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Sunday, June 28, 2009

'मीडिया और साहित्य' से संबंधित परिसंवाद में पूछा गया 'बलॉग और साहित्य' से संबंधित एक प्रश्न और उसका अनोखा उत्तर

गिरिजेश राव, जी ने मेरी एक पुनर्प्रकाशित पोस्ट पर दी गई टिप्पणी में पूछा था कि ये 'रीठेल' क्या है ? यह सवाल सुनकर कल ही साहित्य अकादमी में हुए एक रोचक वाकये की याद आ गई।


हुआ यूँ कि कल ही मुंबई में मेरी बात साहित्यकारों के चुप्पीकरण के बारे में पुष्पा भारती जी से हुई थी । मौका था साहित्य अकादमी के परिसंवाद का, विषय था 'मीडिया और साहित्य'। किसी बात पर उन्होंने कहा कि साहित्यकार चुप है मीडिया की बदलती भूमिका पर, समाज में आये बदलाव पर। इस पर मैंने उनसे साहित्य अकादमी के परिसंवाद में सवाल जवाब के दौर में पूछा कि - आप कह रही हैं साहित्यकार चुप है लेकिन साहित्यकार चुप नहीं हैं। माध्यम ढूँढे जा चुके हैं। कई ब्लॉग लिखे जा रहे हैं। तब उन्होंने कहा कि ब्लॉग को मैं साहित्य नहीं मानती। वहां मैंने पढा है कि लोग लिखते हैं 'बडी टेंशनात्मक स्थिति है'। ये 'टेंशनात्मक' क्या है ? कितने लोग ब्लॉग पढते हैं। ब्लॉग पढा जाता है अमिताभ बच्चन का। मैं ब्लॉग को साहित्य नहीं मानती।


पुष्पा भारती जी ने भले ही ब्लॉग को साहित्य का दर्जा देने से इन्कार कर दिया । लेकिन मेरा मानना है कि ब्लॉग एक बहता साहित्य है। वह ठहरा हुआ साहित्य नहीं है। यहां नये नये शब्द गढे जा रहे हैं। भले ही उन पर अंग्रेजियत की छाप दिखती हो पर यही इसका गुण भी है जो सबको साथ लेकर चलता है। मेरा मानना है कि जब किसी बहते पानी को एक जगह रोकने की कोशिश की जाती है तो वह धीरे-धीरे जमा होकर उपर उठने लगता है और अपने निकलने का रास्ता तलाशता है। इन्टरनेट ने उसी रास्ते का काम किया है। ब्लॉग के रूप में एक रास्ता दे दिया है जिससे कि पानी बहने लगा है। हां इस ब्लॉग साहित्य में कई चीजें अच्छी नहीं होती, कई पोस्ट एक बार पढने के बाद बोझिल से लगने लगते हैं पर क्या साहित्य में ऐसा नहीं है। कई ख्यातनाम किताबें हैं जो अच्छी तो हैं पर उनमें ही कहीं कुछ पन्ने बोझिल हो जाते हैं। तो फिर ब्लॉग साहित्य के साथ ये सौतेला व्यवहार क्यूँ। यहाँ भी एक से बढकर एक लेख मिल जाते हैं तो वहीं एक से बढ कर एक कूडा करकट भी मिलेंगे ही। इन्हें आपको नजरअंदाज भी करना पडेगा क्योंकि यह तो हर क्षेत्र की बात है, वहाँ भी आपको अच्छे बुरे से साबका पडता होगा।

लोग कह सकते हैं कि ब्लॉग जगत में गुटबाजी चलती है ( कुछ हद तक सच भी मानता हूँ) लेकिन, क्या गुटबाजी साहित्यकारों के बीच नहीं चलती?

अभी हाल ही मे राजेंद्र यादव जी ने जून 2009 के संपादकीय में कहा कि - पत्रिकायें साहित्य के पहिये हैं। किताबें व्यक्तिगत या सार्वजनिक संग्रहालयों में ही पडी रह जातीं, अगर पत्रिकाएं उन्हें अंधेरे बंद कमरों से खींचकर बाहर खुली हवा में न ले आतीं। साहित्य के लिये पुस्तकों तक जाना पडता है, पत्रिकाएं उन्हें हम तक लाती हैं, बहसें और सूचनाएं देती हैं, नायक और खलनायक बनाती हैं वे साहित्य को गतिशील बनाती हैं।


मैं राजेंन्द्र जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ। यहां पर मेरा यह भी मानना है कि ब्लॉग भी वही काम कर रहा है। उसने वही काम पत्रिकाओं के साथ किया है। बल्कि पत्रिकाओं से बढकर ही। उसने साहित्य और पत्रिकाएं, दोनों को ही खींचकर खुली हवा देने का काम किया है। इस मायने में ब्लॉग साहित्य और पत्रिकाएं दोनों के लिये ही पहियों का काम किया है। संक्षेप में कहूँ तो ब्लॉग एक त्वरित साहित्य है। इसके बहते रहने में ही सुंदरता है। साहित्यकार गण, हो सके तो इस ब्लॉग जगत की फुलवारी को सींचने का काम करें, इस फुलवारी को देख कर नाक भौ सिंकोडने से फुलवारी को यदि मुरझाना ही होता तो ये कब की मुरझा चुकी होती, पर दिन ब दिन इसमें एक से बढकर एक फूल खिल रहे हैं, कुछ खर पतवार भी हैं, कुछ बेल बूटे भी हैं पर सब मिलकर फुलवारी के ही तो हि्स्से हैं।


