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Sunday, January 10, 2010

लोकभारती द्वारा प्रकाशित - 'साबुन' कहानी अपने आप में बेजोड और बहुत ही दिलचस्प है।

        कुछ कहानीयां अपने आप में बेजोड होती हैं। बहुत ही दिलचस्प।  ऐसी ही एक कहानी है ‘साबुन’।  यह उस दौर की कहानी है जब कि साबुन का इस्तेमाल करना एक तरह से लक्जरी ही माना जाता था, खास करके लोअर मिडिल क्लास के लिये जो अभी अभी कुछ खुलने की तैयारी कर रहा था। कहानी में एक देवर सुखदेव है जो कि अपना साबुन किसी को छूने नहीं देता। उसकी भाभी श्यामा है चोरी छिपे देवर के साबुन का इस्तेमाल कर लेती है। भतीजों से सुखदेव को बेहद लगाव है। सुखदेव अपने बडे भाई का लिहाज करता है। सामने पडने से बचता है। ऐसे ही एक दिन की घटना से कहानी की शुरूवात होती है।
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सुखदेव ने जोर से चिल्लाकर पूछा – मेरा साबुन कहां है ?

श्यामा जो दूसरे कमरे में थी, साबुनदानी हाथ में लिये लपकी हुई आई और देवर से हौले से बोली – यह लो।

सुखदेव ने एक बार अंगुली से साबुन को छूकर देखा, और भँवे चढाकर पूछा – तूमने लगाया था, क्यों ?

श्यामा हौले से बोली – जरा मुंह पर लगाया था।

क्यों तुमने मेरा साबुन लिया। तुमसे हजार बार मना कर चुका हूँ लेकिन तुम तो बेहया हो न।

गाली मत दो। समझे।

श्यामा ने डिब्बी वहीं जमीन पर पटकी और चल दी…….अँगीठी पर तरकारी पक रही थी। श्यामा भुन-भुन करती, ढक्कन हटाकर करछुल से उसे लौट पौट करने लगी, तो देखा तरकारी आधी से ज्यादा जल गई है। उसने कढाई उतार कर नीचे जमीन पर पटक दी।
“खाक हो गई नासपीटी” तरकारी को निहारती, नाराज होकर बोली। तभी उधर ठन्न से लोटा गिरने की आवाज हुई श्यामा ने चौंक कर देखा, बडा लडका बाल्टी खींचकर बाहर लिये जा रहा था।

कहां लिये जा रहा है, अभागे।

नहायेंगे। लडका शांत भाव से जमीन पर बाल्टी घसीटता बोला – चाचाजी ने कहा है।

चाचाजी के बच्चे। गू मूतों में डाल दी बाल्टी। उसने लडके के हाथ से बाल्टी छीन ली और पैरों से धमधम करती गुसलखाने के आगे तक आई।

सुखदेव छोटे भतीजे को सामने बिठाकर उसके सिर पर साबुन मल रहा था। भाभी को देखकर बोला – काला कर दिया साबुन । चेहरे का रंग लग गया इसमें काली माई के।

श्यामा ने चिल्लाकर पूछा – मैं काली हूँ।

सुखदेव न बोला। बच्चे के सिर पर साबुन मलता रहा।

श्यामा ने बाल्टी वहीं पटक दी और चढे स्वर में पूछा- मैं काली हूँ…..मैं काली माई हूँ।

सुखदेव ने घबरा कर कहा – धीरे बोलो। भाई साहब आ गये हैं।

श्यामा ने चौंक कर उधर देखा। कमरे में पति के जूते दिख रहे थे।
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   ब्रजलाल ने आसन पर बैठ कर भोजन पर एक नजर डाली और पूछा – आज तरकारी नहीं बनी।
नहीं।

यहां प्याली में क्या है।

कदुआ है। लल्ला के लिये रख दिया है।  दाल से खाओ।

पति ने आज्ञा मानकर एक ग्रास मुख में दिया और शांत-भाव से बोले – नमक लाओ।

क्या कम है।

बिल्कुल नहीं है।

क्यों झूठ बोलते हो। मैंने नमक डाला था। शर्त लगाती हूँ।

पति ने हंसकर कहा – यही सही। लेकिन अपनी कुशल चाहो तो पतीली में नमक पीसकर डाल दो। सुखदेव अभी खाने पर बैठेगा तो फिर आफत आ जाएगी तुम्हारी।

