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Tuesday, December 8, 2009

मुंबई ब्लॉगर-बैठकी, बोले तो .......होठों को करके गोल...... सीटी बजा के बोल..... ऑल इज वेल चाचू .....ऑल इज वेल :)

         ब्लॉगर मिलन स्थल की ओर जाते समय जब जंगल-झाडी वाले डेढ किलोमीटर के सडक पर पैदल चल रहा था तो मन में ख्याल आया कि यार ये तो एकदम ही अलग अनुभव है।  ब्लॉगर मिलन और वह भी जंगल में। खूब हंसी ठिठोली होनी चाहिये अब तो।


   याद आया मुझे फिल्म परिचय का वह सीन जब गुस्सैल  प्राण के घर के बच्चों को पढाने आए जितेन्द्र खूब जोर से हंसते हैं और नौकर असरानी कहता हैं कि ये क्या कर रहे हैं.....इतना जोर से मत हंसिये। इस घर में हंसना मना है। मुझे जब हंसना होता है तो मैं तो जंगल की ओर निकल लेता हूँ।


       यह सीन मुझे बरबस याद आता है जब कि टीवी पर छिछोरे चुटकुले सुना हंसी बटोरी जाती है। सोचता हूँ कि असरानी ने कितनी सच बात कही थी कि जब हंसना हो तो जंगल की ओर निकल  लो। और मैं इधर जंगल की ओर ही जा रहा था, ब्लॉगरों की बैठक में।


      कुछ को मैं जानता था, कुछ को नहीं। एक दो दिन पहले कल्पतरू पर विवेक जी ने चार पांच लोगों की सूची दी थी कि फलां फलां लोग आ रहे हैं।  मैने  उन लोगों के ब्लॉग खंगाले इस उद्देश्य से कि आखिर ये लोग लिखते क्या हैं। इनका चिंतन मनन किस तरह का है और उसी दौरान मुझे रश्मि रविजा और आभा जी के ब्लॉग पढने का मौका मिला। इन लोगों के सुघढ लेखन और अच्छी लरजती बातें पढ अच्छा लगा। सूरज प्रकाश जी को पहले से पढता रहा  हूँ, मुंबई टाईगर को भी यदा कदा पढता ही रहता हूँ। सो, कुछ इत्मिनान था कि चलो इन्हीं लोगों से तो मिलना है। कैसी हिचक। लेकिन अचानक विवेक जी ने कहा कि चौदह-पंद्रह लोग आ रहे हैं तो थोडा ठिठक सा गया। कौन  लोग होंगे। कैसे होंगे, थोडा बहुत पढ लेता उनके बारे में तो थोडा कम्फर्ट रहता। पर सोचा, ऐसा भी क्या झिझकना.......चलो मिलते हैं, देखूं तो सही कि वह लोग मेरी तरह ही 'रूक रूक कर बौद्धिक अय्याशी' करते हैं या 'सदाबहार बौद्धिक अय्याश' हैं।
   खैर, घर से बोरिवली तक मुंबई लोकल ट्रेन में गया । ट्रेन में एक व्यक्ति को कुछ अंगरेजी की लिखावट पढते देखा जो कि कापी मे पढ-पढ कर मुस्करा रहा था। थोडा सा ध्यान दिया तो वह किसी स्कूल की कापी थी जिसमें किसी बच्चे की लिखावट थी। मेरे द्वारा इस तरह से उस कापी में झांकते देख वह व्यक्ति खुद ही बताने लगा
  - मेरी लडकी ने लिखा है, पहिली में पढती है।
मैं मुस्करा पडा।............मुस्कराते हुए ही पूछा -  आज तो संडे है, उसकी छुट्टी होगी।
- हां, पण अभी उसको ट्यूसन के लिये छोड के आया। ये बुक उसका मेरे बैग में छूट गया है। अबी काम पे जाता है मै, तो साथ में ये बुक भी इदर ही मेरे साथ रै गया।   
- अच्छा अच्छा।
वह व्यक्ति पुलकित हो फिर उसी बुक के एक एक अक्षर को पढने लगा।

