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Tuesday, August 25, 2009

चाशनी के टुकडे


निखिल और अनिता दिख नहीं रहे।
अरे ये क्या ? अब तो आयुश बडा हो गया है। दुसरी कक्षा में जाने लगा है लेकिन तुम हो कि अब तक उसे अपना दुध पिला रही हो। अरे अब तो रोक दो अपना दुध पिलाना। बाहर से जब आता हूँ तो ये वहां लटका मिलता है।

तुम ही बताओ अब मैं क्या करूँ ? न पिलाउं तो लगेगा उधम मचाने। कल रोते रोते सारा बदन जमीन पर लोटकर गंदा कर लिया था इसने। वो तो मैंने रोक लिया नहीं तो नारियल तेल की पूरी शीशी पानी में उडेलने पर तुला था।

बहुत बदमाश हो गया है। कुछ उपाय क्यों नहीं करती ?

कैसा उपाय ?

अरे वही जो मिसेज पुरी ने अपनाया था, मिर्ची वाला।

मतलब ?

अरे उनका लडका बंटी भी मिसेज पुरी का दूध काफी बडे होने तक पीता रहा था। बहुत उपाय किया, लेकिन मजाल है जो बंटी अपनी मां की छाती चिचोरना छोड दे ?

तब ?

तब क्या ? मिसेज पुरी ने अपने निप्पल्स पर मिर्ची वगैरह रगड लिया। और जब भी बंटी पीने आता उसे तीखा लगता।
धीरे धीरे उसने खुद ही छाती का दूध पीना छोड दिया।

तुम्हे कैसे पता ?

अरे मिस्टर पुरी ही तो बता रहे थे।

अच्छा तो ऑफिस में आजकल यही सब बोलते बतियाते टाईम पास हो रहा है।

अरे टाईम पास कैसा, वो तो ऐसे ही बातों बातों में मैने अपने आयुष की अब तक छाती का दूध पीने वाली बात छेड दी तो मिस्टर पुरी ने खुद ही अपने बंटी का हवाला दिया।

तो, तुम क्या चाहते हो हम भी अपने आयुष के लिये मिर्ची का लेप लगा लें।

हम नहीं सिर्फ तुम।

अच्छा हुआ जो बता दिये नहीं तो मैं तो तुम्हें भी गिनने वाली थी।

***************
अरे क्या आज तुमने वो नुस्खा अपनाया ।

तुम्हारे नुस्खे सिर्फ तुम्हारे दोस्तों के यहां ही कामयाब होंगे।
क्यों क्या हुआ

होना क्या था। मैंने मिर्ची को तोडकर जैसे ही अपनी छाती में लगाया जलन से जैसे जान निकल गई।
तब।

तब क्या, जैसे तैसे सह कर मैं मिर्ची लगी छाती लिये बैठी थी कि तुम्हारे लाट साहब जिद करने लगे कि दुद्धू पीना है।

तब।

मैंने भी सोचा, लो पी लो, इसी बहाने मेरे इस नये तरीके का असर भी देखूँगी।

तब क्या हुआ ।

होना क्या था, जैसे ही मेरी छाती आयुष ने अपने मुंह से लगाई सीसी करके दूर हट गया।

अरे वाह। फिर।

फिर क्या, कहने लगा मम्मी दुद्धू तीता है.....धो कर आओ।

क्या।

हां और क्या। आये बडे नुस्खे वाले।

मतलब ये उपाय भी फेल हुआ समझो।

इसमें समझना क्या है, फेल हो गया कि ।

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अरे सुनो, आज आयुष ने मेरा दूध नहीं पिया ।

क्यों, क्या हुआ।

अरे, वो अठारह नंबर का पोलियो वाला लडका है न, निखिल।
हां हा तो।

तो वही आज हमारे बिल्डिंग के नीचे से जा रहा था। उसे लंगडाता जाता देख आयुष पूछ बैठा कि वो लंगडा कर क्यों चल रहा है।

तब।

तब मुझे न जाने अचानक क्या सूझा मैंने फट से कह दिया कि वह अपनी माँ का दूध स्कूल जाने के लायक उम्र होने तक
पीता था, इसलिये भगवान ने उसे पोलियो दे दिया।

अरे वाह, फिर।

फिर क्या......आज शाम के सात बज गये अब तक उसने दूध पीने की जिद नहीं की।

चलो अच्छा है। यही सही। मालूम होता कि पोलियो के डर के कारण ये छाती का दूध पीना छोड देगा तो कब का इस उपाय को अपना लेता।

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सुनो, घर में चावल नहीं है, राशन नहीं है......कुछ भी तो नहीं है। न जाने कौन सी कमाई करते हो कि पूरा ही नहीं पडता।

अरे तो कमा तो रहा हूँ, जितना हो सकता है कोशिश तो कर ही रहा हूँ। ये तो है नहीं कि बैठा हूँ।
आग लगे तुम्हारी कमाई में। न खुद का घर है न ढंग का सूकून। हर ग्यारहवें महीने देखो तो घर बदलना पड रहा है। आखिर तुम्हारे साथ के सब लोगों का अपना मकान हो गया है। एक तुम हो कि अब तक किरायेदार बने घूम रहे हो।
आखिर वो सब भी तो तुम्हारी तरह ही काम करते हैं।

अरे यार तुम्हारा तो हमेशा का रोना है। ये नहीं है, वो नहीं है। अभी एक हफ्ते हुए पाँच हजार दिये थे। इतनी जल्दी स्वाहा हो गये।

पांच हजार दिये थे तो क्या दबा कर बैठ गई हूँ। घर में खर्चे नहीं हैं, मुन्ने की फीस नहीं भरनी है कि घर में खाना राशन पानी बिना कुछ लगे ही आ जाता है। आये हो बडे हिसाब करने। मुंह देखो जरा।

अब तुम बात को बढा रही हो।

मैं बढा रही हूँ कि तुम बढा रहे हो। पाँच हजार रूपल्ली क्या दे देंगे लगेंगे हिसाब करने। आग लगे ऐसी कमाई में।

मैं कहता हूँ चुप रहो।

नहीं चुप रहूँगी। चुप रहो चुप रहो कह कह कर ही तो अब तक मनमर्जी करते आये हो। कह रही थी कि चैताली नगर में प्लॉट मिल रहा है ले लो न दाम बढ जायगा, लेकिन मेरी सुनो तब न। आज वहीं पर शुक्ला जी ने लिया है कि नहीं। ठाट से रह भी रहे हैं और मलकियत की मलकियत बन गई है। औऱ यहाँ देखो तो हर ग्यारहवें महीने गमला दूसरों को देते चलो। थू है तुम्हारी कमाई पर।

