सफेद घर में आपका स्वागत है।

Monday, January 26, 2009

तेरहवीं की पूडी और तख्ते पर बैठे बूढऊ दादा की जबान ( झलकी)

छू छा मत करो । चलो लाइन से पांत मे बैठो । ढेर चिल्ल पों मत करो । सब कोई को मिलेगा । परोसने वाला लवंडा लोग एक हाथ मे परात बाल्टी उठा लो । दाल वाली बाल्टी उधर है । कल्छूल देखना परोसते टाईम पत्तल से छू न जाए । जाने कौन जात का भोजनिहार हो ।
ऐ उधर कहाँ। उधर मत जाओ जनाना असथान है । जहाँ साड़ी फाडी , लूगा बेलाऊज़ देखे की उधर ही ई लवंडा लोग को सब्जी कचौडी दीखेगा।
ये राम्छारवाका लड़का एकदम लम्बरी है । बार - बार पूडी बेलने वालियनके पास जायेगा । कहेगा कढाई ठंडी हो रही है । जल्दी -जल्दी बेलीये । उसको पुडी पर से हटाओ। बोलो सब्जी बांटे। हटाओ उसको ।
, वो रामदवरका लड़का है न । क्या परोस रहा है ? खीर? ध्यान देना होगा उसपे। कहीं खीर बांटते -बांटते बाल्टी समेत अपने घर की ओरन चल दे।
ऐ , ये गाना कौन बजाया देख रहे हैं , मारनी करनी है, तेरही है, फ़िर भी गाना बजा रहे हैं, लाज सरम नहीं है, बजा रहे हैं गोलमाल- गोलमाल।
एं, क्या कहा ? रिंगटोन है । बोलो चुप्पा लेवल पर रहे। अच्छा नही लगता इस तरह टाईम कुटाईम बे बात का बजने लगे। बता देते हैं हाँ, चाहे आदमी हो की मशीन।
और वो कौन खड़ा है कुँए के जगत के पास। हरदास है क्या ?
अभी खाने मे मीन मेख निकालेगा इसमे नमक कम है अ उसमें तीखा तेज । जनम का भिखमंगा है, लेकिन बात बोलेगा जैसे रोज पकवान छोड़ कुछ चिचोरता ही नहीं । अरे उस हरदसवा को जगह देखकर खिला दो कहीं बैठाकर, नही तो इस बीस करेगा और हजार भेद बतायेगा ।
अरे वो क्या बोलता है जतना का लड़का - कि मुंह देखकर खाना परोस रहे हैं ? कहता है अपने परिवार के आदमी को ज्यादे परोसते हैं और दूसरे परिवार के बच्चे तक को कहते हैं - खा लो, जरुरत होगी तो फिर मांगना । ऐसा क्यो, ये मांगने वाली बात क्यो कही ? क्या वह लोग मांगने वाले लगते है। क्यो बेबात की बात बोलते हो। बच्चा लोगन को कम ही परोसा जाता है, भोजन भेस्ट नहीँ जाना चाहिये, इसलिये. तुम लोग भी कौआ कान ले उड़ा वाली बात बोलते हो । जाओ नई पांत बैठ रही है, दौड़ो।

अँय क्या कहा टनमन यादव मर गये चलो एक और तेरहवें का इंतजाम हुआ । लंबरदार से कहो बांस-ओस कटवाये। अभी खा ओ कर आ रहा हूं :)

- सतीश पंचम
( यह पोस्ट जौनपुर के एक कैफे से कर रहा हूँ, पता नहीं सही पहुँचता भी है की नहीं, कहीं रास्ते मे ही पूडी कचौडी न खाने लग जाए : )

Friday, January 16, 2009

बसावन, कल्लू और मेरी गठरी ( भेंट-अकवार पोस्ट)


एक नॉस्टॉल्जिक गठरी बाँधे हुए मैं जौनपुर जा रहा हूँ। मेरी इस गठरी में ढेरों पँखुडीयाँ हैं, कुछ काँटे हैं, और बहुत से डंठल। एक काँटेवाला घर है गाँव का, सुबह होते ही उस घर से झगडे की आवाजें आती है। घर की औरते मुँह बाद में धोती हैं, पहले झगडा करके आपस में एक दूसरे की आवाज नाप लेती हैं। शायद ये कोई गंवई नुस्खा हो।

एक सांवले देह की पँखुडी है, जिसे अपने पैतृक गाँव में घर से कुछ दूर, कभी रहते देखा था। अपने शुरूवाती दिनों में उसे ससुराल वाले अपना नहीं रहे थे। एक दिन जबर्दस्ती जा बैठी घर में, जड जमा ली। आज लाखों की कोठी खडी है दिल्ली में। जो कभी दुत्कारते थे, आज आछो-आछो किये हैं, सास भी, ससुर भी। शायद पैरों का खम ठोककर घर में जमना शुभ माना गया है।

