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Saturday, October 24, 2009

बुद्धि और विवेक का गूढ अंतर......है या नहीं है..... है....बहुत है।

      मुंबई में मेरे कॉलेज के दिनों में मेरी मनोविज्ञान की कक्षा में एक दिन लेक्चरर ने प्रश्न पूछा था कि बताओ बुद्धि और विवेक में क्या अंतर है ?  What is the difference between Intelligence and Wisdom ? सुनकर लगा कि ये क्या बात हुई। दोनों तो एक ही चीज है। पर कुछ लडकों ने शायद इस बारे में पहले से पढ रखा था या जानते थे कि बुद्धि और विवेक में क्या अंतर है। एक दो ने खडे होकर बताना शुरू किया तो लगा कि हां, वाकई गजब का डिफरेंस है दोनों में। बाद में लेक्चरर महोदय ने एक कहानी बता कर इस बात को स्पष्ट किया था।

       कहानी के अनुसार एक व्यापारी था। अपने चार बच्चों को लेकर वह कहीं जा रहा था। रास्ते में एक नदी पडी। नदी को पार करने के लिये कोई साधन न देख व्यापारी ने उस पार जाने के लिये अपनी बुद्धि लगाई और नदी की गहराई नापना शुरू कर दिया ताकि बच्चों समेत वह नदी पार कर सके। नापने के लिये उसने एक लकडी ली और नदी की धार में घुस गया। एक जगह लकडी से गहराई नापा तो वह सबसे छोटे लडके के बराबर गहरा था। आगे एक जगह लकडी नदी मे डालकर गहराई नापा तो वह स्थान बडे लडके के उंचाई के बराबर गहरा था। कुछ और नापा तो गहराई एक दो फीट से ज्यादा नहीं थी। यानि सबसे छोटे लडके के कमर और घुटने तक। व्यापारी ने और दो चार जगह लकडी डुबा डुबाकर पानी की गहराई नापी। नदी से बाहर आकर व्यापारी ने उस लकडी से नापी गई गहराईयों का average निकाला। इसके बाद व्यापारी ने अपना और अपने बच्चों की उंचाई नाप कर उसका Average निकाल दिया। बच्चों और उसकी खुद की उंचाई का औसत नदी की गहराई से ज्यादा था। सो व्यापारी ने मान लिया कि बच्चे यदि नदी में उतरते भी हैं तो नहीं डूबेंगे क्योंकि नदी की गहराई बच्चों की औसत लंबाई से कम है।


व्यापारी ने अपने बच्चों को नदी में उतार दिया और उस पार चलने का आदेश दिया। लेकिन व्यापारी के देखते ही देखते उसके बच्चे नदी मे डूब गये। व्यापारी ने बाहर आकर सोचा कि ये कैसे हो गया ? उसने औसत तो ठीक ही निकाला था। बुद्धि तो लगाई थी। तभी अचानक व्यापारी को भान हुआ कि उसने गणना करने में बुद्धि तो लगाई लेकिन उस गणना को मानने या न मानने का विवेक नहीं लगाया। यदि विवेक लगाया होता तो उसके बच्चे न डूबते।


                       बकौल विवेकी राय, यही हाल हमारे अर्थशास्त्रज्ञों और निति नियंताओं का भी है। वो गणना करके यह मानते ही नहीं कि महंगाई बढी है। उनके गणनानुसार मुद्रा स्फिति निगेटिव है। सभी आंकडे महंगाई के काबू में होने की बात कह रहे होते हैं । गौर से देखा जाय तो इन नीति निर्माताओ का भी हाल उसी व्यापारी की तरह है जो गणना करके औसत आदि निकाल कर अपने को बुद्धि वाला मानता था। यहां हमारे मंत्री -अफसर भी उसी की तरह विवेक नहीं लगा रहे हैं। उन्हें कौन समझाये कि सरकारी बाबूओं द्वारा उपलब्ध आंकडे तो उस लकडी की तरह हैं जिससे व्यापारी ने बुद्धि लगाकर नदी की गहराई नापी थी। लकडी ने कहीं दाल नापी, कही पर शक्कर, एक जगह भूसा नापा, एक जगह आलू तो कहीं बिना कुछ नापे ही आंकडे भर दिये। यहां ध्यान देने की बात है कि सरकारी रौबदाब में लकदक आंकडेबाजी की लकडी वैसी की वैसी ही रही। न घटी न बढी, लेकिन जीवनरूपी  नदी तल की गहराई जरूर कम ज्यादा होती रही।


      ऐसे में तमाम तरह की आंकडेबाजी के चक्कर में देश की अधिकतर जनता तमाम परेशानीयों से जूझते हुए  आंकडों के  बहाव में  डूब ही जाये तो आश्चर्य कैसा ? 



