सफेद घर में आपका स्वागत है।

Friday, May 29, 2009

हंस पत्रिका का आवरण चित्र बहुत ही दमदार है। बधाई हो हंस ।

क्या आप लोगों ने हंस के मई अंक का आवरण चित्र देखा है ? देखे होंगे तो जरूर मन में चह-चहुक हुई होगी। चित्र ही ऐसा है। यहाँ वह चित्र दे रहा हूँ । आप भी देखें । एक दूल्हा और दुल्हन को दिखाया गया है । दुल्हन पियरी पहने, अपना दांया पैर थोडा आगे की ओर निकाल कर खडी है और दूल्हा अपनी दुल्हन के पैर छू कर आशिर्वाद ले रहा है। एक बार ये चित्र देखा तो बस देखता रह गया। बस यूँ समझिये कि अचंभित हूँ ।

हाँ अचंभित ही कहना उचित होगा। अब तक जो कुछ देखा- सुना है, जो कुछ जाना समझा है ऐसे में परिपाटीयों को ढोते-ढोते छन्नी हो चुके समाज के मंडवे तले का ये द्श्य अचंभित ही करता है ।

चित्र ये रहा -





- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ कभी धर्मेद्र लौहपथगामिनी से चुपके-चुपके पहुँचे थे अपनी सुलेखा के पास प्यारेमोहन बन कर

समय - वही, जब शपथ लिये मंत्रियों के यहाँ मिठाई की बंटवाई, मंत्री न बन सकने वालों के यहां अफसोसाई और वहीं कहीं मिठाई के डिब्बों से चींटियों की कतार बंधी ढोवाई चल रही हो।

Monday, May 25, 2009

यमराज की कबड्डी


झमाझम बारिश के बीच रात के आठ बजे ट्रेन का इन्तजार करते यात्रियों की नजर ट्रेन के आने की दिशा मे लगी थी की तभी ओवेरहेड वायर पर पीले प्रकाश की एक झिर्री दिखाई दी और लगा कोई पीले प्रकाश से उस ओवेरहेड वायर को नापता हुआ चला आ रहा है , यात्रियों मे सुगबुगाहट तेज हो गई , सभी लोग अपने को किसी तरह ट्रेन मे घुस जाने के लिए जैसे तैयारी करने लगे, कोई अपना बैग संभाल रहा था तो कोई पाकेट , किसी की नजर अपने मोबाईल पर थी तो कोई अपनी आस्तीनें मोड़ रहा था मानों कोई जंग लड़ने जा रहा हो.....लेकिन यह क्या , इंडिकेटर पर तो पनवेल लिखा है लेकिन ट्रेन तो छत्रपति शिवाजी टर्मिनस की ओर जाने वाली ट्रेन है , पनवेल वाली को क्या हुआ । लोग पनवेल वाली इस तरह कह रहे थे मानों किसी घर मे कई बहुएं हों और घर के लोग अक्सर उन बहुओं के बारे मे बात करते समय उसके मायके का नाम लेकर बुला रहे हों , की वो रामपुर वाली बडकी, वो भिलाई वाली छोटकी, वो बिचली जबलपुर वाली। ऐसे मे लोग यदि पनवेल वाली कहें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि यह पनवेल वाली ही तो है जो उन्हें अपने घर पहुँचा देगी वरना हालत तो ये है की कहीं रात प्लेटफार्म पर ही न गुजारनी पड़ जाय । तभी एलान किया गया की भारी बारिश की वजह से कुछ ट्रेने रद्द कर दी गयीं हैं और कुछ ट्रेनें देरी से चल रही हैं । अब लोगों का उत्साह जो अब तक ठांठे मार रहा था अचानक बर्फ के मानिंद ठंडा हो गया.... लगा अब क्या होगा। अँधेरी स्टेशन की तरफ से आने वाली ट्रेने भर भर कर आ रहीं थीं और लोगों की भीड़ बढती जा रही थी , लोग यहीं वडाला स्टेशन पर पनवेल या बेलापुर जाने वाली ट्रेन पकड़ने के लिए उतरते , लेकिन हो यह रहा था की लोग तो आते जा रहे थे लेकिन पनवेल वाली नहीं आ रही थी ।



