सफेद घर में आपका स्वागत है।

Monday 28 September 2009

शैलेन्द्र जी के बारे में एक पुस्तक प्रकाशित हो रही है। कुछ जानकारी यदि देना चाहें तो दे सकते हैं।

     एक सूचना देना चाहूँगा। सूचना स्व. गीतकार शैलेन्द्र जी से संबंधित है।

         सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र जी के कुछ प्रशंसकों द्वारा उन पर एक पुस्तक प्रकाशन की योजना है। कुछ दुर्लभ सामग्री के साथ पुस्तक में उनसे संबंधित अन्य रचनाओं का भी समावेश हो सके, इसके लिये शैलेन्द्र जी के प्रेमियों से जीवन प्रभात प्रकाशन ने आग्रह किया है कि उनके जीवन के संस्मरण, गीत , कविता आदि नीचे दिये  पते पर भेजने का कष्ट करें। उपयोग के बाद सभी सामग्री वापस की जाएगी।

  शैलेन्द्र जी से संबंधित एक प्रसंग मेरे इसी ब्लॉग पर पब्लिश हुई थी। यदि आप लोगों के पास भी ऐसी ही कुछ बातें हों तो जरूर इस पते पर संपर्क करें।


पता - जीवन प्रभात प्रकाशन,  A 4/1, कृपानगर, मुंबई - 56  फोन नंबर - 9821042840



 प्रसंग जिसे मैंने यहां ब्लॉग पर पब्लिश किया था - ( 11/8/09)


यूँ तो मुंबई के पवई में कार्यालय होने के कारण रोज ही पवई झील के पास से गुजरता हूँ, पर कल अचानक एक विशेष वजह से मुझे ये पवई झील कुछ अलग लगने लगी। वजह भी कुछ खास ही है। दरअसल कल ही मैंने फणीश्वरनाथ रेणु जी के बारे में ‘रेणु रचनावली’ में एक बात पढी है और उसके जरिये पता चला कि ये वही पवई लेक है जिसके किनारे बैठकर फणीश्वरनाथ रेणु और गीतकार शैलेन्द्र जी बहुत रोये थे।

दरअसल फणीश्वरनाथ रेणु जी ने शैलेन्द्र को इसी पवई लेक के किनारे एक बहुत ही करूण गीत सुनाया था । गीत के बोल ग्रामीण अंचलों का भाव लिये थे जिसमें ससुराल में आई लडकी अपने भाई को याद कर रही है। दरअसल जब पहले अक्सर छोटी उम्र में ही विवाह हो जया करता था तब, बिहार के ज्यादातर हिस्सों में नवविवाहित बिटिया को बरसात में होने वाली कीचड मिट्टी से लथपथ होकर ससुराल में काम करने से बचाने के लिये अक्सर बेटिंयों को सावन मास में नैहर बुलवा लिया जाता था ताकि अभी सुकवार, नाजुक बिटियां बरसात में होने वाली कीचकाच से बची रहें। इस ग्रामीण गीत ‘सावन-भादों’ को फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी बहन से सुना था। इस गीत के बोल थे

कासी फूटल कसामल रे दैबा, बाबा मोरा सुधियो न लेल,
बाबा भेल निरमोहिया रे दैबा, भैया के भेजियो न देल..........
...................

कहते है जब भाव प्रबल हों तो भाषा मायने नहीं रखती। यही हुआ।

बकौल फणीश्वरनाथ रेणु जी – तीसरी कसम फिल्म के दौरान शैलेन्दर जी मुझसे ‘महुआ घटवारिन’ की ओरिजनल गीत-कथा सुनना चाहते थे ताकि उसके आधार पर गीत लिख सकें। एक दिन हम ‘पबई-लेक’ के किनारे एक पेड के नीचे जा बैठे। ‘महुआ घटवारिन’ का गीत मुझे पूरा याद नहीं था। इसलिये मैंने छोटी सी भूमिका के साथ बहन से सुना हुआ ‘सावन-भादों’ गीत अपनी भोंडी और मोटी आवाज में गाना शुरू किया। गीत शुरू होते ही शैलंन्द्र की बडी बडी आँखें छलछला आईं। गीत समाप्त होते होते वह फूट फूटकर रोने लगे। गीत गाते समय ही मेरे मन के बाँध में दरारें पड चुकी थीं। शैलेंन्द्र के आँसुओं ने उसे एकदम से तोड दिया। हम दोनों गले लगकर रोने लगे। ननुआँ ( शैलेन्द्र का ड्राईवर) टिफिन कैरियर में घर से हमारा भोजन लेकर लौट चुका था। हम दोनों को इस अवस्था में देखकर कुछ देर ठिठक कर वह एक पेड के पास खडा रहा। इस घटना के कई दिन बाद शैलेन्द्र के ‘रिमझिम’ पहुंचा। वे तपाक से बोले – चलिए, उस कमरे में चलें। आपको एक चीज सुनाउं।

हम उनके शीतताप-नियंत्रित कमरे में गए। उन्होंने मशीन पर टेप लगाया। बोले – आज ही टेक हुआ है। मैंने पूछा – तीसरी कसम ? बोले – नहीं भाई। तीसरी कसम होता तो आपको नहीं ले जाता ? यह बंदिनी का है.....पहले सुनिए तो .

रेकार्ड शुरू हुआ –

अबके बरस भेज भईया को बाबूल
सावन में लिजो बुलाय रे
लौटेंगी जब मेरी बचपन की सखियां
दिजो संदेसा भिजाय रे.....
.................
.......
बीते रे जुग कोई चिठिया न पाती
ना कोई नैहर से आए रे...
अबके बरस भेज भईया को बाबूल

कमरे में ‘पबई-लेक’ के किनारे से भी मर्मांतक दृश्य उपस्थित हो गया। हम दोनों हिचकियां लेकर रो रहे थे............................।


आज फिर उसी पवई लेक के किनारे से गुजरा हूँ। कुछ अपनापन सा लगने लगा है। 

( इस घटना की जानकारी –साभार, ‘रेणु रचनावली’, राजकमल प्रकाशन से)

- सतीश पंचम




Sunday 27 September 2009

हंस में छपा एक पाठक का 'निर्मम पत्र' और उससे उठते सवाल।


             मैं हंस क्यों पढता हूँ ?  क्या हंस सचमुच इतनी अच्छी पत्रिका है ?  क्या मैं इसके ब्रांड नेम से प्रभावित हो उसे खरीदता हूँ ,  या फिर केवल ऑफिस आने-जाने में लगने वाला समय बिताने के लिये ही इसे पढ रहा हूँ। क्या है वो कारण जो मुझे अपने ब्लॉग पर हंस के बारे में लिखने के लिये प्रेरित करते हैं। हांलाकि कई अन्य पत्रिकाएं भी होंगी जो अच्छी और उम्दा कन्टेंट्स दे रही हों लेकिन मै न तो उन्हें पढ पाया हूँ और न ही पढने का समय निकाल पाया हूँ। तो जो कुछ मैने पढा है या जाना है उसी पर मैं लिख रहा हूँ।

      अभी हाल ही में एक सरसरी नजर मैंने अब तक हंस के अपने पढे गये कन्टेंट्स पर डाली  है ।  कभी उसमें बुजरी ( अवधी गाली) जैसी कहानी छपी है तो कभी उसका आवरण चित्र मन मोह रहा हैं। और सबसे बढ कर हंस का संपादकीय है। सुना है कि कई लोग हंस केवल इसलिये खरीदते हैं क्योंकि उसका संपादकीय बहुत बढिया होता है।

   इसी प्रक्रिया में मेरी नजर  एक निर्मम पत्र पर पडी जो हंस के संपादक राजेन्द्र यादव के नाम एक पाठक अरविंद गुर्टू ने दिल्ली से लिखा था और जिसे हंस के जुलाई 2009  अंक में पाठकों के पत्र वाले हिस्से में छापा गया था। इस पत्र को पढने के बाद एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में उठा  कि आखिर राजेन्द्र यादव ने क्या सोचकर इस पत्र को छापने की अनुमति दी होगी। क्या हंस के संपादक के मन में यह प्रश्न नहीं आया होगा कि इससे उनकी छवि धूमिल हो सकती है ?   उन्हें कैसा लगा होगा जब वह  पत्र उनकी आँखों के सामने से गुजरा होगा ? पत्र की आखरी चंद लाईनें तो एक हिसाब से  संपादक के प्रति नफरत की पराकाष्ठा ही दर्शाती हैं।
  जरा आप भी पत्र को सरसरी निगाह से देखें……