मैं अब भी कहता हूँ चुप रहती हो या नहीं।

और वो तुम्हारा चपरासी कनौजीलाल को ही देख लो। रह रहा है न अपने खुद के घर में। भले ही झुग्गी ही सही पर खुद का तो है। और वो सिन्हा, कैसे अपने गैलेक्सी टावर में शान से रह रहा है। काम तो तुम्हारे ही साथ करता है पर ठाट देखो।

अच्छा अब तुम मेरा मुँह न खुलवाओ।

मुँह न खुलवाओ मतलब। कुछ बाकी करम रखे हो अभी जो कह रहे हो कि मुँह न खुलवाओ.......।

ओफ्फो......बैठो.......पहले बैठो। शांत हो जाओ। मेरी बात सुनो।

नहीं सुनूँगी। यही सब कहते कहते.....।

अरे सुन तो लो

कहो, क्या कहना चाहते हो।

तुम जो कह रही हो कि शुक्ला जी ठाट से हैं तो मुझसे पूछो कि वो कितने ठाट से हैं। तीन लडकियाँ हैं उनके। हर एक की शादी कराते कराते उनकी कमर टूट जाएगी। और उसमें भी जो दूसरे नंबर की लडकी है उसे तो तुम जानती है कि चल फिर नहीं सकती। अब उसका टेन्शन अलग झेलना पडता होगा शुक्लाजी को। इसकी शादी होगी कि नही, होगी तो कितना लेना देना पडेगा। दुल्हा कैसा होगा, कहाँ का होगा। तीनों के घर अच्छे मिलेंगे कि नहीं वगैरह...वगैरह। अब तुम ही बताओ, उन लोगों से हम ठीक हैं कि नहीं। हमारे तो दो बेटे और एक बेटी है। भगवान की दया से सब तंदुरूस्त हैं। आखिर सोचो, हम ज्यादा खुशहाल हैं कि वह शुक्ला।

और वो कनौजिया की जो बात करती हो कि उसके पास खुद का घर है, मानता हूँ। कभी देखा है तुमने कि कैसा घर है उसके पास। झुग्गी झोपडीयों से अब तक शायद तुम्हारा पाला नहीं पडा। वहाँ तो दिन में ही कोई जाने ,को तैयार नहीं होता औऱ तुम वहां रहने की बात करती हो। सोचो, सारे अपराध , सारी गंदी चीजें वहीं से तो निकलती हैं और तुम वहां रहने की बात कह रही हो। क्या हो गया है तुम्हें। अरे ऐसी जगह घर लेकर रहने से तो अच्छा है बिना घर लिये रहें।

और जो सिन्हा की बात करती हो तो उसके तो बच्चा ही नहीं हो रहा। हर हफ्ते छुट्टी लेता है कि वाईफ को डॉक्टर के पास ले जाना है दिखलाने। अब तक पचासों हजार रूपये तो फूँक दिये है उसने लेकिन मजाल है जो बच्चा हो जाय़ ।

अब तुम बताओ, तुम्हें ये इतने सारे बच्चे पैदा करने में कितना खर्चा करना पडा। बताओ तो।

हटो, बडे आये समझाने वाले।

अरे मैं मजाक नहीं कर रहा। सच कह रहा हूँ। उन लोगों से अपने आपको तुलना करना छोड दो। वो हमारे सामने कहीं नहीं ठहरते।

तो क्या अब दूसरो के दुख देखकर खुद को खुश होना सीखना पडेगा।

मैं वो तो नहीं कह रहा।

पर मतलब तो वही है।

अरे तुम तो खामखां , राई का पहाड बनाने पर तुली हो। चलो छोडो, चाय बनी हो तो एक कप पिला दो। जब से आया हूँ, तुम्हारे ही पचडें में पडा हूँ।

देती हूँ चाय.........वो तुम क्या कह रहे थे सिन्हा जी के बारे में, पचासों हजार फूँक दिये हैं बच्चा पैदा करवाने में।

मम्मी...मम्मी.......भईया मुझे मारता है।

क्यों मारते हो निखिल.....खेलो बेटा खेलो आं........अनिता बेटी आयुष के साथ खेलो.....निखिल , बेटा तुम भी
खेलो....झगडा मत करो आपस में। सुनिये......चाय दूसरी बना दूँ....ये चाय काफी देर पहले की है।

क्या बात है, अब तो बडा प्यार आ रहा है मुझपर.........।

अब हटो भी!



- सतीश पंचम

Saturday, August 22, 2009

देहात की सडक, हरे भरे खेत, मोटर साईकिल और कुल्हड वाली चाय पिलाती 'गुमटी' । ( देहात लीला )



देहात में मोटर साईकिल पर जाते हुए सडक के दोनों ओर यदि हरे भरे खेत हों तो यात्रा का आनंद दुगुना हो जाता है। कहीं पर किसान खेतों में से खर पतवार निकाल रहा है तो कहीं कटाई – छंटाई चल रही है। कहीं पर कोई हल चलाने के बाद बीडी फूंक रहा है तो कहीं पर खेत में ही चना चबैना चल रहा है। किसानों का अपना अलग किसम का ब्रेक फास्ट जिसे शायद शहर न समझ पाये।

ऐसी ही झिंसी पडती खुशनुमा मौसम की एक दुपहरी, कच्चे रास्ते पर मोटर साईकिल से निकला जा रहा था। एक गुमटी दिखी। सोचा एकाध चाय पी जाय। कुल्हड वाली चाय वैसे भी बहुत सोंधी होती है, वरना शहर में तो उसी जूठे गिलास को सिर्फ गीला भर करके दुबारा प्रयोग करने का चलन है। मोटर साईकिल रोक गुमटी में बने एक पटिया नुमा चबूतरे पर जा बैठा। गुमटी मे कोई ग्राहक न दिखा। दुकानदार बैठे बैठे उंघ रहा था। वैसे भी गाँव में भरी दुपहरिया में चाय कौन पीता है भला ?

चाय मिलेगी ?

बैठिये, बना देता हूँ।

थोडा गँवई मन का आनंद और आस पास के खेतों को निहारने का लोभ छोडते न बना। चाय बनाने को कह दिया। एक अखबार दिखा........हेडलाईन थी - प्रधानमंत्री ने बढती आतंकवादी घटनाओं पर चिंता जताई। खाद्यान्न संकट बढने के आसार। मौसम........

