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Thursday, November 26, 2009

मुंबई के रेडलाईट एरिया फॉकलैंड रोड से गुजरते हुए

हाल ही में मुंबई के ऐसे इलाके से होकर गुजरा हूँ जो वैश्याओं के इलाके के रूप में जाना   जाता है.....फॉकलैंड रोड ......जहां के अनुभव और जन-जीवन को कई बार लोगों ने फिल्मों में छन छन कर देखा है। दरअसल मुझे मुंबई के सी.पी.टैंक इलाके में स्थित हिंदी ग्रंथ कार्यालय जाना था। यहां मैं पहले भी हो आया हूँ, अपनी बेजोड किताबों के भंडार से पटी यह दुकान अपने आप में अंग्रेजीवाद के बीच हिंदी का अजूबा ही कही जाएगी।
   जिस बस से मैं वहाँ गया था, और वह जिन रास्तों से होकर गुजरी उसकी तो एक अलग  कहानी है। हर रास्ते का नाम अपने आप में अजीम रहा, आंबेडकर मार्ग, मौलाना आजाद मार्ग, मिर्जा गालिब मार्ग,कस्तुरबा गाँधी चौक....। खैर, बात हो रही थी रेडलाईट इलाके की। यह इलाका जिस रोड पर है उस रोड का नाम भी अजब गजब था। अक्सर होता यह है कि दुकानदार अपने दुकान पर साईन बोर्ड के साथ नीचे छोटे आकार में दुकान के नंबर के साथ, पूरा पता भी लिखते हैं। तो, यहां कोई उसे अपनी दुकान पर फाल्कन रोड लिखता, कोई फोकलैंड रोड लिखता, तो कोई सीधे ही फॉक** लिख अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता। ये वह है जो कि अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है।
  
    मेरी  बस जैसे ही रेडलाईट एरिया से होकर गुजरने को हुई, बस में बैठे सभी लोगों की नजरें बाहर की ओर टंग गईं। सडक के दोनो ओर वैश्याएं विभिन्न ढंग से ग्राहकों को अपनी ओर लुभाने की कोशिश कर रही थीं। कोई पान खाए दांत चिआरे ग्राहक को बुला रही थी तो कोई अपनी शेवन आर्मपिट को दिखाने के लिये  अपनी बाहों को बार बार उठा अपने खुले बालों को बाँधने का उपक्रम कर रही थी। किसी किसी जगह पर दो से चार वैश्याएं झुंड बनाकर बैठी थीं। उनके बैठने के तरीके अलग अलग थे। कोई साडी के पल्लों को  एक विशेष रूप से रख  ग्राहक बटोरती तो कोई स्लीवलेस पहने कँखौरियों को दिखाने को तत्पर दिखी तो कोई  यूँ ही हँसी ठिठोली करती हुई। कुछ ग्राहक वैश्याओं से मोलभाव भी करते दिखे।  
    
          ट्रैफिक स्लो होने के कारण बस में बैठे लोग इन नजारों को जम कर देख ताक रहे थे।F M पर सदाबहार गाने बज रहे थे।   वहीं, बाहर सडक पर कई लोग जो दलाल टाईप लग रहे थे, रूमाल को गर्दन में कॉलर के किनारे लपेटे.....मुंह में पान दबाये, हाथ की तर्जनी उंगली से चूने की परत खरोंचे हुए ग्राहकों को फांसने की फिराक में लगे। इन्हें देख गुलजार का लिखा कमीने फिल्म का गीत सटीक लगा.....सौदा करे सहेली का, सर पर तेल चमेली का ..........कि आया....कि आया भौंरा आया रे....गुनगुन करता आया रे..........