श्यामा ने स्वर चढाकर कहा – क्या आफत आयेगी । फाँसी दे देंगे मुझे। मैं दासी हूँ न सबकी।

ब्रजलाल ने हंसकर कहा – तुम राजरानी हो, लाओ, रोटी तो दो।

वे कपडे पहन आफिस जाने को हुए तो श्यामा ने कहा -  मुझे साबुन चाहिये।

साबुन। पति ने अचरज से कहा- कैसा साबुन। सुखदेव से कहो। छाता लाओ। वह फाईल उठाना।

तभी रसोईघर से एक पुकार आई – भाभी, खाना परोसो।

फिर दो पतली आवाजें एक साथ आई – भाभी, खाना परोसो।

 बडा लडका अलग थाली में खाता है। छोटा अपने चाचाजी के हाथ से खाता है। तीनों पास पास बैठे खा रहे थे।
बडे लडके ने कहा – दाल में इतना नमक है कि पूछो मत।

श्यामा ने डरते डरते देवर की ओर देखा । पर सुखदेव ने नमक के बारे में कुछ शिकायत न की, उल्टे भतीजे को
डाँट कर बोला – खाओ चुपचाप। फिर भाभी के आगे प्याली सरका कर बोला – तरकारी और देना भाभी।

भाभी ने हंसकर कहा – तरकारी अब नहीं है।

सब खतम।

यह देखो, कढाई आगे खींचकर, हंसकर कहा – जल गई सब। यही बची थी, सो तुम्हारे लिए छाँटकर निकाल ली थी।

देखें, जली हुई का स्वाद देखें।

श्यामा ने कढाई को पीछे को करके कहा – यह तुम्हारे खाने के काबिल नहीं है। लो, दाल और ले लो।

बडे लडके ने कहा – मैं भी दाल और लूँगा।

श्यामा ने उसके आगे सरकाकर कहा – ले, दाल ले।

लडका पतीली में झाँक कर बोला – कहां है इसमें दाल।

दाल नहीं है। अब तू मेरा सिर खा ले, पेटू……

छोटे भतीजे के जूठे हाथ धोकर, सुखदेव कालेज के कपडे पहनने लगा तो कमीज में एक ही बटन पाया।
सुई डोरा और बटन हाथ में लिये भाभी के आगे आ खडा हुआ। श्यामा थाली परोस कर खाना शुरू ही कर रही थी । सुखदेव ने कमीज उसकी गोदी में रखकर कहा – जल्दी, भाभी जल्दी।

भाभी जल्दी जल्दी बटन टाँकने लगी। और तब सुखदेव की नजर भाभी के परोसे हुए भोजन पर गई । तरकारी, जो जलकर काली हो गई थी, अकेली अकेली थाली में सजी थी।

तभी भाभी ने कमीज देकर कहा – लो, थामो। अब मुझे भी पेट में कुछ डाल लेने दो।

बडा भतीजा बाहर दरवाजे पर खडा था। उसके स्कूल की आज छुट्टी थी। कॉलेज जाने लगा तो सुखदेव उसका हाथ पकड कर खींचता हुआ ले गया जल्दी जल्दी बडी दूर तक।

चार मिनट बाद लडके ने दही का कुल्हड माँ के आगे ला धरा। श्यामा उसी जली तरकारी से रोटी खाये जा रही थी। दही देखकर अचरज से पूछा – कहाँ से आया रे ?