       - पच्चीस वर्ष पूर्व जब आप हंस की डमी बना रहे थे, तब मैं आपके कार्यालय में आकर बडा खुश होता था कि अब साहित्यिक उसर में एक नया पौधा लग रहा है, इसमें खूब सुंदर रचनाएं छपेंगी। हम जैसे लेखक को कोई संबल मिलेगा। पर साहित्य बहुत पीछे छूट गया। हंस ने कभी एक पंक्ति भी नहीं छापी, न लिखने के लिये प्रोत्साहित किया। बल्कि साहित्य क्षेत्र से ही निकाल दिया।
        
       यह कुंठा क्यों इतने विकट रूप में हुई, पता नहीं। मैं अभी तक नहीं समझ पाया। पर मैंने देखा है कि अनेक प्रतिष्ठित हिंदी लेखकों के साथ यही दुर्भाव हुआ है। आज तक किसी संपादक या साहित्यकारों को इतनी गालियां नहीं दी गई जितना कि आपको। बावजूद इसके आप गौरवपूर्ण मुस्कान लिये हंसते रहे और आपने किसी की परवाह नहीं की। आपने शायद विवादास्पद बनने की राह पकडी। मेरा नाटक विवादास्पद बन गया। हांलाकि मैं कभी इसे बनने नहीं देना चाहता था। न कोई मेरा आशय ही था। मैं तो एक साधारण प्रेमकथा लिख रहा था। पर आपने अपनी पत्रिका का लक्ष्य बना लिया कि खुद विवादास्पद बने रहो।

         आज तक इस पत्रिका में अच्छी रचनाएं तो जरूर छपीं, पर अच्छे साहित्यकार कभी नहीं छपे। उनको आपने बाहर का रास्ता दिखला दिया। आज भी जब मैं हंस को उलटता-पलटता हूँ तो नए लेखक ही दिखाई देते हैं, जो किसी न किसी ऐसी संस्था से जुडे हैं  जो आपकी सेवा या आपकी स्वार्थ स्थितियों को निबटाने में सहायक हों। वे ही आपके लेखक हैं। भले ही आपका मानदंड रचना ही हो, पर आपके वे पनपे हुए पौधे अच्छे साहित्यकार नहीं बन पाए।

      मेरी भी यही साध रही कि मेरी रचना हंस में छपे, पर यह साध एक अंतिम इच्छा ही रहेगी, फलीभूत नहीं होगी। यह पत्र भी नहीं छपेगा। जिस तरह एक हिजडे को मरने पर मारते-मारते श्मशान घाट पर लाया जाता है, औऱ दूसरे हिजडे शोक की बजाय उत्सव मनाते हैं, उसी तरह शायद आपकी गति हो।

 - अरविंद गुर्टू , दिलशाद गार्डन, दिल्ली

             पूरा पत्र पढने पर अब तक आप समझ ही गये होंगे कि पत्र में किस हद तक संपादक के प्रति नफरत है। न जाने और भी कितने पत्र आते होंगे हंस के संपादक के पास। लेकिन जो बात हंस को अलग बना रही है वह है संपादक की साफगोई। छाप दो जैसा है वैसा ही। लोग भी तो जानें कि हंस के प्रति लोगों के मन में क्या भाव है। शायद यही साफगोई है जो मुझे हंस की ओर खींच लाती है।
    
         रचनाएं तो मेरे हिसाब से कुछ अच्छी हैं तो कुछ खराब भी हैं। कहीं कहीं तो बचकाना कहांनीयां भी छापी जाती है जिसमें अधिकतर नये लेखक ही दिखते हैं। और कहीं कहीं ‘बुजरी’ जैसी सशक्त कहानी भी है जिसके लिये दावा किया जा सकता है कि एक बार पढने के लिये शुरू करने के बाद कोई इसे अधूरा नहीं छोड सकता

 सफेद घर में ही बुजरी कहानी की समीक्षा की गई थी। तब एक टिप्पणी आई थी-
Jayant chaddha said...

अदबुध कहानी... कहानी के पात्र बड़े जाने-चिन्हे से लगते हैं.... कहानी का शिल्प इतना बेजोड़ है की दावा किया जा सकता है की कोई इसे पढता छोड़ उठ जाये...

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           हंस के कविता वाले सेक्शन को केवल दो पन्नों में जगह मिलती है यह बात थोडा अखरती है लेकिन जो भी कविताएं छपती हैं उनमें एकाध ही अच्छी होती हैं और बाकी  तो ज्यादातर केवल ‘कागज कारे’। शायद यही वजह है कविताओं को सस्ते में निपटाने का।

    एक कविता फरवरी 09 में मुस्तफा खान साहिल की  छपी थी -

ऐसा नहीं है कि
नर्म घास नहीं उगती
नर्म घास उगती है
कत्ल आगजनी के माहौल में
उसकी छुअन दब गई है

      वहीं  कई गजलें तो गजब होती हैं । जैसे कि आलोक श्रीवास्तव के गजलों की इन लाईनों को ही लें -

मेरे सीने की हिचकी भी, मुझे  खुलकर बताती है,
तेरे अपनों को गांव में, तू अक्सर याद आता है।

  या फिर शमीम फारूकी की ये लाईनें -

तन्हाईयों    में    बैठ   के   पीता    रहा   हूँ     मैं
एक ऐसा जल कि जिसका कोई जाएका न था
……..
वह दिन भी याद है कि इसी शहर में ‘शमीम’
मैं   खो    गया था   और   कोई    ढूँढता   न था।

      कुल मिलाकर हंस को मैं ठीक ठाक ही मानता हूँ। अखबारो में यह पढने की बजाय कि  शाहरूख खान ने अमेरिका में चेकिंग के नाम पर अपना अपमान होना कबूल किया, सलमान ने चाय पी, फराह ने कन्टेंस्टेंट को फटकारा,राखी सावंत ने स्वंयवर रचाया, हरमन बावेजा ने नई कार खरीदी……. मुझे हंस पढना अखबारों के मुकाबले अच्छा लगता है।

-  सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां चाय पीने का पैमाना ‘कटिंग’  है। 

समय – वही, जब कटिंग पीने के बाद करोडपति सेठ ने चायवाले से कहा – ‘बाघ बकरी’ चाय वापरने का, उसमें ज्यादा टेस्ट होता है, इसमें टेस्ट कम है । चायवाले ने मन ही मन कहा – जब बाघ, एक बकरी को दो रूपये कटिंग के दे रहा हो तो टेस्ट कैसे आयेगा :)

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Monday 21 September 2009

हंस के सितंबर अंक में नामवर सिंह रहे राजेन्द्र यादव के निशाने पर । बहुत दमदार रहा सितंबर अंक का संपादकीय ।


      इस बार हंस का संपादकीय पढा तो लगा कि राजेन्द्र यादव ने नामवर सिंह को सही तरह से निशाने पर लिया है औऱ न सिर्फ निशाने पर लिया बल्कि तीर भी जमकर चलाया।  मुद्दा था हंस की गोष्ठी में नामवर सिंह द्वारा अतिथि संपादक अजय नावरिया पर किया गया कटाक्ष।
    जिसके जवाब में  संपादकीय की शुरूआत ही राजेन्द्र यादव जी ने एक तीखे तीर से की है। राजेन्द्र यादव लिखते हैं -

   …….  हरिशंकर परसाई की एक लघुकथा है – सुबह सुबह एक नेताजी तलवार लेकर बैठ गए. आज तो अपनी गर्दन काटकर ही रहूंगा। आसपास के लोग जितना ही समझाने की कोशिश करते, उतनी ही उनकी जिद बढती जाती कि नहीं, आज तो यह गर्दन कटकर ही रहेगी। लोगों ने पूछा कि कोई तो कारण होगा  ? झल्लाकर बोले कि – ‘यह भी कोई गर्दन है जिसमें सात दिनों से कोई माला ही नहीं पडी……अब इस गर्दन की खैर नहीं है….’