एक डंठल घर भी है, न खाने वाले, न बनाने वाले बस एक खंडहर, गाय-भैंसे शायद उसे अपना बथान मानती हैं।

एक रजा मिंयाँ भी हैं। नाम तो उनका असीर है पर उनके बार-बार बंबई भागने को लेकर गाँववालों ने उनका नाम रजाबेसन ( रिजर्वेशन ) रख दिया। हर वक्त पगहा तुडाये रहते है बंबई जाने के लिये।

एक विधायक जी हैं। दूध बेचते हैं। लोग विधायक इसलिये कहते हैं क्योंकि एक बार सपा वाला बैनर कहीं से खींच-खांचकर ले आये थे। अगले दिन बेचन दर्जी से अपने लिये मोहडे वाली चड्ढी सिलवा लिये। अमर सिंह मय साईकिल विधायक जी के नितंम्बों पर विराजमान थे। कम्बख्त साईकिल मोहडे पर थी।

एक और ओकील (वकील) हैं। कहीं जो झगडा हुआ तो वहाँ ये वकालत करने हाजिर। बडे बडे वकीलों को तो ये कुछ समझते ही नहीं। घरों में महिलाओं के झगडे होते हैं तो किसी मजबूत पार्टी का पक्ष लेगे, धीरे-धीरे कमजोर की ओर ढुलक जाएंगे और फिर अरे भई........पहले एक चाह पिलाओ....ये सब तो होता ही रहेगा। इनकी पत्नी भी शायद मनाती है, कहीं झगडा क्यों नहीं होता आजकल।

डंठलों के साथ कुछ गुलर के फल-फूल हैं। खोलो तो ज्यादातर में कीडे नुमा परत ही नजर आती है। तने पर खुरपा जमा दो तो दूध देते देर नहीं लगती। एक दिन बाजार में बात ही बात किसी से झगडा मोल ले बैठे, सामने वाला मजबूत था। दब गये, दबते-दबते उसे चाय-पान कराने के अलावा रिक्शे में बिठाकर विदा भी कर आये। पूछने पर इतना ही बोले- जाकी रही भावना जैसी।..........गूलर के फूल।

नॉस्टॉल्जिक गठरी में एक रूपये वाली बसावन की चाय है, तीन रूपये वाली कल्लू के गोल-गप्पे । चार रूपये वाली जित्तू के चाट-पकौडे। बगल में ही लौंगलता वाली मिठाई, एक खाने पर दूसरी के लिये ललचता मन।

सोचता हूँ थोडी धूप भी इस गठरी में बाँधता चलूँ .......... नरम...गुनगुनी धूप।



- सतीश पंचम

( फिलहाल पंद्रह दिन के लिये अपने पैतृक निवास जौनपुर में जा रहा हूँ........याद कर रहे हैं - बसावन, कल्लू...... और मेरी गठरी)


Tuesday, January 6, 2009

हरे दोने में बटुरी पलँगतोड मिठाई ( चापुड-चुपुड पोस्ट)



गुलरी की माई आज गला फाड कर बोल रही है - रे गुलरी, वहाँ कहाँ जा रही है फलाने का चिहन देखने। कब से कह रही हूँ दूर रह घरघूमनी से, लेकिन मजाल है जो माने। कल ही समझाया था कि सहरीया बोली बोल रही है, थोडा होसियार रहना........ई बटलोईया जात, बात माने तब न।

गूलरी को क्या, सहरीया बोली हो या गंवई बोली, उसे का ? कौनो चुमौनी लेना है ? बाकि एक बात है, चार दिन में एक बार दतुअन करती है सरीफेवाली, तिसपर नहायेगी भी हफता में एक बार। चम्पई रंग पाने का गुमान है सरीफेवाली को। कह रही थी पानी भरते समय..... मैं क्यों नहाउँ रोज-रोज.......मैं तो गोरी हूँ न। खपसूरत तो एतनी हूँ कि कोई सहर वाली क्या पैंट पहन कर खपसूरती करेगी मेरे सामने। लाली-पौडर इसनो तो मुझे लगाने का जरूरतै नहीं है। खुदै लालम लाल हूँ।

आह रे लालम लाल वाली.....कमाता है न उसका लाल वाला, तभी........नहीं तो देखती केतना लाल बात बोल कर निकल लेती। - भुनभुनाते हुए गुलरी की माई ने अपने आँगन से ही भुनुर-भुनूर बोली बोलते कहा।

बगल से जा रही खोचरन की माई ने कहा - कह लो खूब जी भर कर, कहने से कोई लजाये तब न, तूम कहते थक जाओगी पर मजाल है जो सरीफेवाली को बात लगे।