लडका बाहर को भागता भागता बोला – चाचाजी ने दिया है।

…………………कहानी आगे बढती है। इस बीच सुखदेव और श्यामा के बीच इसलिये बहस होती है क्योंकि सुखदेव ने अपने कपडे जहां सिलवाये वहीं बच्चों के भी कपडे सिलवाए। कपडे तो अच्छे सिले पर सिलाई का पैसा ज्यादा लग गया… कुछ दिनों बाद छोटे    हुए सो अलग।

  इधर श्यामा ने अपने पास के कतर ब्योंत कर बचे एक रूपये से साबुन मंगाने की ठान ली थी। देवर वैसे ही उसे साबुन छूने न देता।   लेकिन साबुन लाने वाला कोई न मिल रहा था। बडे लडके को पैसे देकर भेजा। सोचने लगी कि सुबह अपनी नई टिक्की से जब नहाउंगी तो देखूंगी। रोज लगाउंगी साबुन।

इधर बडे लडके ने दो पैसे का कपडे धोने वाला साबुन ले आया और चौदह पैसे हाथ में रख भाग गया। श्याम खिझती रह गई। गुस्से में वह दो पैसे का साबुन उठाकर एक ओर फेंक दिया और कोसती हुई रसोई बनाने में जुट गई। इस बीच कहानी आगे बढी। सुखदेव की शादी की बात करने एक शख्स आता है। लेकिन सुखदेव किसी और से लगाव रखता है। एक दिन सुखदेव के जेब से कपडे धोते समय एक प्रेंमपत्र पकड में आ जाता है। श्यामा उसे दिखाकर सुखदेव को चिढाने लगती है और मजाक ही मजाक में कह देती है कि वह ब्रजलाल  को यह बात बता देगी। सुखदेव भाई का बहुत सम्मान करता है और नहीं चाहता कि कोई ऐसी वैसी बात भईया को पता चले। सो उसी दिन से सुखदेव श्यामा का नर्म सचिव बन जाता है। दोनों के बीच साबुन को लेकर अभी भी रस्सा कशी चलती रहती है।

खूब ठंड पड रही थी।  इधर सुखदेव ने अपना पुराना स्वेटर एक चाय वाले के नौकर को देने की बात की थी। घर में आकर स्वेटर ढूँढा लेकिन नहीं मिला।

  श्यामा रसोईघर मे बैठी दाल बीन रही थी। सुखदेव ने आकर पूछा – मेरा स्वेटर था एक पुराना।

मैंने ले लिया।

तुमने कैसे ले लिया। सुखदेव ने माथे पर बल डालकर कहा। तुमने क्यों मेरा बक्स खोला।क्यों ले लिया मेरा स्वेटर।

भाभी ने शान्त स्वर में कहा – बेकार पडा था, इसलिये निकाल लिया।

सुखदेव ने स्वर को तीव्र करते कहा – मुझसे बिना पूछे तुमने कैसे ले लिया। तुम मेरी चीज क्यों छूती हो ।

श्यामा चुप रही।

कहां है स्वेटर लाओ दो।

चलो अपने कमरे में। अभी लाये देती हूँ स्वेटर।

यहीं लाकर दो फौरन।

भाभी ने इधर को पीठ करके स्वेटर उतारा, फिर उधर को मुंह करके शान्त स्वर में कहा – यह लो। और नतमुख किये बोली – बाकी के कपडे भी उतरवा लो तन के।

 सुखदेव क्षण भर भौंचक्का सा खडा रहा। स्वेटर वह सामने पडा था, और भाभी सिर झुकाए फिर दाल बीनने लगी। सुखदेव वह स्वेटर उठाने लगा तो एक बार भाभी के झुके मुख की ओर देखा। आँखों से आँसू टपक रहे थे भाभी के…..

  इधर श्यामा ने ब्रजलाल से कहा कि उसके लिये स्वेटर चाहिये। ब्रजलाल ने थोडी बहुत बातचीत के बाद दस का नोट निकाल कर दे दिया। उधर देवर को एक दूसरी ही मुसीबत ने आ घेरा था। जहां पढने जाता था वहां के प्रोफेसर की एक किताब सुखदेव से गुम हो गई थी। उसी के लिये सुखदेव ने एक पत्र पर साढे दस रूपयों की जरूरत लिख भतीजे के हाथ भाभी के पास वह पत्र भिजवाया था। भईया से यह बात बताने को मना भी किया था सुखदेव ने।   भाभी ने उस कागज की पीठ पर लिख कर बताया कि मेरे पास दस रूपये हैं। आठ आने का इंतजाम कहीं से कर लो।

