सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, February 28, 2009

मेरा ब्लॉग कन्टेंट चोरी हो गया है, कहीं आप का भी ब्लॉग लेख चोरी नहीं हो गया हो ।


           जी हां, मेरा ब्लॉग कन्टेंट चोरी हो गया है। एक ब्लॉग पर मेरे लेख चुपके से प्रकाशित कर दिये गये हैं। और जिस ब्लॉग पर यह कन्टेंट प्रकाशित हुआ है, वह ब्लॉग एक पॉर्न ब्लॉग है। मुझे इस घटना की जानकारी ही नहीं होती यदि मैंने अपने द्वारा रचे एक पात्र  'सदरू भगत'  के नाम पर गुगल सर्च न किया होता।

          बैठे बैठे अचानक ही मेरे मन में आया कि देखूं मेरे लिखे लेखों  का गुगल सर्च में क्या परिणाम आता है और सबसे पहले मैंने अपने द्वारा रचे गये पात्र सदरू भगत को ही  सर्च करना शुरू किया। आश्चर्य, सदरू भगत नाम के कई परिणाम आ मिले, लेकिन इन्हीं के बीच एक अनजाना सा लिंक दिखा जिसे पहली नजर में पढते ही पता चल गया कि ये कोई पॉर्न वेबसाईट है। लेकिन इसी के साथ सदरू भगत लिखा देख कर मेरा माथा ठनका कि सदरू भगत नाम का ये शब्द यहां कैसे,  और तभी मैने उस पर क्लिक किया। उसके बाद तो जैसे मेरा दिल धक् से हो गया। मेरा रचा गया पात्र, मेरा लिखा हर शब्द, मेरा लिखा पूरे का पूरा हास्य  लेख  एक पॉर्न वेबसाइट पर मेरे सामने था। अगल बगल और लोगों के होने की वजह से तुरत फुरत उस वेबसाइट को बंद किया। थोडी फुरसत मिली तो फिर सर्च किया और इस बार मेरा एक और लेख इस वेबसाइट पर दिखा।  इस लेख में मैंने समलैंगिक विवाह और उस पर बनाये जाने वाले कानून को लेकर व्यंग्य लिखा था। आप लोगों में से कइयों ने उसे पढा भी होगा - समलैंगिक विवाह और पंडित केवडा प्रसाद । बस फिर क्या था, मैं काफी सोच में पड गया । मन ही मन उस ब्लॉगर को हजार बार कोसने लगा। कम्बख्त ने छापा भी तो एक अश्लील साइट पर, जो इस लेख को पढेगा वो मेरे बारे में न जाने क्या सोचेगा। 


    खैंर, ले देकर ब्लॉग को फ्लैग कर अपना विरोध भी दर्ज करा दिया। लेकिन मन नहीं मान रहा था। सोचा आप लोगों से भी इस वाकये को बांटता चलूँ। लेकिन इस घटना ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर क्या सोच कर उस साइट वाले  ने मेरे लेख को वहां छापा । और इसी उधेड-बुन में मुझे सोचने पर मजबूर होना पडा कि मैं कैसा लिखता हूँ, मेरी शैली क्या है, क्या मैं इतना अच्छा लिखता हूँ कि कोई उसे चुरा लेना चाहता है या फिर मैं इतना घटिया लिखता हूँ कि उसे एक अश्लील साइट अपने यहां प्रकाशित करने योग्य मानती है।


    चोरी से प्रकाशित लेखों का विश्लेषण करने पर पता चला कि उनमें से एक लेख मैंने अखबारों में आये एक अनोखी खबर पर चुटकी लेते हुए लिखा था जिसके अनुसार कहीं के वैज्ञानिकों ने रीसर्च करके बताया था कि दिन में चार बार पत्नी को गले लगायें तो खुशहाली होती है घर में। अब ये खबर मुझे कुछ अटपटी सी जान पडी तो इस पर सदरू भगत और रमदेई नाम के मेरे द्वारा गढे गये पात्रों को लेकर एक लेख लिख दिया था। दूसरे लेख  को ध्यान से देखा तो यह लेख समलैंगिक विवाह को लेकर बनाये जा रहे कानून को लेकर लिखा गया था। यह एक व्यंग्य था जिसमें पंडित केवडा प्रसाद की उलझन और अन्य बातों का वर्णन था। पूरा लेख सीधे छाप मारा था छापने वाले ने। अब इन लेखों मे न जाने कौन सा अश्लीलता वाला तत्व दिखाई दिया था उस छपासी को कि उन्हें आव देखा न ताव फट् से छाप दिया अपने घटिया साइट पर। खैर, यही कहेंगे, जाकी रही भावना जैसी। सावन के अंधे को हर जगह हरा ही दिखाई देता है


  जहां तक मेरे लेखों में भद्दे या अश्लीलता का प्रश्न है तो मैं उससे बचना ही चाहता हूँ, एक दो लेख पहले लिखे थे जिनमें कहीं कहीं आवश्यकता पडने पर शब्द न लिख कर वहां स्टार *** आदि का प्रयोग किया है मैने। लेकिन वही जहां पर जरूरी हो। आतंकवादीयों द्वारा मुंबई पर हुए हमले पर उन आतंकवादीयों के लिये लिखे गये शब्द भी मैने इसी ' Idi** लेखन शैली' में ही लिखे थे । हो सकता है उस चोट्टे ब्लॉगर को यही शैली मेरी सामान्य शैली लगी हो। और लगने का जहां तक सवाल है तो इस बात पर पल्लवी त्रिवेदी जी का ब्लॉग पोस्ट याद आ गया है जिसका शीर्षक ही है बस हमें लग गया सो लग गया....क्या कर लोगे हमारा

