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Saturday, January 2, 2010

'अफसरी' पर लिखे एक लेख का बहुत ही 'रोचक अंश'


    हाल ही में एक बहुत ही रोचक लेख   डॉ विवेकी राय जी रचित एक ग्रामायण पढ रहा था। पढते हुए लगा कि इसे आप लोगों से बांटा जाय । बांटने का कारण यह भी है  कि अब भी भारत के गाँवों में इस तरह की परिस्थिति और इस तरह की ‘चुनमुनीया अफसरी’ देखने को जब तब मिल जाती है ।
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      गाँवों में विकास कैसे हो रहा है यह जानने के लिये एक बी डी ओ नामक साहब की चर्चा है। वह एक समारोह में सम्मिलित था। बहुत भीड थी। जो आता एक नजर उसे देख लेता। वह किसी और को नहीं देखता। सबके बीच रह कर सबसे अलग। गाँव में उपस्थित होकर भी अनुपस्थित। टेरेलिन का मोजा, मोजे पर शू ,  शू पर पालिश, फीता कसा, एक दरी बिछी बंसखट के सिरहाने नीचे पैर लटकाकर बैठा वह  ……… उसे पता नहीं कि यहां कुछ हो रहा है। कोई नमस्ते करता तो आँखे उठाकर कुछ गर्दन मोडकर हाकिमानी तर्ज का उत्तर दे फिर निरपेक्ष-निस्संग।


      बाजा बज रहा था। एक नर्तक कमाल कर रहा था। मगर वह एकदम अप्रभावित, सधे अंदाज की स्तरीय रियासत में डूबा…….गांव वाले भी कैसे मूर्ख हैं कि इस भोंडे नाच-बाजे को ला खडा किया। फिर उसने ऐसे मुंह बिचकाया जैसे वह यहां फंस गया है। मानों वह किसी ताल्लुकेदार का वंशज है और सब कुछ समाप्त हो जाने पर भी अगाध संपत्ति का स्वामी है और शहर में रहकर सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा है।

       ……  हो न हो इसके कपडे लखनउ से धो कर आते हैं। और, बालों की कटाई ? अरे वाह, कृत्रिमता में भी कितना सौदर्य होता है। खास ढांचे में मोड दिलाये गये बाल, बालों में ऐसी लहरें, जो उठकर गिर नहीं जातीं, कई कई बल में मुड मुड जाती हैं। जैसे सावन के कजरारे मेघ सिर पर घुघुचाये शोभा बढा रहे हैं। उजड गाँव  में इस फूस की पलानी में गंवारों के बीच ऐसा सजीला सैलानी शायद तफरीहन आ गया। इसे यहां उदास लगता होगा। न टी, न टेबुल, सब गंवारपन। ऐसा कल्चर्ड आदमी इनमें मिक्स कैसे करे। जलपान के लिये लोगों ने आग्रह किया। बोला,  “ नहीं नहीं, आप लोग तकलीफ न करें, मैं नाश्ता करके आया हूँ। फिर इस प्रकार के नमकीन-मिठाई को मैं छूता भी नहीं।”

तब आपकी खातिर हम लोग क्या करें ? पान सिगरेट ?

     गाँव का पान तो मुंह काटता है। पक्का जगन्नाथी पान मैं बनारस से मंगाता हूँ। पान का डिब्बा चपरासी लिये होगा। …..हरिया औ हरिया…..नहीं, नहीं यह सिगरेट भी मैं नहीं पीता। मेरा सिगरेट मेरे पास है।

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        एक दिन अचानक हल्ला हुआ कि नये बी डी ओ साहब आये हैं। लोग देखने के लिये दौडे कि यह हवा गाडी पर फर्र फर्र उडने वाला साहब कैसा है। मगर जब तक लोग पहुंचे, कुल सैंतीस मिनट में कागज का पेट भरकर और ग्राम सभापति से कहकर कि गरीबी के कारम देश तरक्की नहीं कर रहा है, वे चले गये। क्यों इतनी जल्दी चले गये, आगंतुक लोग तरह तरह के अनुमान भिडाने लग गये।

“ मूर्ख गंवार की तरह रस पानी लाकर रख देने से अफसर रूकेगा ? गेट बनाओ, झंडी लगाओ, टेबुल सजाओ, प्लेट जुटाओ, नमकीन मिठाई के साथ चाय लाओ, स्वागत गान गवाओ, तब भोंपा पर साहब का भाषण कराओ…….”