      राजेन्द्र यादव जी आगे लिखते हैं कि -   मैं सोचता हूँ कि नामवर जी को भी क्या कभी ऐसी पवित्र बेचैनी होती होगी कि दो दिन हो गए, किसी ने अध्यक्षता करने नहीं बुलाया ? वे हर गोष्ठी को शाश्वत अध्यक्ष या अंतिम वक्ता होते हैं। कोई हर्ज नहीं, वे अध्यक्ष हों। श्रोता उम्मीद करते हैं कि वे जरूर कोई नई विचारोत्तेजक बात कहेंगे या अप्रत्याक्षित बात कहेंगे, मगर नामवर जी हैं कि हर बार उन्हें निराश करते हैं या क्षुब्ध छोड जाते हैं।  एक खिसियानी या परम संतुष्ट मुस्कुराहट के साथ लगभग यज्ञध्वंसी गणेश की तरह । मैंने दसियों साल पहले उन्हें आर्थर कॉयस्लर के शब्द उधार लेकर ‘इंटेलेक्चुअल कॉलगर्ल’ कहा था। उनका यह रूप सचमुच पेशेवर हो उठता है जब वे किसी अफसर या राजनेता की पुस्तक का विमोचन कर रहे होते हों – उस समय वह अफसर कवि, मुक्तिबोध से कम नहीं होता, कहानीकार हुआ तो प्रेमचंद के बाप की जगह कहां गई  है……….
 
      उल्लेखनीय है हंस की एक गोष्ठी में नामवर सिंह जी ने अतिथि संपादक अजय नावरिया के बारे में कहा था कि – मैं कहता हूँ राजेन्द्र , इन लौन्डों को मुंह मत लगाओ, ये तुम्हारे हाथ काट डालेंगे। …….. इसी मुद्दे को लेकर राजेन्द्र यादव जी ने अपने संपादकीय में नामवर सिंह को जमकर घेरते हुए लिखा है -
 
    सारा हॉल उस समय स्तब्ध हो गया था  कि नामवर सिंह जी ने यह क्या कह दिया। कौन सी भाषा बोल रहे हैं आचार्य ?  यह पहली बार नहीं हुआ था, अगर मंच पर मैं हूँ और अंतिम वक्ता नामवर जी हों तो यकीन मानिए, वे इसी तरह के कमाल दिखाते रहे हैं। सब लोग मजा लेते हैं, बल्कि ये दो नाम देखकर उन्हें निश्चय हो जाता है कि आज विचार के क्षण नहीं, मनोरंजन और फुलझडियों का जायका मिलेगा। पहले मैं भी मजा लेता था, लेकिन अब चिंतित हूँ कि बुढापे में नामवर जी को ये क्या हो रहा है ? इसबार इसलिये और भी अखरा कि उन्होंने दूर-पास से आने वाले सैंकडों श्रोताओं को निराश ही नहीं किया उनके साथ क्रूर मजाक भी कर डाला।
  
   आगे राजेन्द्र यादव जी लिखते हैं – नामवर जी मेरे बडे हैं और मैंने उन्हें वही सम्मान और उनकी विद्वता को श्रध्दा भाव दिया है। हमारी दोस्ती भी सन 1952 से शुरू हुई है । सच है कि इतना पुराना दोस्त न उनके पास कोई है, न मेरे । मैं उनकी विद्वता, अध्ययन और स्मरण शक्ति के आगे हमेशा नतमस्तक रहा हूँ, मगर क्या करूँ आज वे जहां पहुँच गये हैं वहां उन्हें देखकर तकलीफ होती है – दरवाजे पर बैठा एक बूढा है जो हर समय घर की बहू-बेटियों को टोकता या कोसता रहता है।
  
       राजेन्द्र यादव जी ने अतिथि युवा संपादक अजय नावरिया और नामवर सिंह के विचारों के संदर्भ में बच्चे का उदाहरण देते हुए कहा है कि – बच्चे के पास अतीत नहीं , सिर्फ भविष्य होता है – एक अनजाना, अनागत । अतीत तो उसके दिमाग में हम भरते हैं।  इतिहास, धर्म, संस्कृति  सब यथास्थिति को बनाए रखने के उपकरण हैं। …….युवा के पास अपना निजी या समाज को लेकर एक सपना होता है, इस सपने को रंगरूप देते हैं पुराने अनुभव, उदाहरण और तुलनाएं या विचार….मगर जो यथास्थिति से चिपके रहते हैं या अतीत को ही अपना भविष्य बना लेते हैं तो उन्हें युवा कहना शर्मनाक है – उनकी जगह या तो धर्म में है या सास्कृतिक राष्ट्रवाद में । हमारी समस्या अतीत यानी यथास्थिति को लेकर नहीं, इसके आगे या पार जाने की है…..
  
      और भी कई बातों का जिक्र किया है राजेन्द्र जी ने जिन्हें आप हंस के  सितंबर अंक में पढ सकते हैं। पुरानी और नई पीढी के बीच के द्वद्व को बखूबी उकेरा गया है ।  कुल मिलाकर हर बार की तरह हंस का संपादकीय दमदार लगा है।


- Satish Pancham

स्थान - वही, जिसे मायानगरी कहते हैं।

समय - वही, जब घडी की दो सूईयां आलिंगनबद्ध हो -  दो बजकर बाईस मिनट बता रही हों और तीसरी सूई सोचे कि आखिर वह इतना तेज क्यूँ चलती है :)