अरे लगेगा कैसे, रोज देखती हूँ बाजार से पलँगतोड मिठाई ले आता है इसका लाल वाला। कल ही तो बता रहे थे गुलरी के बाबू........इसका लाल वाला बाजार के मीठावाले को कह रहा था तनिक हरे-हरे दोने में मिठाई बाँधना, सूखे दोने से चुरूर-मुरूर आवाज होती है। आहि रे पलँगतोड मिठाई। अबकी बार गुलरी की माई ने पलँगतोड जरा गला तोडकर कहा।

बहुत देर से सुन रही थी सरीफेवाली। रहा नहीं जा रहा था। लेकिन क्या करे, उसके घरवाले ने कसम जो जोड दी थी - किसी से झगरा-रगरा मत करना। अगल-बगल सब जलते हैं तो जलें, लेकिन बात पर बात मत बोलना। सरीफेवाली को अपने लालवाला पर बडा गुमान था बाकि, एक ही कमी थी - हमेसा गाँव के लोगों से दब कर रहता है, कभी कोई बोले तो मुडी नीचे कर निकल जाता है, कहता है क्या करें झगरा-रगरा करके। यही सब करते रहें तो डूटी पर पहुँच न पायेंगे, आफिसर अलग गपोडेगा एक घंटा खडा करके। झगरा-रगरा .........हुँह।

एही तरह गुलरी की माई का भिनभिनाना रोज का है, सरीफेवाली का झाडू-बरतन भी रोज का ही होता है.....ठीक वैसे ही जैसे सूरूज चन्दा अपने टैम पर आते है, रूकते है, चले जाते हैं। आज भी सूरूज चन्दा आयेंगे। साँझ हो गई है, लेकिन सूरूज चंदा अभी नहीं आये हैं, क्या बात है। रोज तो आ जाते हैं, आज क्या हो गया......न गुलरी के बाबू आये न सरीफे का लालवाला । गुलरी की माई टाँड के पास खडी होकर रास्ता देख रही थी। उधर से सरीफेवाली भी आँगन में बैठकर रहर साफ कर रही थी, रहर में न जाने क्यों सिटके आज नहीं दिख रहे थे, रोज तो बहुत मिलते थे सिटके-कंकड।

तभी सूरूज चंदा आते दिख गये। अरे, ये क्या......गुलरी के बाबू के हाथ में कोई झोला है का। और वो लालवाला डूटीधारी......उसके हाथ में तो रोजै रहता है। पलँगतोड मिठा......गुलरी की माई को याद आ गया अचानक।

घर के पास आते ही सूरूज-चंदा अपने-अपने बथान की ओर चले आये।.........आये तो आये, ये गुलरी के बाबू क्या ले आये हैं - लौंगलता मिठाई। का बात है। और उधर क्या लाया होगा लालवाली का खसम - गुलरी की माई सोचे जा रही थी।

दोना तो हरा है, सूखे दोने में ले आते लाज लगती होगी गुलरी के बाबू को - चुरूर-मुरूर।

क्या लाया वो सरीफेवाली का लालवाला।

क्या लाया होगा सोचो ? गुलरी के बाबू ने पास झुकते हुए पूछा ।

मैं का जानूँ......तुम ही थे बाजार में कि मैं , बडे आये मुझे पूछने वाले ।

अरे तो पूछ काहे रही हो, ले आया होगा कुछ....... तुम्हें क्या ? डाह तो भगवान ने औरतों के नछत्रे में लिख भेजा है।

गुलरी अपने हाथ में लौगलता लेकर दिखा रही थी, देख माई मिठाई के बीच में खोंसा लवंग..... बिलकुल सरीफेवाली के नाक में लगी फोंफी की तरह।

चुपचाप खा ले न तेरी सरीफेवाली और तूँ.....दोनों को भरसांय मे झोंक दूंगी, बडी आयी नाक का लवंग निहारने - गुलरी की माई को जैसे कुछ बाकी याद हो आया था, नाक का लवंग ।

कपडे उतारते हुए गुलरी के बाबू बोले - दवाई ले आया है सरीफेवाली का रजुला........ कहता था जबसे बच्चा नहीं हो जाता घर काटने को दौडता है......तुम्हारी गुलरी को देख कर मन ललचाता है कि मईया बिन्नेसरी कब दया करेंगी हम पर । कह रहा था, उसी सरीफेवाली के लिये रोज कुछ न कुछ अंगुर, मेवा, मिठाई जो बन पडे ले आता हूँ। पर असर पडे तब न। कह रहा था, तुम्हारा भाग जोरदार है जो बिना लवँगलता-पलंगतोड खाये चानी सी बिटिया पा गये हो।