- सतीश पंचम
( 'मीडिया और साहित्य' से संबंधित परिसंवाद शनिवार 27 जून 2009 को मुंबई में हुआ था, यह पोस्ट उसी परिसंवाद पर आधारित है )

आतंकवादी लोग भारत को अपनी मौसी का घर मानने लगे हैं। विश्वास न हो तो खुद ही देख लो


अभी ऐक आतंकवादीजी रास्ते मे मिल गये - मैने पूछ लिया - कहाँ जा रहे हो ?

मौसियाने जा रहा हूँ।

मतलब ?

अरे यार अपने खाला के घर जा रहा हूँ, कुछ बम-वम फोडना है कि नहीं।

मैने कहा यार समझ नहीं आ रहा कि ये तेरा कौन सा मौसीयाना है।

तो बोला - अरे हमारी माँ कई बहने हैं, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भारत.......सब अपुन की माँ की बहने है, तो क्या है कि अपनी एक माँ को छोड बाकी अपुन की मौसी लगेंगी। तो अभी जा रहा हूँ....मौसीयाने बम फोडने। तूम आते हो तो चलो।

मैं सकपका गया.....मैने कहा - यार मैने ये तो सुना था कि आतंकवादीयों ने यहाँ अपनी खाला का घर समझ रखा है, लेकिन नहीं जानता था कि....इतनी शिद्दत से तुम इसे अपनी खाला का घर मान बैठे हो।

मानना क्या है - मानों तो वादी नहीं तो आतंकवादी।

वादी मतलब ?

वादी शब्द बहुत सारे बोरबचन का पर्यायवाची शब्द है - जैसे उदारवादी,समतावादी,समाजवादी,संघर्षवादी,जनवादी,राष्ट्रवादी।

तो तुम्हें ये सब बोरबचन लग रहे हैं।

नहीं बोरबचन तो अपने गुरू श्री लादेन को लगता था, मुझे तो ये वादी वाले शब्दों से लगता है कि कहीं लोकतंत्र के हसींन वादीयों मे घूम रहा हूँ। कोई कुछ बोलने वाला नहीं, कोई कुछ कहने वाला नहीं। कभी कोई केस हो जाय तो हमारे हमदर्द भी यहीं से निकल आते हैं ये कहते हुए कि हमें मुठभेड पर शक है। विश्वास न हो तो कसाब और उसके वकील को देख लो। जिस तरह से इस केस में वादी और प्रतिवादी का खेल खेला जा रहा है, उससे मुंझे तो लोकतंत्र मे ये वादी शब्द बहुत अच्छा लग रहा है।

मैं सोच मे पड गया - सचमुच आजकल ये इतने सारे लोकतंत्र के पवित्र नामों वाले वाद जैसे राष्ट्रवाद, समाजवाद,जनवाद आदि उन्होंने अपना अर्थ और महत्व किस तरह खोया है, और उस अर्थ को खोने मे हमारे ही लोगों का कितना बडा हाथ है, चाहे वह कसाब के वकील के रूप में कोई शख्स हो, या फिर कोई अंतुले जैसा बकवकीया नेता जो मुठभेड पर ही सवाल उठा रहा हो, फिर इतने सारे आतंकवादीयों को ये देश आतंक के लिये हसीन वादी क्यों न नजर आये। सुना है कि कसाब के वकील ने जज पर ही आरोप लगा दिये हैं कि वो वादी को लेकर पक्षपात कर रहे हैं। जज द्वारा आपत्ति जताने पर वकील ने माफी तो मांग ली, पर क्या सचमुच ये वकील अब वकील कहलाने लायक है जो कि सब कुछ जानते समझते हुए भी फर्ज के नाम पर कुछ भी कहे जा रहा है ?

- सतीश पंचम


समय - वही, जब कसाब अपने वकील से सलाह मशविरा कर रहा हो कि अगला दांव क्या चला जाय और पीछे दीवाल पर सटकर एक छिपकली सब कुछ सुन रही हो और सुनने के बाद कह उठे - इस कसाब की दाल कहाँ बनती है, सोचती हूँ, उसी में शर्म से डूब मरूँ ।

( एक रीठेल पोस्ट)