   सुखदेव मान गया। उसे दस रूपये मिल गये।   इधर जब शाम को सुखदेव घर लौटा तो घर में कुहराम मचा था। छोटा वाला लडका  चाचाजी…चाचाजी कह कर रो रहा था और श्यामा उसके हाथ रस्सी से बाँध रही थी। यह दृश्य देख श्यामा को उसने धकियाते हुए बच्चे से अलग किया और गुस्से से पूछा कि क्यों मारा बच्चे को। तब श्यामा ने गरजते हुए कहा – जाओ देखो अपने कमरे में । एक किताब पर पूरी दवात उलट दी इसने। एक रूपये का नुकसान कर दिया। बच्चे को पीटा जाता देख सुखदेव पहले से ही आहत था, सिर्फ इस बात के लिये बच्चे को पीटा जाना औऱ गुस्सा दिला गया। जल्दी जल्दी बच्चे के हाथ खोल उसे कलेजे से लगा लिया। बच्चा चाचा से लिपट सुबकने लगा।

   रूंधे स्वर, आँखो में भर आए आंसू के बीच सुखदेव ने भाभी से  कहा – आज माफ करता हूँ। आइन्दा जो तुमने बच्चे पर हाथ चलाया तो मैं खाना छोड दूँगा समझी।

भाभी न बोली।

सुखदेव ने बाहर जाते जाते कहा – हत्यारिन ने जरा सी दवात के लिये अधमरा कर दिया मेरे लडके को।
  उधर सुखदेव के रिश्ते की बात चलाने एक शख्स आया था। ब्रजलाल से उसकी बातचीत चल रही थी। इधर श्यामा सुखदेव के प्रेम प्रसंग को जानती थी कि उसका मन प्रियंवदा नाम की लडकी पर आया है। सुखदेव की मन की जान श्यामा ने ब्रजलाल  से अकेले में बात चलाई कि सुखदेव की शादी उस शख्स के  वहां नहीं करने देगी। जहां वह चाहेगी, सुखदेव का ब्याह वहीं होगा।

 बृजलाल हतप्रभ। थोडी ना नुकुर और मान मनौवल के बाद बृजलाल सुखदेव की शादी प्रियंवदा से करने को मान जाते हैं।

  इधर प्रियंवदा के यहां से भोजन का बुलावा आता है। श्यामा ने प्रियंवदा के बारे में पहले ही जान लिया था कि काफी खूबसूरत है और उसकी और सुखदेव की जोडी खूब जमेगी।  प्रियंवदा के यहां जाने का समय हो रहा था। दोनों भाई रविवार होने के कारण बाहर गये हुए थे। उसने जल्दी जल्दी रसोई बनाई, फिर सब सँभाल-सुधारकर वहां जाने को तैयार हुई। शीशे के सामने जाने पर देखा चेहरे पर कहीं कुछ कालिख सी लगी थी। हाथ से छुडाने लगी तो वह और फैल गई। श्यामा ने घबरा कर चारों तरफ देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है।  फिर जल्दी से साबुनदानी उठाकर गुसलखाने की ओर भागी गई।

   मुख धोया साबुन से, हाथ धोये साबुन से। फिर पैरों पर नजर गई तो  पैर भी बहुत गंदे दिखे। पैरों पर भी साबुन मलने लगी। सहसा बायीं ओर किसी की परछाईं देखकर श्यामा ने साबुन मलते मलते उधर को मुंह किया तो हाथ जहाँ के तहां रूक गये और आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा।
  सामने कन्धे पर धोती तौलिया डाले, नंगे बदन सुखदेव खडा था निश्चल, निर्वाक।
 
श्यामा से कुछ न बन रहा था। यों ही पैर पर साबुन लगाये बैठी रही। आखिर सुखदेव ने ही वह निस्तब्धता तोडी। मुस्कराकर मुँह खोलकर बोला- बैठी क्यों हो, मुँह धोकर हटो न।