गुलरी की माई को लौंगलता अचानक कुछ ज्यादे मीठा लगने लगा। कोख पर दोख नही, यही क्या कम है ।

अगले दिन सुबह अरहर के बने झाडू से बुहार लगाती सरीफेवाली सूखे दोनों को एक ओर टटेर रही थी, कोई देख न ले। सुरूज चंदा चले गये थे। आँचल में छुपा कर माई कुछ लिये जा रही है सरीफेवाली के यहाँ - गुलरी ने सामने आ गये बालों की ओट से कनखहीये देख कर जान लिया।

वापसी में गुलरी की माई कुछ टनमन चल रही थी। हाँ गुलरी सच ही कह रही थी........ सरीफेवाली के नाक का लौंग तो सचमुच लौंगलता में खोंसे गये लौंग की तरह दिखता है। वैसे है सरीफेवाली सीधी, लौंगलता ले नहीं रही थी, कह रही थी दीदी मेरे यहाँ कौन है जो खायेगा, ले जाओ। अरे मैं कहूँ तू जो है, खा लेना चभककर, गुलरीया आये तो थोडा सीखा पढा दिया करना, लडकी जात......जाने मेरे जैसी भगवन्ती माँ पाये या न पाये।

उधर सरीफेवाली हाथ झाडकर हरे दोनों में पडे लौंगलता को निहार रही थी, कुछ सोच भी रही है शायद......... आज जरूर नहाउंगी, गोरी हूँ तो क्या हुआ, हूँ तो घर-जवार की ही, फिर काहे गुमान। नीम के पेड से दतुअन टूटने की आवाज आई - चट्-चटाक ।

- सतीश पंचम


(* पलँगतोड मिठाई - एक प्रकार की मिल्क केक जैसी मिठाई, जो मुझे जौनपुर के एक दो दुकानों पर देखने को मिली है। इसके बारे में सुना है कि नवविवाहित दुल्हा अपनी दुल्हन को सबकी नजरों से चुराकर खिलाता है, उसे खुश करता है या ऐसा ही कुछ :) हरे दोने का इस्तेमाल इसलिये की हरे होने से आवाज कम होती है नहीं तो चुरूर-मुरूर बोलता है( लोग जान नहीं जाएंगे - आज दुलहिन ने पलँगतोड मिठाई खाई है :)


*बटलोईया जात - बटलोई / बटुली यानि की खाना पकाने के बर्तन के आसपास केंद्रित जीवन धोना, पकाना, माँजना.... जिसे साधारणतः स्त्री जाति से संबंधित शब्द कहा सुना जाता है। देहात में यह बटलोईया जाति कहकर एक प्रकार से नारीसूचक शब्द मैंने कई साल पहले राह चलते एक महिला के मुँह से सुना था जो अपनी बेटी को ताना मार रही थी, आज उसे यहाँ प्रयोग कर रहा हूँ।


*चापुड-चुपुड पोस्ट - यह नामकरण मैं पहली बार किसी पोस्ट के लिये दे रहा हूँ। अक्सर लोगों का मानना है कि कोई चीज खाते वक्त आवाज नहीं करनी चाहिये, असभ्यता होती है। लेकिन मेरा मानना है कि जो बात चापुड-चुपुड की आवाज करते हुए खाने में है वह जबान बंद कर मुँह डोलाने में नहीं। इस तरह खाने से खाने वाला, खाने का असली स्वाद पाता है :) यह पोस्ट भी कुछ उसी तरह की बजर देहात की तरह धूसर कहानी है जो एक तरह का चापुड-चुपुड अंश लिये हुए है :)



- Satish Pancham

केले को लपेट कर रोटी संग खाना, या फिर कभी गुड़ से रोटी चबाना, अच्छा लगता है।


अच्छा लगता है मुझे,
कच्चे आम के टिकोरों से नमक लगाकर खाना,
ककडी-खीरे की नरम बतीया कचर-कचर चबाना।
इलाहाबादी खरबूजे की भीनी-भीनी खुशबू ,
उन पर पडे हरे फांक की ललचाती लकीरें।
अच्छा लगता है मुझे।

आम का पना,
बौराये आम के पेडो से आती अमराई खूशबू के झोंके,
मटर के खेतों से आती छीमीयाही महक ,
अभी-अभी उपलों की आग में से निकले,
चुचके भूने आलूओं को छीलकर
हरी मिर्च और नमक की बुकनी लगाकर खाना,
अच्छा लगता है मुझे

केले को लपेट कर रोटी संग खाना,
या फिर गुड से रोटी चबाना।
भुट्टे पर नमक- नींबू रगड कर,
राह चलते यूँ ही कूचते-चबाना।
अच्छा लगता है मुझे।