Thursday, June 25, 2009

मैकूलाल की बिजनेस पॉलिसी

कॉरपोरेट स्टाईल की फंड रेजिंग से आपका कभी वास्ता पडा हो तो आप अच्छी तरह कुछ बातें जान समझ सकते हैं जिसका कि दूसरा नाम ही है- चालाकी । यह चालाकी एक सोचे समझे गुच्छे का रूप होता है जो लटकता तो रहता है पर आसानी से नहीं दिखता। आप ने एक फार्म भरा कि सिर्फ एक क्रेडिट कार्ड चाहिये, कुछ दिन बाद आपको एक औऱ वैल्यू प्लस कार्ड मिलता है यह कह कर कि आपको हमारी सर्विस अच्छी लगी होगी, यही सोचकर हम ये कार्ड भेज रहे है.....आपने अच्छा किया जो ECS का फार्म भरा। आपको लाईन में लगने की जरूरत नहीं। आपकी सुविधा का ख्याल रखते हुए प्रोसेसिंग फीस आपके सेलरी अकाउंट से ले ली जायेगी।
जब कोई ग्राहक अड जाता है कि बिना कहे तुमने कैसे इतना सब दे दिया और पैसा भी काट लिया तो बैंक आपको खेद है का एक सूचना देकर आपको दी गई क्रेडिट लिमिट खत्म कर देता है औऱ आपके अकाउंट के उपयोग न करने पर आप का अनयूज्ड पैसा अपने क्रेडिट पूल में डाल देता है। जैसे ही कोई ग्राहक मिलता है तो बैंक आपके द्वारा छोडे गये क्रेडिट मनी को किसी और को जारी करता है, अपने उसी क्रेडिट पूल के जरिये जिससे आपको पहले क्रेडिट कार्ड दिया गया था। यानि कि एक की जूठन ( कैंसल्ड क्रेडिट लिमिट ) के जरिये दूसरे का पेट भरने वाली पॉलिसी।

वहीं दूसरी ओर मैकूलाल वो बेल शरबत वाला है जिसे मैदागिन ( बनारस) में देखा है । एक गिलास बेल रस पीने के बाद जैसे ही ग्राहक खाली गिलास सामंने रखता है कि तुरंत मैकूलाल और एक कल्छुल बेल रस खाली गिलास में उडेल देता है। ग्राहक ना ना करे तब तक गिलास फुल्ल।

अब।

ग्राहक झख मारके बेल रस पीता है और जो अडियल ग्राहक मिल जाता है तो मैकू बहस भी करता है कि आप ही ने गिलास सामने पीने के बाद इस तरह रखा जैसे और मांग रहे हो....तो हम तो भर दिये। अब पी लो।

इतने पर भी जब ग्राहक नहीं पीता औऱ सिर्फ एक गिलास का पैसा देकर चल देता है तो उसके पीठ घुमाते ही मैकूलाल उसी जूठे गिलास की बेल रस को फिर से उसी मटके में उडेल देता है जिसमें से कि बेल रस निकाल कर दिया था। जूठे गिलास वाले बेल रस को मटके में डालकर फेर फार कर पूरी कायनात को एक सा करने के बाद मैकूलाल आवाज लगाता है - ठंडा बेल तरावट दार।

शायद इसे ही कहते हैं कॉरपोरेट कल्चर का ठेला संस्करण ।

- सतीश पंचम

Friday, June 19, 2009

गाँव- देहात में ठहरी एक बारात का आँखों देखा हाल



गाँव-देहात की या शहर की ही किसी बारात में शामिल होना यानि की अपने सिर में कौवे की कलगी लगाने जैसा है। लोगों ने एक आईटम खा कर खत्म किया नहीं कि कौवे की तरह घरातीयों की ओर ताकने लगेंगे कि देखें अब क्या आ रहा है। महक तो बहुत बढिया आ रही है, पर साले कर क्या रहे हैं…….ला क्यों नहीं रहे। ये उस बारात का हाल होता है जो गाँव देहात में खेतों में उस समय ठहराई जाती है जब गेहूँ कट चुके हों, अरहर वगैरह ढो सटक कर एक लाईन कर दिये गये हों। ऐसे मे बिना हॉल वगैरह बुक किये केवल शामियाना तान कर बारात ठहरा दी जाती है। जिसका अपना अलग ही आनंद है।

ऐसी ही एक बारात में मैं अबकी शामिल हुआ। बहुत मन से इस बारात में गया था क्योंकि तीन चार साल बाद कोई बारात करने का मौका मिला था वरना तो कभी गर्मियों में शादि व्याह के मौसम में मेरा जाना कम ही हो पाता है । थोडा जल्दी ही मैं चल पडा। गाँव देहात का रास्ता है जाने कैसा रास्ता हो। मोटर साईकिल थी ही । रास्ते में कल्लू धोबी की दुकान पर भीड देखा। लोग बीच बाजार बनियान पहने, खडे खडे शर्ट उतार कर प्रेस करवा रहे थे । उनका मानना था कि बारात में जा रहे हैं तो एकदम कडक इस्त्री किये हुए जाना चाहिये। इसके लिये लोगों में बीच बाजार अधनंगे खडे होने में भी कोई हिचक नहीं थी। कुछ लोग नाई की दुकान पर जमें थे। खत को इतना सफाचट करवाना चाहते थे मानों वहाँ कभी बाल ही नहीं थे। सब को जैसे आज ही चंदन टीका लगा कर केंचुली छोडना था।

ईधर मोटर साईकिल पर बैठते ही साथी ने इतनी जोर की किक मारी की लगा एक और किक मारे तो बस सीधे द्वारपूजा पर पहुँच जाउंगा। थोडी दूर सडक पर चलते ही बडी बडी गिट्टियों से सामना हुआ, मोटरसाईकिल तो ऐसे छिटक रही थी जैसे जमीन पर कुछ ढूँढ रही हो।
हम लोग रास्ता बदल कर चले। काफी आगे जाने पर एक जन से रास्ता पूछे तो बोले आपको उसी गिट्टी वाली सडक से जाना चाहिये था…..बहरहाल रास्ता तो आगे ठीक था। उसका ‘बहरहाल’ वाला शब्द कानों में गूँजने लगा। ये साला ‘बहरहाल’ क्या होता है ?



