मुंबई में मेरे कॉलेज के दिनों में मेरी मनोविज्ञान की कक्षा में एक दिन लेक्चरर ने प्रश्न पूछा था कि बताओ बुद्धि और विवेक में क्या अंतर है ? What is the difference between Intelligence and Wisdom ? सुनकर लगा कि ये क्या बात हुई। दोनों तो एक ही चीज है। पर कुछ लडकों ने शायद इस बारे में पहले से पढ रखा था या जानते थे कि बुद्धि और विवेक में क्या अंतर है। एक दो ने खडे होकर बताना शुरू किया तो लगा कि हां, वाकई गजब का डिफरेंस है दोनों में। बाद में लेक्चरर महोदय ने एक कहानी बता कर इस बात को स्पष्ट किया था।
कहानी के अनुसार एक व्यापारी था। अपने चार बच्चों को लेकर वह कहीं जा रहा था। रास्ते में एक नदी पडी। नदी को पार करने के लिये कोई साधन न देख व्यापारी ने उस पार जाने के लिये अपनी बुद्धि लगाई और नदी की गहराई नापना शुरू कर दिया ताकि बच्चों समेत वह नदी पार कर सके। नापने के लिये उसने एक लकडी ली और नदी की धार में घुस गया। एक जगह लकडी से गहराई नापा तो वह सबसे छोटे लडके के बराबर गहरा था। आगे एक जगह लकडी नदी मे डालकर गहराई नापा तो वह स्थान बडे लडके के उंचाई के बराबर गहरा था। कुछ और नापा तो गहराई एक दो फीट से ज्यादा नहीं थी। यानि सबसे छोटे लडके के कमर और घुटने तक। व्यापारी ने और दो चार जगह लकडी डुबा डुबाकर पानी की गहराई नापी। नदी से बाहर आकर व्यापारी ने उस लकडी से नापी गई गहराईयों का average निकाला। इसके बाद व्यापारी ने अपना और अपने बच्चों की उंचाई नाप कर उसका Average निकाल दिया। बच्चों और उसकी खुद की उंचाई का औसत नदी की गहराई से ज्यादा था। सो व्यापारी ने मान लिया कि बच्चे यदि नदी में उतरते भी हैं तो नहीं डूबेंगे क्योंकि नदी की गहराई बच्चों की औसत लंबाई से कम है।
व्यापारी ने अपने बच्चों को नदी में उतार दिया और उस पार चलने का आदेश दिया। लेकिन व्यापारी के देखते ही देखते उसके बच्चे नदी मे डूब गये। व्यापारी ने बाहर आकर सोचा कि ये कैसे हो गया ? उसने औसत तो ठीक ही निकाला था। बुद्धि तो लगाई थी। तभी अचानक व्यापारी को भान हुआ कि उसने गणना करने में बुद्धि तो लगाई लेकिन उस गणना को मानने या न मानने का विवेक नहीं लगाया। यदि विवेक लगाया होता तो उसके बच्चे न डूबते।
बकौल विवेकी राय, यही हाल हमारे अर्थशास्त्रज्ञों और निति नियंताओं का भी है। वो गणना करके यह मानते ही नहीं कि महंगाई बढी है। उनके गणनानुसार मुद्रा स्फिति निगेटिव है। सभी आंकडे महंगाई के काबू में होने की बात कह रहे होते हैं । गौर से देखा जाय तो इन नीति निर्माताओ का भी हाल उसी व्यापारी की तरह है जो गणना करके औसत आदि निकाल कर अपने को बुद्धि वाला मानता था। यहां हमारे मंत्री -अफसर भी उसी की तरह विवेक नहीं लगा रहे हैं। उन्हें कौन समझाये कि सरकारी बाबूओं द्वारा उपलब्ध आंकडे तो उस लकडी की तरह हैं जिससे व्यापारी ने बुद्धि लगाकर नदी की गहराई नापी थी। लकडी ने कहीं दाल नापी, कही पर शक्कर, एक जगह भूसा नापा, एक जगह आलू तो कहीं बिना कुछ नापे ही आंकडे भर दिये। यहां ध्यान देने की बात है कि सरकारी रौबदाब में लकदक आंकडेबाजी की लकडी वैसी की वैसी ही रही। न घटी न बढी, लेकिन जीवनरूपी नदी तल की गहराई जरूर कम ज्यादा होती रही।
ऐसे में तमाम तरह की आंकडेबाजी के चक्कर में देश की अधिकतर जनता तमाम परेशानीयों से जूझते हुए आंकडों के बहाव में डूब ही जाये तो आश्चर्य कैसा ?
( विशेष : अर्थशास्त्रियों की आंकडेबाजी से संबंधित संदर्भ विवेकी राय ( गाजीपुर) द्वारा उनकी किसी किताब में एक जगह दिया गया है जो कि मेरे पैतृक निवास जौनपुर में छूट गई है। इस से संबंधित अर्थशास्त्र का संदर्भ देने का श्रेय विवेकी राय जी को ही है। मैं तो बस उसे यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ। )
- सतीश पंचम
स्थान - वही, जिसे एक परेशान शहर की संज्ञा दी जाने लगी है।
समय - वही, जब नक्शे पर एक निशान लगा कर चीनी अफसर कहता है... अब नक्शे छापने वाली मशीनों को फिर से ऑर्डर देना पडेगा.....कागज कंपनी में फोन लगाओ तो........।
दुर्गम और रोमांचक - त्रियुण्ड
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आज ऐसी जगह पर चलते हैं जहाँ जाने का साहस कम ही लोग जुटा पाते हैं। क्योंकि
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