मैं ट्रेन में बैठे बैठे आसपास का जायजा लेने लगा लगा। कहीं पर स्टे ऑन शक्तिवर्धक कैप्सुल का विज्ञापन था तो कही पर रत्न-माणिक और भाग्योदय करने वाले विज्ञापन। लोगों और आस पास के माहौल को देखते ताकते बोरिवली स्टेशन आ गया।
    बोरिवली स्टेशन से तय स्थल की ओर बढ चला। रास्ते में एक जगह रूक कर चाय पी। नेशनल पार्क के भीतर जाने पर कुछ वहां के  आदिवासी महिलाओं एंवं बच्चों  के द्वारा इमली और अमरूद बेचते देखा। अमरूद के बगल में ही नमक की पन्नी भी दिखी। पूछने पर पता चला कि तीन मूर्ति मंदिर डेढ दो किलोमीटर अंदर है और पैदल जाना पडेगा। निजी वाहन हो तो उससे भी जा सकते हैं। अब वहां निजी वाहन कहां तलाशूं. सो, चल पडा ग्यारह नंबर की बस के जरिये पैदल। दोनों ओर हरे हरे पेड, झुरमुट और पक्षियों का कलरव। जी खुश हो गया। कहीं कहीं युवा- बच्चे सडक पर क्रिकेट खेल रहे थे तो कही पर यूँ ही बैठे समय व्यतीत कर रहे थे। कुछ युवा जोडे एक दूसरे के पंजों को आपस में फंसाये चल रहे थे।


      आस पास से गुजर रही कारों के प्रति संशय होता कि क्या पता इनमें भी कोई ब्लॉगर बैठा हो जो तीन मूर्ति की ओर चला जा रहा है। आस पास की हरियाली देखते जैन मंदिर पहुंचा तो याद आया कि सब टीवी पर तारक मेहता का उल्टा चश्मा में जेठालाल की पत्नी दया अक्सर जेठालाल को जय जिनेंन्द्र कह कर ही प्रणाम करती है।



       ऑफिस जाते समय मेरी श्रीमती जी ने जेठालाल की पत्नी दया की देखा-देखी मुझसे भी कई बार यूं ही मुस्कराते हुए जय जिनेन्द्र कह ठिठोली की है। जैन न होते हुए भी मैं हाथ जोड जय जिनेंन्द्र  कह बैठता हूँ। यूं भी कोई भी मंदिर, मस्जिद या चर्च के सामने से गुजरते हुए हाथ सीने की ओर बढ ही जाते हैं चाहे वह किसी भी धर्म के क्यों न हों। यहां भी वही हुआ।  मंदिर के गेट पर पहुचते ही हाथ खुद ब खुद सीने पर श्रद्धावश चले गये। भीतर मंदिर में जाने पर विवेक रस्तोगी जी मिले। परिचय हुआ। तब तक आलोक नंदन जी भी आ गये। बातचीत करते हुए हम लोग जैन मंदिर के हॉल में चले जहां पर की बैठक तय की गई थी। खिडकियां खोली गई। पंखे चलाये गये। और फिर थोडी बातचीत, थोडी सोच मुद्रा, थोडा इधर उधर फोन-फान । और शुरू हुआ धीरे धीरे लोगों का आना। सूरज प्रकाश, अविनाश वाचस्पति, रश्मि रविजा, शमा, फरहीन, रूपेश श्रीवास्तव, अजय , विमल, राज सिंह, शशि सिंह, सभी लोग आते रहे, महफिल जमती रही।

   
    इधर महाबीर जी (मुंबई टाईगर) और विवेक रस्तोगी जी काफी व्यस्त थे। कभी ब्लॉगरो के लिये पानी, कभी चाय, बिस्कुट , समोसे, वगैरह आदि का प्रबंध करते रहे। बीच बीच में समय निकाल कर हम लोगों के बीच भी आ बैठते और पूरी तन्मयता से बातचीत का रस लेते और रह रह कर अपने विचार भी बताते जाते ।
   