 तब मानो श्यामा की चेतना लौटी। ओठों में तनिक मुस्कराई और जल्दी जल्दी पैर धोकर उठ आई वहाँ से। कमरे में आकर शीघ्रता से साबुन की टिक्की एक कपडे पर दबा-दबाकर सुखाई, फिर बडे जतन से उसे साबुनदानी में रखकर ले आई।

    सुखदेव पाईप खोलकर खडा था। और जाने क्या सोचता पानी की धार को देख रहा था। खट् से भाभी ने पैरों के  पास वह साबुनदानी रख दी और लौट चली लम्बे डग भरती।
 
सुखदेव क्षण भर साबुनदानी को निहारता रहा। फिर उसने नीचे झुक कर साबुन की टिक्की उठा ली और तडित वेग से दूर जाती भाभी की ओर वह साबुन फेंक दिया जोर से।

  साबुन जाकर एक उपर रहने वाले परिचित सेठ को को लग गया जो उसी वक्त घर में प्रवेश कर रहा था । साबून जोर से लगा था सो वह सेठ पट पकड कर बैठ गया।    श्यामा ने पीछे मुडकर देखा । सुखदेव घबडा गया। आनन फानन में बहाना बनाया कि एक बंदर अभी इधर उपर  से गुजरा है उसी ने साबुन गिराया होगा। सेठ ने साबुन को उलट पलट कर देखा और कहने लगा – नया साबुन है। बजरंगबली की कृपा से मिल गया। साबुन लेकर सेठ चलता बना।

 उसी वक्त प्रियंवदा का नौकर भोजन के लिये लिवाने आ गया। श्यामा ने दोनों लडकों को सजा धजा कर बाहर खडा किया। डरती डरती देवर के पास आकर बोली- जरा अपना रूमाल दोगे।
क्यों तुम्हारा रूमाल क्या हुआ।

मेरे पास कब था रूमाल।

तो यों ही जाओ।

 श्यामा ने अनुनय करते कहा – दे दो जरा देर के लिये।

सुखदेव चिल्लाकर बोला – नहीं दूंगा रूमाल, चली जाओ सामने से।

श्यामा ने मुंह पर हाथ रखकर कहा – अरे धीरे बोलो। बाहर नौकर खडा है।

सुखदेव ने और चिल्लाकर कहा – नौकर की ऐसी की तैसी।

श्यामा घबराकर बाहर निकल आई।

  उधर प्रियंवदा के यहां श्यामा और बच्चे ही पहुँचे  थे। बातचीत  करते श्यामा को लगा कि ये तो अपना ही घर है । प्रियंवदा के बारे में सुखदेव ने पहले ही बहुत कुछ बताया था।   मजाक और चुहल चलती रही। प्रियंवदा की श्यामा के बच्चों से खूब बन पडी। थोडी बहुत बातचीत के बाद बात शादी पर होने लगी। बातचीत के दौरान पता लगा कि प्रियंवदा के भाई रामाशंकर के पास कई दुकानें हैं।

 श्यामा ने पूछा – भैया, अपनी दुकान पर साबुन भी बिकता है न।

बहुतेरा साबुन है। साबुन की तो एजेन्सी तक है।

तब एक शर्त है।

सबका दिल घबडाने लगा कि न जाने ब्याह की कौन सी शर्त रखी जा रही है।

श्यामा बोली – भैया, तुम्हें हर महीने मुझे एक साबुन की टिक्की देनी होगी। बोलो, हामी भरते हो।

रामाशंकर ठहाका मारकर हंस पडा। रामाशंकर की अम्माजी भी हंस रही थीं।

पर श्यामा न हंसी। बल्कि स्वर में दुख भरकर बोली – तुम्हे क्या पता अम्मा, कि मैं साबुन के लिये कितनी परेशान रहती हूँ।

रामाशंकर ने गदगद स्वर में कहा – बहिन, आज ही तुम्हारे पास एक पेटी साबुन भिजवा दूँगा।