(  विशेष :  अर्थशास्त्रियों की आंकडेबाजी से संबंधित संदर्भ विवेकी राय ( गाजीपुर) द्वारा उनकी किसी किताब  में एक जगह दिया गया है जो कि मेरे पैतृक निवास जौनपुर में छूट गई है।  इस से संबंधित अर्थशास्त्र का संदर्भ देने का श्रेय विवेकी राय जी को ही है। मैं तो बस उसे यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ।   )


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे एक परेशान शहर की संज्ञा दी जाने लगी है।

समय - वही, जब नक्शे पर एक निशान लगा कर चीनी अफसर कहता है...  अब नक्शे छापने वाली मशीनों को फिर से ऑर्डर देना पडेगा.....कागज कंपनी में फोन लगाओ तो........।

Tuesday, October 13, 2009

लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर


छप्पन भोग लगते हैं तुम्हें
गुडहल गेंदे के फूल फबते हैं तुम्हें
लोगों के हूजूम पूजते हैं तुम्हें
 
ऐसे स्थल को छोड क्यों कर निकलोगे बाहर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 
तभी तो,
हर घर में दुग्ध पीते दिख जाते हो
कभी शाक-सब्जी में भी नजर आते हो
बारिश की बूँदों से छपछपा उठी
सूखी दीवाल पर भी दिख जाते हो
 
गदगद हो काई लगी दीवाल को पुजवाकर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 
कब तक यूँ ही भरमाओगे
इत्र फुलेल की छिडक से
कब तक नथुनों को नरमाओगे
भूखे लोगों से हर दिन
कब तक अर्ध्य अर्पण कराओगे
अरे कभी तो तुम लजाओगे
 
क्या लजाना इतना भी है दुश्कर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 
लोगों कहते हैं कि तुम कण कण में हो
नदी, पर्वत, नभ, जल में हो
बस, आज मुझे इतना बता दो
वो गुडहल का फूल सूखा क्यों
कण पराग का रूठा क्यों
जो पडा था तुम्हारे ही गले में
 
जवाब अभी नहीं  तो  दो कुछ ठहरकर
सांझ-गोधुलि या फिर पहर कर
 
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां ओट ( वोट )  पड रहे हैं जिसकी ओट लेकर बडे बडे काम करने का मंसूबा बांधा जायेगा।

समय - वही, जब मंसूबा बांधते समय एक ओर से रस्सी खुल जाय और मंसूबा सोच रहा हो कि अब मैं खुद को कैसे बांधूं : )


**** पंकज मिश्र जी द्वारा टिप्पणी में इस मंदिर के बारे में पूछे जाने पर थोडी बहुत जानकारी ये रही***** यह मंदिर जौनपुर मे है। ध्यान से देखेंगे तो इसके गर्भगृह के बाहर कुछ लोग बैठे या सोये हुए हैं। ये लोग अकारण नहीं सोये हैं। 
दरअसल जौनपुर में शिक्षामित्रों के ट्रेनिंग के दौरान जब महिलाएं ट्रेनिंग कक्ष में ट्रेनिंग ले रही होती हैं, उस वक्त उनके पति पास ही के मंदिर में शरण लेते हैं, बच्चा संभाले हुए या खुद को संभाले हुए। ट्रेनिंग छूटने पर शाम होते ही अपनी अपनी फटफटीया पर लेकर निकल पडते हैं घर को। इस जगह की Exact location तो नहीं पता पर कहीं ब्लॉक वगैरह के आसपास ही है । 


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Monday, October 5, 2009

जब एक साल पहले 'विमान के ऑटोपायलट मोड' वाली मेरी लिखी पोस्ट के कुछ अंश विमान में वाकई घट गये ।


    अभी हाल ही में पता चला कि एक विमान में छेडछाड को लेकर हंगामा हुआ और विमान को दोनों पायलट ऑटोपायलट मोड में रख दिये ।  इसी ऑटोपायलट वाले मुद्दे को लेकर मैंने जो पोस्ट लिखी थी उसमें एक जगह कॉकपिट में हुई हल्की छेडछाड का भी जिक्र था। मुझे क्या पता था कि एक साल बाद वही सब घटित हो सकता है। लिजिये पेश है वह पोस्ट.....