     इधर अविनाश वाचस्पति जी काजू ले आये थे और उधर राज सिंह जी ढेर सारी पान की गिलौरीयां ले आये थे। हंसी मजाक के बीच बातचीत का सिलसिला चलता रहा। इसी बीच एडम जी स्केच भी बनाते जा रहे थे।



   सभी ब्लॉगर अपनी बात भी रख रहे थे और रह रह कर बगल में बैठे  ब्लॉगर से कुछ पूछ पुछौवल भी कर ले रहे थे। कुछ बातें जैसे कि यूनिकोड के बारे में चली, तो  कुछ माईक्रोचर्चा ब्लॉगिंग के बौद्धिक अय्याशी होने पर भी चली इसके साथ ही साथ ब्लॉगिंग के खाये पिये अघाया होने जैसी बातों पर भी बातें निकली।  कमेंट में nice या फिर Very Nice लिखकर कमेंट करने वालों  पर भी हल्की फुल्की मजाकिया बात निकली। 
   
      इसी दौरान हंसी मजाक के कई मौके आए। जैसे कि जब राज सिंह जी ने अविनाश वाचस्पति जी से पूछा कि - आप नुक्कड पर तो हो ही, और कहां हो आप।
  अविनाश जी ने फरमाया एक तो पिताजी हैं।
हांय, क्या क्या।
एक तो पिताजी है, और भी ब्लॉग है जैसे कि तेताला ......
अरे भईया मैं पूछ रहा हूँ कि आप नुक्कड के अलावा कहा रहते कहां हो आप तो बता रहे हो कि.....पिताजी हैं..
  इतना सुनना था कि बगल में बैठी फरहीन जी ठठाकर हंस पडीं। दरअसल अविनाश जी अपने ब्लॉग पिताजी के बारे में बताना चाह रहे थे और राज जी उनका पता ठिकाना पूछे जा रहे थे। अब हो गई गफलत :)

  खैर, अविनाश जी ने एक रोचक बात बताई कि उन्हें ब्लॉगिंग के जरिये मोबाईल सस्ते में कैसे मिला। दरअसल, कहीं उन्होंने जानना चाहा कि कौन सा मोबाईल लूं तो ठीक रहेगा और इसी क्रम में उन्हे मोबाईल के फीचर के बारे में जानने का मौका मिला। इसी दौरान एक ऐसे शख्स ने मोबाईल बेचना चाहा क्योंकि  कैमरा मोबाईल उसके ऑफिस में अलाउ नहीं था। चालू हालत में वह मोबाईल उन्हें सस्ते में मिल गया।  लोगों से जानकांरी और जरूरतों को बांटने का जरिया कैसे बना ब्लॉगिंग यह इसका उदाहरण ही है।
     
      सूरज प्रकाश जी ने भी अपने अनुभव बांटे कि कैसे वह एक्सीडेंट का शिकार हुए और कुछ ही घंटों में मित्रों के ब्लॉग के जरिये यह बात सबको पता चल गई। यही नहीं, 28 लोगों ने रक्तदान के लिये आगे भी आए।
      
      तो इसी तरह की बातें साझा हुई हैं मुबई की ब्लॉगर-बैठकी में। यह एक तरह से गेट टुगेदर ही था। एजेंडा जानबूझ कर तय नहीं किया गया था कि पहले सब एक दूसरे को जान पहचान लें तो बात आगे बढेगी। बीच में समय निकाल मैं मंदिर के भीतरी हिस्से में चला गया। कुछ फोटो आदि खींची। मोबाईल के जरिये ही फोटो खींच रहा था सो जैसे तैसे धुंधली-धूसर तस्वीरें खींच-खांच कर वापस आया तो यहां चला-चली की बेला थी।
   मैं भी आलोक नंदन जी के साथ चल पडा स्टेशन की ओर..........। 