 नौकर पीछे से बोला – मैं दे आउंगा शाम को।

जाने किधर से बडे लडके ने सब सुन लिया। वह रामाशंकर के आगे जाकर बोला – मामाजी,  आज  जीजी से और चाचाजी से साबुन के पीछे खूब लडाई हुई थी।

श्यामा ने चिल्लाकर कहा – चुप रह चुगलखोर।

पर लडका न माना। उसी दृढ स्वर में बोला – सच मामाजी, इसने चाचाजी का साबुन ले लिया था सो चाचाजी ने……

श्यामा ने लपक कर उसका मुंह बंद कर दिया।

सारा घर हँस रहा था।
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  यहां मैं कहानी का कुछ अंश ही दे पा रहा हूँ।  पूरी कहानी एक तरह से निम्न मध्यमवर्ग के उस हिस्से को बयां करती है जो अपने रोज की छोटी मोटी बातों में हंसी – खुशी तलाशता रहता है। कहानी में एक ओर प्रेम है, लगाव है तो दूसरी ओर हास परिहास भी है जो कि रह रह कर कहानी में झलकता है। पूरी कहानी को पढने के बाद कुछ हिस्से मन में रह रह कर कौंधते हैं – जल चुकी तरकारी, दही, स्वेटर , साबुन , दवात….ये कहानी के ऐसे पात्र हैं जो कहानी को असलियत के करीब ले आते हैं।

   इससे पहले मैंने कभी  द्विजेन्द्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’ जी की कोई कहानी नहीं पढी थी। लेकिन अब उनकी लिखी कहांनियों को पढने का मन कर रहा है।  मैंने जहां यह कहानी पढी वह किताब थी – ‘23 हिन्दी कहानियाँ’,  साहित्य अकादमी  नई दिल्ली की ओर से लोकभारती द्वारा इलाहाबाद से प्रकाशित, मूल्य – 35 रूपये।
 
    जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा पसंद की गई 23 श्रेष्ठ कहानियों का संग्रह है यह किताब।  और भी बहुत सी कहानियाँ हैं इस किताब मे। सचमुच जैनेन्द्र कुमार जी ने द्विजेन्द्रनाथ मिश्र जी की कहानी को इस  किताब  में संकलित कर उचित ही सम्मान दिया है।

  मुझे तो यह कहानी बहुत भाई।

- सतीश पंचम


 

17 comments:

Vivek Rastogi said...

सतीश जी,

बहुत बढ़िया कहानी से रुबरु करवाने के लिये शुक्रिया मजा आ गया, आज फ़िर साहित्य की बहुत दिनों बाद खुराक मिली है।

वाकई सोचने की बात है कि जब हम छोटे थे तो पूरा परिवार एक ही साबुन से नहाता था पर अब सबके अपने अपने अलग अलग साबुन हैं।

ऐसी किताबें हम भी पढ़ना चाहते हैं, कहाँ से लाते हैं इतना स्टॉक पढ़ने का बताईये तो हम भी ले आते हैं, अपनी खुराक के लिये।

डॉ. मनोज मिश्र said...

सतीश जी ,
कहानी में वाकई दम है.

Satish Pancham said...

@ विवेक जी,

मुंबई में तो इस तरह की किताबें जीवन प्रभात लाईब्रेरी से मिल जाती हैं। विलेपार्ले में इर्ला ब्रिज के पास ही है यह लाईब्रेरी। हिंदी की तमाम बेहतरीन किताबें एक बार में हजार रूपये तक की मिल जाती है ले जाने के लिये।

महीने के पचास रूपये की मेंम्बरशिप चार्ज बहुत सस्ती पडती है। पचास रूपये में सारा आकाश, गुनाहों का देवता, गुडिया भीतर गुडिया, प्रेमचंद का समस्त रचना संसार..सभी कुछ मिल जाता है। अभी हाल ही में टोपी शुक्ला पढी है, बहुत रोचक लगी। ममता कालिया जी की रचना अभी देख कर आया हूँ...अगली विजिट में उसे भी समेट लूंगा। लेकिन मुश्किल यह है कि मेरे पास उतना समय नहीं है उन्हें पढ पाने के लिये :(

हो सके तो वहां एक बार जरूर जायें।

लाईब्रेरी का फोन नंबर है 02226716587 औऱ ज्यादा जानकारी वहां से ले सकते हैं।

बहुत सारी किताबें आपको हिंदी गृंथ कार्यालय (सी पी टैंक) में भी मिलती हैं।

Arvind Mishra said...