खैर, चौरकर्म को कहां तक रोका जा सकता है। राईट क्लिक डिसेबल करने पर भी लोग इमेल सब्सक्राइबर के जरिये माल उठा लेंगे। फीडर तो है ही। डॉ अमर जी इस समय मुझे बडे याद आ रहे हैं। ठिठोली जो करते हैं। कह रहे थे ब्लॉग पर ताला लगाना शुभ है। अब मैं सोच रहा हूँ ताला अलीगढ वाला लगाउं कि गोदरेज का :)

ब्लॉगर जनों, आप लोग भी अपने अपने ब्लॉग कन्टेंट्स को सर्च मारा किजिये, कहीं आप के द्वारा क्रियेट किया हुआ, रचा हुआ सदरू भगत किसी और रूप में न हों। मैं चलूं, सदरू भगत की पत्नी रमदेई और फाफामऊ वाली उनकी पतोहू इंतजार न कर रहे हों। रमदेई तो पहुँचते ही उबल पडेगी, कहां छोड आये मेरे सदरू भगत को। एक तो बुढौती, उपर से न जाने कौन-कौन इलाके में उन्हें छोड आते हो :)

अंत में - उम्मीद है, उस चोट्टे सन्नी ब्लॉगर तक मेरी यह पोस्ट पहुँच गई होगी।

- सतीश पंचम

 

Wednesday, February 25, 2009

चुनाव गूलर फूल


मिश्रा छेड देवे , मिश्राईन चुटकी लेवे
ललाईन मांग फेरे, यदुआईन ताना मारे
चुनाव गूलर फूल

माया रेरी मारे, कल्याण छनछनाये
अमर सुंघनी ले के, सब ओर हैं सुंघाये
आकाश हेलीकॉप्टर, तनिक जो हरहराये
मुलायम अपना टखना पहले ही सहलायें
चुनाव गूलर फूल

आये कैसी ये दुश्वारी, नेता ढोंवे जन असवारी
अंधा कौवा टांग लायें, हर वोट लगे है भारी
आडवाणी जिम में जायें, देह बुढौती में बनायें
मुस्की मारें मनमोहन, कोई गीत गुनगुनायें
चुनाव गूलर फूल

यौगेंन्द्र यादव भी चमके, टीवी पे चर्चा करके
प्रणय रॉय भी खुरचें, कान पेंसिल से सटाके
पहने कान कुण्डल , तीत विनोद दुआ जो बोलें
डाले खादी की अचकन, करें बंद , कभी खोलें
चुनाव गूलर फूल

फागुन का हो मौसम, और आम हो बौराये
ऐसे में कम्बख्त, जो चुनाव ढरक आये
बेसिर पैर कहे हैं नेता, होकर दिमागी पैदल
ऑस्कर बताते सबको, नौ नौ हमीं तो लाये
चुनाव गूलर फूल

मिश्रा छेड देवे , मिश्राईन चुटकी लेवे
ललाईन मांग फेरे, यदुआईन ताना मारे
चुनाव गूलर फूल


- सतीश पंचम

गूलर फूल - दरअसल गूलर का फूल होता ही नहीं, गूलर के केवल फल होते हैं, हमारे देश में भी चुनाव होता ही नहीं, उसके केवल फल होते हैं जो कि अब तक कीडेदार और दुंदुभीप्रिय ही दिखाई दिये हैं। हमें चुनाव एक गूलर से दूसरे गूलर के बीच ही करना है।

रेरी मारना - तू तडाक से बात करना

असवारी - दूल्हा -दुल्हन को ले जाने वाली पालकी


* पैरोडीगीत मूल रूप से छत्तीसगढी लोकगीत और आजकल दिल्ली-6 में बज रहे गीत ससुराल गेंदा फूल की तर्ज पर ।

( गूलर के फल का चित्र साभार http://flicker.com से)

Thursday, February 19, 2009

'मनबोध मास्टर की डायरी' तो कमाल की है - पेश है अनोखा मजेदार अंश


कल ट्रेन में बैठे-बैठे एक अच्छी रचना पढने का मौका मिला। किताब थी विवेकी राय रचित 'मनबोध मास्टर की डायरी' । उसमें एक जगह बताया गया कि किस तरह लेखक एक बैंडबाजे वाले की खोज में चले और उन्हे पढे लिखे बैंडबाजे वालों के एक दल के बारे में जानकारी मिली। एक जन ने बताया कि -

स्कूल के मास्टर लोग शादी-विवाह में बैंड बजाने का काम करने लगे हैं। ..... ये लोग बजनिया नहीं हैं लेकिन पेट और परिस्थिति जो न करावे । इनमें बीएड, बीपीएड, विद्यालंकार, शास्त्री, आचार्य सभी शिक्षित लोग हैं। इनके एक रात का सट्टा भी ज्यादा नहीं है - बस पांच सौ रूपये रात समझिये।

सभी अध्यापक हैं ?