Wednesday 16 September 2009

फाईव स्टार होटल का मेरा अनोखा अनुभव

         फाईव स्टार होटल में  ग्यारह सौ रूपये का डिनर करने के बाद  मन तरह तरह के ख्यालों से कबड्डी खेल रहा था। एकाध ख्याल तो पोलो भी खेल रहे थे आखिर बडे लोगों का खेल जो ठहरा :)
    दरअसल हाल ही में एक आयोजन के सिलसिले में फाईव स्टार होटल में जाने का पहली बार मौका मिला ।  पहुंचते ही महकते माहौल ने मधुमास को सामने ला दिया।  फूलों की पंखुडियों से सजे थाल जब चलते हुए अगल बगल दिखते थे तो लग रहा था जैसे चित्रलेखा फिल्म का कोई सीन फिल्माया जा रहा है। बेल-बूटे, लतादार सीढीयां और फूलों की झालर….वाह क्या कहने।
      थोडी देर बाद जब भोजन आदि का समय हुआ तो देखा कहीं पर दिमाग को मेंटल करने वाले कांटिनेंटल खाने की टेबल है तो कहीं पर जापानी Sushy. एक जगह भिंडी सकुचाई सी दिख रही थी तो उसके बगल में ही सीना चाक किये चाईनीज । खाने गया तो  होटल में पतली, छरहरी ललनाएं बात बात पर मुस्कराते कह रहीं थी कि Do You Want more sir…..Will u please…..Its Continental……oH, Its delicious….can u try this….. तो मुझे लगा कि  आज तक मेरी पत्नी ने इतने प्यार से भोजन के लिये कभी नहीं कहा……  कभी भूल से कह भी दिया जरा रोटी बढाना तो उलटे कह देंगी कि सामने ही तो है, हाथ बढा कर ले क्यों नहीं लेते  और इन्हें देखो, कितने आग्रह से कह रही हैं कि ये भोजन अच्छा है..इसे भी ले लो…वह भोजन भी ले लो…। सोचता हूँ अगर पत्नी को घर मे हर खाने पर ग्यारह सौ रूपये देने लगूँ तो  शायद वह भी मुझे इसी तरह आग्रहपूर्वक खिलायेगी……अरे एक और रोटी लिजिये……आपने तो कुछ खाया ही नहीं……. :)
          खैर, थोडी देर बाद जापान के डिश  ‘Sushi’  को खाने का तरीका बताते मित्र ने कहा, इसे थोडा सा बगल में रखी चटनीनुमा  चीज के साथ मिलाकर एक ही कौर में खा लो फिर बताओ कैसा है। सोचा, जब फाईव स्टार का है तो अच्छा ही होगा…बेधडक बगल में रखी चटनी जैसी चीज को रख Sushi को मुँह में रख लिया…..उसके बाद…..लगा जैसे कि कोई सन्न करने देने वाली चीज आ गई है…….इतना तेज स्वाद, इतनी तेज गंध कि दिमाग भन्ना गया…..। दुबारा खाने की हिम्मत न पडी। पूरे पांच मिनट बाद उस   चीज का भन्ना देने वाला  असर उतरा। मित्र महोदय मेरी हालत पर मजे ले रहे थे। और मैं सोच रहा था यार, फाईव स्टार में इतना अजीब टेस्ट वाला खाद्य पदार्थ भी होता है क्या ?  मैं तो नाहक ही अपने नुक्कड के समोसे वाले को सडे आलू इस्तेंमाल करने के लिये भला बुरा कह रहा था। आज पता चला कि उससे भी बुरा कोई टेस्ट हो सकता है। नेट पर तलाशने पर पता चला कि यह जापानी चीज है जो बहुत पसंद की जाती है, लेकिन मैं तो दुबारा न खाने की कसम खा चुका हूँ। ( बगल में ही Sushi  उसका चित्र भी लगा है)
          आयोजन का दौर चल ही रहा था कि सोचा एक बार बाथरूम हो आया जाय। वहां जाने पर पूरा बाथरूम खाली था। महंगे एअर फ्रेशनर ने वहां भी मधुमास को ला रखा था।  आठ दस ओबामा दीवालों पर चल रहे थे। दरअसल मझोले आकार के बाथरूम में करीब आठ दस LCD लगे थे जिनपर CNN चैनल चल रहा था । LCD के किनारे सुनहरे फ्रेम से मढे गये थे। देखने पर लगता था कि दीवाल में कोई चलती फिरती पेंटिंग है। सोचा आया हूँ तो शौचालय का इस्तेमाल कर लूं।  अंदर जाकर जब सिटकनी लगाई तो देखा कि पानी का तो कोई इंतजाम ही नहीं है यहां। टॉयलेट पेपर दीवार से लटक रहा है। अब क्या करूँ  ?  टॉयलेट पेपर देख कर तो मेरा मन बिदक गया।  मन मसोस कर बिना कुछ करे धरे ही बाहर आ गया। मन ही मन कहा-  साले, पानी की बाल्टी या मग ही रख देते। लेकिन क्यों रखेंगे….अंग्रेजीयत को ठेस न लगेगी।
            उस वक्त मुझे अपने बचपन के मित्र रामधारी की याद हो आई जिसे हम धरीया कह कर बुलाते थे। गांव में खेलते-खेलते जब अचानक उसे प्रेशर आ जाता तो खेल छोड कर खेतों के एक ओर जाकर वह निपटान करता और वहीं जमीन पर पडे ढेले का इस्तेमाल  सफाई के लिये कर वह फिर खेलने आ जाता। एक दो बार देखने के जब सबको पता चला कि ये शौच के बाद ‘ढेलउवल’ करता है, पानी का इस्तेमाल नहीं करता… तो सभी आपस में कहते इससे दूर रहो……बहुत फूहड है…..गंदा है….ये है वो है….। उसकी माँ भी रामधारी को गुस्सा करती थी कि – ‘केत्थो लायक नहीं है इ निमहुरा….( किसी लायक नहीं है ये नासपीटा…’) . लेकिन अब पता चल रहा है कि और किसी लायक रामधारी हो या न हो, फाईव स्टार होटल में रहने की लायकी उसमें बचपन से थी, तभी तो हम जिस ‘ढेलउवल क्रिया’ को  फूहड मानते थे, गंदा मानते थे वही सब कुछ यहां फाईव स्टार में टॉयलेट पेपर के रूप में मान्य है।

     सोचता हूँ, आज अगर रामधारी की माई फाईव स्टार होटल में इस्तेमाल होने वाले इन टॉयलेट पेपर्स को देखती तो जरूर अपने बेटे को  इंटेलेक्चुअल,  गुणी और हाई क्लास का मानती औऱ कहती – मेरा बेटा फाईव स्टार वाले बडे बडे लोगों की तरह रहता है………. है कोई मेरे बेटे के बराबरी का पूरे गाँव में :)

- Satish Pancham

स्थान – वही, जहां  बेल-बूटों और लताओं से सजी सीढियों पर मेरे पैर रूके से जा रहे थे।
समय – वही, जब मैं फूलों से सजे थाल के बगल से गुजर रहा था और बगल से ही एक भौंरा भनभनाते हुए कह रहा था – Sushi खाओगे Sushi  :)