सक्कर जियादे लेंगे कि कम ?

जैसा समझो वैसा बनाओ भई। अपने को सब चलता है।

एक बार फिर अखबारों में खो गया। सूखे की आशंका से अरहर के दाम चढे। शाहरूख ने अमेरिका में हुए अपने अपमान को कबूला.......बिपाशा ने जॉन को किस किया, राखी सावंत ने दुल्हा चुना...... वाईचुंग भूटिया ने न खेलने का मन बनाया।

इस साल तो झूरा पड गया है- दुकानदार ने मेरी तंद्रा भंग करते कहा।

हां, सो तो है।

जाने कईसे बीती इ साल। सक्कर का दाम अबहीं से बादर खोदे लगे हैं।

क्या करेंगे । बारिश नहीं होगी तो दाम तो बढेंगे ही। - मैंने भी हां में हां मिलाई।

असल में पाप बहुत बढ गया है। जेहर देखो, वहीं खून कतल, मार, झगडा। यही सब का न असर है कि धरती मईया कोपा गई हैं।

हां, बात तो ठीक कहते हो।

अच्छा ई बतावें कि आप बम्मई रहते है का ?

उसका इस तरह पूछना मुझे अटपटा न लगा। अक्सर पूर्वांचल के ज्यादातर इलाकों से निकले लोग मुंबई की तरफ ही ज्यादा बसे हैं। सो मैंने कहा - हां, क्यों ?

अच्छा इ जो हिरो हिरोनियन का फोटू है, तो क्या सब अईसे ही दिखती हैं क्या ?

मुझे दुकानदार थोडा रसिक लगा। समय बीताने की गरज से मैंने अखबार को एक ओर परे रखते चुहल की – हां, दिखती तो सब अईसे ही हैं.... काहें ? मिलना-उलना है का ?

दुकानदार एक पल को मुस्कराया और बोला – अरे तो ......कपडा वपडा तो ढंग का पहिनें। देखो तो मालूम पडता है एक कोना अतरा यहां खुला है तो दूसरी का उहां से खुला है।

अरे, उनका मन करे जैसा पहने, तुम क्यों दुबरा रहे हो ? मैने मजाकिया लहजे में पूछा।

नहीं, बात दुबराने की नहीं है। दुकानदार थोडा रूक कर बोला - उ का है कि गाँव में ही एक नई नवेली सादी हुई है। पतोह सायद कोई नये ढंग की है। आई थी तो हाथ में घडी ओडी लगाके आई थी। बस, फिर क्या था ? गाँव वाली औरतन को मौका मिल गया । कोई कहती है कि हिरोईन बनी फिरती है तो कोई कहती है मधुरी दीछित है।

अच्छा !

हां, भाई। उसका तो अब घर से बाहर निकलना जैसे अपाढ हो गया है। सास अलग ताना मारती है कि उसके इस तरह घडी पहन कर आने के बाद उसका नाम घडीवाली पड गया है।

मैं सोच में पड गया। ऐसा भी होता है क्या ? घडी पहन लेने भर से नाम पड जाता है। तो 'मूर्ति प्रदेश' की एक माया यह भी रही। पतोह जो केवल घडी पहनने भर से ही बदनाम हो रही है।

बात कहां से चली थी हिरोईनों से, उनके कपडे पहनने के ढंग से और अब देखो बात गाँव की पतोह पर आकर टिक गई है। कुछ और बातों का सिलसिला चला। चाय तब तक बन चुकी थी। कुल्हड को उल्टा कर उसमें से आँवे की राख को दुकानवाला झटक कर निकाल रहा था।

तभी न जाने कहां से एक कुत्ता आ गया। मेरे पैरों के पास आकर कुछ सूँघने लगा। मेरे मन में शंका हुई । पता नहीं ये कैसा कुत्ता है ? पैर को एक तरफ मोड कर थोडा सरकने को हुआ।

काटेगा नहीं। पालतू है।

सुनकर थोडा निश्चिंत हुआ।

लिजिये - चाय भरी कुल्हड मेरी ओर थमाते दुकानदार ने कहा।

चाय थामने के बाद एक पल को चाय के थोडे ठंडे होने का इंतजार कर ही रहा था कि तभी एक महिला सिर पर झौवा ( घास वगैरह रखने वाली टोकरी) रखे कहीं से आती दिखी। गुमटी के पास आकर एक पल को रूकी और फिर अंदर गुमटी में आ गई।

चाह चाही।

बईठो....... देते हैं।

वह महिला गुमटी मे एक ओर रखे ईंट के टुकडे पर जा बैठी। बैठने के लिये जगह खाली थी पर फिर भी वह वहां पर नहीं बैठी। जमीन पर पडे ईंट के उपर बैठने से मुझे थोडा अटपटा लगा। सोच में पड गया, हो सकता है कोई लाज लिहाज की बात हो ।

चाय की चुस्कियां लेते रहा। रह रह कर उस महिला की ओर कनखियों से देख लेता था। उसका ध्यान चबूतरे पर से आधे झूलते अखबार पर था। वह एक पल को रूकी और दुकानदार से बोली – अखबार ले लूँ पढने के लिये ।

आंय.......हां ले लो - दुकानदार अचानक जागते से बोला हो जैसे।

महिला ने अखबार को आगे बढ कर ले लिया। कुछ देर उलट पलट कर देखती रही और फिर वापस करते बोली – आज एहमा, गुम हुए लोगन का फोटू नहीं है का ?

अब क्या मालूम । जो है सो वही है- दुकानदार ने जान छुडाने की गरज से कहा।

वह महिला अब भी थोडी देर उलट पलट कर अखबार देखती रही, कुल्हड में रखी उसकी चाय ठंडी हो गई थी। थोडी देर देखने के बाद अखबार वापस उसने वहीं रख दिया जहां से लिया था। साडी की कोंछ में से एक रूपये का सिक्का निकाल उसे दुकान पर रखे दूध के टोप पर रखते हुए बोली - चाह रख लिजिये। पीने का मन नहीं है।

अरे तो मत पियो, पईसा तो मत दो। बिना पिये पईसा दे रही हो !