किसी तरह बचते बचाते लडकी वालों के घर के पास बारात स्थल पहुँचा। काफी जल्दी पहुँच गाया था। सात-साढे सात बजे होंगे। गाने बजाने की आवाज से पता चल गया था कि हाँ यही घर है जिसके यहाँ शादी पडी है। अन्य बाराती आते होंगे। अक्सर गाँवों में बारात के रूकने की जगह लडकी के घर से सौ सवा सौ मीटर दूर ठीक की जाती है जहाँ से चलकर बारात द्वारपूजा वगैरह के लिये गाते बजाते आती है। तो, मैं और मेरे मित्र वहीं मोटर साईकिल से उतर गये। एक नीम का पेड था। उसके नीचे कुछ टेंन्ट हाउस वाली फोल्डिंग खाटें पडी थीं। उन्हीं पर हम लोग जा बैठे। जा क्या बैठे, बस यूँ समझिये कि उन खाटों पर पसर गये। आँखें उपर आसमान की ओर लगीं थी। हल्की हल्की हवा भी चलने लगी। नीम की कुछ झुकी हुई टहनियों देखते समय पता लगा आज तो अँजोरिया रात है। चाँदनी रात। नजर घुमाई तो देखा चाँद भी निकल ही रहा था। नीम की पत्तियाँ कुछ और नरम लगने लगीं।

तभी बगल के घर से किसी बुढिया की आवाज आई जो अपनी पतोह को डाँट रही थी –

- तुझे क्या जरूरत थी सिलबट्टा उठाकर बियाह वाले घर देने की। कह नहीं सकती थी कि अम्मा का फोडा पका है उस पर पीस कर नींम की पाती लगानी है। बस , उन लोगों ने पूछ लिया और इसने उठा कर दे दिया। बाहर वाले आयें, चाहे घर ही लूटकर चल दें, मजाल है जो इस घर के लोग मना कर दें।

गाँव देहात में अक्सर शादी-ब्याह के समय चीजें आपस में बाँट कर एक दूसरे को ले देकर काम चलाया जाता है। चूँकि बगल में ही शादी पडी थी तो सिलबट्टे वगैरह का काम निकल आया होगा, और लडकी वालो ने इस बुढिया के सिलबट्टे को उधार ले गये होंगे। लेकिन अब बुढिया है कि पतोह की जान खा रही है।

खैर, यही सब देखते सुनते नींद सी आने लगी। अभी बाकी बारात पहुँची नहीं थी। तब तक कुछ लोग आये बाल्टी में बेल का शरबत लेकर। उनके आग्रह करने पर कि बाकी जब बाराती आयेंगे तो वो भी पी लेंगे आप लोग पहुँच गये हैं तो लिजिये पी लिजिये। बेल का शरबत पीकर तृप्त हुआ। धीरे धीरे बाराती लोग जमा होने लगे। इलेक्ट्रानिक रथ वगैरह तैयार होकर जगमग जगमग दिखने लगा। उसके आगे आगे बीस बाईस लोग सिर पर गमला लाईट आदि लेकर चलने लगे। देखते ही देखते बारात द्वारपूजा के लिये निकल पडी।
डीजे खूब जमकर बज रहा था । कोई गुड्डू रंगीला फंगीला गा रहा था - थोडा सा ढील ढीला करो…..ऐसा ही कुछ। लोग डीजे पर जमकर नाच रहे थे। मैं ऐसे मौकों पर अक्सर ठूँठ हो जाता हूँ। समझ ही नहीं आता कि नाचूँ कि न नाचूँ। और कोई जगह होती तो नाच भी लेता लेकिन गाँव देहात में नहीं । इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण है जो कि गाँव देहात में रहने वाले ही जानते हैं। दरअसल होता यह है कि, गाँवों में गाय भैंसों को तो खिला पिलाकर शाम को ही हटा दिया जाता है ताकि बारात के लिये रास्ता बने लेकिन खूँटा वहीं गडा रहने दिया जाता है । अब एक दिन के लिये खूँटा कौन उखाडे-पखाडे। सो जो डीजे शहर के लोगों को नचा रहा होता है वही डीजे गाँव के लोगों को लहूलूहान करवा रहा होता है। लोगों का आधा ध्यान नाचने में और आधा ध्यान खूँटा ढूँढने में होता है कि कहीं लग न जाय।