             इन्हीं सब नजारों के बीच से बस गुजरती हुई अपने गंतव्य कस्तूरबा गाँधी चौक पहुँची। पास ही की लेन में हिंदी गृंथ कार्यालय वाली दुकान थी। दुकान में घुसने पर पिछले नजारों से अलग दुनिया दिखी। कहीं पर अज्ञेय दिखे तो कहीं प्रेमचंद, एक ओर 'गुनाहों का देवता' सजी थी, तो एक ओर 'सारा आकाश'। वहीं, फणीश्वरनाथ रेणु के 'मैला आंचल' के बगल में 'चरित्रहीन' भी लगी थी। कहीं पर मैत्रेयी पुष्पा की 'इदन्नमम' दिखी तो कहीं पर चित्रा मुदगल की 'आँवा'। बगल में ही 'वेद-पुराणों की मिमांसा' भी दिख गई। इन ढेर सारी क्लासिक रचनाओं और सरस्वती के भंडार को वैश्यालयों से कुछ ही फर्लॉंग की दूरी पर स्थित होने से  मैं सोच में पड गया कि क्या ही अजीब स्थिति है। एक ओर सरस्वती जी का भवन हैं तो पास ही में नरक भोगती महिलाओं का इलाका, जो न जाने किस पाप की गठरी को ढो रही हैं। एक ओर ज्ञानदायिनी भवनिका और दूसरी ओर चंद चहल-कदम ही दूर स्त्रीयों के नारकीय ठीये।  अजब मेल है।
 
    तभी मेरे जहन में फिल्म 'अमर प्रेम' का वह दृश्य कौंध गया जिसमें दुर्गा मूर्तियों की स्थापना के लिये वैश्याओं के घर की देहरी से मिट्टी लेने की प्रथा को दिखाया गया है। फिल्म में मूर्तिकार   से कोई प्रश्न करता है कि दुर्गा जी तो पवित्र हैं, फिर उनकी स्थापना के लिये इन बदनाम जगह वालियों के देहरी की मिट्टी क्यों ली जाती है ? तब मुर्तिकार कहता है कि इन लोगों के यहां की मिट्टी बहुत पवित्र होती है। प्रथानुसार, बिना इस जगह की मिट्टी लगाये दुर्गा जी की मूर्ति स्थापना नहीं की जाती।
      कैसा संजोग है, कि सरस्वती जी और दुर्गा जी का। एक शक्ती दायिनी हैं तो दूसरी ज्ञानदायिनी। जैसे दुर्गा जी को बदनाम गलियों की मिट्टी से स्पर्श पूजन की परंपरा है, वैसे ही शायद साहित्यिक कृतियों के रूप में सरस्वतीजी भी  बदनाम गली की देहरी को  छूती दिख रही हैं। न जाने कितनी उच्च स्तर की साहित्यिक कृतियां इन बदनाम गलीयों की बदौलत ही लिखी जा चुकी हैं। वैश्याओं की देहरी फिर अपनी मिट्टी का मान रखने में कामयाब रही लगती है।

        फणीश्वरनाथ रेणु की 'जूलूस' लेकर लौटते समय फिर वही दृश्य दिखे। ट्रैफिक और भी स्लो हो गया था। गहराती शाम देख वैश्याओं की संख्या और भी बढ आई थी। दलाल और ग्राहक सभी जैसे इसी वक्त को पाने में बेताब थे, मानों शाम कोई उत्सव लिये आ रही हो।  तभी मेरी नजर वैश्याओं के बीच बैठी एक बेहद सुंदर स्त्री पर पडी। शक्ल से वह कहीं से भी वैश्या नहीं लग रही थी. चेहरे पर मासूमियत, साडी के किनारों को उंगलियों में लपेटती खोलती और एक उहापोह को जी रही वह स्त्री अभी इस बाजार में नई लग रही थी। कुछ ग्राहक उसकी ओर ज्यादा ही आकर्षित से लग रहे थे। मेरे मन  में विचार उठा कि आखिर किस परिस्थिती के कारण उसे इस नरक में आने  की नौबत आन पडी होगी। इतनी खूबसूरत स्त्री को क्या कोई वर नहीं मिला होगा। मेरी लेखकीय जिज्ञासा जाग उठी। मन ने कहा........ यदि यहां की हर स्त्री से उसकी कहानी पता की जाय तो हर एक की कहानी अपने आप में एक मानवीय त्रासदियों की बानगी होगी। न जाने किन किन परिस्थितियों में यह स्त्रीयां यहां आ पहुँची हैं। कोई बंगाल से है, कोई तमिलनाडु से है तो कोई नेपाल से है। हर एक की कहानी अलग अलग है, पर परिणाम एक ही। हर एक पर कहानी लिखी जा सकती है।  