आप द्वारा पहले भी पढवाई गयी कुछ कहानियों के क्रम में यह कहानी भी भावपूर्ण है

Vivek Rastogi said...

सतीश जी,

बहुत बहुत धन्यवाद, जानकारी देने के लिये पर मेरा वहाँ जाना बहुत मुश्किल होता है, और मेरे पास खुद की अच्छी खासी लाईब्रेरी है, और मैं उसे भी समृद्ध करना चाहता हूँ, ये किताबें सेकंड हैंड या नई जैसी भी हों कहाँ मिल सकती हैं, अगर आपकी जानकारी में हो तो बतायें या फ़िर कोई प्रकाशन सीधा भेजता हो।

आपको फ़िर कष्ट दे रहे हैं, उसके लिये क्षमा।

सतीश पंचम said...

ये किताबें आप को इसी लाईब्रेरी में खरीद कर भी मिल सकती हैं.... प्रकाशक से सीधे खरीद कर आपको छूट के साथ यहां वह सभी किताबें मिलेंगी जो दिल्ली या इलाहाबाद सरीखी हिंदी की समृद्ध दुकानों में मिलती हैं।

बीच में संचालक श्री सरस्वती मिश्र जी से बात हुई तो वह चाहते थे कि ऐसे कोई शख्स या संस्था उनके इस लाईब्रेरी को चला सके जिसकी रूचि साहित्य में हो तो वह कुछ कागजी कार्यवाही करने के बाद अपनी इस लाईब्रेरी को बतौर ट्रस्टी सौंप सकते हैं।

हो सके तो आप उनसे एक बार बात कर लिजिये।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर कहानी, नोख झोंक मै परिवारिक प्यार भी दिखता है, ओर बडो का सम्मान भी धन्यवाद

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

पुस्तक एक ओर। जब बात लोअर मिडिल क्लास की चली है तो मुझे अपने पिलानी के शुरुआती दिन याद आ गये। घर से बड़ी तंगी से भेजा गया था इंजीनियरिंग कालेज। हॉस्टल में कमरे का बल्ब दो दिन में ही फ्यूज हो जाने पर आंसू आ गये थे।

पिताजी को चिठ्ठी में लिखा था कि छ रुपये बर्बाद हो गये।

यह कहानी पढ़ी तो अभाव के वे दिन याद आ गये।

alka sarwat said...

कहानी है कि वास्तविक cहित्रण ,वास्तव में घर इसी को कहते हैं ,वैसे महिला की बहुत बलिदानी छवि पेश की गयी है
सतीश जी कहानी पढवाने के लिए धन्यवाद

अर्कजेश said...

अभी आधी पढी है ...बाकी बाद में पढता हूँ ...
कहानी रोचक है , यथार्थपरक भी ।

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत बढ़िया कहानी है. निम्न-मध्य वर्ग घरों में साबुन, क्रीम वगैरह का इस तरह से इस्तेमाल सत्तर और अस्सी के दशक में खूब था. दिल को छू गई कहानी.

अभय तिवारी said...

कई सालों से मेरी पसंदीदा कहानी है ये.. निर्गुण जी उन कथाकारों में से हैं जिनकी चर्चा कम हुई है और प्रतिभा उस अनुपात में कहीं अधिक है उनके अन्दर.. उनकी दूसरी कहानियां भी इतनी ही मार्मिक हैं..

शोभना चौरे said...

70 ke dshak ki ghar ghar kiyad dilati hui apni lagi yh khani .devar bhabhi ke
snehil pyar se bhari ak achhi khani pdhvane ke liye dhnywad .

स्पाईसीकार्टून said...

आपके अबाउट मी के तो हम पंखे हो गए सरकार

Devendra said...

स्व० द्विजेन्द्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’ जी की कहानियों का कोई जोड़ नहीं है.