- सतीश पंचम 
 



Saturday, December 5, 2009

फाफामउ वाली पतोह




    अपने गाँव जाते समय रास्ते में पडने वाले इस 'फाफामउ' नामक स्थान से मैं आकर्षित हूँ। इसका नाम फाफामउ कैसे पडा यह तो नहीं पता, लेकिन कल ही मुंबई की लोकल ट्रेन में एक फाफामउ वाले शख्स से मुलाकात हुई थी जो अपने गाँव जा रहा था अपनी बिटिया के लिये विवाह हेतु लडका देखने ।  उन से हुई बातचीत के दौरान ही यह पोस्ट मुझे याद आ गई जो मैंने कुछ समय पहले लिखी थी। फिलहाल  छिपुली में रखे नये गुड और एक लोटे पानी के साथ यह पोस्ट पुनर्प्रकाशित है  :)

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   अचार बनाते समय रमदेई ने फाफामऊ वाली पतोह को तनिक हाथ धोकर ही  अचार छूने-छाने को क्या कह दिया, फाफामऊ वाली तो आज उधान हो गई है। रह-रहकर अपना काम करते समय सामने आ जाती है और तीखे व्यंगबाण छोडती है -


कुछ काम तो है नहीं, बस राबडी देवी की तरह तर्जनी अंगुरी उठा कर लहकारे रहेंगी कि, छू-छा मत करो.....हाथ धो लो.....हुँह, जैसे हम कोई छूतिहर हैं, बेटा को हमसे बियाहे बेला नहीं देखा था कि साफ सुथरी हैं कि नहीं, आज आई हैं हमें सफाई दिखाने।

रमदेई भी क्या करें, जब तक जांगर था अपने हाथ की कर-खा लेती थी, अब तो जब खुद की देह ढल गई है तब औरों को क्या दोस दे। सदरू अलग इस रोज-रोज की किच-किच से परेशान रहते थे। खैर, जैसे तैसे दिन बीत रहे थे, यह मानकर संतोख कर लेते कि, जहाँ चार बासन होंगे वहाँ पर आपस में बजेंगे ही। सदरू यही सब सोचते अपने दरवाजे पर बैठे हुए थे।

उधर फाफामऊ वाली पतोहू आँगन में एक बोरा बीछा कर उस पर बैठ अपने छोटे लडके को उबटन लगा रही थी। उबटन साडी में न लग जाय इसलिये घुटनों तक साडी को उपर भींच लिया था, दोनों पैरों को सामने की ओर रखकर, उसके उपर बच्चे को लिटाकर उबटन मलते हुए तो फाफामऊ वाली को कोई नहीं कह सकता कि यह झगडालू है, उस समय तो लगता है कि ये सिर्फ एक माँ है जो अपने बेटे को उबटन लगा कर, मल-ओलकर साफ सुथरा कर रही है। इधर बेटा अपनी मां को देखकर ओठों से लार के बुलबुले बनाता अपनी बुद् बुबद् .....बद्....की अलग ही ध्वनि निकाले जा रहा था। तभी दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई।

कौन.....बिमला....आओ आओ।

अरे क्या बेटवा को उबटन लगा रही हो......और देखो तो कैसे मस्त होकर उबटन लगवाये जा रहा है......बिलकुल मेरे सकलदीप की तरह।

सकलदीप की तरह, हुँह आई है बडी जोड मिलाने वाली......कहाँ मेरा लल्ला और कहाँ इसका नाक चुआता सकलदीप। मन ही मन भुनभुनाते हुए पतोहू ने कहा - अम्मा उधर रसोई में हैं।

फाफामऊ वाली के इस तेवर से बिमला समझ गई आज लगता है खटपट हुई है घर में। फिर भी थोडा सा माहौल को सहज करने की कोशिश करते हुए कहा - अरे हैं तो हैं, क्या हो गया, क्या मैं तुमसे ही मिलने नहीं आ सकती..........आई बडी अम्मा वाली।

