सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र जी के कुछ प्रशंसकों द्वारा उन पर एक पुस्तक प्रकाशन की योजना है। कुछ दुर्लभ सामग्री के साथ पुस्तक में उनसे संबंधित अन्य रचनाओं का भी समावेश हो सके, इसके लिये शैलेन्द्र जी के प्रेमियों से जीवन प्रभात प्रकाशन ने आग्रह किया है कि उनके जीवन के संस्मरण, गीत , कविता आदि नीचे दिये पते पर भेजने का कष्ट करें। उपयोग के बाद सभी सामग्री वापस की जाएगी।
शैलेन्द्र जी से संबंधित एक प्रसंग मेरे इसी ब्लॉग पर पब्लिश हुई थी। यदि आप लोगों के पास भी ऐसी ही कुछ बातें हों तो जरूर इस पते पर संपर्क करें।
पता - जीवन प्रभात प्रकाशन, A 4/1, कृपानगर, मुंबई - 56 फोन नंबर - 9821042840
email - jeevanprabhat@yahoo.in
प्रसंग जिसे मैंने यहां ब्लॉग पर पब्लिश किया था - ( 11/8/09)
यूँ तो मुंबई के पवई में कार्यालय होने के कारण रोज ही पवई झील के पास से गुजरता हूँ, पर कल अचानक एक विशेष वजह से मुझे ये पवई झील कुछ अलग लगने लगी। वजह भी कुछ खास ही है। दरअसल कल ही मैंने फणीश्वरनाथ रेणु जी के बारे में ‘रेणु रचनावली’ में एक बात पढी है और उसके जरिये पता चला कि ये वही पवई लेक है जिसके किनारे बैठकर फणीश्वरनाथ रेणु और गीतकार शैलेन्द्र जी बहुत रोये थे।
दरअसल फणीश्वरनाथ रेणु जी ने शैलेन्द्र को इसी पवई लेक के किनारे एक बहुत ही करूण गीत सुनाया था । गीत के बोल ग्रामीण अंचलों का भाव लिये थे जिसमें ससुराल में आई लडकी अपने भाई को याद कर रही है। दरअसल जब पहले अक्सर छोटी उम्र में ही विवाह हो जया करता था तब, बिहार के ज्यादातर हिस्सों में नवविवाहित बिटिया को बरसात में होने वाली कीचड मिट्टी से लथपथ होकर ससुराल में काम करने से बचाने के लिये अक्सर बेटिंयों को सावन मास में नैहर बुलवा लिया जाता था ताकि अभी सुकवार, नाजुक बिटियां बरसात में होने वाली कीचकाच से बची रहें। इस ग्रामीण गीत ‘सावन-भादों’ को फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी बहन से सुना था। इस गीत के बोल थे
कासी फूटल कसामल रे दैबा, बाबा मोरा सुधियो न लेल,
बाबा भेल निरमोहिया रे दैबा, भैया के भेजियो न देल..........
...................
कहते है जब भाव प्रबल हों तो भाषा मायने नहीं रखती। यही हुआ।
बकौल फणीश्वरनाथ रेणु जी – तीसरी कसम फिल्म के दौरान शैलेन्दर जी मुझसे ‘महुआ घटवारिन’ की ओरिजनल गीत-कथा सुनना चाहते थे ताकि उसके आधार पर गीत लिख सकें। एक दिन हम ‘पबई-लेक’ के किनारे एक पेड के नीचे जा बैठे। ‘महुआ घटवारिन’ का गीत मुझे पूरा याद नहीं था। इसलिये मैंने छोटी सी भूमिका के साथ बहन से सुना हुआ ‘सावन-भादों’ गीत अपनी भोंडी और मोटी आवाज में गाना शुरू किया। गीत शुरू होते ही शैलंन्द्र की बडी बडी आँखें छलछला आईं। गीत समाप्त होते होते वह फूट फूटकर रोने लगे। गीत गाते समय ही मेरे मन के बाँध में दरारें पड चुकी थीं। शैलेंन्द्र के आँसुओं ने उसे एकदम से तोड दिया। हम दोनों गले लगकर रोने लगे। ननुआँ ( शैलेन्द्र का ड्राईवर) टिफिन कैरियर में घर से हमारा भोजन लेकर लौट चुका था। हम दोनों को इस अवस्था में देखकर कुछ देर ठिठक कर वह एक पेड के पास खडा रहा। इस घटना के कई दिन बाद शैलेन्द्र के ‘रिमझिम’ पहुंचा। वे तपाक से बोले – चलिए, उस कमरे में चलें। आपको एक चीज सुनाउं।
हम उनके शीतताप-नियंत्रित कमरे में गए। उन्होंने मशीन पर टेप लगाया। बोले – आज ही टेक हुआ है। मैंने पूछा – तीसरी कसम ? बोले – नहीं भाई। तीसरी कसम होता तो आपको नहीं ले जाता ? यह बंदिनी का है.....पहले सुनिए तो .