नाहीं, रखो।

इतना कह कर बिना कुछ बोले वह महिला अपने झौवे को उठा चलती बनी।

मैंने कहा – बडी अजीब है। चाय भी नहीं पी और पैसा देकर चलते बनी।

उ चाय पीने थोडी न आई थी। उसका लडका घर छोड कर चला गया है। कभी कभी आ जाती है इस ओर अखबार में उसे ढूँढने।

मैं सोच में पड गया, ये महिला क्या जाने कि बिना पैसा खर्चा किये अखबारो में किसी का फोटू नहीं छपता। और अगर छपता भी है तो कोई विशेष कारण से।

अखबारवाली नाम पड गया है इसका।

क्या ?

हां, एक दो बार गाँव के लोग इसको अखबार उलटते पलटते देख चुके हैं। सो गाँव में बात फैल गई की बिसनु की माई अखबार पढना जानती है। तब से लोग इसे अखबारवाली बोलने लगे हैं। ये बोलती नहीं बेचारी, सुन लेती है।

खैर, चाय खत्म हो चुकी थी। पैसे चुकता कर मैं फिर से अपनी मोटर साईकिल पर जा बैठा। थोडा ही आगे बढा था कि वह महिला रास्ते में जाती दिखी। साडी से अपनी आँखें पोंछ रही थी। शायद मैंने चाय की दुकान पर कनखियों से ठीक ही देखा था । चाय की दुकान में ही उसकी आँखों के कोर भीग चुके थे, यहां रास्ते पर आते आते छलछला उठे।

मेरे जहन में अब भी अखबार की हेडलाईनें कौंध रहीं थी – बिपाशा ने जॉन को किस किया, राखी सावंत ने दुल्हा चुना......शाहरूख ने अमेरिका में हुए अपने अपमान को कबूला.......।



- सतीश पंचम

Tuesday, August 18, 2009

नेता रीलोडेड विथ NDTV

आज एनडीटीवी पर कोसी में आई बाढ के एक साल पूरे होने पर एक रिपोर्ट देख रहा था। इस रिपोर्ट को देख कर एक साल पहले का दृश्य सजीव हो उठा। लोगों की त्रासदी और नेताओं के दोगलेपन को उजागर करती रिपोर्ट देख मुझे एक साल पहले की वह खबर याद आई जिसमें नेताओं द्वारा राहत कैम्प से तब तक कोई राहत नहीं दी जाती थी जब तक कि कोई नेताजी उसका उदघाटन न कर दें। अखबारों मे कहीं कहीं इस बात की चर्चा हुई थी तब। उसी बात पर मैंने एक पोस्ट लिखी थी। पेश है वही पोस्ट फिर एक बार -

- नेताजी रीलोडेड



बाढ राहत केंद्र में मधेपुरा के बोदर ने अपनी टांग खुजाते हुए कहा - ससुर पेट चुरूर मुरूर कर रहा है, कुछ बांट ओंट नही रहे हैं। सहरसा से आये रामलवट यादव ने कहा - जी तो हमारा भी ठीक नहीं है......आज चार दिन हो गया पेट में एक दाना नहीं गया है, जाने का कर रहे हैं ई राहत उहत वाले कि अभी तक किसी को अंदर केंद्र में जाने ही नहीं दे रहे। इतने में शोर हुआ कि नेताजी आय गये हैं - अब सब कोई अपना पत्तल - कुल्हड, गिलास- उलास संभाल लिजियेगा, कोई किसी को धक्का उक्का न दे, और हाँ जैसे ही नेताजी फीता काटें तो सब लोग ताली जरूर बजाइयेगा।

रामलवट समझ गये कि क्या होने वाला है.......मन ही मन बोले.......अरे तोरी बहिन क भकभेलरू ले जाय........ससुर अबहीं घाटन करेंगे तब जाकर दाल ओल बंटेगा। बोदर की समझ में न आया कि आखिर ये फीता-कटन्नी क्यों हो रही है, और हो रही है तो नेता ही क्यों काट-कूट रहा है.......आज तक तो न सुना था कि कभी बडे लोग कोई गत का काम किये हों। रामलवट यादव के कान के पास मुंह ले जाकर बोला - ई फीता उता काहे काट रहा है? और काट रहा है तो दाल ओल उसके काटने के बाद ही मिलेगा ऐसा क्यूँ , क्या फीता काट कर उसी दाल में डालेगा क्या। रामलवट ने बोदर की बात पर हल्के से मुस्कराते हुए कहा - अरे तुम नहीं जानते- ये घाटन नेता हैं, हर जगह कैंची लेकर चलते हैं, जहां देखते हैं कोई नया काम हो रहा है, फट से घाटन करने के लिये फीता काट देते हैं। बगल में खडे लालराज कोईरी जो थोडा पढे जान पडते थे, बोले - अरे भाई घाटन नहीं, उदघाटन कहो। रामलवट ने लालराज की बात को फटाक से खतम करने की ईच्छा से कहा - हाँ वही....वही घाटन । ईधर लालराज सोच में पड गये कि ये निरा चुघ्घड तो नहीं है क्या...........बता रहा हूँ उदघाटन तो कह रहा है हाँ वही घाटन....लालराज ने चुप रह जाना ठीक समझा।

रामलवट जारी थे........तो ऐसा है कि चाहे कैसा भी काम हो, यहां तक कि सौचालय भी खुलवाना हो तो ये घाटन नेता से ही खुलवाये जाते हैं, इधर फीता काटा उधर नया काम सुरू। बोदर को अजीब लगा.....ये क्या कि लोग एक तो पहले से ही परेशान हैं....बाढ....पानी....बरखा-बुन्नी से, उपर से ये घाटन महाराज और तुले हुऐ हैं कि पहले फीता काटेंगे तभी सबको भोजन मिलेगा। बोदर ने गाली देते हुए कहा - मालूम पडता है ऐनके बाप जब ईनको पैदा कर रहे थे तो हाथ में चाकू भाला लिये हुए थे......ससुर क नाती.....आये हैं घाटन करने......अरे पूछो ये भी कौनो बात हुई कि लोग भूख से बेहाल हैं.....आंते कुलबुला रही हैं, ठीक से खडे नहीं रहा जा रहा और ये नेता लोग होटिल से खा पीकर अच्छे से चले हैं कि अब तनिक ईत्मिनान से बाढ राहत केंद्र का उदघाटन किया जाय.......अरे जा घोडा क सार.......कबहूँ तुम पर भी पडेगी......इतना अनेत कर रहे हो तो समझ लो कि उपर वाला भी जब तोहार रसलील्ला खतम करेगा तो फीता काट कर ही करेगा।