       तभी मुझे अमरकांत रचित 'इन्हीं हथियारों से' उपन्यास की लाईनें याद आ गईं जिसमें कोठा मालकिन अपने यहां की लौंडी को ग्राहकों से सावधान रहने के लिये ताकीद देती  है, कि इन  ग्राहकों को कभी अपने दिल की बात नहीं बतानी चाहिये। और न तो कभी दिल  देना चाहिये। यहां जो आते हैं सभी अपने मतलब से आते हैं। इन ग्राहकों में शराबी, जुआरी, लोभी, दलाल, कवि, लेखक सभी तो होते हैं। इनके चक्कर में नहीं फंसना चाहिये।

      अब समझ में आया कि कवियों और लेखकों को क्यों अमरकांत जी ने जुआरियों, शराबीयों और लोभियों की कोटि में रखा था। वैश्यालयों से कवियों और लेखकों को अपनी लेखकीय नायिका के चरित्र ढूँढने में सहायता जो मिलती थी।
  
        इन्हीं सब बातों को सोचते हुए बस जाने कब वैश्याओ के इस बदनाम इलाके को छोड मौलाना आजाद रोड पर गई थी। मैं सोच में था। कैसी विडंबना है कि एक ओर भारत के पहले शिक्षामंत्री मौलाना आजाद के नाम सडक है वहीं दूसरी ओर साहित्य सरिता........... इन दोनों के बीच में शिक्षा व्यवस्था को मुँह चिढाता लेदर करेंसी का ठीया।

  उधर एफ एम चैनल पर गानों के बदले अब मुख्य  समाचार पढे जा रहे थे। बराक ओबामा से प्रधानमंत्री की मुलाकात .........सुरक्षा व्यवस्था पर गहन चिंतन.. ......  राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने आज सुखोई विमान उडाया..........

-         सतीश पंचम

Tuesday, November 17, 2009

फोडा जी, जरा कोने में आईये.....आप को एक बात पब्लिक में प्राईवेट होकर बतानी है :)

       हजारों-करोडों के माल असबाब की बरामदगी के बाद फोडा जी, जब आप  ने   यह कहा कि आपके खिलाफ साजिश की जा रही है।  कोई आपको परेशान कर रहा है। तो आपके इस अप्रतिम सच को देख मैं द्रवित हो गया और मैंने भी अब ठान लिया है कि मैं भी आपकी तरह  मन की बात सच सच सब लोगों को बता दूँ। और  पहला सच यही है कि वो शख्स मैं ही हूँ जो आपको लगातार परेशान कर रहा है। आपकी जो पंपापुर वाली प्रॉपर्टी छापे में पकडी गई है , उसे मैंने ही बताया था कि वह आपकी ब्लैक की कमाई है। और वो जो रजाईपुर की मसहरी वाली के नाम अकाउंट पकडा गया है , वो मैंने ही आयकर वालों को बताया था। फोडा जी आप सच कह रहे हैं कि कोई आपको परेशान कर रहा है। मैं अपने इस अपराध के लिये क्षमा चाहता हूँ।

          नहीं नहीं, मुझे रोकिये मत.....आज मुझे कह लेने दिजिये। आपके अप्रतिम सच से मैं सचमुच बहुत द्रवित हूँ। हाँ, तो मैं कह रहा था कि वह जो चिल्लेमिंयां की खदान  है न, उस पर रजिस्ट्री मैंने ही आपके नाम की करवा दी थी। करोडों की बात थी, तो मैंने सोचा था कि आपके नाम कर दूंगा तो आप जल्दी पकड में आ जाओगे, क्योंकि मंत्री बनने के पहले तक आपकी औकात एक लुंगी और बनियान पहन चप्पल फटकारते आदमी की ही थी। अचानक करोडों की खदान आपके नाम हो जाय तो समझा जा सकता है कि आपने कुछ हेराफेरी की होगी। इसलिये मैंने खदान की रजिस्ट्री आपके नाम कर दी थी। इसके लिये मैं मेरी अर्थी उठने तक क्षमाप्रार्थी हूँ। अर्थी उठने से याद आया कि आप तो सुबह देर से उठते थे क्योंकि आप खदानों के ठेके आदि के लिये ओवर टाईम भी करते थे। बताओ भला, ऐसे कर्मठ और वस्तुनिष्ठ प्रतिभा को मैं यूँ ही फंसाने की जुगत में था।