मैंने देखा कि डीजे अब भी बज रहा था। सिर पर रखे लाईटें लिये लोग आगे बढ रहे थे कि तभी एक मुसीबत आन पडी। बाँस की कईन / टहनी कई जगह पर इन लाईटों में उलझ रहीं थी। अब या तो बाँस की इन कईनियों को काटा जाय या लाईटों को वहीं रोक दिया जाय। लेकिन लोगों ने जज्बा दिखाया, बँसवारी के हर बाँस को दो दो लोग पकड कर एक ओर दाबे रखे ताकि कईन लाइटों से न टकराये और देखते ही देखते पूरा रथ बिना रोकटोक आगे बढ लिया। डीजे अब भी गा रहा था थोडा सा ढील ढीला करो।

लोग नाच भी खूब रहे थे। कोई कोई तो नाचने में इतनी मेहनत कर रहा था, पसीने-पसीने हो रहा था कि लगता था जैसे उसे कोई मंडवे में से देख रहा है और उसका नाचना देखकर आज ही उसकी शादी भी फिक्स हो जायेगी। एकाध जन तो गमछा लेकर नचनिया बनने में ही परम आनंद प्राप्त कर रहे थे। कुछ पियक्कड जाँबाज लोगों को तो लगता था अब नहीं नाचेंगे तो बारात मालिक अगली खुराक में कमी कर देगा।
जैसे तैसे द्वार पूजा का कार्यक्रम संपन्न हुआ। मिठाई और जलपान आदि के लिये बारात को शामियाने में नॉयलॉन वाली फोल्डिंग खाटों, कुर्सियों आदि पर बिठाया गया जो गेहूँ के खाली खेत में बिछे थे। बगल के खेत में अरहर की कटी हुई खूँटिया जमीन से दो-तीन इंच निकली हुई कह रहीं थी जरा उधर ही रहना गेहूँ वाले खेत में, इधर आये तो बस गड जाउंगी। (शर्म से नहीं ).

खैर, थोडा इंतजार करके कुछ लोगों के जलपान करके चले जाने के बाद अगली खेप में मैं भी एक कुर्सी पर बैठ गया। लेकिन बैठते ही पता चल गया कि पैंट के नीचे छेना मिठाई की चाशनी लग गई है जो कि कुर्सी पर गिरी थी/ गिरा दी गई थी। मन मसोस कर थोडा पानी ले साफ सूफ किया ही था कि मित्र बोले - यार मेरा भी लगता है पैंट चाशनीया गया है :)
मैंने कहा लो मजा अब। ले- देकर किसी तरह पानी से चाशनी लगी जगह को किसी तरह धोया । धोया क्या बस धोने का छलावा भर किया।


इतने में कई लोगों को लघु शंका की सूझी तो बढ लिये कटे अरहर के खेत की तरफ। जमकर खेत को नम किये। सुबह जब खेत मालिक अपने खेतों को देखेगा तो जरूर सोचेगा, चलो इसी बहाने खाद-पानी का खर्चा बच गया । अभी ये सब क्रिया कलाप चल ही रहा था कि किसी के नाराज होने की खबर आई। ये नाराज होना भी एक परंपरा बन गई है। जिस शादी में कोई नाराज न हुआ तो समझो कि शादी का कोई मजा नहीं आया। कोई जीजा इसलिये नाराज है कि उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा तो कोई इसलिये क्योंकि किसी घराती ने गलती से पानी भरी बाल्टी पैर पर दे मारी। ये लोग इस आन्हर गाँव में जाने क्यों रिश्ता करने आ गये। एक बाल्टी के पैर में हल्के से लग जाने से पूरा गाँव ही अंधा कैसे हो जाता है ये बारात में आकर बखूबी समझा जा सकता है।