'पूरा स्टाफ समझिये । वह जो बडा सा ढोल होता है और जिसे ड्रम कहते हैं तथा जो इतने जोर से बजाया जाता है कि उसकी आवाज से घर की खपरैल तक खिसकने लगती है। उसे अंग्रेजी के लैक्चरर बजाते हैं। संस्कृत वाले पंडित जी तमूरी पिटपिटाया करते हैं। ......इतिहास के अध्यापक शक्सफोन और नागरिक शास्त्र के अध्यापक बल्टहार्न बजाया करते हैं। कमाल का काम है कारनट का। सो इसे गणित और विज्ञान के अध्यापक बजाते हैं। हिन्दी विभाग यहाँ भी उपेक्षित है। हिन्दी टीचर को झाँझ मिली है। बजती तो खूब झमाझम है पर अन्य सुरीली आवाजों के आगे उसकी क्या बिसात है ? अर्थशास्त्री वाले मसक बजाते हैं। एक बार हवा भर दी तो बस उंगलीयाँ भर हिलानी है। ......महत्व का काम पीटी टीचर का है।......यहाँ डांसर बिना बैण्ड अधूरा लग रहा था। बाहर से रखने पर अपनी मौलिकता जाती रहती। इसीलिये शारिरिक शिक्षक ने इसमें अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार यह दल तैयार हो गया।

......तो ये बाजा बजाना औऱ अध्यापन कैसे एक साथ कर लेते है ?

बाजा वे गर्मी की छुट्टियों में ही बजाते हैं। प्रायः हमारे यहाँ लग्न विवाह के दिन उसी लम्बी छुट्टी में पडते हैं। अध्यापकों के पास शिमला, नैनीताल मे तरावट लेने के लिये जाने भर तो पैसा होता नहीं। .....सो एक दो महीने का धन्धा उठा लेते हैं।......

.......इनको बारात में ले जाने से कई समस्यायें हल हो जायेंगी। बैठे बिठाये सफेदपोश बाराती मिल जायेंगे। ......बाजा बजाने के बाद जब कपडे बदल कर ये लोग महफिल में बैठते हैं तो महफिल उग जाती है। वह खादी की चमक, वह टोपी-चश्मा, वह भव्य व्यक्तित्व तथा मुख पर विद्या का वह प्रकाश। बारात में बैंड बाजे के साथ कोई बोलता आदमी भी होना चाहिये। यहाँ दर्जनों मिल जाते हैं। संस्कृताध्यापकों को तो बारात में शास्त्रार्थ का एक नशा जैसा है....।

......कर्मकांड की समस्या भी हल। द्वार पूजा से लेकर विवाह तक के सारे काम संस्कृताध्यक्ष से करवा लिजिये। अगर बाजा बजते में कोई मौका आ गया तो उन्हें छुडाया भी जा सकता है...तमूरी ही तो बजाते हैं।

लेखक ने इतना जानकर सोचा कि इन अध्यापकों वाले बैंड बाजे से किस तरह बात की जाये - पढे लिखे लोग हैं। सो लेखक ने कई मजमून बनाये -



- क्यों महानुभाव आपकी एक रात की सेवा का क्या पुरस्कार होता है ?

किन्तु यह बात जँची नहीं। दूसरा मजमून बनाया -

- आपके अनुरंजन कार्य की दैनिक दक्षिणा क्या होगी ?

नहीं यह भी नहीं जम रहा। अंत में लेखक ने मजमून कुछ इस तरह तैयार किया -

- हमारे यहाँ के माँगलिक कृत्य के सानन्द सम्पन्न होने में आपका जो अमूल्य सहयोग प्राप्त होगा उसकी मुद्रा रूप में कितनी न्योछावर आपकी सेवा में उपस्थित करना हम लोगों का कर्तव्य होगा ?

यह वाक्य कुछ जमा और विशिष्ट बजनियों के गौरव के अनपरूप जँचा।

*******

यह व्यंग्य मैं मनबोध मास्टर की डायरी से साभार पेश कर रहा हूँ। विवेकी राय जी से मैंने एक बार बनारस से ही फोन पर बात की थी, काफी अच्छा लगा था। खुद विवेकी राय जी शिक्षक रह चुके हैं। यह व्यंग्य उन्होंने तब लिखा था जब शिक्षकों की तनख्वाह रोक ली जाती, महीने के पचास साठ रूपये वोतन मिलते थे। आज भी कई शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों को परले दर्जे का कारकून ही समझा जाता है। यह व्यंग्य उसी की याद दिलाता है। विशेष रूप से बाजे का चुनाव शिक्षकों के विषय से मैच कर रहा है - झाँझ - हिंदी विभाग को - बजती तो झमाझम है पर बाकी बाजों के सामने उसकी क्या बिसात...और विशेषकर पीटी टीचर का डांसर बनना तो अहोभाग्य ठहरा :) अर्थशास्त्र का तालमेल जिस तरह मसक बाजा से करते हुए बताया गया उसे बहुत सराहा जा सकता है। आज के आर्थिक मंदी के दौर में जब सभी अर्थशास्त्री एक मेज पर बैठ टिपिर टिपिर आंकडे कंम्प्यूटर पर टिपिकते है तो एसे में विवेकी राय जी का अर्थव्यवस्था के बारे मे यह कहना - मसक बाजा अर्थशास्त्र वाले टीचर बजाते हैं, एक बार हवा भर दो बाद में बस उंगलियां ही हिलानी हैं :D
( हमारी अर्थव्यवस्था भी मसक बाजे की तरह ही तो नहीं, एक बार हवा भरी बाद में उंगली कंम्प्यूटर पर चल पडी, हजारों अर्थशास्त्रज्ञों की तरह :)



- सतीश पंचम

पुस्तक अंश साभार - 'मनबोध मास्टर की डायरी'
लेखक - डॉ विवेकी राय
अनुराग प्रकाशन
चौक, वाराणसी- 221001