         फोडा जी, आई एम वैरी वैरी सॉरी.......आपको मैंने फंसाने की कोशिश की। अब मैं चाहता हूँ कि ये जो सब आय कर जायकर वाले हैं उनको भी आप यह सच बता दिजिये कि वह शख्स मैं ही हूँ जो आपको फंसा रहा था। आपके खिलाफ साजिश कर रहा था। आप मुझ पर जरा भी रहम न करें और सारी बातें खुल कर बताएं कि कैसे मैंने अपनी सपत्ति आपके नाम कर दी केवल इसलिये कि आप फंस जाएं। फोडा जी, आप संकोच न करें, उन्हें खुलकर बताएं की वह सारी संपत्ति मेरी है जो आपके नाम पर पकडी गई है। मैं जो चाहे सजा भुगतने के लिये तैयार हूँ। और हां, आप उन सारी संपत्तियों को निसंकोच मेरे नाम कर दिजिये। कहा गया है कि पाप की चीज को ज्यादा देर अपने पास नहीं रखना चाहिये। मैं पहले आपका विरोधी था, लेकिन आपकी सच्चाई को देख कर मैं यह पाप का बोझ आप पर लदने नहीं दूँगा। एक पैर पर खडा रहूँगा लेकिन आपको पाप के लांछन से मुक्त करके रहूँगा। इसके  लिये मुझे सरकार चाहे जो सजा दे, मैं तैयार हूँ। लुंगी, चड्ढी और गमझा सब मैंने पहले से ही झोले में रख लिया है। कंघी भी रख ही लेता हूँ। सुना है कि जेल में शेविंग क्रीम वगैरह नहीं होती, केवल पानी लगाकर ही शेव करना पडता है तो पामोलीव वाला शेविंग क्रीम भी ले ही लेता हूँ। तौलिया लूँ कि न लूँ इसी उलझन में हूँ क्योंकि लुंगी होने से तौलिये का भी काम हो जाता है, तो नाहक बोझ क्यों लेकर चलूँ। वैसे भी ये पाप का बोझ तो मेरे साथ है ही, अब और कितना बोझ लादकर चलूँ।
 
     रास्ते में चकचोन्हर वकील बाबू के यहां होकर चलियेगा। क्या है कि मेरे सभी माल असबाब की रख रखाव वही करते हैं, तो जो कुछ मैंने आपके नाम रजिस्ट्री किया है, उसे चकचोन्हर बाबू के हाथों ही मेरे नाम कर दिजिये। लगे हाथ यह काम भी हो जाय तो अच्छा है।

       चलिये, मेरे जेल जाने का वक्त हो रहा है, वैसे भी जल्दीयै लौटना भी तो होगा। किसी को बेबात फंसाने की सजा इतनी लंबी तो होती नहीं कि पूरी उमर जेल में ही बितानी पडे। और बित्ते भर की सजा पर गज भर का लाभ मिल रहा हो तो ऐसी सजा कौन न झेलना चाहेगा। तो, ऐसा किजिये कि आप जरा मेरा यह झोला पकडिये, मैं जरा छोटई की महतारी को ढाँढस बंधा आउं। उ भी बहुत दुखी थी कि मेरी वजह से फोडा जी सांसत में हैं। यह जानकर तो वह और दखी थी कि आपके नाम जो तमाम चार पांच हजार करोड की जो संपत्ति है वह असल में मेरी है। मुझे तो छोटई की माई ने बहुत दुत्कारा। कह रही थी कि जरा भी इंसानियत बची है मुझमें तो जाकर तुरंत आपसे माफी के  साथ साथ माल असबाब मांग लूँ ताकि आप और सांसत में न पडें।
 
      वो जो 640 करोड मिला है न उ महानगरीया में, तो उसमें से ही आप अपने लिये एक ठो चुडीदार पाजामा कुर्ता सिलवा लिजियेगा, लल्लन टेलर के यहां जाईयेगा तो वह अच्छा सिलकर देता है। बस उससे हमारा नाम भर बता दिजियेगा। आप का कपडा अच्छा सिलकर देगा। कपडा चुराएगा नहीं।
 