पतोहू को अब जाकर थोडा महसूस हुआ कुछ गलत हो गया है.......भला क्या जरूरत बाहर वालों के सामने अपना थूथन फुलाये रखने की। संभलते हुए बोली - अरे नहीं, उबटन से मेरा हाथ खराब है न सो मैंने सोचा कोई लेने देने में तुम्हें अनकुस न लगे, तभी अम्मा की ओर बताया था। बैठो-बैठो, और कहो - क्या हाल है घर ओर का।

बिमला को अब दिलासा हुई कि चलो अभी थोडा ही गदहा खेत खाया है। बैठने के लिये लकडी की छोटी पीढी को अपनी ओर खींचती हुई बिमला ने अपने घर की बिपदा बयान करनी शुरू की। अरे क्या कहूँ बहिन - मेरी सास तो एकदम आजकल भगतिन हो गई है, कहती है बरतन ठीक से माँजो, तनिक साफ-सफाई का ख्याल करो....... हाथ धो-धाकर ही अचार छुओ।

फाफामऊ वाली का जी धक् से हो गया - हाथ धो-धाकर ही अचार छुओ........ये क्या कह रही है। यही बात तो आज के झगडे की जड बना है। और ये बडकी सहुआईन वही कह रही हैं जो मेरी सास ने कहा। अरे अभी सुन लें तो मेरे घर में फिर महाभारत मच जाय। सोचेंगी न समझेंगी बस, यही कहेंगी कि ऐसे घर-फोरनियों के ही कारन सब घर बिगडते जा रहे हैं। खुद कुछ काम न करेंगी और दूसरों के घर काम बिगाडने चल देंगी। पतोहू ने सोचा अब कोई दूसरी बात करू नहीं तो ये अपना रूदन लेकर बैठी रहेगी और सुनना मुझे पडेगा।

अच्छा सकलदीप कैसा है

वो तो ठीक है, उसको क्या होगा.....जो होगा मेरी अम्मा को ही होगा.......उसे देखकर कहती हैं कि कितना खाता है रे घोडमुंहा.....पेट है कि मडार।

इधर पतोहू सोच में पड गई - फिर वही सास की बात, अभी अम्मा रसोई में सुन ले तो हाथ में जलती लुक्की लेकर दौडेंगी। इसे अब सीधे-सीधे दूसरी बात करने के लिये कहूँ वही ठीक होगा।

अच्छा अब दूसरी बात करो, क्या वही पुरानी-धुरानी लेकर बैठी हो.....और सुनाओ......छुटकी का क्या हाल है।

पुरान-धुरान बात.......... बिमला को अब भी पतोहू के असली मंतव्य का पता न चल रहा था कि किसी तरह बात सास से हटकर किसी और मुद्दे पर आ जाय लेकिन वह माने तब न। कुढते हुए बोली - अरे इसे पुरान-धुरान बात कह रही हो......ये तो अब पुराना होने से रहा......रोज ही ऐसी और कई बातें नये ढंग से मेरे घर में होती हैं, वो तो मैं हूँ जो संभाल ले जाती हूँ......मेरी सास का चले तो........।

बिमला की बात अधूरी रह गई......रसोई से बाहर निकलते रमदेई ने कहा - ए सकलदीप के माई,.... तनिक हाथ लगा दो तो छत पर सूखते मकई को उतार लूँ।

फाफामऊ वाली पतोहू समझ गई........ अम्मा जान गई हैं कि मैं बात टाल रही हूँ और ये बतफोरनी मुझसे बार-बार सास-बेसास करे जा रही है, उसे चुप कराने के लिये ही अम्मा ने अपने काम में उसको लगा दिया है। ये बतफोरनी काम में लगी रहेगी और बात बदल जायगी। आज पहली बार अपनी सास पर मन ही मन गर्व हो रहा था फाफामऊ वाली को.....झगडा और झगडे की जड को कैसे ढंका-तोपा जाता है यह कोई रमदेई अम्मा से सीखे।