रेकार्ड शुरू हुआ –
अबके बरस भेज भईया को बाबूल
सावन में लिजो बुलाय रे
लौटेंगी जब मेरी बचपन की सखियां
दिजो संदेसा भिजाय रे.....
.................
.......
बीते रे जुग कोई चिठिया न पाती
ना कोई नैहर से आए रे...
अबके बरस भेज भईया को बाबूल
कमरे में ‘पबई-लेक’ के किनारे से भी मर्मांतक दृश्य उपस्थित हो गया। हम दोनों हिचकियां लेकर रो रहे थे............................।
आज फिर उसी पवई लेक के किनारे से गुजरा हूँ। कुछ अपनापन सा लगने लगा है।
( इस घटना की जानकारी –साभार, ‘रेणु रचनावली’, राजकमल प्रकाशन से)
- सतीश पंचम
दरअसल फणीश्वरनाथ रेणु जी ने शैलेन्द्र को इसी पवई लेक के किनारे एक बहुत ही करूण गीत सुनाया था । गीत के बोल ग्रामीण अंचलों का भाव लिये थे जिसमें ससुराल में आई लडकी अपने भाई को याद कर रही है। दरअसल जब पहले अक्सर छोटी उम्र में ही विवाह हो जया करता था तब, बिहार के ज्यादातर हिस्सों में नवविवाहित बिटिया को बरसात में होने वाली कीचड मिट्टी से लथपथ होकर ससुराल में काम करने से बचाने के लिये अक्सर बेटिंयों को सावन मास में नैहर बुलवा लिया जाता था ताकि अभी सुकवार, नाजुक बिटियां बरसात में होने वाली कीचकाच से बची रहें। इस ग्रामीण गीत ‘सावन-भादों’ को फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी बहन से सुना था। इस गीत के बोल थे
कासी फूटल कसामल रे दैबा, बाबा मोरा सुधियो न लेल,
बाबा भेल निरमोहिया रे दैबा, भैया के भेजियो न देल..........
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कहते है जब भाव प्रबल हों तो भाषा मायने नहीं रखती। यही हुआ।
बकौल फणीश्वरनाथ रेणु जी – तीसरी कसम फिल्म के दौरान शैलेन्दर जी मुझसे ‘महुआ घटवारिन’ की ओरिजनल गीत-कथा सुनना चाहते थे ताकि उसके आधार पर गीत लिख सकें। एक दिन हम ‘पबई-लेक’ के किनारे एक पेड के नीचे जा बैठे। ‘महुआ घटवारिन’ का गीत मुझे पूरा याद नहीं था। इसलिये मैंने छोटी सी भूमिका के साथ बहन से सुना हुआ ‘सावन-भादों’ गीत अपनी भोंडी और मोटी आवाज में गाना शुरू किया। गीत शुरू होते ही शैलंन्द्र की बडी बडी आँखें छलछला आईं। गीत समाप्त होते होते वह फूट फूटकर रोने लगे। गीत गाते समय ही मेरे मन के बाँध में दरारें पड चुकी थीं। शैलेंन्द्र के आँसुओं ने उसे एकदम से तोड दिया। हम दोनों गले लगकर रोने लगे। ननुआँ ( शैलेन्द्र का ड्राईवर) टिफिन कैरियर में घर से हमारा भोजन लेकर लौट चुका था। हम दोनों को इस अवस्था में देखकर कुछ देर ठिठक कर वह एक पेड के पास खडा रहा। इस घटना के कई दिन बाद शैलेन्द्र के ‘रिमझिम’ पहुंचा। वे तपाक से बोले – चलिए, उस कमरे में चलें। आपको एक चीज सुनाउं।
हम उनके शीतताप-नियंत्रित कमरे में गए। उन्होंने मशीन पर टेप लगाया। बोले – आज ही टेक हुआ है। मैंने पूछा – तीसरी कसम ? बोले – नहीं भाई। तीसरी कसम होता तो आपको नहीं ले जाता ? यह बंदिनी का है.....पहले सुनिए तो .
रेकार्ड शुरू हुआ –
अबके बरस भेज भईया को बाबूल
सावन में लिजो बुलाय रे
लौटेंगी जब मेरी बचपन की सखियां
दिजो संदेसा भिजाय रे.....
.................
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बीते रे जुग कोई चिठिया न पाती
ना कोई नैहर से आए रे...
अबके बरस भेज भईया को बाबूल
कमरे में ‘पबई-लेक’ के किनारे से भी मर्मांतक दृश्य उपस्थित हो गया। हम दोनों हिचकियां लेकर रो रहे थे............................।
आज फिर उसी पवई लेक के किनारे से गुजरा हूँ। कुछ अपनापन सा लगने लगा है।
( इस घटना की जानकारी –साभार, ‘रेणु रचनावली’, राजकमल प्रकाशन से)
- सतीश पंचम