लोग तो कहते हैं कि किसी को जानना हो अगर
उसके खाने की आदतों को देखो,
पर अफसोस........
मायानगरी ने मेरी सारी आदतें,
Luxurious शौक में बदल डाली हैं।

- सतीश पंचम

Sunday, January 4, 2009

न्यूटन के जन्मदिन पर एक रीठेल पोस्ट ( फुलकारी)

(मेरी इस सदरू भगत सीरिज की पोस्ट में न्यूटन का एक बार जिक्र आया था। आज उन्हीं न्यूटन का 4 जनवरी को जन्मदिन है, यह बात मुझे साईब्लॉग से पता चली है,डा. सुबोध महंती , श्री अरविंद मिश्र और उनकी टीम को धन्यवाद देते हुए यह रीठेल पोस्ट प्रकाशित की गई है)

जब से सदरू भगत ने खबर सुनी है कि दिन में चार बार पत्नी को गले लगाने से जीवन खुशहाल रहता है, तब से तो जैसे उनके पैर जमीन पर नहीं पड रहे, चल तो रहे थे लेकिन सोचते थे कितनी जल्दी पहुँच जाउं कि गले मिलने को हो। मन ही मन सोचे जा रहे थे कि जब रमदेई मुझे हुक्का पकडायेगी तब गले मिल लूँगा, जब खाना परोसेगी तो फिर गले मिल लूँगा, थोडी देर मे जब बर्तन ओर्तन मांज लेगी तो फिर लिपट लूँगा और फिर होते-होते जब सांझ को मेरे पैर दबायेगी तो फिर क्या कहना, तब तो वो विज्ञानी लोग भी क्या लिपटें होंगे जो ये बताये हैं कि दिन मे चार बार पतनी से गले मिलने से जीवन सुखी होता है ......कुल मिलाकर चार बार ही तो गले मिलना है.......अगर ईतना करने से जीवन खुशहाल हो जाय तो क्या कहना। अभी यह सोचे चले जा रहे थे कि रास्ते में झिंगुरी यादव मिल गये।

कहाँ जा रहे हो उडन दस्ता बने हुए।

अरे कुछ नही बस ये जानो कि आज मुझे पंख लग गये है। आज नहीं बोलूँगा........कल मिलना तो बताउंगा।

ईधर झिंगुरी को लगा आज सदरू जरूर सहदेव कोईरी के यहां गये होंगे.......गांजा का असर दिख रहा है......लगता है खूब बैठकी हुई है आज।

हाँफते-डाफते सदरू किसी तरह घर पहुंचे, देखा पतोहू बाहर बैठी अपने पैरों में लाल रंग लगा रही है.....मौका ताडकर भीतर घर में घुस गये। रमदेई कोठार में से गुड निकाल कर ला रही थी कि कुछ मीठा बनाया जाय। तब तक सदरू को सामने देख पूछ बैठी - क्यों क्या बात है.....ईतना हाँफ क्यों रहे हो।

सदरू ने किसी तरह अपनी साँसों को नियंत्रित करते कहा - आज तुझे खुस्स कर दूंगा।

खुस्स करोगे........क्या आज फिर गांजा पीकर आये हो जो टनमना रहे हो।

अरे नहीं रमदेई....पहिले गले मिल तब बताउं.......कहते हुए सदरू आगे बढे।

हां.......हां .......हां ......अरे क्या आज गांजे के साथ चिलम भी गटक लिया क्या जो जवान की तरह घुटूर - घुटूर गोडे जा रहे हो।

अरे आज कुछ न बोल रमदेई, बस आ जा गले लग जा.........जीवन खुस्सहाल हो जाई।

अब रमदेई को पक्का यकीन हो गया कि ये सदरू भगत के मुंह से गाँजा बोल रहा है।

अच्छा तो गले मिलने का नया सौक पाला है.......रहो, अभी तुम्हारा गले मिलौवल ठीक करती हूँ........कहते हुए रमदेई ने बगल में रखे धान कूटने वाले मूसल को उठा लिया और ईस तरह खडी हो गई मानो कह रही हो - बढो आगे.......देखूँ कितनी जवानी छाई है तुममें।




अब सदरू सोच में पड गये कि ये तो कुछ और ही हो रहा है। संभलकर बोले - अरे विज्ञानी लोग बोले हैं कि दिन में चार बार पतनी को गले लगाने से खुस्सहाली मिलती है, तभी मैं आया हूँ तुझे खुस्स करने और तू है कि ले धनकूटनी मूसल मुझी पर टूट पडना चाहती है।