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       नितिन के कदम खुदबखुद Pilot Rest-Room की ओर बढे जा रहे थे, कमबख्त इस बंगलोर वाली Flight ने परेशान कर रखा है , एक नजर घड़ी की तरफ़ डाली - ओह.... Its 4.00 am.....damm, I hate this timing. जब सभी लोग सो रहे होते हैं रात एक बजे , कमबख्त तभी इस Flight को attend करो , साले ये भी तो नही कह सकते की एक spare Pilot रखें, cost saving .......Bullshit.... मन ही मन नितिन कुढ़ता हुआ Pilot Rest Room मे दाखिल हुआ। सोफे पर धम्म से गिरते हुए जैसे उसे लगा अब यहीं सो जाऊं तो अच्छा रहे, तभी Rest Room attendent कृपाल सिंघ ने दरवाजा खटखटाया , May I sir, ............ya Come come, न चाहते हुए भी नितिन को बोलना ही पड़ा , इस वक्त वो किसी से बोलना नहीं चाहता था लेकिन एक कृपाल ही तो था जो रोज उसी की तरह नाईट ड्यूटी करता , और गाहे बगाहे जब उसे नाईट ड्यूटी से खीज होने लगती तो कृपाल को देख कर जैसे उसे अहसास होता की वो अकेला नहीं है, हालांकि Co-Pilot सुधीर साथ होता है लेकिन उसके साथ कितनी देर बात की जाय, बंगलोर से मुंबई तक तो लगभग रोज ही वो दोनों साथ साथ होते हैं और बातें भी तो वही पायलटों वाली , Poor Visibility, Hang-on, Hang-Off, one point Landing , Two Point Landing, कमबख्त इसके सिवा ज्यादा हँसी मजाक भी तो नहीं कर पाते , अभी उस दिन Air-Hostess मीना चटर्जी को सिर्फ़ Hi Kitty ही तो कहा था .  Flying Manager मिश्रा ने छूटते ही कह दिया , see , I don't want any escalations, Please behave properly in Cockpit, Your voice details are with us........no more to say.  साला जैसे उसे cockpit की इन्ही बातों को सुनने के लिए रखा है।

सुधीर साब नहीं आए - कृपाल ने पानी का ग्लास और नमकीन रखते हुए पूछा।

नहीं, उसके कोई गेस्ट मिल गए हैं , उनसे मिल कर बाद मे आएगा- अनमने होकर नितिन ने जवाब दिया ।

चाय ले आऊं ?

नहीं , आज मूड नहीं है । तुम जाओ , अभी थोड़ा सोना चाहता हूँ ।

जी अच्छा, - कहकर कृपाल वापस चला गया।

      पानी पीकर नितिन की नजर टेबल पर पड़ी aviation Magazines पर पड़ी, - कहीं Airspace है, तो कहीं Flying ढकी है, उसके बगल मे ही Wings दिख रही है , उसने ज्यादा इधर उधर न देखते हुए सोफे पर ही सो जाने का उपक्रम किया , पैर फैलाकर उसने आँखें बंद कर लीं , लेकिन कमबख्त नींद को क्या हो गया , वो भी नहीं आ रही अब, सामने पड़े Rest Bed पर नजर पड़ी , नितिन ने उठकर उसी पर सो जाना चाहा, पानी और नमकीन वैसे ही पड़े रहे, जैसे उन्हें पता हो की उन्हें कोई छूने वाला नहीं है- इतना वो भी जानते हैं।

     Bed पर पड़ने के बाद नितिन ने आँखें बंद कर सोना चाहा , लेकिन बहूत देर तक आँखें बंद करने के बाद भी नींद नहीं आई, कभी - कभी ऐसा भी होता है की जिस चीज की जब जरूरत होती है, वो अचानक मिल जाए तो उस चीज की वैल्यु ख़त्म सी हो जाती है। वह चीज जब तक सामने नहीं होती , लगता है , यही सबसे जरूरी चीज है।

अब........