इस कहानी को मैंने नहीं पढ़ा था....
इतनी रोचक है कि पूरा पढ़ कर ही दम लिया.
यह कहानी भारतीय संस्कृति का परिचय भी कराती है. जिन मुल्यों के कारण हमारी पहचान थी, पाश्चात्य संस्कृति उन्ही पर कुठाराघात करने पर आमादा है. यह कहानी हमारी सांस्कृतिक धरोहरों का दस्तावेज है.

आभार.

विश्विद्यालय प्रकाशन,चौक -वाराणसी में उनकी पुस्तकें आराम से मिल सकती हैं.

सतीश पंचम said...

@ देवेन्द्र जी,

चौक, वाराणसी के जिस विश्वविद्यालय प्रकाशन की आप ने जानकारी दी है, वहीं एक रोचक घटना मेरे साथ इस वाराणसी के चौक इलाके में हुई थी।

एक बार महानगरी ट्रेन पकडने के लिये वाराणसी आया था। अभी समय काफी था, तो सामान के साथ ही चौक की ओर रवाना हुआ कि कुछ और किताबें देख ली जांय। कुछ किताबें मैंने समेटीं ।

मैं किताबें ले सामान टांग टूंग कर निकला और सामने से गुजरते रिक्शे वाले को आवाज दी। मेरा आवाज देना था कि उसने खट से रिक्शा रोक कहा - साहेब सलाम, बैठिये।

मैं थोडा हतप्रभ, कि ये मुझे इतनी इज्जत से क्यूं बुला रहा है। उससे पूछा कितना लोगे आगे जाने का। तो रिक्शे वाले ने कहा - जितना देना हो दे दिजिये, अब आप से क्या लेना। मन हो तो दिजिये नहीं तो कोई बात नहीं, आप से पैसा थोडे ही मांगता हूँ।

अब मैं परेशान सा होने लगा कि ये कौन है जो मुझसे इतनी इज्जत से पेश आ रहा है। तभी मेरा ध्यान आस पास गया तो सारा माजरा समझ आया।

दरअसल विश्वविद्यालय प्रकाशन का एक गेट चौक पुलिस थाने से निकलता है और उस गेट से गुजरने पर लगता है कि पुलिस वालों के रिहाइशी इलाके से ही आप निकल रहे हो।

सारा मामला पल भर मे समझ आया कि बेचारे रिक्शे वालों को पुलिस वाले हडकाते रहते हैं और उनके डर से कभी रिक्शे वाले किसी पुलिस वाले से पैसे नहीं लेते।

पुलिसिया गेटे से निकलने के कारण वह रिक्शे वाला मुझे पुलिसवाल जान बडी इज्जत से पेश आ रहा था। रास्ते में मैने उससे बातचीत की और उसे आश्वस्त किया कि मैं तो यहां से बस गुजर रहा था, मैं पुलिस वाला नहीं हूँ तब उस रिक्शे वाले ने बताया कि इहां के पुलिस वाले जिये नाहीं देते, थोडा सा जाम लगा कि पहिले रेक्शे वाले क ही रेतिहें । भले ही बिकरम (ऑटो रिक्शा) वालन के ही गलती काहें न हो।

विश्वविद्यालय प्रकाशन में ढेरों विविधता भरी किताबें देखीं हैं । यादें ताजा हो गईं।

हिमांशु । Himanshu said...

कहानी निर्गुण जी कहानियों का वही परिचित भाव उत्पन्न करती है, जो अक्सर उन्हें पढ़ते हुए महसूस किया है मैंने । अपेक्षा से कम चर्चित कहानीकार पर बेजोड़ !

विश्वविद्यालय प्रकाशन की आपकी घटना रोचक है । इसी विश्वविद्यालय प्रकाशन से द्विजेन्द्र नाथ मिश्र ’निर्गुण’ की कई खंडों में रचनावली प्रकाशित हुई है एल०उमाशंकर के सम्पादन में । अमूल्य ग्रंथ है । सब कुछ इकट्ठा है यहाँ निर्गुण जी का !

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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