उधर सदरू आँगन से बाहर बैठे अपने बडे पोते बड्डन के साथ खेल रहे थे - बड्डन ने दो चुंबक अपने हाथ में लेकर उन्हें चिपकाने की कोशिश कर रहा था। दोनों चुंबकों के समान ध्रुवों के N-N पोल को जोडता, लेकिन वो दूर भागते....जैसे ही N- S पोल को जोडता, वह चिपक जाते। सदरू यह सब बडे मगन होकर देख रहे थे - उन्हें लग रहा था - सकलदीप की माई बिमला और मेरी पतोहू इस N-N पोल की तरह हैं, जितना ही सास का नाम लेकर सकलदीप की माई चिपकने की कोशिश करती, पतोहू उतनी ही जोर लगाकर बात बदलने की कोशिश करती है। जैसे ही रमदेई और सकलदीप की माई का संवाद चला, विरोधी ध्रूव जुड गये, N-S पोल की तरह। जरूरी नहीं कि आपस में विचार मिलते हो तो घनिष्ठता बढे ही......इसका उल्टा भी हो सकता है, ठीक चुंबक की तरह।

        उधर छत के उपर से रमदेई सूखी मकई कि चेंगारी भर कर पकडा रही थी,सकलदीप की माई बिमला नीचे खडी अपने दोनों हाथों से चेंगारी थाम रही थी। तभी चुंबक से खेलते हुए पोते ने कहा - दद्दा ये देखो....एक चुंबक उपर है, उससे चिपका दूसरा नीचे से लटक रहा है, गिरता भी नहीं। सदरू ने देखा....उपर वाले चुंबक का N पोल, नीचे वाले चुंबक के S पोल से जुडा था ।

- सतीश पंचम


Thursday, December 3, 2009

जब ब्लॉगर होने के कारण शादी न हो सके और जुडने वाला रिश्ता तोड दिया जाय......

 यदि आपने शोले देखी हो तो उसमें एक विशेष सीन है कि जब अमिताभ बच्चन बसंती और धर्मेंद्र की शादी की बात करने बसंती की मौसी के यहां जा बैठते हैं और लगते हैं अपने दोस्त का गुणगान करने। यह गुणगान कम और अवगुणगान ज्यादा होता है। यह पोस्ट उसी सीन से प्रेरित हो लिखी गई है। 
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   -अरे बेटा बस इतना समझ लो कि घर में जवान बेटी सीने पर पत्थर के सिल की तरह है। बसंती का ब्याह हो जाय तो चैन की सांस लूँ।


   - हां सच कहा मौसी, बडा बोझ है आप पर


   - लेकिन बेटा, इस बोझ को तो कोई कुँएं में यूं ही फेक तो नहीं देता न। बुरा नहीं मानना, इतना तो पूछना ही पडता है कि लडके का खानदान क्या है उसके लच्छन कैसे हैं कमाता कितना है।

-         कमाने का तो ये है मौसी कि एक बार बीवी बच्चों की जिम्मेदारी समझने लगेगा तो ढंग से कमाने भी लगेगा।

-         तो क्या अभी कुछ भी नहीं कमाता

-         नहीं नहीं ये मैंने कब कहा मौसी, कमाता है लेकिन अब रोज रोज तो आदमी गुगल एड सेंस से तो नहीं कमा सकता ना..... तो कभी कभी गँवा भी देता है ।

-         गँवा देता है से मतलब, क्या कोई जुआरी है


-         नहीं नहीं मौसी, ये मैंने कब....... कहा लेकिन मौसी ब्लॉगिंग चीज ही है ऐसी कि अब मैं आपको क्या बताउं।