Saturday, February 14, 2009

गिलास के भीतर बेलन से कुचकुचाया हरा मसाला, ढेलेदार नमक और तहरी


इस बार इलाहाबाद में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के यहां जाने का मौका मिला अल्लापुर में । उनके रहने के तौर-तरीकों को ध्यान से देखने में कई अलग चीजों से वास्ता पडा। इन्हीं में से एक जगह मसाला कुचकुचाते रामकिसुन मिल गये। एक गिलास में हरा धनिया, लहसुन, मिर्च डालकर उसे बेलन से गिलास में ही कुचकुचा रहे थे। बगल में ही रेडियो पर बज रहा था - राम करे ऐसा हो जाये......मेरी निंदिया तोहे लग जाये.... मैं जागूं तू सो जाय......मैं जागूं......
वहीं एक तरफ दीवाल पर सिंहासन पर बैठे हुए सम्राट अशोक का चित्र टंगा था । देखते ही लगता था कि कोई बंदा यहां पर सिविल सर्विसेस की तैयारी में सम्राट अशोक को आदर्श मान रहा है। जरूर IAS, PCS बनना चाहता है। दूसरी दीवाल पर नियॉन, ऑर्गन, क्रेप्टॉन से सुसज्जित Periodic Table । शायद Chemistry की तैयारी भी चल रही है। एक जगह घी, तेल, चावल, दाल आदि को रखे देखा। उन्हीं के बीच चॉक से लिखा था Welcome 2009. कुछ पुराने पोस्टर या चित्रों के फाडे जाने या हटाये जाने के अवशेष दिख रहे थे। एक जगह विवेकानंद का चित्र था। बगल में अखबार की कोई कटिंग चिपकी थी जिसमें एक शख्स की Black and White फोटो दिखी । पूछने पर पता चला एक बंदा यहां का सिविल सर्विसेस में चुना गया था। इसी कमरे में रहता था। सो, हम लोगों ने उसके सम्मान में अखबार में आये उसके चित्र को कटिंग कर यहां चिपका दिया है। छात्रावास मैनेजर कमरा देने से पहले ही हिदायत दे देता है, इस कटिंग को हटाना नहीं। दीवाल पर चिपके रहने देना है।
तहरी बनाई जा रही थी। उन्हीं सब के बीच कुछ हंसी-मजाक वाला बतकूचन भी चल रहा था। विषय था कौन....कहां.....क्या........कैसे..... । हर बात के पीछे हंसी ठट्ठा जमकर हो रहा था।
एक बोले - अरे रामकिसुन जी, आप तो खाली एक अढैया खा लोगे और लगोगे सोने। थाली भी नहीं सरकाओगे कि कम से कम वही सरका दें। बाद में भले सुबह उठ कर सूखी कटकटा गई जूठी थाली को एक घंटा मांजोगे।
- अरे तो क्या हुआ। मांजते तो हैं न। मेरा तो ये मानना है कि खाना खाओ तो वहीं सो जाओ। थाली सरकाना मतलब एहसान फरामोश हो जाना है। कि, खा लिये और सरका दिये।
मैं रामकिसुन जी की खाना खाने और थाली न सरकाने के पीछे छुपे दर्शन को देख थोडा दंग था। हंसी-मजाक भी दर्शनशास्त्रमय हो उठा। तभी एक और विषय उठा - नमक । दरअसल बगल के कमरे से कोई छात्र नमक लेने आ पहुँचे। उनके यहां नमक खत्म हो गया था। मैंने देखा नमक के नाम पर बडी-बडी डली थी डिब्बे में । मैं पूछ बैठा - अरे भई, ये तो पहले पुराने समय में मिलने वाला नमक है, बडे-बडे ढोके वाला। अब भी मिलता है क्या। ये तो आयोडाइज्ड नमक नहीं है।
एक बोले - यहां किसको बच्चा होने जा रहा है जो आयोडीन वाला नमक खाये।
सभी फिर एक बार ठठाकर हंसे ।
अरे भई, सस्ताहवा नमक लिये, ढेला फोडे, डाल दिये। एतना सोचने लगे तो कर लिये तैयारी कम्पिटीशन की।
फिर भी, क्या अब भी ये मिलता है, मैंने तो समझा था बंद हो गया होगा।
बंद तो नहीं हुआ लेकिन अब भी बडे-बडे डली या ढेले के रूप में गांव देहात में बिकता है। गांव से आ रहे थे तो मय झोला-झक्कड यह ढेलेदार नमक भी टांग लाये थे।
दूसरे छात्र बोले - अरे बस नमक। और वो ससुराल से खटाई और घी लेते आये वह क्यों नहीं बताते।
पता चला जिस छात्र के बारे में बातें हो रही थीं उसकी शादी हो चुकी है और दो बच्चे भी हैं। पत्नी सुदूर देहात में अपने दो बच्चों के साथ है और ये महाशय यहां कम्पिटीशन की तैयारी कर रहे हैं। पत्नी का चयन शिक्षामित्र के रूप में गांव में हो गया है और कुछ खर्चा पानी घर का वह ही उठाये हुऐ हैं।
तो बात चल रही थी नमक के ढेले पर। कि......नमक का ढेला फोडा, दाल में डाला, दाल तैयार। तभी एक गांव-देहात का एक छात्र मजे लेकर कुछ गाने लगा। प्रहलाद नामक एक छात्र को चिढाते बोला -
अरे कहा है न-

हाय राम,
आईल कइसन बेला,
हमरे नौ-नौ गदेला ( बच्चे)
बलम मोरे फोडें ढेला..... बलम मोरे फोडें ढेला