अरे कौन विज्ञानी है जरा मैं भी देखूं उस मुंहझौंसे को........घोडा के फोडा नहीं तो.......वो कह दिया ये सुन लिये......जरा दिखा दो तो कौन गांव का है वो विज्ञानी-ध्यानी.......आये जरा......न गोबर में चुपड कर झाडू से निहाल कर दिया तो कहना........आये हैं गियानी-विगिआनी की बात लेकर। अरे ईतनी ही खुस्सहाली मिलती गले मिलने से तो वो किरपासंकर सबसे जियादे खुस्स होता.....जो रात दिन अपनी मेहरीया को ले घर में घुसा रहता है, ये भी नहीं देखता कि सब लोग यहाँ महजूद हैं......बस्स ........लप्प से घर में घुस गया.......मेहरीया भी वैसी ही है......न उसको सरम न उसको लाज।

सदरू को लगा रमदेई तो ठीक कहती है......अगर गले मिलने से ही सबको खुसहाली मिले तो कोई काम क्यों करे......सब अपनी अपनी मेहरारू को ले गले मिलते रहें और खुश होते रहें।

तभी बाहर लल्ली चौधरी की शरारत भरी आवाज आई - अरे भगत कहाँ हो.....अंदर घर में क्या कर रहे हो भाई........एतना कौन अरजेंटी आ गया।

रमदेई ने कहा - हाय राम ये कहाँ से आ गये साफा बाँधकर, फट् से बाहर निकलते कहा - अरजेंटी का तो ऐसा है चौधरीजी कि आज ये खुस्सहाली बाँट रहे हैं।

खुस्सहाली बाँट रहे हैं......तनिक हमको भी बाँटो भगत......अरे ऐसी कौन सी खुशहाली बाँट रहे हो कि रमदेई को ही बाँटोगे।

तभी सदरू भी बाहर निकल आये और लगभग चहकते हुए कहा - तुम्हे खुसी बाँटने का अभी बखत नहीं आया लल्ली........जिस दिन बखत आयेगा बता दूँगा....लेकिन एक बात है लल्ली भाई।

क्या ?

वो ये कि आज भी हमारी पतनी को समझ नहीं है कि विज्ञान क्या होता है.....खोज क्या होती है.......और उसके दम खुसहाली कैसे मिलती है।

लल्ली की कुछ समझ में न आ रहा था कि ये सदरू क्या आंय-बांय बके जा रहे हैं.....फिर भी सिर हिलाकर हुँकारी भरी जैसे सब समझ रहे हों।

तभी सदरू ने देखा पतोहू नहीं दिख रही है......अभी आया तब तो पैरों मे आलता वगैरह लगा रही थी।

पूछा - फाफामउ वाली नहीं दिख रही है, अभी जब आया तो यहीं थी।

लल्ली ने कहा- अरे अभी मैं आया तो देखा तुम्हारा बडा लडका रामलाल अपने दक्खिन वाले घर मे जा रहा था.......बहू भी पीछे-पीछे पानी लेकर गई थी......क्या हुआ जो ईतना पूछ ओछ रहे हो।

नहीं कुछ नहीं ऐसे ही पूछ रहा था.......वैसे लगता है आजकल की नई पीढी विज्ञानी लोगों की बात जरा जल्दी मान जाती है......है कि नहीं रामदेई.....।

इधर रामदेई को लगा जैसे उसे ही लगाकर यह बात कही गई है, बोली - हाँ हाँ.....बडे आये नई पीढी की वकालत करने.......अरे वो तो कम से कम खुस्सहाली बाँट रहे हैं मिलजुलकर......लेकिन तुमसे तो वो भी नहीं हुआ......जरा सा मूसल क्या देखा.....लगे बगलें झांकने........ईतना भी नहीं जानते कि सब लोगों का खुसहाली बांटने का तरीका होता है......कोई गले मिलकर खुसहाली बांटता है तो कोई मूसल लेकर........और जो मूसल लेकर खुसहाली बांटता है.....उसकी खुसहाली उ गियानी विगियानी लोगों की खुसी से कहीं ज्यादा होती है।

वो कैसे ?

वो ऐसे कि गले तो सब मिल लेते हैं......मूसल कोई-कोई को खाने मिलता है.......समझे कि बुलाउं कोई गियानी-विगियानी को।

लल्ली चौधरी को अब भी पल्ले नहीं पड रह था कि आखिर य़े किस मुद्दे पर बातचीत चल रही है, सो समझ लिया यहां से हट जाउं वही ठीक रहेगा, सो खंखारते हुए बोले- ठीक है भाई आप लोग खुसहाली बांटो, मैं तो चला अपनी भैंस ढूढने....न जाने कहाँ खुसहाली बाँटते फिर रही है।

लल्ली के जाते ही सदरू लपक कर रमदेई के पास पहुँचे - हाँ तो क्या कह रही थी तू कि मूसल खाने में खुसहाली मिलती है......सच।

अरे अब भी नहीं समझे का.......हम तो राजी थीं खुसहाली बाँटने.......तुम ही भाग आये मूसल की मार के डर से।

तो क्या वो तेरा मूसल उठा कर मेरी ओर झपटना सब नाटक था ?