धीरे-धीरे खाने का समय भी हो आया। लोग अब पंगत में बैठना अपमान समझने लगे हैं। टेबल कुर्सी की पांत चलेगी। समझदार बाराती कभी ट्यूबलाईट के आसपास वाली सीट पर बैठ कर भोजन नहीं करता। वो अंधेरा कोना तलाशता है क्योंकि गाव देहात में कीट पतंगे ट्यूबलाईट के आस पास ही बिना डीजे की धुन बजाये ही नाचते रहते हैं और जो ट्यूबलाईट के पास बैठा हो उसकी थाली में जरूर गिर कर खुशी मनाते हैं। अंधेरे कोने में बैठने का एक फायदा यह भी होता है कि निस्संकोच होकर भोजन गपागप भकोसा जा सकता है।
एक बात मैंने नोटिस की है कि जब परोसने वाला आता है तो लोग उससे बडे आग्रह से कहेंगे कि - 'उनको भी' दो....इस 'उनको भी'... में 'भी' बडे काम का होता है जिसका छुपा मतलब है कि उनके साथ साथ 'मुझे भी' भोजन परोसो ।
खैर भोजन आदि करने के बाद जो लोग आस पास के थे या जिनके पास आने जाने का निजी वाहन था वो धीरे-धीरे चलने लगे। एक के बाद एक मोटर साईकिलों की आवाज जब आने लगी तो गाँव के कुत्ते तक हदस गये कि जाने कौन लोग हैं जो हडर-हडर किये हुए हैं। उन बारातियों के जाने के बाद कुत्तों में भी एक तरह के इत्मीनान की झलक दिखाई दे रही थी कि जितने चले जांय उतना अच्छा। शायद नाहक ही मोटर साईकिल की लाईट जला जला कर कुत्तों की विश्रांति में खलल पड रही थी। एक कुत्ते को तो देखा, अपने लिये सोने की जगह तलाश रहा था। लेकिन कहाँ जाय, उसके सोने की जगह पर तो शामियाना तना है और लोग हैं कि शामियाना छोडकर बाहर चाँदनी रात में खाट बिछाकर पडे हैं। मजबूर होकर कुत्ते ने शामियाने में ही सोना ठीक समझा।
मैंने चाँदनी रात में खेतों में बिछी खाट का आनंद लेने की सोची। खाट पर पडते ही नींद सी आने लगी। आस पास लोग अब भी भुनुर - भुनुर बातें कर रहे थे। कोई कुछ कहता तो कोई कुछ। एक जन का कहना था सब्जी कुछ कम जम रही थी तो एक को तो दाल में नमक तेज । मैंने सिर घुमा कर उन लोगों की ओर देखा तो पाया कि ये वही लोग थे जो कडक और बिना सिलवट पडे इस्त्री वाले कपडे पहनने के लिये बीच बाजार कल्लू की दुकान पर शर्ट उतार कर खडे थे ताकि ताजा ताजा शर्ट प्रेस हो और बिना सलवट वाली शर्ट पहने बारात में चमक सकें।
मैं सोच रहा हूँ, जो लोग खुद बाजार में अपने कपडे उतार कर खडे थे उनसे किसी की इज्जत के बारे में उम्मीद रखना भी बेमानी है । उनींदी आँखों से न जाने क्या क्या मैं सोचता जा रहा था, एक बेटी मेरी भी है । आज नहीं तो कल मेरे घर भी यही लोग आयेंगे। बारात होगी, गाजे बाजे होंगे, शोर-शराबा होगा, तमाम नाते रिश्तेदार जुटेंगे, तमाम तरह के खर्चे होंगे औऱ होंगे ऐसे ही कपड उतारू लोग ।
मेरी आँखें नींद से बोझल हो रहीं थी। चाँदनी रात में, खुले आसमान के नीचे, खेत में मैं सोने की कोशिश कर रहा था कि तभी आसमान से चाँद ने झुक कर मेरे माथे से कुछ उठाया और कहा - उफ्फ.... ये शिकन अभी से क्यों ला रहे हो, बिटिया तो अभी छोटी है न :)


- सतीश पंचम


Saturday, June 13, 2009

एक बच्चे का ननिहाल और नई शर्ट ( वाकया )

इस बार गांव गया तो एक चार साल के बच्चे नितिन के निर्मल क्रोध को देखने का मौका मिला । हुआ यूं कि बच्चा नितिन अपने ननिहाल, यानि के मेरे गाँव में रहता है। खूब लाड प्यार में पल रहा है। नितिन की माँ अपने ससुराल में ही है, चार साल के नितिन को जब उसके मामा ने एक पाँच सौ के आसपास की कीमत वाला शर्ट लाकर दिया तो उसे पहनने पर उसके नाना ने कहा कि तुम्हारी तो तैयारी हो गई । अब यही कपडा पहना कर तुम्हे तुम्हारी मम्मी के पास छोड आउंगा।

उस समय तो नितिन कुछ न बोला लेकिन थोडी ही देर बाद एक बच्चे की आवाज आई।

अरे नितिनवा ने देखिये क्या कर दिया है ?

सब लोग दौडे कि क्या हो गया । आशंका सबके मन में जाने कैसे कैसे रूप लेकर आ रही थी। घर के अंदर झांक कर लोगों ने देखा कि नितिन ने अपनी उस नई नवेली शर्ट को हँसुए सो काट-काट कर चिथडें कर डाला था। पहुँचने पर हँसुआ एक तरफ फेंक कर होने वाली पिटाई के लिये जैसे एक तरह से वह अपने को तैयार कर रहा था।

उसकी काजल लगी आँखे देखने पर जाने कैसा तो लग रहा था। विस्मय, डर, आशंका इन सबको मिलाने के बाद एक और चीज दिख रही थी उसकी आँखों मे और वह थी- जिद्द । कि, न रहेगा ये शर्ट और न जाना पडेगा अपने घर।

न चाहते हुए भी, लोगों के रोकते रोकवाते भी मामा लोगों ने उसकी धुनाई कर दी। पिट पिटाने के बाद रात को वही नितिन फिर नाना की थाली के पास आलथी पालथी मार कर बैठ गया और मुंह खोलकर कहा – आ……।

नाना ने भी एक कौर उसके मुंह में डाल दिया। रात को जब सभी बैठे तो इस बात पर लगभग सभी सहमत थे कि बच्चे ननिहाल में रहने से बिगड जाते है। शायद कुछ हद तक ये बात सच भी है। माँ-बाप के यहाँ रहने पर अनुशासन कुछ रहता है जो कि ननिहाल में रहने पर अनुशासन पर लाड-दुलार की परत चढ जाती है ( हो सकता है ये बात सच न भी हो )