उसका इतना कहना था कि सब लोग फिर एक बार हंस-हंसकर लोट पोट होने लगे। दरअसल यह गीत बिरहा वाला गीत है और एक पत्नी के दर्द को बयान कर रहा है कि मेरे नौ-नौं बच्चे हो गये हैं और आमदनी का ये हाल है कि पति मेरे ढेला फोडने वाला काम कर रहे हैं। ढेला फोडना यानि निरर्थक काम करना।
मैं भी सोच में पड गया कि यार ये तर्ज तो काफी छांट कर लाया है पट्ठा। यहां तो सचमुच प्रहलाद पतिदेव घर से लाये हुए नमक का ढेला फोड रहे हैं, निरर्थक सरकारी नौकरी के लिये प्रयत्न किये जा रहे हैं जिसकी आशा अब बढती उम्र के कारण क्षीण होती जा रही है और वहां पत्नी है कि अपने बच्चों को लेकर किसी तरह चल रही है।
यह बैठकी काफी देर तक चली। अब तो पोस्ट भी लंबी हो चली है......चलिये बंद करता हूँ न आप लोग कहेंगे, क्या ढेलेदार पोस्ट है.....ससुर फोडते रह जाओ, कुछ न निकले :)

- सतीश पंचम

Wednesday, February 11, 2009

वैलेंटाईनहा बाबा के लिये पूडी-कढाही के चढावे पर रोचक चर्चा ( बतफोडवा पोस्ट)



आज सदरू भगत वैलेंटाईन डे मना रहे हैं। एक नई नीली रंग की पट्टेदार चढ्ढी, उस पर सेन्चुरी मिल वाली परमसुख छाप धोती, सफेद रंग का कुर्ता, एक नया अँगोछा कंधे पर रख यूँ चले, मानों समधियाने जा रहे हैं। धोती में नील इतना ज्यादा लगवा लिये थे कि लगता था बसपा का बैनर ही कहीं से झटक लाये हैं और वही पहन-ओढ कर निकले हैं। इधर रमदेई भी आज पूरे फॉर्म में थी। नई-नई साडी को बिना एक बार भी पहने धो-कचार कर धूप में सूखा रही थी, जानती थी नई साडी एक-दो बार धोने से कपडे का बल टूटता है और पहनने में नरमाहट बनी रहती है।
बगल वाली जलेबी फुआ ने टोक भी दिया था, काहे नया लूगा को धो रही हो, पहन लो एसे ही....लगेगा बियाह वाली साडी है। चलोगी तो लूगा खसर-खसर बोलेगा सो अलग। तो जानते हैं रमदेई ने क्या कहा - अरे नई साडी खसर-खसर बोलती है इसिलिये तो धो-कचार कर धोती का खसरपन कम कर रही हूँ। मैं तो नहीं पहनती लेकिन मेरे बुढउ मानें तब न। बोल रहे थे हम लोग वेलेंटाईनहा बाबा को मनायेंगे।
वैलेंटाईनहा बाबा ? वो कहाँ के बाबा है ? जलेबी फुआ ने अचरज से पूछा।
अरे जैसे हमारे बरम बाबा, हरसूबाबा, डीह बाबा हैं न, वैसे ही अंगरेज लोगन के वैलेंटाईन बाबा ।
अच्छा, तो उनके लिये ही पूडी- कढाई चढाने की तैयारी हो रही है ।
हाँ, वह सब तो करना ही पडेगा। कढाही चढेगी, परसाद बंटेगा। बाकी सब भी काज-करम होगा। अब तो देखो वैलेंटाईन बाबा कहाँ तक पार लगाते हैं।
सब पार हो जायेगा बहिनियाराम, सब पार हो जायेगा। बस वैलेंटाईनहा बाबा पर भरोसा रखो।
रमदेई और जलेबी फुआ की बातें चल ही रही थीं कि सदरू भगत टहकते-लहकते आँगन में आ पहुँचे। देखा जलेबी फुआ पहले ही से बैठी हैं। रमदेई अलग कपडों को उपर-नीचे अलट-पलट कर सुखा रही है, ताकि कपडे जल्दी सूख जायें। एक गठरी में सिधा-पिसान बाँधा जा रहा है ताकि पूडी-उडी का इंतजाम हो, कढाई चढे। थोडे पुआल भी लिये जा रहे हैं ताकि आग जलाकर कढाई देने में आसानी हो। थोडी देर के लिये सदरू भगत को लगा कि औरतें न हों तो तर-त्यौहार का पता ही न चले। वो तो चार औरतें मिल बैठ कर बोल-बतिया लेती हैं, थोडी लेनी-देनी कर लेती हैं तो पता चलता है कि कोई त्यौहार है। एसे समय बच्चों की कचर-पचर अलग चल रही होती है। किसी का पाजामे का नाडा नहीं खुल रहा तो किसी की सियन खुल गई है। इन्हीं सब बातों में सदरू भगत मगन थे कि बाहर पंडित केवडा प्रसाद की आवाज सुनाई पडी।
अरे भगत......अंदर ही हो क्या ?
अरे पंडितजी। आइये- आइये। कहिये , कैसे आना हुआ। सदरू भगत आँगन से बाहर आते हुए बोले।

आना क्या, बस जब से ये सुना कि तुम वैलेंटाईनहा बाबा को कढाई चढाने जा रहे हो, हम तो दौडे चले आये। पानी भी नहीं पिया, पैर देख लो अभी भी धूल से अंटे पडे हैं।
हाँ, कढाई चढा तो रहा हूँ। सुना है बहुत पहुँचे हुए बाबा हैं। बहुत पढे लिखे कालेज के छोकरा-छोकरान तक उन्हें मानते हैं।
कालेज के छोकरा-छोकरान बाबा लोग को मानते हैं ? विसवास नहीं होता भगत। देखा नहीं था हरकिरत का लडका जो शहर में पढ रहा था, गाँव आया तो हम लोगों को पिछडा कह रहा था। कहता था कि क्यों पाथर को पूजते हो। कहीं पाथर पूजने से दुख दुर होते हैं। ये बाबा ओबा लोग कुछ नहीं होते बस बेकार के लोग होते हैं। और आज देखो, सब पढुआ-ठेलुआ लोग वैलेंटाईन बाबा को एकदम मान ही नहीं रहे बल्कि उनके लिये मार भी खा रहे हैं। बदनामी झेल रहे हैं। हर जुलुम हँस कर झेल रहे हैं ।