     तो चलूँ, जेल वाली दीवार मेरा इंतजार कर रही है। क्या कहूँ, आपसे बिछडते हुए बहुत दुख हो रहा है। सोचता हूँ कि आप भी साथ होते तो ये दुखियारे दिन जल्दी ही कट जाते। फिलहाल तो बकरे कटवाईये ताकि ईश्वर की अनुकंपा बनी रहे।  फोडा जी, ...........कहा थोडा....... समझना ज्यादा.......और क्या कहूँ, आप तो खुद समझदार हैं। ईश्वर से आपके लिये सुख की कामना करता हूँ। चलिये फिर मुलाकात होगी। कहा गया है कि सज्जन व्यक्ति ही सज्जनता का सम्मान करता है। आप जैसा सज्जन व्यक्ति तो इस संसार में ढूँढे न मिलेगा।

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   अरे, ये लाईट को क्या हो गया। सज्जन ढूँढने की बात कर रहा हूँ और यहां अक्षर तक ढूँढने पड रहे हैं। उफ्फ, इस देश का कुछ नहीं हो सकता । ढंग से व्यंग्य भी लिखना हो तो एकाध किलो तेल जनरेटर को अर्पण करना पडता है।

        अच्छा फोडा जी, गुड नाईट एंड शब्बा खैर। फिर मिलेंगे। 'नीड का निर्माण फिर' वाली कविता हम लोग दुबारा पढेंगे और हां, निर्माण से याद आया कि वो जो लतमारगंज में  अवैध निर्माण चल रहा है, उसे भी मैंने ही आपके नाम से कर रखा है, कोई पूछे तो मेरा नाम बता दिजिएगा :)




- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर अदृश्य  कन्वेयर बेल्ट के जरिये 640 करोड रूपयों की खोखा  ढुलाई झारखंड से महाराष्ट्र तक  हुई है।

समय - वही, जब कन्वेयर बेल्ट में लगने वाली एक घिरनी बगल वाली घिरनी से कहती है कि ऐसा भी क्या कमाना कि ढोने के लिये कन्वेयर बेल्ट लगे। सुनकर दूसरी घिरनी कहे, जानती नहीं क्या बहन......... पैसे में बहुत वजन होता है :)

( य़ह व्यंग्य आज की राजनीति पर है जो केवल चेहरे दर चेहरे  बदलती है, कर्म नही   - सतीश पंचम  )

Sunday, November 1, 2009

क्या हिंदी पट्टी के पत्रकारों के वजह से देश में हिंदी प्रदेशों की गलत छवि बन रही है ?

      मेरा मानना है कि हिंदी पट्टी के मीडिया कर्मी ज्यादा संख्या में होने से एक प्रकार की मुसीबत सी हो रही है। एक इमेज सी बनती जा रही है यू पी बिहार के बारे में कि ये लोग ऐसे होते हैं..वैसे होते हैं। रहने का ढंग नहीं जानते है आदि...आदि...।

       अब इसे मैं एक प्रकार का दुर्भाग्य ही मानूंगा कि हिंदी पट्टी के ज्यादातर लोग नेशनल न्यूज चैनलों में हैं। अक्सर न्यूज जब भी बिहार के बारे में चलाई जाती है तो एक दरिद्रता का वरक लपेट कर पेश की जाती है। लेकिन बार बार इन्ही प्रदेशों से खबरे दिखाये जाने पर एक प्रकार की नेगेटिव इमेज बनना लाजिमी है।

     सवाल यह उठता है कि क्यों कैमरा हिमाचल को फोकस नहीं कर पाता....क्यों कैमरा तमिलनाडु या उडीसा को फोकस नहीं कर पाता। क्या देश के बाकी इलाके अपने खान पान और साडी-मीनाकारी-पच्चीकारी वगैरह दिखाने के लिये ही बने हैं। क्या बाकी जगह कैमरा यही बताने के लिये है कि कन्याकुमारी का यह पेय फेमस है, केरल की यह कला उत्तम है……क्या वहां खबरें नहीं होती….वहां मर्डर या अपराध नहीं होते ? क्या वहां कोई अप्रिय घटना नहीं घटती ?