अपना पेट तो पहाड है। कहां से खिलावें।

तब हवा कूटो। गजटेड अफसर है। खिलवाड नहीं है। …………पहले खिलाओ फिर काम कराओ।

  “ खायेगा पियेगा नहीं तो अफसरी कैसे रहेगी। अफसर के माने है कि जनता से कम बोले। बिल्कुल संपर्क न रखे। सदा रिकेब पर लात रहे। कोई देखे नहीं कि कहां रहता है, क्या खाता है।”

“…….. मगर सानी पानी की तरह दाल-भात पर और वह भी ऐरे गैरे के यहां चोंच नहीं मारते। गोट-मोट आसामी पकडते हैं और माल काटते हैं। कहा जाता है -

   सुखी मीन जहं नीर अगाधा
   अफसर खुश जहं पाडा बांधा !

  “तब इसलिये चले गये क्या ? हमारे सभापति के यहां दूध-दही का आजकल ठाला है।”

“वही अंग्रेजी जमाने का हाकिम अब भी है भईया। बी का अर्थ बिलायती, डी का अर्थ डिजाईन और ओ का माने अफसर। बिलायती डिजाईन का अफसर।

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  - पुस्तक अंश,  साभार विवेकी राय जी के - ‘जुलूस रूका है’ किताब  से
प्रकाशक-  नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली
मूल्य- 20 रूपये मात्र*

 * 1977 में प्रकाशित इस किताब का मूल्य- 20 रूपये था। फिलहाल इस किताब का क्या मूल्य चल रहा है, इसकी जानकारी मुझे नहीं है ।

       दोनों चित्र मेरे अनुज द्वारा  गाँव में ही खींचे गये हैं।  पहला चित्र जिसमें एक नाच हो रहा है, बगल के गाँव में ही किसी शादी ब्याह के दौरान  आज से चार-पांच साल पहले लिया गया था। दूसरा चित्र जिसमें बच्चा भैंस पर बैठ कर मस्ती कर रहा है, वह भी गांव के ही किसी बच्चे का है ।

- सतीश पंचम

20 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

रोचक प्रस्तुति..आभार. नववर्ष की हार्दिक शुभकामना..

Vivek Rastogi said...

किसी के कल्चर में शामिल होने के लिये, या किसी को अपने कल्चर में शामिल करना कैसे करना बहुत बढ़िया।

अफ़सरी का अच्छा मतलब समझाया है।

गिरिजेश राव said...

फसड़ कर न रहे तो अफसर कैसा !
लोग बाग उसको का बूझेंगे?

भाई जब अफसर फील्ड माँ जात है तो ऐसे ही करन पड़त है।

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत गजब.
विवेकी राय जी का लिखा इससे पहले आपने ज्ञान भैया के ब्लॉग पर प्रस्तुत किया था. बड़ा सहज लेखन है. बहुत मज़ा आया पढ़कर.

Satish Pancham said...

@ शिव कुमार मिश्र जी,

जी हाँ, मैंने एक टिप्पणी में विवेकी राय जी का लिखा 'गँवई गंन्ध गुलाब' के अंश ज्ञानजी के 'गाँव की ओर' पोस्ट में दिया था। असल में विवेकी राय जी ने अपना बहुतेरा समय गाँव में ही बिताया है और उसी के अनुसार उनका लेखन भी गाँव की सोंधी महक लिये होता है।

कोशिश करूंगा कि उनके लिखे कुछ और अंश पढवा सकूं.....जैसे कि हवा में उडते जेट विमान के पीछे से लंबी धूएं की लकीर को देख उन्होंने उसे 'गूंगा जहाज' कहा क्योंकि वह आवाज नहीं करता और सिर्फ आकाश में एक लंबी लकीर बनाता चला जाता है।

गाँव में उड रही धूल के बारे में उनका कहना था कि कपडों पर धूल जहां बैठ जाती है वहां एकाएक पवित्रता सी आ जाती है - यह और ऐसी ही ढेरों बातें उनके खांटी ग्रामीण चितेरे होने की पुष्टि करती हैं।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर ढ

Suman said...

nice

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

मोजे पर शू , शू
अदभुत शैली इसी किस्म के होते हैं बाक़ी अफसरान
छूटकू प्रजाति के
विवेकी राय जीको आभार आपका भी

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प...फोटो ने उसे ओर जीवंत बना दिया है ....ओर हां पिछले दिनों एक हिंदी पत्रिका वागर्थ में रेणू जी के गाँव से ओर उनसे जुड़े संस्मरण प्रकाशित हुए है जरूरपढियेगा

मनोज कुमार said...