तभी शिवाजी टर्मिनस की ओर से एक ट्रेन पनवेल के लिए आती दिखायी पड़ी , इंडिकेटर पर देखा पनवेल ही लिखा था , सभी फ़िर से उसी तरह तैयारी मे लग गए जैसे अभी एक पहली वाली के लिए तैयार हुए थे , फ़िर वही आस्तीनें, फ़िर वही बैग और फ़िर वही उत्साह । ट्रेन धडधडाती हुई प्लेटफार्म पर आयी और लोगों ने देखा ये तो पहले ही इतनी भरी है की इसमे और लोग चढ़ तो क्या बल्कि एकाध बाहर ही न फेका जाएँ , लोग दरवाजों पर लटके हुए थे, कोई ट्रेन की छत पर चढा था तो कोई दो डिब्बों के बीच मे बनी सीढियों पर सटा था , किसी को खिड़की मे ही जगह मिल गयी थी , यानी ट्रेन को बाकायदा लोगों ने इस तरह ढांप लिया था की जैसे कोई स्त्री पहली बार गर्भवती हो और मारे लाज के वो अपने पेट को तोपने का भरसक प्रयास कर रही हो । फ़िर भी किसी-किसी को लग रहा था की और किसी को जगह मिले न मिले उसे जरूर मिल जायेगी और इसी प्रयास मे वो दरवाजे पर खड़े लोगों को आगे अंदर घुसो कहते हुए शंखनाद करता ख़ुद उन्हें घुसाने की कोशिश करता की कम से कम फ़ुट बोर्ड पर पैर रखने की जगह ही मिल जाए लेकिन हाय रे किस्मत, कोई टस से मस नहीं हो रहा था । थक हार कर वो प्लेटफार्म पर चुपचाप खड़ा हो गया, ठीक उन्हीं यात्रियों की तरह जो पहले ही हार मान चुके थे , और अगली ट्रेन का इन्तेजार करने लगे थे और लोग आपस मे बातें भी कर रहे थे कि -मान लो इस भरी हुई ट्रेन मे यदि कोई मर- मुरा जाए तो यमराज भी उसके प्राण पखेरू लेने के लिए कदापि न घुस पाएंगे। लेकिन लोग शायद यह नहीं जानते थे की यमराज ख़ुद आज मुंबई के वडाला स्टेशन पर मौजूद हैं । वो इस तैयारी मे थे की किसी की साँस टूटे तो उसे लेकर यमलोक चलें और इसी इंतजार मे पिछले कई ट्रेनों का इन्तजार कर रहे थे। लेकिन लोग थे की अपनी साँस तोड़ने को तैयार नहीं, ठीक उस कबड्डी के खिलाडी की तरह जो विरोधी खेमे मे जाने पर मुह से कबड्डी - कबड्डी का जाप करता रहता है और जानता है की जहाँ ये जाप बंद हुआ , वहीं उसकी मौत यानि आऊट हो जाने की घोषणा हो जायेगी।



यह ट्रेन भी चली गयी और लोग फ़िर भुनभुनाते कुनबुनाते प्लेटफार्म पर खड़े रहे की अब देखें अगली ट्रेन कब आती है । इस बीच लोग आपस मे समय काटने के लिए कुछ बातचीत भी करने लगे , कुछ का कहना था की ये रेल विभाग की नादानी है, बारिश के लिए पहले ही कुछ इंतजाम करना चाहिए था, ट्रैक को थोड़ा ऊपर उठा देना चाहिए था मानों ट्रैक न हुआ कपड़े सुखाने की रस्सी हो गयी जिसे जब चाहे रस्ते मे पड़ जाने पर लोग यूँ ही हाथ से ऊपर उठा कर उसके नीचे से निकल जाते हैं।

बातचीत करते करते लोगों का ध्यान सामने के विज्ञापन पर पड़ा जिसमे लिखा था - अपना लक पहन कर चलो , लोगों को उस विज्ञापन से एक नया मुद्दा मिल गया । एक ने कहा - लगता है आज किसी ने अपना लक्क नही पहना है तभी कोई ट्रेन नही मिल रही है , सुनते ही सभी और हसी की फुहार छुट पड़ी और इसी बीच लोगों की नजर बगल मे लगे एक और विज्ञापन पर पड़ी जिसमे एक नाईजीरियन लाल रंग की बंडी पहने था और उस पर लिखा था यूनिसेक्स वेस्ट । लोगों को शायद इसी तरह के टोपिक की जरूरत थी । एक बोला - विज्ञापन के इस नाईजीरियन को देख लगता है जैसे उसे जबरदस्ती पहना कर बैठा दिया गया है। दूसरा बोला- पैसे मिलेंगे तो आप बंडी क्या बिन बंडी भी बैठने को तैयार हो जायेंगे और आजकल बिन बंडी ज्यादा पैसे मिल रहे हैं। सभी जो आसपास खड़े थे मुस्करा पड़े । यमराज भी खड़े खड़े मुस्करा दिए , और तभी एक ओर पनवेल वाली गाड़ी आते दिखायी पड़ी , लोग फ़िर अपनी उसी मुद्रा मे आ गए , कसी हुई बाहें, तैयार दिल और गरगराते रेल की पटरियों की आवाज और उन्ही सब के बीच किसी की साँस टूटने की राह तकते यमराज , कोई तो गिरे इस रेल से .......कोई तो साँस टूटे ।