सच कहते हो पंडितजी। मैं तो समझता हूँ कि जितना हम लोगों के देसी बाबा लोगन में शक्ति है, उससे कहीं ज्यादा विदेसी बाबा में शक्ति है। देखा नहीं, क्या बडे, क्या बूढे सब के सब वैलेंटाईनहा बाबा को मान रहे हैं। सुना है वह एसे बाबा हैं कि उनके लिये गुलाबी रंग की चड्ढी का चढौवा लगता है।
अच्छा।
हां और क्या ? एसे वैसे बाबा थोडे न है।
लेकिन आज तक तो हम लोग अपने यहां चढावे में कोपीन अ लंगोट छोड कुछ चढाये ही नहीं हैं। लंगोट चढाते थे तो एक सिरा एक ओर बाँध देते थे और दूसरा दूसरी ओर। अब इ गुलाबी चड्ढी का चढावा कैसे चढेगा बाबा को।
बस वही मैं भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि वैलेंटाईन बाबा का चढौवा गुलाबी चड्ढी कैसे अर्पित किया जाता है, कैसे चढाया जाता है।
अभी यह चर्चा चल ही रही थी कि कुछ लोग भजन गाते हुए बगल से निकले -

वैलेंटाईन बाबा, तेरो अजब है हाल
रे बाबा, तेरो अजब है हाल
मांगे न मोती, नाहीं हीरा
नाही मांगे गहना-गुरिया ,
मांगे चड्ढी-पुआल रे बाबा
तेरो अजब है हाल
रे बाबा......

- सतीश पंचम

Monday, February 9, 2009

काँग्रेस का नींबू मिर्च बनाम भाजपा का राहु कालम ( बतफोडवा पोस्ट)

आम के पेड के नीचे बैठे बूधन महतो अपनी जाँघ पर सुतली को बर(मरोड) रहे थे जिस्से रस्सी बना सकें, कि तभी खदेरन और झिंगुरी हल बैल लेकर जाते हुए दिखे..... इतनी दोपहरीया में ई लोग कहाँ जोताई करने जा रहे हैं जबकि गर्म लूह और तपिश के मारे बाहर मुँह निकालने में पतँग पडी है। बूधन महतो ने दूर से ही पूछा - कहाँ जा रहे हो जोडी-पाडी मिलकर। पेड की छाँह देख पास आते झिंगुरी ने कहा- देख नहीं रहे हो....हल-बैल लेकर जा रहे हैं तो खेत में ही जा रहे हैं......कहीं कोई ईनार-कुआँ खोदने थोडे जा रहे हैं....हल लेकर। अरे तो कोई टैम होता है हल जोतने का.........सभी किसान लोग सुबह ठंडे-ठंडे जोत लेते हैं कि बैलों को भी आराम रहे....औऱ खुद भी बीमार होने से बचें.......नहीं तो सीत-घाम .......ठंडी-गर्मी......मार डालेगी कि जीने देगी.......आये हो बडे हल जोतुआ - बूधन महतो ने कुछ नाराजगी भरे स्वर ने कहा। खदेरन ने कहा - टैम देखकर ही तो जोताई करने निकले हैं.....अभी-अभी राहु खतम हुआ है.....सो चल पडे हल बैल लेकर। राहु खतम हो गया है.....कब.....कैसे......अभी कल ही तो साईकिल से अपने मामा के यहाँ जा रहा था- बूधन महतो ने कुछ अचरज भरे स्वर में कहा। झिंगुरी बोले - अरे उ राहुला बनिया नहीं.......आप को तो केवल राहुल नाम के बनिये का पता है सो लगे हो राहु ......राहु जपने.........राहु माने गिरह....नछत्र वाला राहु.....उ राहु जब होता है तो कोई ढंग का काम नहीं करना चाहिये....देख नहीं रहे.....बडे बडे नेता लोग भी अब राहु को बचा कर चलते हैं......पाटी का कारकरम हो तो उसे भी जोतखी और ओझा-सोखा से समय ज्ञान लेकर करते है। बूधन महतो बोले - समय ज्ञान लेकर ......इ कौन नया परपंच है भाई। ........आज तक तो नहीं सुना था। झिंगुरी ने कहा - अरे कैसे सुनोगे.....खुद तो कभी टीबी-फीबी देखते नहीं हो....... कि नहीं.......कांगरेस पारटी के मंच पर नींबू मिरचा बाँधा गया था। और वो भाजपा वाले हैं न वो लोग भी कहीं एक बार बंगलोर नाम का कोई जगह पर भाजपा पाटी का कोई कारकरम में सब लोग बता रहे हैं कि टोटका-ओटका खुब हुआ ......मँच की दिसा बदल दी गई थी.........झँडे मे कमल का रंग पीला कर दिया और समय को ध्यान मे रखकर कहा गया कि कौन कब बोलेगा.......कौन कब बोलेगा। अब खदेरन ने मोर्चा संभालते हुए कहा - अरे जब ऐतना बडमनई लोग समय दिसा का ईतना ख्याल रखते है तो हम लोगों को तो रखना ही चाहिये.......क्या कहते हो । बूधन महतो ने मुस्की मारते कहा - जहाँ तक समय दिसा की बात कर रहे हो तो एक बात जान लो......हम आजतक केवल दिसा उसा का ख्याल किये हैं तो केवल दिसा मैदान के समय........और सच कहूँ तो तुम भी ईस खटकरम मे काहें अपना बखत खराब कर रहे हो........अरे ई कुल टीम-टाम......गिरह.......नछत्र उन लोगन के लिये है जिनके पास कौनो काम नहीं है......जिनके पास बहुत टाईम ओईम है, उनके लिये है...........तुम लोग कहाँ इन लोगों के चक्कर मे पड रहे हो। कल को कहेंगे कि समय ठीक नहीं है.......फलाना नछत्र चल रहा है........बोवाई चार दिन बाद करो तो क्या तुम उनका कहा करोगे कि अपना काम करोगे... बरखा-बूनी तो कौनो टैम-टूम देखकर तो नहीं बरसेंगे, ...........लडिका - बच्चा कल जब रोटी मांगेगे.....तब क्या कहोगे कि नछत्र ठीक नहीं था ईसलिये समय पर बोवाई न हो सकी, अरे जाओ......सुकर मनाओ कि अभी थोडा ही गदहा खेत खाया है.....कल को बाढ राहत का सामान भी गिरह-नछत्र देख कर बंटेगा .....खदेरन और झिंगुरी केवल सिर हिलाने का काम कर रहे थे कि तभी कोई राही अपनी साईकिल पर जाता दिखाई दिया,धूप और लू से बचने के लिय़े अपने सिर और मुँह को कपडों से कसकर बाँधे हुए, बगल में रेडियो लटकाए अपने में ही मगन वह राही चला जा रहा था......रेडियो पर कोई फिल्मी गीत बज रहा था.... तोहे राहु लागे बैरी, मुस्काये है जी जलायके......। खदेरन ने झिंगुरी से कहा....तो क्या कहते हो....चलें वापस....हल लेकर घर से आ रहा था तो दग्गू की माई भी कुछ ऐसा ही गा रही थी..... मोरा गोरा अंग लेई ले :)