तभी नेताजी ने भाषण देना शुरू किया - भाईयो....जब बच्चा जन्म लेता है तो उसके नाभी का फीता काटने के लिये दाई आती है.......बस आप मुझे वह दाई समझ लेना कि जो ये फीता काटकर कुछ सहयोग दे रहा हूँ, आप लोग नाराज न होना.....बात ये है कि ईस तरह फीता काटने से मीडिया और आप लोगों के द्वारा सब को पता चलता है कि यहाँ बाढ राहत सेन्टर खुल गया है ईसलिये हम ये फीता काटन किये हैं वरना हम तो ये न करते.......।इतने में भीड का धैर्य जवाब देने लगा ...... किसी ने चिल्ला कर कहा - अरे ये फीताक्रमी को हटाओ यार...... बहुत पढे हैं बिज्ञान में फीताक्रमी.....गोलक्रमी......सभी ससुरे कीडे होते हैं पेट के........ये भी एक पेट का ही कीडा है जो हमें भूखा रख रहा है......।

इधर लालराज ने मन ही मन कहा - शरीर को तो पेट के कीडे वाले रोग से मुक्ति मिल जाती है लेकिन इस फीताधिराज से जाने कब मुक्ति मिलेगी जो हमारे मरने में भी सहयोग करना चाहता है...............फीता काट कर ।



*फीताक्रमी = Ribbon Worm (पेट का एक प्रकार का कीडा)


- सतीश पंचम


Monday, August 17, 2009

शादी ब्याह में होने वाले झगडे टंटे, बेबात के बात और असवारी में बैठी दुलहन



शादी विवाह में झगडा टंटा होना, नाराज होना , बेबात के ही अपने आपको अपमानित समझना खूब देखा गया है। इन्ही मुद्दों को घेरती एक दिलचस्प कहानी फिर पढने मिली। कहानी है 'मुखिया साहब' जो कि 'फिर बैतलवा डाल पर' कहानी संग्रह में से है, प्रकाशक हैं - भारतीय ज्ञानपीठ। यूं तो इसे पहले भी पढ चुका हूँ लेकिन जब दुबारा पढा तो कुछ और बातों पर नजर पडी और मजा कुछ दुगुना हो गया। कहानी लिखी है गाजीपुर के डॉ विवेकी राय जी ने। विवेकी राय जी लिखते हैं –

जिस बरात में हम लोग गये हुए थे, एक खानदानी रईस की थी। विदा-विदाई में खूब नाटक हुआ और होते होते दिन के दस बज गये। बिना ठीक से सोचे कि कहां जाना है, छुट्टी पाते ही हम लोग साइकिल की सीट पर बैठ गये।

उपर दहकता सूरज, नीचे तेज, उजली और चमचमाती धूप। पछिवहीं लूचि की आँच। आज मालूम हुआ कि ऐसी खडखडिया दोपहरी में भी चला जा सकता है।

लेखक विवेकी राय आगे लिखते हैं कि जब हम काफी थक गये तो एक गाँव में सोचे कि चलो यहां मुखिया जी के यहां रूक कर कुछ खा पी लिया जाय। पूछकर मुखिया के दरवाजे की ओर बढे। पर यह क्या ? पचीस-तीस हाथ लंबी बैठक में दर्जनों चारपाईयों पर बहुत-से लोग बैठे थे। कुछ लोग नीचे भी बैठे थे। सभी खामोश। जैसे बैठाये गये हों। अपराधी जैसे चुप। माजरा क्या है ? सामने जाकर लौटना भी उचित नहीं है। बैठक के पास पहुँचे। संयोग से उन बैठे लोगों में मेरे एक पहचानी मित्र मिल गये। साईकिल खम्भे से टिका दी गई। मित्र के पास जा बैठे। हम लोग भी चुपचाप बैठे। इतने में बाजा बजाने वालों का दल आया। वह लोग भी एक कोने में चुपचाप बैठ गये। चुप्पा लोगों की संख्या बढती जा रही थी।


धीरे से आँख चारों ओर दौडायी। वह पीली धोती और लाल कुरता पहने कौन ? उमर पन्द्रह-सोलह साल की। आँख में हलका काजल और पैर में महावर। यह तो दूल्हे का बाना है। इधर साफ-सुथरा पहने लोग। उधर कुछ बूढे बाबा । तमाखू चढाकर लाया गया। एक बाबा पीने लगे। गोरे, लम्बे, उजली और बडी-बडी मूँछें, एकहरा शरीर, आयु 60 के लगभग, चेहरा खिंचा हुआ, आँखें चढी हुई।

तब तक एक डोली आयी। फाल बढाते, हूँ-हूँ-हूँ करते करते , एक हाथ में सोटा थामें कहार। आँखें उधर खिंची। तब तक मानो बम फूट गया।

खबरदार! ऱख दो वहीं।

देखा बूढे काका थे। हुक्का चारपाई के पाये से टिका दिया और खडे हो गये।

देखें कौन माई का लाल घर में ले जाता है ? बडे विदा कराने वाले हुए।

एक आदमी ने धीरे से हाथ पकडकर बैठाया । कहार रूक गये। डोली रख दी गई ; ठीक बैठक के सामने जहाँ धूप की उजली आग जमीन और आसमान के बीच में कस गयी थी।

कुछ लोग उधर से आये। शायद गाँव के ही हैं। पट्टीदार होंगे। बूढे बाबा के पास बैठ गये। एक ने सुर्ती निकाली। बनाते-बनाते कहा, - लडकी को घर में जाने दें। इसने क्या अपराध किया है ? बेचारी धूप में डोली के भीतर भूख-प्यास और गरमी से मर जाएगी।

मर जाएगी तो मर जाये। इसे लेजाकर वापस कर आओ। कुछ खाने पीने के लिये डोली के भीतर रख दो।


यह ठीक नहीं होगा।

यही ठीक होगा।

अब चुप्पी खत्म हुई। मित्र ने बताया कि ये बूढे गाँव के मुखिया हैं। इनके लडके की शादी थी। बरात करनपुर गई थी। आज सबेरे विदा-विदाई के समय दहेज में कुछ कमी होने के कारण ये नाराज होकर चले आये।

एक मजेदार बात । कुछ लोग उधर से मुस्कराते हुए आते हैं। बैठक में आकर गम्भीर हो जाते हैं। मुखिया को समझाते हैं। चार बात इधर चार बात उधर। फिर उठकर वैसे ही चले जाते हैं। ये मजा लेने वाले लोग हैं। आग लगानेवाले हैं। पट्टीदार लोग हैं। बना खेल बिगाडने वाले लोग हैं।

इधर कहानी आगे बढती है। बहस मुबाहिसा सब बेकार। मुखिया बार बार कह रहे हैं – बप रे बाप। पगडी उतार दी, नाक कटा दी।

लेखक मुखिया से तब कहते हैं - आप के घर की लक्ष्मी है। इसे इस तरह क्यों दुत्कार रहे है।

कौन साला दुत्कारता है। खैरियत इसी मे है कि डोली पहुँचवा दो।

तो इसे अब नहीं लाएंगे ?