यह ट्रेन भी कसी हुई थी , बल्कि पहले वाली से कुछ ज्यादा ही क्योंकि इन्तजार जब लंबा होता है तो लोग रही सही आशा को इस उम्मीद मे झोंक देते हैं की जो हो देखा जायगा , और यही वह समय होता है जब यमराज की कबड्डी अपने पूरे उफान पर होती है , लोग टप्प-टप्प कर ट्रेन से एक या दो की संख्या मे गिरते हैं और यमराज उन छूटे हुए खिलाड़ियों को इन साँसों वाले कबड्डी के खेल से बाहर कर देते हैं। नियम वही - साँस नही टूटनी चाहिए।

लोगों ने इस नयी आयी ट्रेन मे घुसने की भरपूर कोशिश की , लेकिन असफल होने के लिए ही। तभी सब लोगों की नजर लेडिज डिब्बे पर गयी , अरे इसमे तो सिर्फ़ पन्द्रह - बीस लेडिज ही हैं बाकी डिब्बा तो खाली है , और इस भरी बारिश मे कौन लेडिज इतनी देर तक ऑफिस मे रुकेगी , इसलिए तो आज लेडिज डिब्बा इतना खाली-खाली लग रहा है। koochh यात्रियों की नजरें आपस मे मिलीं जैसे पूछ रहीं हो की , - कहो क्या कहते हो चला जाय । कुछ नजरों ने हिचकिचाहट दिखलाई , कुछ ने हिम्मत दिखायी और देखते ही देखते लोगों का रेला लेडिज डिब्बे की ओर बढ़ने लगा। अन्दर बैठी महिला यात्रियों के चेहरे देख कर समझा जा सकता था की उनके मन मे क्या चल रहा है। इधर यमराज के मन मे भी कुछ चल रहा था - शायद कोई शिकार न मिलने की पीड़ा या फ़िर कोई कानूनी उलझन जो की पुरूष यात्रियों द्वारा महिला डिब्बे मे यात्रा करने से बढ़ गयी थी। इधर महिला डिब्बे मे सवारियों ने विरोध करना शुरू किया की आप लोग लेडिज डिब्बे मे यात्रा नहीं कर सकते , लेकिन पुरूष यात्रियों की भीड़ इतनी ज्यादा थी की उनकी ओर कोई ध्यान ही नहीं दे रहा था । उन महिला यात्रियों को सुनाने के लिए एक पुरूष यात्री ने अपने साथी से कहा - आजकल रेलवे मे अपग्रेडेशन का नियम लागू है , जब कोई सीट खाली जा रही हो तो वेटिंग वालों को उस पर जगह मिल जाती है और इधर तो पूरा डिब्बा ही खाली है । दुसरे यात्रियों ने उसकी इस बात की तारीफ़ की और एक ने कहा - हाँ और क्या.....जब लम्बी दूरी मे ये अपग्रेडेशन लागू है तो छोटी दूरी मे क्यों नहीं। एक ने कहा - अब तो यूनिसेक्स वेस्ट (बंडी) भी आ गयी है तो क्या ट्रेन नहीं आ सकती । उधर यमराज प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े सोच रहे थे की इस डिब्बे मे घूसूं की नहीं - ख़ुद पुरूष जो ठहरे ।

उधर सिग्नल हरा हो गया लेकिन ट्रेन आगे नहीं बढ़ रही थी , बहुत से लोग अब भी प्लेटफार्म पर छूटे हुए थे उन्हें किसी भी तरह जगह नहीं मिल पायी थी और अगली गाड़ी का इन्तजार कर रहे थे। तभी यमराज के कानों मे किसी की आवाज आई - अरे एक बन्दा गिर गया है , ट्रेन की छत पर से सीधा निचे आ गया है। यमराज की बांछें खिल गयी, दौड़ते हुए पहुंचे उस जगह जहाँ किसी के गिरे होने की तस्दीक़ की गयी थी, देखा एक पन्द्रह बीस साल का युवक अपने कपडों को झाड़ते हुए उठ कर खड़ा हो रहा था , और लोग कह रहे थे जा तेरा लक तेरे साथ था जो मोटरमेन ने समय पर गाड़ी आगे नहीं बढाया नहीं तो तू आज गया था । इधर यमराज अपने शिकार को हाथ से निकलते देख कह बैठे - लगता है आज सभी का लक सबके साथ है।

- सतीश पंचम
स्थान - मुंबई
समय - मिल नहीं रहा। ( समय मिलता तो ये पुरानी पोस्ट न ठेलता :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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