- सतीश पंचम



( यह पोस्ट एक बार पहले भी प्रकाशित हो चुकी है तब भाजपा के बैंगलोर के पार्टी कार्यक्रम में हुए टोटकों के कारण यह पोस्ट लिखी गई थी, लेकिन हाल ही में काँग्रेस के मंच पर छाये नीबू मिर्च वाले विवाद के आलोक में यह पोस्ट पुनः प्रकाशित है)

Friday, February 6, 2009

दीवाल पर लिखी एक इबारत का सच - आँखन देखी

    यहाँ देखौआ, छेकौआ के लिये कमरा मिलता है। जी हाँ, ऐसा ही तो लिखा था शारदा मंदिर के पास वाले दुकानों के सामने। साथ चल रहे परिचित ने बताया कि यहाँ पर अब लडका लडकी को एक दूसरे को देखने दिखाने के लिये कमरे मिलते हैं, यानि देखौआ। पसंद आने पर विवाहोपयोगी लडका-लडकी के परिवार के बीच कुछ उपहार( लेन-देन) आदि का आदान-प्रदान होता हैं जिसका अर्थ होता है इस जोडे को हमने छेंक लिया है- यानि कि छेकौआ।  परिवार के लोग भी साथ होते है। मित्र बता रहे थे कि विवाह आदि तय होने के लिये अब ऐसे स्थल ज्यादा उचित माने जाने लगे हैं।

   मैं सुनता जा रहा था और मंदिर के आस पास की दुकानों में नजर भी दौडाये जा रहा था। मैंने अनुमान लगाया कि इस प्रकार के मिलन स्थल का निर्माण बढने के पीछे आये सामाजिक बदलाव ही हैं। पहले केवल घर वालों की रजामंदी से विवाह संपन्न हो जाता था। लडका न लडकी को देख पाता था, और लडकी न लडके को। दोनों एक दूसरे को विवाह होने के बाद ही देख पाते थे। लेकिन धीर-धीरे यह कलुषित प्रथा बंद होती गई और लडका-लडकी को देख कर ही विवाह आदि संपन्न होने लगे। ये देखौआ-छेकौआ वाले नवनिर्मित कमरे, उसी बदलाव के मर्मस्थल हैं।

    आज भी सुदूर देहात में जब कभी तिलकहरू लोग आते हैं तो उनके आने और जाने तक स्वागत सत्कार आदि में पूरे कुनबे को ही बटुर कर एक जगह उपस्थित रहना पडता है। स्वागत आदि में कोई कमी न रह जाये। घर की महिलाओं को भी सहेजना पडता है कि देखो बच्चों को ज्यादा डिस्टर्बेंस न करने दो। तिलकहरू लोग आ रहे हैं। लडका देखने आ रहे हैं, ये न हो.....वो न हो। मेरी नजर दुकानों में रखी चीजों पर पडी। कहीं सिंदूरदान रखा है, कहीं माँग-टीका। एक ओर सस्ती किताबों की दुकान भी है जिसमें ज्यादातर व्रत-जप आदि के लिये उपयोगी किताबें ही ज्यादा नजर आ रही हैं। सँतोषी माता कथा, विवाहोपयोगी गाली गीत, गाली सागर, सत्यनारायण कथा, हरितालिका कथा और ऐसी ही अनेकों किताबें। मैं आगे बढा।

एक सज्जन जो बहुत आतुर होकर हमारी ओर देख रहे थे उनसे मित्र ने पूछा - एक कमरा

मिलेगा ? देखौआ के लिये।

कितने लोग होंगे ?