     अब क्या करूँ, ये अचानक नींद को क्या हो गया, अभी तक तो साली जैसे बदन तोड़ रही थी- नितिन जैसे मन ही मन बुदबुदाया। Bed के बगल मे पड़े न्यूज़ पेपर पर हाथ बढाया ..... सोये सोये ही खबरें अनमने सी देखने लगा , Nuclear deal issue गर्म था , एक जगह आरुशी हेमराज की खबरें बतायी गयी थीं, मुह का स्वाद जैसे कड़वा हो गया, एक मर्डर क्या हुआ पूरा मिडिया पीछे पड़ गया, तभी एक जगह नजर पड़ी- विमान मे पायलट सो गए , पूरी ख़बर मे दिलचस्पी बढ़ गयी, एक तो वैसे भी उसके पेशे से जुड़ी ख़बर थी, ऊपर से ये जिस तरह से हेडिंग लिखी गयी थी , उससे उसकी दिलचस्पी और बढ़ गयी, पूरी ख़बर को एक साँस मे पढ़ डाला, विमान Autopilot पर रख कर पायलटों के सो जाने की ख़बर थी की किस तरह विमान मे कई सौ यात्री थे और पायलट थे की सोये हुए थे, एक बार फ़िर नितिन को लगा मुह का स्वाद बिगड़ गया है, उठ कर बैठ गया, कुछ देर यूँ ही bed पर बैठने के बाद , उसने सोचा चाय पी जाय, बगल मे लगे काल बेल को बजाया, थोडी देर मे कृपाल वापस दरवाजे पर-

yes Sir?

कृपाल एक चाय लाना।

जी- कहकर कृपाल चला गया।

    नितिन फ़िर सोच मे डूब गया, - क्या होता अगर Autopilot Mode मे ही कोई accident वगैरह हो जाता। ऐसा नहीं है की नितिन ने प्लेन Autopilot मे न रखा हो, लेकिन कितनी देर, सिर्फ़ कुछ मिनट तक जब लगता की यहाँ ज्यादा कुछ Handle करने को नहीं है, और फ़िर CoPilot भी तो होता है, लेकिन यहाँ तो दोनों ही सो गए थे । सोचते हुए नितिन को News की headlines याद आई - गुर्जर आन्दोलन से rail सेवा बंद, सिखों ने बाबा राम रहीम के वजह से बंद किया, Jammu  बंद , अमरनाथ श्राइन बोर्ड से जमीन वापस ली गयी, मुंबई मे बाहरी- भीतरी के नाम पर हंगामा मचा है , लोगों को परेशान किया जा रहा है की तुम नॉर्थ वाले हो या कहाँ के ...............

     तभी नितिन ने सोचा - ये देश भी तो Autopilot पर है - कोई देखने वाला नहीं, कोई बोलने वाला नहीं - ऐसे मे कोई Accident हो जाए तो .......लेकिन accident तो उस विमान मे भी नहीं हुआ था , तो क्या देश सचमुच Autopilot पर है ?

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  उस समय  कमेंन्टस देते समय  ज्ञानदत्त जी ने एक बात कही थी कि -  सचमुच देश आटो पाइलट पर है। पिछले महीने गुर्जर आन्दोलन में गाडियां बन्द रहीं, पर आज पिछले महीने के बारे में विवरण लिखते समय कई प्लस पॉइण्ट हैं जो लिखे जा सकते हैं।






       
        अब जब एक साल से ज्यादा का वक्त गुजर गया है इस पोस्ट को लिखे, तो अब तो ढेरों प्वॉंइंट्स हैं.....एक तो यही जीता जागता मामला आ भिडा है......छेडछाड + ऑटोपायलट मोड वाला ।


      हांलाकि यह पोस्ट मैंने Short Story के रूप में लिखा था, लेकिन नहीं जानता था कि कभी इस तरह की छेडछाड वाली घटना कॉकपिट में वाकई घट सकती है।  फिलहाल ऐसी परिस्थ्ति में प्लेन को ऑटोपायलट मोड पर रख यदि दोनो ही पायलट कॉकपिट से बाहर आ गये ,  ऐसे में यदि कॉकपिट के दरवाजे  का ऑटोलॉक फिचर काम कर गया होता तो प्लेन को बचाना मुश्किल था, क्योंकि तब दोनों में से एक भी पायलट विमान की लैंडिंग कराने के लिये डैशबोर्ड तक नहीं पहुंच पाता। 

- Satish Pancham

स्थान - वही, जहां पर पिछले चौबीस घंटे से ज्यादा रिमझिम- रिमझिम बारीश हो रही है।

समय - वही, जब दोनो पायलटों को लगे कि अब विमान को ऑटोपायलट मोड पर रख थोडा यात्रियों की तरफ चला जाय तफरीह करने....... इस विश्वास के साथ कि कॉकपिट का ऑटोलॉक फीचर तो कब का लॉक है  :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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