जब वक्त आयेगा तो लाउंगा।

जाने दिजिये, जो हुआ सो .....।

खूब बात करनेवाले हो। ओठ काटकर और सिर तोडकर उन्होंने कहा – राजा का धन मुसहर बाँटे ? मेरा लडका है, मैंने खर्च किया है। मैं मालिक हूँ। और बीच में कोई दूसरा कूद पडे ? मेरी इज्जत बरबाद कर मालिक बन बैठे ?

दूसरा कौन गैर है। आपके रिश्तेदार लोग हैं।

रिश्तेदार हैं तो रिश्तेदारी करे कि छुरी पेट में भोंकेंगे। एसे रिश्तेदार को दूर से सलाम।

कौन विदा करा लाया ? मुखिया ने पूछा ।

मैं – लेखक के मित्र ने थोडा सिर झुका कर कहा।

क्यों विदा करा लाये ?

गलती हो गयी।

क्यों गलती हो गयी ?

पुन सन्नाटा। कोई कुछ नहीं बोल रहा है। तभी कोई बोल पडा ।

इसका जवाब मेरे पास है। गमछा बँधा, लमछर कुरता, अँधेड उम्र , घुटने तक धोती, नाटा कद, दोहरा हाड-काठ।

आगे आकर दाहिने हाथ की तर्जनी से हवा में लाईन बनाता हुआ बोला –
देखिये, ये मुखिया हैं। हमारे बडे भाई साहब हैं। अब तक मैं शील संकोच में कुछ नहीं बोल रहा था। अब हद हो गई है। ...........मैं लडकी को घर में ले जाता हूँ । घर में हमारा भी हिस्सा है।

तब पहले बाँट बखरा हो जाए।

हाँ- हाँ जो होता हो सब हो जाय। दोनो भाई सोंटा लेकर मैदान में छरकने लगे। हाँ- हाँ- हाँ कर अनेक लोग धरहर करने लगे। शोर – गुल अजब हो उठा।

इधर रिश्तेदार लोग भी सामान समेटने लगे। छडी उठा ली गई। झोला संभाल लिया गया। साईकिलें खडखडाने लगीं।, हम लोग भी उठ खडे हुए। कुछ गाँव वाले रोकने मनाने लगे। सब अस्त व्यस्त हो गया ।

उधर दुल्हा सिसकने लगा। कुछ लोगों की नजर इस पर गई और लोग उसे समझाने बुझाने लगे, भैया, तुम काहे को रोते हो ? चुप रहो, चुप रहो।

उसी समय एक मजेदार बात हुई। मौका पाकर घर की औऱतें डोली टाँग ले गयीं और दरवाजे पर लगाकर बहू उतार ली गयी। हवेली मधुर मधुर गीत से गूँज उठी। उस समय तक अभी दोनों भाईयों मे उछल कूद जारी थी। गाली-गलौज और ललकार- फुफकार के बीच जब गीत की ध्वनि कानों में पडी तब मुखिया का सारा ताव जैसे एकदम उतर गया। घर में आग लगने का शाप देते गाँव से बाहर हो गये।

चार बजे भोजन मिला। एक घण्टा आराम कर हम लोग चले। रास्ते में स्टेशन पर कुछ लोग मुखिया की मनावन कर रहे थे। अनमें नाच, बाजा, तम्बू और बत्तीवाले थे जिनका सट्टा बाकी था।

तभी लेखक ने झटके से एक बात सुनी – पक्के उस्ताद हैं, सट्टेवालों को लूटने के लिये कैसा पाखण्ड रचा।

पूरी कहानी पढने के बाद विवेकी राय जी के गहन ग्रामीण समझ और विचार के प्रति कुछ और श्रद्धा बढ गई है। पिछले कुछ दिनों से कोई नई किताब उनकी नहीं पढ पाया हूँ । यूं तो उनसे फोन पर कई बार बात हुई है, लेकिन इधर आयु और अस्वस्थता के चलते उनकी लेखन यात्रा जरूर थोडी बाधित लग रही है। गुरूवर विवेकी राय जी के लिये आशा करता हूँ कि जल्द ही पूरी तरह से सक्रिय हो कर हमें कुछ और ग्राम्य झांकी दिखलाएंगे।




- सतीश पंचम









( 'मुखिया साहब' कहानी अंश- साभार - 'फिर बैतलवा डाल पर' कहानी संग्रह से, प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ,

*आवरण चित्र - साभार , हंस (अगस्त 2008 अंक ) - यहां बता दूँ कि हंस के आवरण चित्र बहुत रोचक होते हैं। इन्हीं मे से एक यह आवरण चित्र अगस्त 2008 अंक का है। पहले भी सफेद घर पर दुल्हन के पैर छूते दुल्हे का आवरण चित्र (जून 2009) पर चर्चा की गई है। इन आवरण चित्रों को देख कर हंस की रचनात्मकता पर मुग्ध हूँ।

Sunday, August 16, 2009

आखिर ऐसा क्या है फिल्म 12 Angry Men में जो कि मैनेजमेंट में Decision Making पढाने के लिये इस फिल्म का इस्तेमाल किया जाता है ? आईये जानें।


आखिर ऐसा क्या है फिल्म 12 Angry Men में जो कि Managerial technique of Decision Making पढाने के लिये इस फिल्म का इस्तेमाल किया जाता है। आईये जानें। कल्पना करें कि आप जिस टीम में काम करते हैं वहां कई तरह के लोग हैं किसी का कुछ बैकग्राउंड है तो किसी का कुछ। किसी की अपने निजी जीवन में कुछ घटनाएं घट चुकी हैं जो कि उन्हे आजीवन उनके Decision making पर असर डालती हैं और वो पूर्वाग्रह या Prejudice के तहत अपना निर्णय लेते हैं।