Saturday 12 September 2009

सदरू भगत और शर्तिया इलाज वाले डॉक्टरों का विज्ञापन

    
    अरे क्या तुम्हारा दीदा फूट गया था जो ई पूरे घर को नासपीटे बिज्ञापन से रंगा बैठे हो, चार दिन नैहर क्या गई ....घर को रसलील्ला अखाडा बना दिया - रमदेई ने सदरू भगत से कहा। 
           सदरू कहें तो क्या कहें, चार अच्छर पढ लिये होते तो आज ये दिन न देखना पडता, कम्बख्तों ने बिज्ञापन भी छापा है तो शर्तिया ईलाज वाला.....गुप्त रोग, नामर्दी, स्वप्नदोष, श्वेत प्रदर और न जाने क्या-क्या पढकर सुना रहा था बासदेव का लडका, कह रहा था कोई डॉक्टर खान का बिज्ञापन है जो रोग-ओग का ईलाज करते हैं।  उन्हें तभी ईन्कार कर देना चाहिये था जब वो घर के दीवाल पर बिज्ञापन छापने वाले रंग रोगन लेकर आये थे, कह सकते थे कि हम अपने घर पर ईस तरह का बिज्ञापन नहीं लगने देगे, बहू-बेटियों का घर है, लेकिन हाय रे अपढ बुढापा, पूछने पर इतना बताया कि दवा वाला, डॉक्टर वाला विज्ञापन है, आप का घर सडक के पास ही है सो उस घर की दीवाल पर बिज्ञापन छापेंगे बदले में सौ-पचास दे भी देगे, बाहर से घर भी रंगा देंगे सो भी आपको सुभीता हो जायेगा, जब से घर बनवाये हो लगता है कभी चूना छोड कोई दूसरा रंग नहीं लगाया, अब हम लगा देंगे। 
              ले दे कर एक दिन मे रंग पुता गया, दूसरे दिन लिख उख कर काम खतम, सौ रूपये मिले सो अलग, लेकिन क्या जानते थे कि ये जी का बवाल बो रहे हैं, सोचे थे लाल तेल या काढा-ओढा का बिज्ञापन होगा, लेकिन ये तो शीघ्रपतन, स्वप्नदोष और नामर्दी वाला बिज्ञापन है । ईधर रामदेई पूरे उफान पर थी, क्या बडी बहू और क्या छोटी बहू सबकी खबर ले रही थी, घर न हुआ चकचोन्हरों का अड्डा हो गया, जो आता है घर की ओर ताक कर हँसता है.....हँसेंगे नहीं जब हँसने लायक काम किये हैं तो......वो रामजस खटिक ऐक आदमी को रस्ता बता रहा था कि सीधे चले जाईये, वहीं बगल मे एक शीघ्रपतन वाला घर आयेगा, बस वहीं से मुड जाईयेगा......नासपीटा......बोली बोल रहा था.......खुद के घर की बहुरिया भले यहाँ वहाँ लपर-झपर करे लेकिन दूसरे के घर का नाम रखने मे ये आगे रहेंगे......हँसो और बोलो......ईस घर के लोग ही जब हँसाने के लिये जोर लगाये हों तो और हँसो।
               तभी बडी बहू बाँस के झुरमुटों की आड से आती दिखी , साथ मे ननद रतना भी थी। कहाँ से आ रही हो दोनों जनीं - रमदेई ने उसी रौ मे पूछा। रमदेई की फुफकारती आवाज से दोनों समझ गयीं कि आज अम्मा उधान हुई है....कहीं कुछ बोली तो चढ बैठेंगी.....रतना ने ही कहा - भौजी का पेट दुख रहा है.......दवाई लेने गई थी। रमदेई कडकते बोली, अरे तो उसी नासपीटे डाकटर से ही ले लेती जिसका नाम घर पर चफना लाई हो....ये नहीं कि रोक-छेंक लगाती कि ऐसा बिज्ञापन नहीं लगने देंगे.....बस कोई आये चाहे घर ही लूटकर चला जाय लेकिन मजाल है जो इस घर के लोग चूँ तक बोले.....। 
            इधर लोगों की भीड बढती जा रही थी, हर कोई किसी न किसी बहाने इसी ओर चला आ रहा था, सब को मानों ऐक ही साथ काम निकल आया......कोई दुकान जा रहा था तो कोई खेत देखने , किसी को तो अपनी भैंस ही नहीं मिल रही थी, जाने चरते-चरते कहाँ चली गई.........लेकिन खोजने वाला रमदेई के यहाँ जरूर देखता चला......देखो आज सब कोई देख लो कि ई शीघ्रपतनौआ घर कैसा होता है। 
         कान खुजाते रमदू कोईरी बोले - मुदा हम तो समझे कोई टक्टर-ओक्टर का या बिस्कुट-उस्कुट का बिज्ञापन छापने आये हैं....ईसलिये मैं तो कुछ न बोला....दो दिन घर से फुरसत ही न पाया, आज देखा तो ये हाल है.....। 
         इधर सदरू भगत मन ही मन कह रहे थे - खूब हाँक लो बच्चा, तुम भी तो वहीं थे जब वो लोग कलाकारी कर रहे थे....अब कैसे गाय बन गये हो। 
    लल्ली चौधरी बोले - अरे तो क्या हो गया जो ईतना बावेला मचाये हो.......घर को रंग-ओंग दिया, जितना कीडा-उडा होगा सब मर गया होगा, सौ रूपया मिला सो अलग, अब क्या डॉक्टर अपना घर ही उठा कर दे दे। 
             रमदेई लिहाज करती थी लल्ली चौधरी का - एक तो गाँव के बडमनई, दूसरे दूर के रिश्ते मे बहनोई.......धीमे-धीमे ही भुनुर-भुनुर करती बोली - ये और आये हैं आग लगाने - अरे ईतना ही चाव है कीडा मरन्नी का तो अपने घर ई बिज्ञापन रंगा लेते......घर के कीडा के साथ , दिमाग का कीडा भी मर जाता......आये हैं साफा बाँधकर । 
          रामराज ड्राईवर जो हरदम अपने साथ रेडियो लेकर चला करते थे वह भी आ गये थे बवाल सुनकर, रेडियो अब भी उनका बज ही रहा था........तुलबुल परियोजना पर भारत पाकिस्तान वार्ता शीघ्र शुरू होने की संभावना प्रधानमंत्री ने व्यक्त की है। कल एक जीप के खड्ड मे गिर जाने से राजमार्ग संख्या 10 पर हादसा हुआ......। ईधर रामदेई का भी समाचार जारी था.......आग लगे ई बुढौती में.....न चूल्हा न चक्की केकरे आगे बक्की......। 
            तभी रेडियो पर संदेश प्रसारित हुआ.....सुरक्षित यौन संबंधों हेतु कंडोम का ईस्तेमाल करें.....कंडोम है जहाँ, समझदारी है वहाँ। सुनकर सभी को जैसे लगा यह विज्ञापन रमदेई के लिये ही था.....सभी मुंह दबाकर हँस रहे थे उधर सदरू भगत सोच रहे थे क्या कहा जाय......ससुर मैं तो किसी ओर में नहीं हो रहा हूँ......ईधर ये बुढिया जान खा रही है, उधर ये सब लबाडी-सबाडी.....आज खुब तमासा लगा है दरवाजे पर....ये रमदेई जो न कराये सो कम है.....।
          तब तक लल्ली चौधरी खंखार कर बोले - ऐसा है सदरू महराज कि आज जमाना बदल गया है, अब वो लाज लिहाज वाला जमाना रहा नहीं........सो तुम लोग कहाँ अपने प्राण बचाते फिरोगे.....एक काम करो.....जाकर चूना लो और पोत दो दीवाल पर पूरी दीवाल ही सफेद हो जाय , सौ रूपया मिल ही गया है.....जब वो रंग-रोगन वाले औ लिखने वाले डॉक्टर पूछें तो कह देना कि - क्या बतायें डॉक्टर साहब, हमारी दीवाल को लगता है श्वेत प्रदर हो गया है.......ईसलिये सफेद -सफेद लग रही है.....अब आप ही कुछ करें और जल्दी करें......वरना कोई और शर्तिया डॉक्टर आकर न लिख जाय.....सफेद दागों का शर्तिया ईलाज :) 


(  यह सदरू भगत वाली पहली पोस्ट है जो मैंने सितंबर 2008 में ही  पब्लिश की थी,  आज एक बार फिर.....सदरू भगत औऱ रमदेई के उसी किस्से को पेश किया है....उम्मीद है जल्द ही इस सीरिज की नई पोस्ट लिख पाउंगा ) 


- सतीश पंचम


स्थान - मुंबई, जहां बीच सडक अचानक बडा गड्ढा हो गया है।


समय - वही, जब एक  चलताउ चैनल उस गड्ढे को उल्का पिंड के गिरने से निर्मित बताने की फिराक में हो और तभी एक चैनल सही खबर चला दे और चलताउ चैनल कह उठे  -   
- दगाबाज कहीं का,...... बिरादरी से धोखा कर गया   :) 




चित्र : साभार MID DAY से 

Monday 7 September 2009

हर ब्लॉगर के लेखन की एक अपनी शैली है, पोस्ट देखते ही कह सकते हैं कि किसने लिखा है।



       हर ब्लॉगर की एक  अपनी शैली  है। कई बार पोस्ट को देखते ही पता चल जाता है कि किसने लिखा होगा इसे।   डॉ अनुराग अपनी पोस्ट में त्रिवेणी लिखते हैं, डॉ. अमर इटालिक स्टाईल में  लिखते हैं तो ज्ञानदत्त जी की  पोस्ट दार्शनिक फ्लेवर लिये होती है। नाम देखने की जरूरत ही नहीं पडती। पता चल जाता है कि किसकी पोस्ट  है ये। इसी तरह मेरी भी एक अपनी  शैली है।

            कई  बार आपने मेरे यहां देखा होगा कि अपनी पोस्ट के नीचे मैं  स्थान और समय कुछ अलग ढंग से  बदल बदल कर  लिखता हूँ।  इस तरह स्थान और समय लिखने की आदत मुझे अपने स्कूली दिनों में पडी जब मित्रों के बीच हम लोग क्लास में पढाई के दौरान ही मजाकिया चिटों का आदान प्रदान करते थे। मुझे याद है जब मैंने पहली बार अपनी पंजाबी के पिरियड में पर्चा पास किया था। पर्चा क्या था एक उलूल जूलूल लिखा कागज था। बचपन के दिन थे, सो पंजाबी की क्लास में  गुरमुखी में ही मैंने एक साथी को लिखा

-----तेरी पैँट थल्ले जा रही ए….
थां – पंजाबी मिस दी क्लास
समां – क्लास खतम होण तो पैलां

            पर्चा पाते ही सुक्खी ( शायद सुखविंदर नाम था उसका) ने पर्चे के पीछे मुझे गाली लिख मारी थी और मैं ही ही करके हंस रहा था। फिर तो यह चलन क्लास में चल पडा था। सुबह सुबह पर्चा देने लेने की शुरूवात अमरीका ( अमरीक सिंह ) नाम का लडका करता था। हाथों हाथ होते होते वह पर्चा सबको जब तक मिल नहीं जाता था तब तक क्लास डिस्टर्ब रहती थी। सोडी मिस तो हमारी इन हरकतों से इतना तंग आ गई थीं कि कुछ बच्चों के घर वालों को बुलावा भेज दिया गया था कि – असी तुआडे पुतर दियां हरकतां वेख के तंग आ गए हां…..छेती वड्डी मैडम नुं मिलो।

  पर्चा मिलते ही सब की सिट्टी पिट्टी गुम। उस समय उस परचे के नीचे मैंने लिखा था

 थाँ – वड्डी मैडम दी कुर्सी दे साहमणे…..
कदे – जदों वड्डी मैडम नां होण औह वेले….