खैर जो भी हो, नितिन के चर्चे गाँव में भी खूब हो रहे हैं – पट्ठे ने नई शर्ट फाड डाली।

अब पता चला कि जिद्द चर्चात्मक भी होती है।


- सतीश पंचम

स्थान – मुंबई

समय – वही, जब ठसाठस भरी बस में और सवारी लेने के लिये खलासी आवाज लगाता जाता है और ड्राईवर बस को यूँ ही आगे पीछे करता रहता है कि लोगों को लगे कि बस अब निकलने ही वाली है :)

Friday, June 5, 2009

पैदल चलने का सुख

फिलहाल तो मैं चला जौनपुर। बच्चों की छुट्टियाँ खत्म होने को है, सो इसी बहाने गाँव का एक चक्कर लगाने जा रहा हूँ । लेकिन तीन दिन में क्या क्या बटोर सकूंगा। नदी के किनारे की सीपियां भी तो बटोरने लगूँ तो शायद मेरे बटोरने लायक नॉस्टाल्जिक अनुभव उन से ज्यादा ही ठहरेंगे। सुना है सीपियाँ अब कम होती जा रही हैं…..सोचता हूँ अब अपने अनुभवों की तुलना किस से करूँ ।

पिछली बार जनवरी महीने में दोनों ओर खिले सरसों के खेतों के बीच फैली सडक पर मजे लेते हुए पैदल चल रहा था तो एक गाँव की ही बूढी अम्मा ने पूछा था…..का बेटवा पेस्टिक ( Practice) करत हय का ? शायद उसका इशारा गाँव में सुबह सवेरे चलने वाले उन लोगों से था जो ठंड में गठिया आदि से बचने के लिये रोज चलने की प्रैक्टिस करते थे ।

इस भरी गर्मी में सोचता हूँ अब पैदल चलने पर क्या सवाल पूछा जायगा ? पैदल चलना भी अब सवाल पैदा करता है ।



- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां पर लौटना है

समय – वही, बस ट्रेन पकडने का……।

मुंबई लोकल यात्रा मे एक रंग ये भी है - वाकया

अक्सर मुंबई लोकल के फर्स्ट क्लास में सफर करता हूँ लेकिन वहां पर वह बात नहीं दिखती जो सेकंड क्लास में सफर करने से दिखती है । फर्स्ट क्लास में तो लोग अपनी किताबों में खोये रहते है या फिर मोबाईल पर 'कॉपर आज उपर जायेगा'....' स्टील नीचे जायेगा' जैसी बातें करते रहते हैं । लेकिन सेकंड क्लास में आते ही नजारा बदल जाता है। कोई हनुमान चालीसा की छोटी वाली किताब लिये पढ रहा है, कोई क्रॉस वर्ड भर रहा है। कभी कभी पिच्च से थूके जाने की आवाजे सुनाई पडती हैं तो कभी गाली गलौज, धक्कम धुक्की के हंगामें में सुनाई पड जाता है – तू उतर….....तेरे को देखता हूँ।

कल मुंबई लोकल के सेकंड क्लास के डिब्बे में सफर करने का मौका मिला। इन्हीं सेकंड क्लास के डिब्बों में कई भजन मंडलियां गाते बजाते चलती हैं। ये भजन मंडलीयां रोज आने जाने वाले यात्रियों से ही बना एक ग्रूप है। ऐसे ढेरों ग्रूप हर फेरी में दिख जाते हैं। रेल में लोहे की दीवार ढोलक बन जाती है तो सामान रखने वाला कैरियर भगवान की तस्वीर लटकाने के काम आ जाता है। उस कैरियर में अक्सर फूल-मालायें भी V आकार में लटकती मिल जाती है जिसका मतलब है कि इसके पहले वहां कोई भगवान लटके होंगे । गंतव्य स्थान आने पर तस्वीर तो उतार ली गई लेकिन हार को वहीं लटकता छोड चल दिये होंगे। अब वो हार सारा दिन अप डाउन करता रहेगा ।

ऐसे माहौल में ही एक शख्स की बातें सुनी। जो शायद कोई घरों वगैरह में पेंटिंग करने वाला काम करता था। अपने साथी को वह जिस अंदाज में बाते बता रहा था कि बस सुनते रहो औऱ गुनते रहो। कुछ बातें भद्दी अवश्य लगें पर यही तो है लोकल बातचीत की एक झलक। जरा यहां बातचीत का मुखडा देखिये….

अरे यार हम कहा जब अटेंडम आप ने बुलाया तो हम अटेंडमै आ गये। लेकिन पहुँचने पर वो औरतीया बोली कि अभी साहब की छुट्टी नहीं है , फिर कभी बुलाएंगे। अभी कलर बिलर नहीं करवाना है।

क्या बात कर रहा है ?