वहीं इसी टीम में कुछ एसे लोग हैं जो कि हवा का रूख देख कर फैसला करते हैं। दूसरों को देखकर फैसला करते हैं कि उन्हें क्या पसंद है, क्या नहीं। कहीं वो नाराज तो नहीं हो जाएंगे मेरे निर्णय लेने से। कुछ ऐसे सदस्य भी होते हैं जिनका कि अपने पर कॉन्फिडेंस नही होता और हर डिसिजन लेने से पहले अपने सिनियर का मुंह ताकते हैं। इस टीम में ऐसे भी हैं जो कि केवल अपनी नौकरी करते रहने के लिये ही टीम में बने रहना चाहते हैं। उन्हें जो कहा जाता है वही करते हैं। अपने से इनिशियेटिव लेने की उनमें क्षमता ही नहीं होती।


यह फिल्म 12 Angry Men इन्हीं सब परिस्थितियों को एक जगह एक कमरे में लाकर पेश करती है। इस 12 Angry Men का ही हिंदी Version है एक रूका हुआ फैसला। कहानी के अनुसार एक बच्चे पर अपने पिता की हत्या का आरोप होता है। कोर्ट आदेश देती है कि बच्चे ने हत्या की है या नहीं ये फैसला एक 12 सदस्यी जूरी पर छोडा जाय। कोर्ट के आदेश के तहत फैसला एकमत से होना चाहिये।





सभी 12 सदस्य एक कमरे में बंद हो जाते हैं। उन्हें बाहर जाने की तब तक इजाजत नहीं है जब तक कि फैसला न हो जाये। शुरूवात में ही कई सदस्य उस कमरे को कोसते दिखते हैं जिसमें वह बंद हैं। पंखा नहीं चल रहा, गर्मी है ये है वो हैं। यानि वह सब कमियों की बातें करते हैं लेकिन जिस बात पर Decision लेना है वही नहीं करते। कुछ देर बाद सभी सदस्य एकसाथ बैठते हैं। शुरूवात में ही कोर्ट में चले इस बच्चे के केस को ध्यान में रखते हुए जूरी मेंबर आपस में वोटिंग करते हैं कि बच्चा Guilty है या नहीं। कोर्ट में चली बहस और अपनी जो कुछ भी आधी अधूरी जानकारी के तहत 11 सदस्य बच्चे को Guilty मानते हैं, दोषी मानते हैं लेकिन एक सदस्य बच्चे को दाषी नहीं मानता।

बाकी के सदस्यों की भौंहे टेढी हो जाती हैं इस एक सदस्य के प्रति। वह उसका मजाक उडाते हैं कि 11 सदस्य एकमत हैं लेकिन अकेला वही है जो बहुमत के खिलाफ है। तब उस पर लोग दबाव डालते हैं कि अब वह भी एकमत से शामिल हो और बच्चे को guilty माने और हम सभी इस बंद कमरे से बाहर निकले। हम सभी को अपने अपने काम निपटाने हैं। किसी को फिल्म देखने का वक्त हो रहा था तो किसी को कुछ। लेकिन चूंकि फैसला कोर्ट आदेश के तहत एकमत से होना चाहिये अत वह बारहवां सदस्य अपने सहमत न होने का कारण बताता है और हर एक प्वॉइंट को तफ्सील से रखता है। लेकिन फिर भी जूरी के सदस्य उससे सहमत नहीं होते। वह चाहते हैं कि जल्दी से फैसला हो और उन्हें घर जाने मिले। कुछ बहस और झडप के बाद वह बारहवां सदस्य एक प्रस्ताव रखता है कि अब तक मैने जो यहां बात बताई है उसके बाद भी आप लोग सहमत नहीं हैं। इसका काट ये है कि एक बार और वोटिंग करवाई जाये और यदि एक और वोट बच्चे को निर्दोष माने तो बहस जारी रखी जाय। इस बार वह बारहवां सदस्य खुद से ही वोटिंग में हिस्सा नहीं लेता।

वोटिंग होती है और आश्चर्यजनक ढंग से एक औऱ सदस्य बच्चे को निर्दोष मानता है। NOT GUILTY वाला वोटिंग पर्चा सबके आंख की किरकिरी बन जाता है। इस बात पर भी बहस होती है कि किसने किया होगा ये एक वोट। तभी वह शख्स जिसने बच्चे के पक्ष में वोट किया था खडा होता है और अपनी बात को रखता है कि क्यों वह बच्चे को निर्दोष मानता है। अब जूरी का फैसला टर्न लेना शुरू करता है 10 लोग बच्चे को दोषी मानते है लेकिन 2 लोग बच्चे को दोषी नहीं मानते।


उन्ही के बीच एक जूरी सदस्य यह कहते हुए लगातार अपनी बात रखता है कि बच्चा दोषी है और रहेगा। पडताल करने पर वह खुद बताता है कि उसके घर में उसका बेटा उसका सम्मान नहीं करता। स्पष्ट था कि वह जूरी मेंबर उस बच्चें में अपने बेटे का अक्स देख रहा था और फैसला भी उसी हिसाब से ले रहा था।



बहस आगे बढती है और फिर उन लोगों की बीच रायशुमारी होती है। अबकी बच्चे को निर्दोष मानने वालों की संख्या बढ जाती है। जूरी का फैसला एक दूसरी तरफ जाते देख एक और सदस्य बच्चे को निर्दोष मानने लगता है। यह सदस्य उस तबके का प्रतिनिधित्व करता लगता है जो कि देखा देखी फैसला करता है। उसका खुद का कोई डिसिजन नहीं होता।


एक सदस्य तब अपना फैसला पलट देता है जब उसे लगता है कि जल्दी फैसला हो जाय तो उसे घर जाने को मिले । सिनेमा की टिकटें उसकी जेब में उमड घुमड रही होती हैं। इस पर एक सदस्य भडक जाता है उस शख्स को कहता है कि उसने अपना फैसला क्यों बदला उसे Explain करे। सिर्फ इसलिये कि सिनेमा देखने उसे देर हो रही है, वह अपना फैसला नहीं बदल सकता।

Explain Me !