     आज वह सिग्नेचर स्टाईल मैं अपनी लगभग हर पोस्ट में इस्तेमाल करता हूँ। कई पोस्टों में मैं स्थान और समय जान बूझ कर नहीं लिखता। क्योंकि कुछ पोस्टें अलग भाव लिये होती हैं और स्थान और समय लिखने से पोस्ट से ध्यान बंटने की संभावना रहती है। कई बार मैं समयाभाव के कारण भी स्थान और समय नहीं लिख पाता क्योंकि बदल बदल कर स्थान और समय लिखने के लिये भी सोचना पडता है :)

   लवली जी और अशोक पाणडेय जी ने मुझे एक दो बार टोका भी है   ( कैसेनोवा वाली पोस्ट पर भी) इस बात  के लिये कि स्थान और समय क्यों नहीं लिखा।  खैर, कोशिश करूँगा कि अब से अपने सिग्नेचर में स्थान और समय लिखा करूँ…….उसी क्लास वाली सिग्नेचर स्टाईल में  -

-----तेरी पैँट थल्ले जा रही ए….
थां – पंजाबी मिस दी क्लास
समां – क्लास खतम होण तो पैलां  :)

- सतीश पंचम

यमराज के ब्लॉगर बनने के बाद यह रही यमराज की पहली पोस्ट।


       यमराज को लगता है कुछ काम धंधा नहीं है। रोज आ जाते हैं घूमते टहलते।  उस दिन तो हद हो गई। कहने लगे कि फलां ब्लॉगर के प्राण हरने हैं, तुम भी साथ चलो।

मैंने कहा – क्यों ब्लॉगरों में सिर फुटौवल करवा रहे हो।

यमराज ने भृकुटी टेढी करते कहा  -  क्यों ? क्या मेरे साथ चलने से तुम्हें कोई परेशानी है ?

मैंने कहा - यदि किसी ब्लॉगर के प्राण लेते समय बाकी ब्लॉगर  लोग मुझे तुम्हारे साथ देख लेंगे तो कल को आरोप लग सकता है कि मैं ही हूँ जो ब्लॉगवार छेडे हुए हूँ और इसी के चलते एक ब्लॉगर को किसी भैंसे पर बैठ कर आये हुए गुंडे से मरवा चुका हूँ।  तुम तो उसके प्राण ले निकल लोगे, बाकी के ब्लॉगर मेरी जान खाएंगे….रोज दस-बीस  Anonymous टिप्पणीयां देते रहेंगे।

तो  दे  ही रहे हैं,  ले लेना। कुछ तुमसे ले तो नहीं रहे।

अच्छा ठीक है। तब यमराज जी आप ही ब्लॉगर क्यों नहीं बन जाते। आपके पास तो मरण से संबंधित रोचक संस्मरण होंगे। आपको भी पता चल जायेगा कि ये ब्लॉगर प्रजाति कितनी चालू हैं।

  ये आईडिया बुरा नहीं है। जरा अपना गोद-यंत्र देना तो – यमराज ने गदा को नीचे रखते हुए कहा।

यमराज का इतने जल्दी ब्लागिंग के लिये तैयार होना कोई हैरत की बात नहीं है। जबसे उन्होंने देखा  कि यमराज के आने के बावजूद ब्लॉगर भीष्म पितामह की तरह तब तक अपने प्राण नहीं त्यागता जब तक कि उसकी पोस्ट को शत्रु पक्ष और मित्र पक्ष दोनों  की ही  टिप्पणीयाँ न मिलें, तब से यमराज और व्याकुल हो उठे कि आखिर ये ब्लॉगिंग है क्या चीज ?
    
      मुझसे थोडी बहुत  तकनीकी जानकारी लेने के बाद यमराज जी तो एकदम रौ में आ गये और फिर उन्होंने लिखी अपनी पहली पोस्ट……..जिसका शीर्षक था  - 

                                                     'ब्लॉगिंग के बदलते आयाम'

      यम हैं हम……हम हैं यम। जहां जाते हैं लोगों के प्राण सूख जाते हैं। जिसकी ओर नजर उठा कर देखते हैं उसे काठ मार जाता है। लेकिन जाने क्यों मैं इन दिनों अपने उस प्रभाव को बरकरार नहीं रख पा रहा हूँ। विशेषत: तब जब किसी ब्लॉगर के प्राण हरने हो।
       
        ये ब्लॉगर भी कम्बख्त बडे चालू टाईप होते हैं। कुछ ब्लॉगर तो एक प्रोफाईल सही रखते हैं  बाकी दो प्रोफाइल फर्जी रखते हैं।  प्रोफाइल देख कर एक दो जगह गया था प्राण हरने, पता चला कि जिंदादिल सिंह के प्राण हरने थे वहां कोई जिंदादिल कौर नाम की महिला ब्लॉगर है औऱ एक जगह तो जिंदादिल की कौन कहे कोई मुर्दादिल ब्लॉगर भी नहीं मिला। कम्बख्तों ने खामखा दौडा दिया। भैंसा मेरा अलग परेशान था। उसे भी आश्चर्य था कि ये ब्लॉगर इतने चालू टाईप के कैसे होते  हैं।

       खैर, एक जगह मैं IP Address देख कर प्राण हरने गया था। जाने पर पता चला कि वह IP Address तो  भले ही फलां जगह का दिख रहा है लेकिन असल में वह ब्लॉगर Router के जरिये धरती के उस पार अमरीका से ब्लॉगिंग कर रहा है। मैं ब्लॉगरों के इन पैंतरों से इतना तंग आ गया कि सही  Router और IP Trace करने के चक्कर में मैने Networking  की क्लासेस भी Join की। जब मैं भैंसे पर बैठ अपनी गदा लेकर क्लास पहुंचता था तो नये नये बचकुंडे मुझे Fancy dress कहकर चिढाते थे। मैं वह भी झेल गया। लेकिन मै यह नहीं झेल सका कि कोई मेरे भैंसे को  सलमान खान कह कर  चिढाये। माना कि मेरा भैंसा कुछ नहीं पहनता पर रहता तो शरीफों की तरह है।
  
       खैर, ये तो ब्लॉगरों की बातें हैं। अब मैं इन्सानों की बात बताता हूँ। न न….आप ये मत पूछना कि ब्लॉगर क्या इन्सान नहीं होते ? होते हैं पर वो Virtual World के होते हैं यानि कि - हैं लेकिन नहीं हैं……..हैं भी और नहीं भी। अब छोडिये भी आप लोगों को गूढ ब्लॉगात्मिक बातें क्या समझाउं।

       हां, तो एक दिन एक जगह प्राण हरने जा रहा था। रास्ते में ही एक घर सदरू भगत का पडा। सदरू भगत की पत्नी रमदेई अपनी फाफामउ वाली पतोहू को डांट रही थी। उसका डांटना देख मेरा भैंसा बिदक गया और चलते चलते एक खोह में जा घुसा। मैं किसी तरह गिरते गिरते बचा हूँ।
   
        फाफामउ वाली पतोह का डांटने का कारण भी बडा अनोखा था। गाँव देहात में होता यह है कि जिस किसी  नई नवेली विवाहित महिला को किसी पडोसी महिला से बात करनी होती है  तो  वह तरकारी बनाते समय एक लोटा पानी अलग से  कडाही में  डाल देती है। जिससे कि कडाही में पानी खौल खौल कर जलता रहे और तरकारी बनने का समय बढ जाय। और यही वह Extra Extended समय होता है जब घर की नई नवेलियों को अगल-बगल वालीयों से बातचीत करने का Talk Time मिलता है।

           सास रमदेई इन सब पैंतरों से वाकिफ थी, आखिर उसने भी तो अपने समय इसी तरह का Talk Time Recharge किया होगा। सो, शुरू हो गई फाफामउ वाली पतोह पर राशन पानी लेकर। तुझे आग लगे…..तू मर जाये….तू ये हो जाय……। बताओ भला, अब मैं सिर्फ कडाही में एक लोटा पानी बढा देने के कारण किसी के प्राण कैसे लूँ।

        अब यही सब देख ताक कर परेशान हूँ। सोचता था कि किससे यह सब बातें कहूँ। जो देखा सुना वह सब बताने को जी मचल रहा था तो एक ब्लॉगर मिले सतीश पंचम।  वही सब कुछ सीखा पढा कर मुझे भी ब्लॉगर बनवा दिये वरना मैं भी था  देवता कभी काम का । चित्रगुप्त का फोन आता रहता है कि महाराज कहां ब्लॉगिंग के चक्कर में पडे हो, यहां डेली डेडली अकाउंट पेंडिंग होता जा रहा है।

       आज कल अपनी गदा, जो  कि  इस्तेमाल न होने के कारण शो-पीस बन कर रह गई है उसे टटोल रहा हूँ कि क्या इस पर कोई पोस्ट लिखी जा सकती है ?