-         तो क्या ब्लॉगिंग का लती है.... नशेडी है।


-         छी छी छी मौसी, वो और नशेडी......ना ना ...अरे वो तो बहुत अच्छा और नेक इंसान है। लेकिन मौसी एक बार जब कम्पूटर पर बैठ जाय तो फिर अच्छे बुरे का कहां होश रहता है, जो मन में आता है लिखता है, टिपियाता है, जिसको मन आए गरियाता है। अब कोई किसी का हाथ तो पकड नहीं सकता ना।

-         ठीक कहते हो बेटा, ब्लॉगिंग का नशेडी वो, लती वो, उलूल जूलूल टिपियाये गरियाये वो.....लेकिन उसमें उसका कोई दोष नहीं है।

-         मौसी, आप तो मेरे दोस्त को गलत समझ रही हैं। वो तो इतना सीधा और भोला है कि आप तो बस बसंती की शादी उससे करके देखिये...ये ब्लॉगिंग और नेट वगैरह की आदत तो दो दिन में छूट जाएगी।

-         अरे बेटा, मुझ बुढिया को समझा रहे हो। ये ब्ल़ॉगिंग और इंटरनेट वगैरह की आदत आज तक किसी की छूटी है जो अब छूट जाएगी।

-         मौसी, आप मेरे दोस्त को नहीं जानती। विश्वास किजिये, वो इस तरह का इंसान नहीं है। एक बार शादी हो गई तो वो नेट और ब्लॉगिंग के जरिये अपनी बौद्धिक अय्याशीयां बंद कर देगा।

-         हाय हाय, बस यही एक कमी बाकी रह गई थी। क्या बहुत अय्याश किस्म का है।

-         तो इसमें कौन सी बुरी बात है मौसी, इस तरह की अय्याशियां तो बडे बडे उंचे लोग तक करते हैं. बडे बडे सेमिनार वगैरह में इसी तरह की अय्याशियां ही तो चलती हैं। और इस तरह की बौद्धिक अय्याशी करने वाले लोग अक्सर पढे लिखे और उंचे खानदान से ही होते हैं।

-         अच्छा तो बेटा ये भी बताते जाओ कि ये तुम्हारे गुनवान दोस्त किस खानदान से हैं।

-          बस मौसी खानदान का पता चलते ही आप को सबसे पहले बताउंगा। फिलहाल तो इसे अनानिमस ही समझिये।

-         एक बात की दाद दूँगी बेटा कि भले ही सौ बुराईयां हैं तुम्हारे  दोस्त में लेकिन तुम्हारे मुंह  से उसके लिये तारीफ ही निकलती है।

-         अब क्या बताउं मौसी, ब्लॉगरों का दिल ही कुछ ऐसा होता है। तो मैं ये रिश्ता पक्का समझूँ।

-         पक्का, अरे मर जाउंगी लेकिन मैं अपनी बिटिया का ब्याह एक ब्लॉगर से कत्तई नहीं करने वाली जो कि अपने बीवी बच्चों को छोड दीन दुनिया से जुडने की ललक में बौद्धिक अय्याशियां करता फिरे। मुझे ये रिश्ता मंजूर नहीं।


-         क्या बताउं मौसी, नहीं जानता था कि ब्लॉगिंग से लोग कुँवारे रह जाते है वरना अब तक तो देश की आबादी की समस्या हल हो गई होती औऱ सरकार खुद ही ब्लॉगर अनुसंधान संस्थानों की स्थापना करती फिरती। खैर, चलता हूँ। आपकी बात सुनकर मेरा ब्लॉगर दोस्त कहीं टंकी  न ढूँढ रहा हो :)  

- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां अंबानी भाईयों की इमारतों पर हेलीपैड बनवाने का विरोध आसपास के लोग कर रहे हैं और अब नौसेना उसे सुरक्षा के लिहाज से रिजेक्ट करने की ठान रही है। 


समय - वही, जब दो हेलीकॉप्टर आपस में बातें कर रहे हों कि यार हमारी हालत तो भिखारियों से भी गई गुजरी हो गई है, कम्बख्त कोई हमें अपने घर के पास पल भर रूकने भी नहीं देता :)  

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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