यही कोई आठ-दस लोग।

   आईये देख लिजिये। छोटा कमरा दो सौ एक रूपये। और बडा चाहिये तो तीन सौ एक रूपये।
मैं राउण्ड फिगर से एक रूपये ज्यादा लेने के पर कुछ सोचने लगा। ये क्या बात हुई दो सौ एक, तीन सौ एक.....यानि एक ज्यादा ही रहे। तभी बात कुर्सी गद्दे की होने लगी। एक कुर्सी पाँच रूपये, एक गद्दा छह रूपये। पाँच घण्टों का चार्ज।

ठीक है। चलो दिखाओ।

  हम आगे बढे। इधर हॉल में कई लडकियाँ अपने परिवार के साथ बैठी थीं। हमारे पहुँचते ही उन सबकी नजर हमारे उपर पडी। शायद उन्हें लगा हम लडके वाले आ गये हैं, जिसका कि वे इंतजार कर रहे हैं। लडकियाँ सहम कर सिर से ढरके पल्ले को ठीक ठाक करने लगीं। अन्य साथी औरतें अपने आप को यथावत रखते हमारी ओर इस तरह देख रही थी मानों कुछ ढूँढ रही हों......उनकी आँखे शायद भावी दुल्हे को खोज रही थीं। लेकिन जैसे ही हमारे साथ उस शख्स को देखा जो कि कमरे किराये पर देता है......वह अपने आप पहले जैसे सहज हो गये। उन्हें पता चल गया कि यह भी हमारी तरह देखौआ-छेकौआ के लिये कमरा बुक करने आये हैं।

    तभी मेरी नजर दीवाल पर लगी एक तखती पर पडी जिसपर लिखा था - विवाह कोई कानूनी बंधन नहीं, जन्म जन्माँतर का अटूट बँधन है जिससे पिढियाँ बनती हैं। इसे बहुत कुछ सह कर निभाना पडता है। - प.पू श्री........

   कमरा देख-ताक कर हम मंदिर के प्रांगण में ही एक ओर खडे हो गये और इंतजार करने लगे अपने सगे-संबंधियों का जो कि लडका-लडकी को लेकर अपने-अपने निवास स्थान से चल चुके थे और थोडी ही देर में पहुँचने वाले थे। तभी बगल में किसी के हो-हल्ला करने की आवाज आई। एक शख्स काफी तल्ख लहजे मे किसी से कह रहा था - अरे यार ऐसे थोडी होता है, इतना दो तो शादी होगी नहीं तो दूसरा तैयार है।

   बात शादी के लिये लेन-देन पर आकर बिगड गई थी। जोर-जोर से बोलने वाला शायद लडकी वालों की ओर से था। उसके आगे कहे गये कुछ शब्द भद्दे जरूर थे लेकिन अपने-आप में हकीकत तो उघाड कर रख रहे थे।

   वह कह रहा था - अरे यार झाँ* जल जाता है जब इतनी तैयारी करके ले फाँद कर, गाडी-घोडा करके लडकी लेकर देखने आओ और यहाँ साले गाँ* खोल देंगे कि इतना दो.....उतना दो।

    दूसरा उसे समझा रहा था - अरे, गजब करते हो यार । मंदिर है.....थोडा ख्याल करों।
क्या-क्या ख्याल करूँ। ये मंदिर है इतना तो मैं भी जानता हूँ.....लेकिन वो लोग को समझ है। मुँह खोल रहे हैं दो लाख नकद, चार चक्का अलग......अरे हद है।

   तो क्या करोगे ?  कुछ न कुछ तो देना ही होगा। आगे जाकर कम - ज्यादे करवाया जा सकता है। ऐसा तो है नहीं कि कह दिया और देना ही पडेगा। लडके वाले शुरूवात में कहते ही इतना है कि आखिर में बात कहीं सम पर आकर टिके। मैं हूँ न, चिंता मत करो।

   इस दुसरे शख्स की बातों से लगता था कि यह अगुआ है और इसकी ही अगुआई से बात-चीत चल रही है शादी की। बात को कहाँ संभालना है और कहाँ उछालना ये शख्स बखुबी जानता लगा। तभी वह अगुआ आदमी कुछ धीमी आवाज में बात करने लगा। लेकिन तल्ख लहजे में बोलने वाले की आवाज पर कोई असर नहीं हो रहा था।

   अरे क्या - एक अस्सी और एक-पचासी कर रहे हो। सोनार के यहाँ बैठे हो क्या। सुनकर कपार से ससुर खून चूने लगता है एतना दो ओतना दो।

    तो क्या करोगे, फोकटे में निबाह ले जाना चाहते हो। देखो, जिस समाज में तुम हो, उसी में मैं भी हूँ। इतना जान लो। आज लडकी के बखत देते समय तो ना-नुकुर कर रहे हो। कल जब तुम्हारे लडके का होगा तो पैर जमीन पर न रखोगे। ये कहो, हम लोग हैं जो कह कर दबाये हुए हैं नहीं तो पाँच नगद गिनवाता और चार चक्का पहूँचाने को कहता।

    पहले वाले के चेहरे पर अब भी शिकन ढिली न हुई थी। धीरे-धीरे वह दोनों अंदर कमरे की ओर बढे जहाँ लडका-लडकी के परिजन बात-चीत में लगे थे। इधर मैं भी बाहर की ओर थोडी चहल-कदमी के लिये चला। मित्र ने आँख के इशारे से कुछ कहा - मानों कह रहे हों - देखा यही होता है यहाँ।
  
    मैं चला जा रहा था और नजर आ रही थी वह तखती जिस पर लिखा था - विवाह कानूनी बँधन नहीं है। यह जन्म-जन्माँतर का अटूट बंधन है जिससे पीढियाँ बनती हैं। इसे बहुत कुछ सहकर निभाया जाता है - प. पू. श्री........।


- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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