- यमराज

स्थान-  वही , जिसकी पक्की सडकों पर चलने से मेरे भैंसे के खुर घिस गये।

समय – वही, जब मैं किसी के प्राण लेने पहुँचु और वह सूफीयाना अंदाज में गीत गाता मिले -
            आज दिन चडिया तेरे रंग वरगा.....रब्बा तैनुं दिल दा वास्ता


चित्र - साभार Flicker.com से

Sunday 6 September 2009

यदि पोस्ट लिखते ही यमराज प्राण लेने आ जांय तो ? उपर से यमराज टिप्पणी भी करें !!!!




यम हैं हम।

तो ?
-अरे हम हैं यम.....तुम्हारे प्राण लेने आये हैं।

-देखिये यमराज जी,  अभी अभी एक पोस्ट पब्लिश की है ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत वाले इसे दिखाते ही होंगे......टिप्पणीयां भी बस आने वाली ही हैं......चौबीस घंटे और रूक जाइये.....उसके बाद प्राण ले लो चाहे मेरी पोस्ट डिलीट ही कर दो....कोई फर्क नहीं पडता.....एक ब्लॉगर होने के नाते इतना तो हक बनता ही है।

-ये ब्लॉगर क्या चीज है ?

-यमराज जी, ब्लॉगर नहीं पता आपको......बडे वाहियात किस्म के हैं आप । आज के जमाने में आपको पता होना चाहिये कि एक ब्लॉगर क्या चीज है .

-वो चीज.....मेरा मतलब वो ब्लॉगरी इसी दुनिया में मिलती है या कहीं और से आती है।

-जी आती तो इसी दुनिया से है पर हर ब्लॉगर अपने आप को अलग ही दुनिया का मान कर लिखता है।

-अच्छा।

-हां और क्या ?

-तो तुम भी कुछ लिख रहे हो क्या।

-हां....मैं भी कुछ लिख ही रहा हूँ......पोस्ट अभी अभी पब्लिश की है। जरा पढिये तो.......।

-अरे ये क्या लिखा है तुमने.......गुलजार के गीत पर आधारित पोस्ट......एक ही लट सुलझाने में सारी रात गुजारी है.....अरे पहली बार मोहब्बत की है।

-यही तो है मेरी पोस्ट का विषय......कि कैसे खूबसूरत गीत गुलजार जी लिख रहे हैं कि बस मगन हो सुनते रहो।

-इसमें मगन होने की क्या बात है। लट तो मैने भी बहुत सुलझाई है।

-तो क्या आपने अपनी यमराजिन जी के लट सुलझाये हैं ?
-अरे नही....कभी सुना है कि मेरी कोई यमराजिन वगैरह भी है ?

-तब ?

-अरे मैं अपनी लट खुद सुलझाने की बात कर रहा हूँ।

-कुछ समझा नहीं ?

-अरे इसमें समझना क्या है मेरे बालों को देख कर समझ नहीं आ रहा कि इतने बडे मुकुट को संभालने के लिये बडे बालों की पैकिंग लगती है ताकि मुकुट हिले-डुले नहीं बल्कि बालों में एक जगह स्थिर रहे।

-अच्छा तो इसी लिये पौराणिक कैरेक्टरों के बाल इतने बडे बडे होते थे......ग्रेट। लेकिन इसमें लट सुलझाने की बात कहा  से आ गई।

-अरे तुम नहीं समझोगे......जरा गुलजार का गाना फिर बोलो तो.....

-एक ही लट सुलझाने में सारी रात गुजारी है.....पहली बार मोहब्बत की है।

-हां....तो तुम्हारे कवि ने पहली बार मोहब्बत की तो लट सुलझाई.......मैं भी तब लट सुलझाता हूँ जब मुझे किसी के प्राण हरने हों और लगे कि इसके प्राण कुछ और देर रहने देना चाहिये ।

-ऐसा कब लगता है आपको  ?

-फिल्मों में।
-मतलब  ?

-अरे भाई, जब फिल्मों में कोई मरने वाला होता है तब वह बेटे का इंतजार करता है। बेटे के आते ही वो एक दो बात बोलकर टैं बोल जाता है। बेटे के आने और उसके प्राण अटकाने के बीच मैं अक्सर अपनी लट सुलझाता रहता हूँ। मुझे भी उस शख्स से प्राण हरने तक वक्ती मुहब्बत सी हो जाती है कि कम से कम अपने बेटे को तो देख ले।

-ओह तो वह आप ही थे जो बेटे को मिलवाकर ही फिल्मी बाप या मां के प्राण हरते थे।

-हां और क्या......तुम लोग नाहक ही डायरेक्टर को क्रेडिट देते रहते हो। हां...आगे क्या लिखा है 
तुम्हारे कवि ने ?

-लिखा है कि

याद है पीपल के घने जिसके साये थे

गिलहरी के जूठे मटर हमने खाये थे

ये बरकत उन हजरत की है

पहली बार मुहब्बत की है......



-अच्छा तो गिलहरी के जूठे मटर खाने से तुम्हारे कवि को प्रेयसी मिली।

-हां, लिखा तो ऐसा ही है।

-हमम्.....मैं भी सोचता हूँ कि यमराजिन को ला ही लूँ......लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा कि मेरी यमराजिन मुझे मिलेंगी कहां।

-तो आप भी गिलहरी के जूठे मटर क्यों नहीं खाते  ?

-खा तो लू पर तुम्हारे शहर के बडे बडे मॉल तक में चूहों के जूठे मटर मिलते हैं.....गिलहरी के जूठे मटर मिलना तो दूर की बात है।

-हां, ये बात तो है......न जाने कैसे चूहे हर 'पेटीपैक माल' में मुंह मार लेते हैं और वह जूठा हो जाता है।

-पेटीपैक माल ?

-अरे पेटीपैक माल नहीं जानते जो माल कारखाने से आने के बाद अब तक खोला न गया हो...जिसकी सील न खुली हो उसे पेटीपैक माल  कहते हैं। और मटर तो 'पेटीपैक प्रजाति' की है। बिना उसके खोल निकाले मटर खाई नहीं जाती ।

-ओह......नया शब्द है शायद .......पेटीपैक ?

-हां....कुछ ऐसा ही समझो। अरे आपने तो नई पोस्ट के लिये और कन्टेंट मुहैया करवा दिया। अब ऐसा किजिये कि ये पेटीपैक शब्द पर एक पोस्ट ठेल दूँ तब आप मेरे प्राण लिजिये। तब तक टिप्पणीयां भी आ जायेंगी।

-ये क्या नई बला है। तुम्हारी पोस्ट पर आई टिप्पणीयां क्या तुम्हारे प्राणों से ज्यादा महत्व रखने लगी है।

-जी, कुछ ऐसा ही समझिये।

-अच्छा तो मेरी एक टिप्पणी अभी लो।

-बताईये


............ और यमराज जी ने टिप्पणी की -

..........कल को तुम यदि तुम मर जाओ तो तुम्हारे पोस्ट और टिप्पणीयों का क्या होगा। तुम्हारी टिप्पणीयां तो सर्वर पर ही पडी रहेंगी न। तुम्हारे ब्लॉगर साथी कुछ कुछ दिनों बाद घूम फिर कर आएंगे और कहेंगे कि कुछ लिखो.....लिखते क्यों नहीं.....पर तुम होगे तब न। ऐसे में तुम्हारी टिप्पणीयां वगैरह कहां जाएंगी  ? 