बहस और आगे बढती है और धीरे धीरे जूरी पलट जाती है और अंत में फैसला सर्वमान्य ढंग से आता है कि बच्चा निर्दोष हैं।

इस पूरी फिल्म को एक ही कमरे में फिल्माया गया है। फिल्म की जान है इसकी स्क्रीप्ट। औह.......क्या जानदार बात कही – ये शब्द सहसा ही मुंह से निकल आते हैं। उस वक्त का सीन गजब का है जब मनोरंजन टिकट के कारण एक सदस्य फैसला बदलता है।

पूरी फिल्म को एक तरह से आदर्श फिल्म माना जा सकता है जो कि विभिन्न तबके के लोग, उनकी मानसिकता और Decision Making की उनकी क्षमता को पेश कर रही है।


- सतीश पंचम

Saturday, August 15, 2009

यह पोस्ट आज के दिन, यानि 15 अगस्त के लिये शायद सटीक हो।



कुछ दिनों पहले New York Times में एक लेख छपा था जिसमें भारतीयों के बढते वर्चस्व को लेकर एक महत्वपूर्ण बात कही गई, कि भारतीय बच्चे अमरीकीयों के लिये एक नये किस्म की चुनौती बनते जा रहे हैं। मेरे पास इस लेख की कतरन एक E-Mail के जरिये आई है, आप भी जरूर उस कतरन को देखें। पहले भी यह पोस्ट प्रकाशित हो चुकी है , लेकिन शायद आज के दिन के लिये ही ये पोस्ट ज्यादा सटीक है।

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"When we were young kids growing up in America, we were
Told to eat our vegetables at dinner and not leave them.
Mothers said, think of the starving children in India
And finish the dinner.'


And now I tell my children:
'Finish your homework. Think of the children in India
Who would make you starve, if you don't.'?"


- Thomas L Friedman












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- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे कि कभी अंग्रेजों ने दहेज में दे दिया था।

समय - वही, जब माउंटबेटन, भारत के गवर्नर बनने के लिये हस्ताक्षर कर रहे थे और बगल में ही एक अर्दली उस कलम को निहार रहा था जिससे कि भारत की किस्मत पर हस्ताक्षर किये जा रहे थे।



Tuesday, August 11, 2009

फणीश्वरनाथ रेणु और शैलेन्द्र जी की वजह से मुंबई का 'पवई- लेक' कुछ खास है( रोचक वाकये के कारण)।



यूँ तो मुंबई के पवई में कार्यालय होने के कारण रोज ही पवई झील के पास से गुजरता हूँ, पर कल अचानक एक विशेष वजह से मुझे ये पवई झील कुछ अलग लगने लगी। वजह भी कुछ खास ही है। दरअसल कल ही मैंने फणीश्वरनाथ रेणु जी के बारे में ‘रेणु रचनावली’ में एक बात पढी है और उसके जरिये पता चला कि ये वही पवई लेक है जिसके किनारे बैठकर फणीश्वरनाथ रेणु और गीतकार शैलेन्द्र जी बहुत रोये थे।

दरअसल फणीश्वरनाथ रेणु जी ने शैलेन्द्र को इसी पवई लेक के किनारे एक बहुत ही करूण गीत सुनाया था । गीत के बोल ग्रामीण अंचलों का भाव लिये थे जिसमें ससुराल में आई लडकी अपने भाई को याद कर रही है। दरअसल जब पहले अक्सर छोटी उम्र में ही विवाह हो जया करता था तब, बिहार के ज्यादातर हिस्सों में नवविवाहित बिटिया को बरसात में होने वाली कीचड मिट्टी से लथपथ होकर ससुराल में काम करने से बचाने के लिये अक्सर बेटिंयों को सावन मास में नैहर बुलवा लिया जाता था ताकि अभी सुकवार, नाजुक बिटियां बरसात में होने वाली कीचकाच से बची रहें। इस ग्रामीण गीत ‘सावन-भादों’ को फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी बहन से सुना था। इस गीत के बोल थे

कासी फूटल कसामल रे दैबा, बाबा मोरा सुधियो न लेल,
बाबा भेल निरमोहिया रे दैबा, भैया के भेजियो न देल..........
...................

कहते है जब भाव प्रबल हों तो भाषा मायने नहीं रखती। यही हुआ।

बकौल फणीश्वरनाथ रेणु जी – तीसरी कसम फिल्म के दौरान शैलेन्दर जी मुझसे ‘महुआ घटवारिन’ की ओरिजनल गीत-कथा सुनना चाहते थे ताकि उसके आधार पर गीत लिख सकें। एक दिन हम ‘पबई-लेक’ के किनारे एक पेड के नीचे जा बैठे। ‘महुआ घटवारिन’ का गीत मुझे पूरा याद नहीं था। इसलिये मैंने छोटी सी भूमिका के साथ बहन से सुना हुआ ‘सावन-भादों’ गीत अपनी भोंडी और मोटी आवाज में गाना शुरू किया। गीत शुरू होते ही शैलंन्द्र की बडी बडी आँखें छलछला आईं। गीत समाप्त होते होते वह फूट फूटकर रोने लगे। गीत गाते समय ही मेरे मन के बाँध में दरारें पड चुकी थीं। शैलेंन्द्र के आँसुओं ने उसे एकदम से तोड दिया। हम दोनों गले लगकर रोने लगे। ननुआँ ( शैलेन्द्र का ड्राईवर) टिफिन कैरियर में घर से हमारा भोजन लेकर लौट चुका था। हम दोनों को इस अवस्था में देखकर कुछ देर ठिठक कर वह एक पेड के पास खडा रहा। इस घटना के कई दिन बाद शैलेन्द्र के ‘रिमझिम’ पहुंचा। वे तपाक से बोले – चलिए, उस कमरे में चलें। आपको एक चीज सुनाउं।

हम उनके शीतताप-नियंत्रित कमरे में गए। उन्होंने मशीन पर टेप लगाया। बोले – आज ही टेक हुआ है। मैंने पूछा – तीसरी कसम ? बोले – नहीं भाई। तीसरी कसम होता तो आपको नहीं ले जाता ? यह बंदिनी का है.....पहले सुनिए तो .

रेकार्ड शुरू हुआ –

अबके बरस भेज भईया को बाबूल
सावन में लिजो बुलाय रे
लौटेंगी जब मेरी बचपन की सखियां
दिजो संदेसा भिजाय रे.....
.................
.......
बीते रे जुग कोई चिठिया न पाती
ना कोई नैहर से आए रे...
अबके बरस भेज भईया को बाबूल

कमरे में ‘पबई-लेक’ के किनारे से भी मर्मांतक दृश्य उपस्थित हो गया। हम दोनों हिचकियां लेकर रो रहे थे............................।


आज फिर उसी पवई लेक के किनारे से गुजरा हूँ। कुछ अपनापन सा लगने लगा है।

( इस घटना की जानकारी –साभार, ‘रेणु रचनावली’, राजकमल प्रकाशन से)

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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