बेहतरीन। लाजवाब। आपको नए साल की मुबारकबाद।

डॉ. मनोज मिश्र said...

रोचक प्रस्तुति,हकीकत से रूबरू कराती है यह.

अजय कुमार झा said...

वाह वाह इस खांटी लेखन से नैन और मन दोनों को सुकून मिला बहुत बहुत मजा आया

Udan Tashtari said...

रोचक लगा यह आलेख. मजा आया. आभार प्रस्तुत करने का.

सतीश पंचम said...

@ अनुराग जी,

रेणू जी के बारे में जानकारी देने के लिये शुक्रिया। अभी हाल ही में फिल्मकार बी आर इशारा जी से मिलना हुआ जो कि फिल्म तीसरी कसम के असि. डायरेक्टर थे। उनसे भी रेणु जी के बारे में कुछ चर्चा हुई और पता चला कि फिल्म में चाय की दुकान पर जो शख्स मैथिली बोल रहा था वह नब्येंदु घोष थे जिन्हें कि मैं अब तक रेणु समझ रहा था। वहीं फिल्म में कहीं शैलेन्द्र जी भी थे जो कि साईकिल से निकले थे महज कुछ सेकंडों के लिये।

डर महसूस करवाने के लिये कुछ सीन जैसे कि शुरूवात में टप्पर गाडी में किसी भूतनी आदि से डरते हीरामन को शिव मंदिर में जाते समय डर साईड शॉट में समय पर बैल से गोबर करवाना (डर की अभिव्यक्ति) आदि के बारे में भी जानकारी मिली।

जल्दी ही तीसरी कसम पर कुछ लिखूंगा।

वागर्थ के बारे में जानकारी देने के लिये शुक्रिया।

अविनाश वाचस्पति said...

पंचम भाई बहुत सुंदर लिखा है
अफसरी पर ज्ञान चतुर्वेदी जी का एक व्‍यंग्‍य
राजस्‍थान पत्रिका में प्रकाशित हुआ था, वो भी बेजोड़ है। जिस दिन तलाशने पर मिल गया, उसे स्‍कैन करके ब्‍लॉग पर लगाऊंगा। आनंद लीजिएगा और मोल तोल पर बी डी ओ, पटवारी, ग्राम सेवक इत्‍यादि पर मेरे व्‍यंग्‍य प्रकाशित हुए हैं। उनके आकाईव का लिंक दे रहा हूं। सुरक्षित कीजिएगा और समय मिलने पर पढि़एगा। विश्‍वास है आनंद आएगा। मन में समाएगा। http://www.moltol.in/index.php?option=com_ijoomla_archive&task=archive&search_archive=1&act=search&author=424&ptitle=%E0%A4%85%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B6%20%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

हमें तो बीडिओ का अर्थ पता था- बेचारा देहाती अफसर :)

बहुत बढ़िया प्रसंग पढ़वाया आपने, धन्यवाद। आनन्द आ गया।

महाशक्ति said...

जितना अच्‍छा लेख उतनी ही अच्‍छी फोटो

rashmi ravija said...

बहुत ही बढ़िया खाका खींचा है,गाँव के जन-जीवन का...बी.डी.ओ,छोटा मोटा राजा ही होता है,अपने ब्लाक का...और ये दृश्य जब-तब क्या...हमेशा ही दिखते होंगे.मुझे नहीं लगता...सुदूर गाँवों में कुछ भी बदला है...जो लोग प्रमोशन पाकर बी.डी.ओ.बनते हैं...वे कुछ पहले वाले दृश्य के बी.डी.ओ.जैस हैं ..और जिनकी नियुक्ति कम्पीटीशन पास करके सीधी होती है..वे दूसरे दृश्य वाले होते हैं...जल्द से जल्द गाँव से भागने को उत्सुक..
(मैं लेख पढ़ते हुए,पूछने ही वाली थी कि मुंबई में ये किताब आपको कहाँ से मिल गयी..पर अंत में आपने बता ही दिया..पुरानी पुस्तक है)

अर्कजेश said...

रोचक है , हकीकत है, प्रासंगिक है । क्‍योंकि बाहरी दृश्‍य भले ही बदल गए हों । लेकिन सरकारी अफसर का नजरिया कमोबेश वही है ।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सरकारी अफसर की बहुत बढ़िया परिभाषा है.

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