हां यार, ऐसे ही बोली। अरे .... हम कहा – मैं दूसरा मिला मिलाया काम छोडकर आप का अटेंडम कलर करने चला आया और आने पर बोल रही हो कि ऐसा नहीं वईसा…..तो ये तो ठीक नहीं है।

तब ?

तब क्या…..बोलने लगी कि नहीं हमारे वो बोले थे इसलिये मैंने आपको फोन करके बुलाया था लेकिन अभी उनकी छुट्टी नहीं है इसलिये फिर बाद में फिर बुलायेंगे तब कलर बिलर कर देना।

हम कहा अब क्या कहूँ……..बिलेपारले वाला काम छोड कर अटेंडम आप के यहां आ गया, अब वापिस जाउंगा तो सेठिया मोछ मोटवायेगा।

तब ?

तब क्या, हम कहा हमारा खोटी हुआ है आने जाने का…….है कि नहीं…….आप आने जाने का और टाईम का कुछ पईसा दे दो।

तब?

तब क्या…..लगी तीन तिंया बोलने बतियाने। अरे ऐसे कैसे दे दें, अभी कोई काम भी नहीं किये और लगे पैसे मांगने।

तब ?

अरे तब क्या……हम भी तो वैसही घाघ बतासू है……धर लिये तो धर लिये……….हम कहा ऐ…….आप काम करवाये या न करवायें……अटेंडम बोलीं है आप तो मैं आया हूँ अपना पुराना काम छोडकर…….और आने पर बोल रही हो कि अभी नहीं तो फिर कभी तो मेरा जो नुकसान हुआ उसका कुछ भरपाई करो।

हां, बात तो सच है । फिर क्या हुआ ?

अरे , वही कहा है न…..कि …..न नंगा नहाना न खुल्ले में लगाना…….बस वही हाल ।

माने ?

अरे, ऐकदम फराडिया औरतीया थी यार……तीस रूपया पकडा कर बोलती है लो अपना आने जाने का भाडा किराया ले लो। अरे हम कहा इस तीस रूपल्ली का क्या करूं…… पुडिया बना कर गां* में डालूं ।

तब ?

अरे, तो कहा है न कि भागते भूतवा की भगही भली। हम कहा लाओ…..दो……अब तो अटेंडम मर रहे होंगे तब भी मैं बुलाने पर मूतने तक न आउंगा।

ऐसा ?

हां और क्या…….मैं भी मुंडी नीचे किये चल दिया। नीचे उतर कर गेटवा पर आया तो क्या देखता हूँ कि उ औरतीया का आदमी चढ्ढी पहिने फुलवारी में पानी दे रहा है। हम कहा जा साले…….घर में रह के औरतीया को अटेंडम बाजार भाव पता करने को रख छोडा है और इहां ससुर पाईप लेकर फुलवारी बगईचा सींच रहा है।

अरे तो बोले नहीं कुछ ?

क्या बोलेगा ? साले कईसा कईसा केलांट ( client) मिल जाता है। कंटराज (contract) पता करने के लिये कारीगर को घर बुला कर उसका पूरा दिन खोटी कर दिया और पकडा रही है तीस रूपईया । एकरी मां क .....।

अभी ये बातचीत चल ही रही थी कि ट्रेन विलेपार्ले स्टेशन पर पहुँच गई । तभी प्लेटफार्म पर से कोई बंदा चिल्लाया…….अबे चुतिया साले…..सेठिया तेरी मारने के लिये ढूँढ रहा है। जल्दी जा न बाजू वाली बिल्डिंग से आदमी रख लेगा।

अंधेरी स्टेशन पर उतरते ही सोच रहा था – क्या इतनी सारी झाँकी मुझे फर्स्ट क्लास में देखने मिलती ? कदापि नहीं…….वहां पर सोना चढता है ……कॉपर उतरता है तो सीमेंट वोलाटाईल बन जाता है……लेकिन इन फर्स्ट क्लास वाले यात्रियों के मुकाबले , सेकंड क्लास स्टेबल रहता है …….आँकडों में……….कपडों में……..और मिजाज में.....बदल जाता है तो केवल रंग ।



- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ गुणीराम जा पहुँचे थे।

समय - वही, जब महिला आरक्षण बिल अपनी लंबी चादर ओढे हुए थोडा सा सिर बाहर निकाल कर झाँक रहा है।



विशेष - मैं अब भी सेकंड क्लास में यात्रा करना पसंद करता हूँ क्योंकि वहां मुझे मेरे कहानियों के लिये कैरेक्टर , अनुभव और खाद आसानी से मिल जाते हैं। रही बात फर्स्ट क्लास में यात्रा की, सो तो अगर कंपनी की ओर से मंथली पास की इनायत न होती तो वो मेरे बूते से बाहर है :)

मुनीष जी ने टिप्पणी में कहा कि लिटरेरी एंगल से ये लेख ठीक है तो थोडा अचंभा लगा क्योंकि इस तरह का लेखन सस्ताउ किताबों में मिलता है। बहुत कुछ झिझकते हुए ही ये पोस्ट लिखी है। कहीं किसी की भावना आहत हों तो क्षमाप्रार्थी हूँ।
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फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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