    - यमराज की बात सुनकर मैं सोच में पड गया हूँ.........सोचता हूँ कह दूँ कि मरने के बाद जो भी टिप्पणीयां आएंगी वह 'व्योम' में चली जाएंगी लेकिन अब सोचता हूँ.......टिप्पणीयां 'व्योम' में ही जाएंगी इसकी क्या गारंटी है......सर्वर तो अब भी अप ही है.......जिस दिन सर्वर डाउन हुआ......समझिये कि सारी टिप्पणीयां व्योम की ओर चलीं :) 


...... और हम अब चले नहाने......श्रीमती जी कब से कह रहीं हैं कि संडे है तो क्या नहाने का भी संडे मना रहे हो ? .....सोचता हूँ कि पत्नीयों की उलाहना भरी बातें कभी 'व्योम' में क्यों नहीं जातीं,..... ढंग से ब्लॉगिंग भी नहीं करने देतीं ये क्या किसी यमराज से कम हैं :)


- सतीश पंचम
स्थान - मुंबई ।
समय - वही, जब कडाके की ठंडी 'पूस की रात' में 'हल्कू' और उसका कुत्ता 'झबरा' खेतों की रखवाली के लिये आम के सूखे पत्तों का अलाव जलाकर गर्माहट महसूस कर रहे होते हैं इस फिक्र में हैं कि इस फसल से पाई-पाई जोडकर मालगुजारी चुकानी है और तभी कहीं दूर एक गीत बजता है......रात के ढाई बजे......कोई शहनाई बजे........दिल का बाजार लगा....धेला-टका-पाई बजे। 



चित्र - साभार Flicker.com से

Saturday 5 September 2009

स्कूल के मास्टर लोग शादी-विवाह में बैंड बजाते हैं

                  पेशे से शिक्षक रहे विवेकी राय जी ने 'मनबोध मास्टर की डायरी' में व्यंगात्मक शैली में बताया है कि किस तरह वह एक बैंडबाजे वाले की खोज में चले और उन्हे पढे लिखे बैंडबाजे वालों के एक दल के बारे में जानकारी मिली। एक जन ने बताया कि -

स्कूल के मास्टर लोग शादी-विवाह में बैंड बजाने का काम करने लगे हैं। ..... ये लोग बजनिया नहीं हैं लेकिन पेट और परिस्थिति जो न करावे । इनमें बीएड, बीपीएड, विद्यालंकार, शास्त्री, आचार्य सभी शिक्षित लोग हैं। इनके एक रात का सट्टा भी ज्यादा नहीं है - बस पांच सौ रूपये रात समझिये।

सभी अध्यापक हैं ?

'पूरा स्टाफ समझिये । वह जो बडा सा ढोल होता है और जिसे ड्रम कहते हैं तथा जो इतने जोर से बजाया जाता है कि उसकी आवाज से घर की खपरैल तक खिसकने लगती है। उसे अंग्रेजी के लैक्चरर बजाते हैं। संस्कृत वाले पंडित जी तमूरी पिटपिटाया करते हैं। ......इतिहास के अध्यापक शक्सफोन और नागरिक शास्त्र के अध्यापक बल्टहार्न बजाया करते हैं। कमाल का काम है कारनट का। सो इसे गणित और विज्ञान के अध्यापक बजाते हैं। हिन्दी विभाग यहाँ भी उपेक्षित है। हिन्दी टीचर को झाँझ मिली है। बजती तो खूब झमाझम है पर अन्य सुरीली आवाजों के आगे उसकी क्या बिसात है ? अर्थशास्त्री वाले मसक बजाते हैं। एक बार हवा भर दी तो बस उंगलीयाँ भर हिलानी है। ......महत्व का काम पीटी टीचर का है।......यहाँ डांसर बिना बैण्ड अधूरा लग रहा था। बाहर से रखने पर अपनी मौलिकता जाती रहती। इसीलिये शारिरिक शिक्षक ने इसमें अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार यह दल तैयार हो गया।

......तो ये बाजा बजाना औऱ अध्यापन कैसे एक साथ कर लेते है ?

बाजा वे गर्मी की छुट्टियों में ही बजाते हैं। प्रायः हमारे यहाँ लग्न विवाह के दिन उसी लम्बी छुट्टी में पडते हैं। अध्यापकों के पास शिमला, नैनीताल मे तरावट लेने के लिये जाने भर तो पैसा होता नहीं। .....सो एक दो महीने का धन्धा उठा लेते हैं।......

.......इनको बारात में ले जाने से कई समस्यायें हल हो जायेंगी। बैठे बिठाये सफेदपोश बाराती मिल जायेंगे। ......बाजा बजाने के बाद जब कपडे बदल कर ये लोग महफिल में बैठते हैं तो महफिल उग जाती है। वह खादी की चमक, वह टोपी-चश्मा, वह भव्य व्यक्तित्व तथा मुख पर विद्या का वह प्रकाश। बारात में बैंड बाजे के साथ कोई बोलता आदमी भी होना चाहिये। यहाँ दर्जनों मिल जाते हैं। संस्कृताध्यापकों को तो बारात में शास्त्रार्थ का एक नशा जैसा है....।

......कर्मकांड की समस्या भी हल। द्वार पूजा से लेकर विवाह तक के सारे काम संस्कृताध्यक्ष से करवा लिजिये। अगर बाजा बजते में कोई मौका आ गया तो उन्हें छुडाया भी जा सकता है...तमूरी ही तो बजाते हैं।

लेखक ने इतना जानकर सोचा कि इन अध्यापकों वाले बैंड बाजे से किस तरह बात की जाये - पढे लिखे लोग हैं। सो लेखक ने कई मजमून बनाये -



- क्यों महानुभाव आपकी एक रात की सेवा का क्या पुरस्कार होता है ?

किन्तु यह बात जँची नहीं। दूसरा मजमून बनाया -

- आपके अनुरंजन कार्य की दैनिक दक्षिणा क्या होगी ?

नहीं यह भी नहीं जम रहा। अंत में लेखक ने मजमून कुछ इस तरह तैयार किया -

- हमारे यहाँ के माँगलिक कृत्य के सानन्द सम्पन्न होने में आपका जो अमूल्य सहयोग प्राप्त होगा उसकी मुद्रा रूप में कितनी न्योछावर आपकी सेवा में उपस्थित करना हम लोगों का कर्तव्य होगा ?

यह वाक्य कुछ जमा और विशिष्ट बजनियों के गौरव के अनपरूप जँचा।

*******

     विवेकी राय जी ने यह व्यंग्य तब लिखा था जब शिक्षकों की तनख्वाह रोक ली जाती, महीने के पचास साठ रूपये वेतन मिलते थे। आज भी कई शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों को परले दर्जे का कारकून ही समझा जाता है। यह व्यंग्य उसी की याद दिलाता है। विशेष रूप से बाजे का चुनाव शिक्षकों के विषय से मैच कर रहा है - झाँझ - हिंदी विभाग को - बजती तो झमाझम है पर बाकी बाजों के सामने उसकी क्या बिसात...और विशेषकर पीटी टीचर का डांसर बनना तो अहोभाग्य ठहरा :)


चित्र- शिक्षामित्रों के ट्रेनिंग सत्र  का है जो कि मेरे अनुज  ने गाँव में ही एक जगह खींचा था।
पुस्तक अंश साभार - 'मनबोध मास्टर की डायरी'
लेखक - डॉ विवेकी राय
अनुराग प्रकाशन
चौक, वाराणसी- 221001

( पहले भी यह पोस्ट प्रकाशित हो चुकी है, लेकिन आज शिक्षक दिवस पर पुन: प्रकाशित  )

 - सतीश पंचम

बातें, जो जाने की जल्दी मचा रही हैं.....

कुछ बातें जल्दी मचाती हैं कि मैं जा रही हूँ......मैं न रूकूंगी। समय भी उन्हें ऐसा करने के लिये उकसाता रहता है कि कह दो कि देर हो रही है.......बहुत रूक लिये......हम जा रही हैं........अब न रूकेंगी.............ऐसी ही बातों को देखने पढने के लिये इस राह से गुजर सकते हैं जहां समय को एकबारगी धकियाया जा सकता है कि समय तुम बीत गये तो क्या हुआ ? ठहरने की सांकल तो अब भी खटखटायी जा सकती है......

ऐसी ही बीते-अनबीते पलों को इन लिंक्स के जरिये देखा जा सकता है ।

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