हाय दईया.......अब तो लगता है सचमुच कोई गियानी-विगियानी बुलाना पडेगा जो ईनको मूसल वाली खुसी समझाये।

बगैर मुसल का डर दिखाये राजी हो जाती तो तुम ही कहते बडी उस तरह की हो.....।

ईधर सदरू लपक लिये रमदेई की ओर यह कहते.........जियो रे मेरी करेजाकाटू .

उधर धान कूटने वाला मूसल जमीन पर फेके जाने के बाद थोडी देर ढुलकता रहा और फिर न्यूटन के गुरूत्वाकर्षण बल से खुद एक ओर स्थिर हो पडा रहा मानो कह रहा हो - ये है न्यूटन का भाई ओल्डटन :)


- सतीश पंचम

Saturday, January 3, 2009

मेरा अनुमान है , बीवी उसे पीटती होगी। (वाकया)


लोग अक्सर पुरूषों को रफ एण्ड टफ यानि हार्ड कोडेड देखना चाहते हैं, और स्त्रियों को नाजुक, नरम उछाह वाले अंदाज में । यह बात एक नये अंदाज में मुझे अपने डॉक्टर के यहाँ एक वाकये से दो-चार होने पर पता चली। हुआ यूँ कि क्लीनिक में मैं अपने लिये दवा लेने गया था। यह क्लिनिक मुंबई के पंजाबी कैंप में है और आसपास ज्यादातर विभाजन के बाद भारत आये लोगों के साथ-साथ पंजाब के लोग ज्यादा रहते हैं। यहाँ के लोगों में एक प्रकार का भाईचारा मैंने अक्सर देखा है। लोग अक्सर एक दूसरे के बारे में जानकारी रखते हैं।

क्लिनिक में दस-बारह मरीज और थे। तभी एक व्यक्ति नें डॉक्टर से फीस पूछी। डॉक्टर साहब ने अपने ही अंदाज मे ही कहा - पचास कड्डो।

लेकिन पैसे देने के बजाय वह आदमी खडा रहा और उस शख्स के साथ आई उसकी पत्नी ने अपने पर्स से सौ का नोट निकाल कर डॉक्टर को पकडाये। डॉक्टर साहब ने अपनी दराज में उस सौ के नोट को वापस रखते हुए पचास रूपये वापस उस महिला को पकडाये। महिला ने पचास का नोट लिया , अपने पर्स में रखा, दोनों चले गये। दोनों के जाने के बाद डॉक्टर मंद-मंद मुस्करा रहे थे। एक व्यक्ति ने पूछ ही लिया - की गल्ल होई....... थोडा सानुं वी दस्सो।

डॉक्टर साहब अब खुल कर हँसने लगे और बोले - ऐनु वेखदा ए जो हुण गिया.......राजेंनदर लाले दा पुत्तर ए। मैं ताँ इसदी जनानी दा रौब वेख के हस रिया सी।

बात मेरी समझ में कुछ-कुछ आ रही थी। दरअसल पैसे पत्नी ने अपने पर्स से दिये थे यह देखकर कुछ खटका हुआ था, मुझे भी और आसपास बैठे लोगों को भी। तभी पास बैठे एक सरदार जी बोल पडे- ओ शराबी-वराबी होउगा, तां ही उसदी जणाणी ने पैसे अपणे कोलों कड्डे, नई ताँ की लौड सी।

मुझे भी यह बात जँच रही थी कि, हो सकता है पति के हाथ में पैसे न टिकते हों या पति उडा देता हो, इसलिये घर का कारभार पत्नी ही देखती हो।

लेकिन तभी डॉक्टर बोले - ओ नईं जी नई,बंदा शरीफ है, बहुत शरीफ है। एन्ना शरीफ है कि चलदा वी जणाणीयां दी तराँ है। अज्जे ओहदी सूपरनखा ओन्नु बोले कि तूँ सारा दिन धूप्प विच्च खडे रै ते मजाल है जो लाले दा पुत्तर हिले उधरों। सारा दिन धूप्प विच खडा रहेगा पर कद्दे इक ग्लास पाणी वी नईं मंगेगा।