        कभी रूट लेवल पर काम करते हुए कैमरे का फोकस एडजस्ट किया जाय तो देश में दिखाने के लिये बहुत कुछ है। लेकिन हिंदी पट्टी के होने के कारण पत्रकार भी अपने क्षेत्र से हट नहीं पाते और बार बार घोल-घाल कर वही सब दिखाते रहते हैं। यह इमेज ही है जिसके कारण हिंदीभाषी अक्सर अपमानित होने को अभिशप्त होते जा रहे हैं। उधर राजू श्रीवास्तव जैसों के गंवई चुटकुले भी हिंदी पट्टी को एक लंठ मान पेश किये जाते हैं। जब कोई इन प्रदेशों से कहीं नौकरी आदि के लिये जाता है तो उसे अन्य समस्याओं के अलावा एक नेगेटिव छवि को लेकर भी चलना पडता है।

नेगेटिव इमेज बनने का एक उदाहरण और ।

         जब सुबह टीवी ऑन करो तो सबसे पहले गुडगांव या नोयडा की खबर होती है कि वहां फलां ट्रक लुढक गया या फलां एक्सिडेंट हो गया या कि फलां जगह वारदात हुई है। अब चूँकि नोयडा या गुडगांव का रास्ता मिडिया वालों के रास्ते में पडता है तो सुबह सुबह न्यूज चलनी शुरू हो जाती है औऱ वह भी ब्रेकिंग न्यूज का ठप्पा लगाये।  तो इमेज ये बन रही है कि नोयडा-गुडगांव काफी असुरक्षित है...जबकि लोग यह नहीं सोच पाते कि आखिर सुबह सुबह न्यूज पहले वहीं की क्यों फ्लैश होती है।

     मैं पत्रकारिता से नहीं जुडा हूँ, न ही मैं कभी गुडगांव या नोयडा गया हूँ। लेकिन जिस तरह से चींटियों की कतार देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां चींटियों का घर होगा और उसके कतार की दिशा में ही कोई मीठा या खाने योग्य सामग्री है तो उसी आधार पर कह रहा हूँ कि मीडिया तंत्र का जमावडा एक गुच्छे के रूप में जरूर नोयडा या गुडगांव के आसपास है। आधुनिक शब्दावली में इसे ही हब कहा जाता है। चींटियो की कतार अपने आवागमन से सुबह छह बजे खुद ही लाईव हो जाती है :)

      यूं तो हर गली या मुहल्ले में मीडिया वाले मिल जाएंगे लेकिन नेशनल लेवल पर कोई तुरंता प्रसारक या OB Van उनके लिये शायद उस हद तक उपलब्ध न हो। अगर हो भी तो इतना दबाव तो नहीं ही होगा कि कोई नई खबर जल्दी फ्लैश करो...... जबकि हब होने से गुडगांव या नोयडा इस मामले में प्रसारण कर देते हैं। इन मुद्दों पर थोडा सा ध्यान भर देने की जरूरत है। बाकी चीजें तो खुद ब खुद समझ आ जाएंगी।

     और अंत में शरद जोशी के लापतागंज की तर्ज पर मीडिया के बारे में अपने शब्दों में कहूं तो

-   यहां सब बिज्जी हैं..... थोडा सा ध्यान दिया जाय तो बिज्जीपन नजर आ जाता है कि कितने बिज्जी है :)


( यह लेख मैने रवीश जी की एक पोस्ट में जो टिप्पणी दी थी उस पर आधारित है । इस मुद्दे पर चर्चा, प्रतिक्रिया आदि को जानने के लिये रवीश जी के ब्लॉग में जाया जा सकता है । मैं यहां व्यक्तिगत होकर पोस्ट नहीं लिख रहा हूँ बल्कि इस पोस्ट को समस्त नेशनल ( ? )  हिंदी पट्टी के पत्रकारों के लिये  ही समझा जाय । रवीश जी के बोलने बताने के तौर तरीकों को मैं भी काफी पसंद करता हूँ, लेकिन कहीं न कहीं यह मुद्दा रह रह कर मन में  करक रहा था, सो पोस्ट के रूप में लिख रहा हूँ  )

 - सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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