नल है या आप, खुद ही समझ लिजिये।


- अरे यार, मेरा तौलिया तो दो, उसे कौन सा टच देने जा रहे हो।

- क्या, करीना टच…….ले जाओ लो जाओ।   वैसे भी फिल्म  इंडस्ट्री में चर्चा चल रही है कि ,   थ्री इडियट्स और भी ज्यादा सुपर डूपर हिट होती अगर करीना फिल्म में कहती – जहाँपनाह, तुस्सी ग्रेट हो….तोहफा कुबूल करो :)


(फैशन इंडस्ट्री में एक चलन है कि किसी भी चीज को कुछ भी नाम देकर कलेक्शन दिखा दो, मार्केट पकडने  में देर न लगेगी। यह व्यंग्य उसी को लेकर लिखा है। तमाम  टच जो यहां लिखे हैं, सब काल्पनिक हैं।  )

- सतीश पंचम

23 comments:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

एक डुबकी ब्लोग वालो के लिये भी .

Udan Tashtari said...

बहुत सटीक...छठी डुबकी लगा रहे हैं.

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत बढिया,इसी तरह दुबकी में ही सबको निपटा दें.

Arvind Mishra said...

मैं तो इस ब्लॉग पोस्ट में ही डुबकी मार गया -आपने एकाध और लगाई होती तो पूरी हो जाती मेरी -अभी सर दिख रहा है मेरा -आप एक और लगाईये न !

RAJ SINH said...

डुबकी क्या इन सबों को बोर ही दीजिये .

' खिचडी ' क शुभकामना !

Vivek Rastogi said...

अपन तो तीन डुबकी से ज्यादा लगाने की हिम्मत ही नहीं कर पाते हैं।

इन डुबकी वालों के लिये शांति यज्ञ भी करवा देते किसी श्री श्री १००८ वाले मठाधीश जी महाराज से तो सब ठीक हो जाता।

फ़िल्म वाकई सुपर डुपर हिट होती अगर यह सब करीना करती तो।

संजय तिवारी ’संजू’ said...

ok, thanks

गिरिजेश राव said...

अति उत्तम पोस्ट।
तोहफा कुबूल वाला आइडिया अब से भी फिलम निर्माताओं को भेज दो। अगर लागू कर दें तो कसम लाल की, फिलम दुबारा हिट हो जाएगी। :)

Suresh Chiplunkar said...

ये अन्त में भारी-भरकम डिस्क्लेमर देने की कौनो जरुरत नहीं थी जी। सारे "टचों" और "कलेक्शनों" के बारे में जनता जानबे करत है… :)

डॉ .अनुराग said...

ओर जो पोलिस वाले वहां ड्यूटी दे रहे है बेचारे .उनके लिए कौन डुबकी लगाएगा ...
पूयर गंगा ..कित्ती मैली होगी...छह महीने बाद

सुलभ 'सतरंगी' said...

खूब दुबकी लगाईं और लगवाई आपने... सटीक व्यंग्य और सही बात निकली है.

Neeraj Singh said...

वैसे भी फिल्म इंडस्ट्री में चर्चा चल रही है कि , थ्री इडियट्स और भी ज्यादा सुपर डूपर हिट होती अगर करीना फिल्म में कहती – जहाँपनाह, तुस्सी ग्रेट हो….तोहफा कुबूल करो :)

वैसे अगर कहीं ये सच हो गया .. और प्रोडूसर ने इस आईडिया को अपना लिया और थ्री इडियट्स २.० रिलीज़ कर दी तो इसका क्रेडिट आपको ही मिलना चाहिए

ई-गुरु राजीव said...

भाई हमारी डुबकी तो आपकी इस ठहाकेदार रचना के लिए है.
हा हा हा
मकर संक्रांति की शुभकामनाएं. :)

सतीश पंचम said...

नीरज जी, यूँ ही बैठे बैठे ये ख्याल आ गया था कि करीना को भी तुस्सी ग्रेट हो.... कह ही देना चाहिये था। लेकिन बाद में सोचा कि एक और शख्स था यदि इस आईडिया को, सीन को उस पर अपनाया गया होता तो हॉल में जमकर तालियां बजतीं, जमकर सीटियां बजती और वह शख्स था वीरू सहस्त्रबुद्धे :)

सोचिये कि साईकिल के पीछे कैरियर पर घोसला रख चलने वाला प्रोफेसर वीरू सहस्त्रबुद्धे जब कहता - जहाँपनाह, तुस्सी ग्रेट हो...तोहफा कुबूल करो तो वह सीन अपने आप में हास्य के साथ एक अकड के झुकने का टच लिये होता और धमाल मचाता।

मुझे लगता है कि राजू हीरानी ने थोडे धैर्य के साथ इस सिचुएशन पर भी सोचना चाहिये था।

वैसे, फिल्म जैसी भी बनी है, बहुत अच्छी बनी है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

ई जो फिलिम वालों का नाम लिया है, वे तो समझ नहीं आ रहे।

हमने तो एक्को डुबकी न लगाई। :(

और ये फुलपैण्ट पहिरे हथिया है या मुसटी! :)

सतीश पंचम said...

@ ज्ञानजी,

मुसटी शब्द पर ।

मेरे घर में अक्सर चूहे को चूहा ही बोला जाता है, चुहिया सुने भी बहुत दिन हुए और मुसटी शब्द बहुत सालों बाद आप से सुन रहा हूँ।

गाँव में था तब चूहे के लिये यह शब्द सुनता था लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया था।

यह चित्र इंटरनेट से लिया गया है। अगर यह चित्र खिंचवा रहा है तो हाथी है, चित्र खिंचवा रही है तो हथिनी है :)

वैसे हाथी की पूंछ इतनी लंबी नहीं होती, आपने सही ध्यान दिया है। शायद यह गणेश जी के मुहल्ले वाला हो :)

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर आप ने तो गंगा किनारे ही घुमा दिया

ज्ञान said...

क्या कोई ज्ञानी बता सकता है कि चिट्ठाचर्चा पर की इस टिप्पणी में ऐसा क्या था जो इसे रोक रखा गया है?
http://murakhkagyan.blogspot.com/2010/01/blog-post.html

rashmi ravija said...

सटीक व्यंग....और इस आलेख का 'पंचम टच'..अच्छा था...:)

Devendra said...

डूब कर लिखा है आपने.
मैं तो चला नहाने के लिए पानी गरम करने ....
आपकी दुबकी आपको मुबारक.
आनंद आ गया पढ़कर.

rds,earthpage said...

maja a gaya

shama said...

Oh ! Ha,ha,ha!

rds,earthpage said...

bhayanak thand me
hanste- hansate huye
kamaal ki dubki lagai
hai aapne

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