हम सभी चकरा गये। क्या बात है, पत्नी इतनी हावी है क्या इसकी। खैर आगे डॉक्टर खुद ही बोले - चंगा कमांदा है, कपडे दी दुकान है, दो बच्चे नें, पर खुद ते चिंदी वांग कपडे पैणेगा ते माता जी नुँ वेखो ते फिलम वालियाँ दूरों पज्ज जाण। ऐनुं दबदा वेख के एसनुं होर दबांदी ए।

अब आस-पास बैठे लोग सोच में पड गये, कि कहीं कोई शारिरिक खराबी तो नहीं, जिसके एवज में इस शख्स की पत्नी अपने पति पर अपना गुस्सा निकालती है। अगल-बगल तीन-चार महिलायें भी बैठी थी। उनकी उपस्थिति में अक्सर मर्दों के बीच होने वाले कुछ उडंतु किस्म के मजाकिया सवाल भी नहीं किये जा सकते थे जैसा कि अक्सर इस प्रकार की चर्चायें छिडने पर एकाध मजाक हो ही जाते हैं। सभी के मन में एक ही शंका थी कि हो न हो वही बात हो सकती है, बाकि और तो कोई नहीं, लेकिन अभी तो डॉक्टर ने खुद ही बताया कि दो बच्चे हैं इसके, कहीं कोई कमी नहीं है । डॉक्टर साहब का बताना जारी था जिसके अनुसार यह शख्स का मिजाज कुछ नरम टाईप का है या कहें कि कुछ नारी टाईप मर्द जिसे अक्सर बाईल्या या मेहरारू टाईप कहा जाता है, उस तरह का, बाकी शारिरिक रूप से कोई कमी नहीं है । सभी मुस्करा रहे थे। तभी डॉक्टर साहब ने एक सवाल आसपास बैठी महिलाओं से किया - क्यों जी, तुहाडे नुसार पति किवें होंणा चाईदा ए कडक बंदा होणा चाईदा ए कि नरम।

हँसती हुई एक महिला ने ही जवाब दिया कडक बंदा जी।

लो सुणो। कडक बंदा चाहीदा ए। क्यों नरम क्यों नईं।

सभी आस पास बैठे लोग ठठाकर हँस पडे। जैसा कि मैने बताया ज्यादातर लोग आस पास के है और एक दूसरे को जानते पहचानते हैं। इसलिये इस तरह का हँसी-मजाक अक्सर डॉक्टर साहब के यहाँ चलते ही रहता है। डॉक्टर खुद भी हँसमुख हैं। तभी एक और व्यक्ति ने कहा -

गल्ल ऐ है कि सारीयाँ औरताँ नाल पुछ्छो.......सब ने एई कैणा है। सानुं कडक बंदा चईदा ए। अज्जे पिंड दी छड्डो हुण शैर विच वी किसे नाल पुछ्छो - ओ वी कहेगा......ना जी मर्द ते ओ ही हुंदा ए जे जणाणी नुं काबू विच रखे ।

अब मुद्दा थोडा भटक रहा था। पुरूष प्रधान समाज की तस्वीर उभरती जा रही थी। तभी पास बैठे एक व्यक्ति ने ही कहा - दरअसल अभी जो ये जणाणी गई है, उसको चाहिये था कि अपने पति के हाथ में पर्स पकडाती और पति उसमें से पैसे निकाल कर देता। लेकिन हुआ उल्टा। कई बार होता है कि पति पर्स भूल गया या रह गया तो ऐसे में पत्नी को पति के हाथ में पर्स दे देना चाहिये। सभी लोग आहो जी कह कर समर्थन कर रहे थे। पास बैठी महिलायें भी सई गल्ल है कह कर हामी भर चुकीं थी। मैं कुछ तय नहीं कर पाया कि कितना सही है या कितना गलत।

खैर, बात आई गई हो गई। मै दवा लेकर लौटा और इस बात को भूल सा गया। इस वाकये को हुए लगभग दो-तीन महीने हो गये । अभी कल ही फणीश्वरनाथ रेणु जी की एक रचना मिथुन राशि पढ रहा था तो लगा कुछ पुरानी धुंधली सी तस्वीर दिख रही है। मिथुन राशि नाम की कहानी में एक पात्र कहता है - "बात यह है कि गाँव की औरतों को सप्ताह में दो-तीन बार नहीं पीटो तो समझती हैं कि उनका पति उन्हें प्यार नहीं करता। और, औरतों को पीटना असभ्यता है न ।" आगे यही पात्र एक प्रसंग में एक व्यक्ति के बारे में कहता है - " रसिक व्यक्ति है ..................पर बीवी के सामने चूँ भी नहीं कर सकता कभी । मेरा अनुमान है , बीवी उसे पीटती होगी। "

धुंधली तस्वीर अब साफ हो गई है। तस्वीर में क्लिनिक वाली वह महिला कह रही थी -सानुं कडक बंदा चाहिदा ए।


- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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