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Tuesday, December 8, 2009

मुंबई ब्लॉगर-बैठकी, बोले तो .......होठों को करके गोल...... सीटी बजा के बोल..... ऑल इज वेल चाचू .....ऑल इज वेल :)

         ब्लॉगर मिलन स्थल की ओर जाते समय जब जंगल-झाडी वाले डेढ किलोमीटर के सडक पर पैदल चल रहा था तो मन में ख्याल आया कि यार ये तो एकदम ही अलग अनुभव है।  ब्लॉगर मिलन और वह भी जंगल में। खूब हंसी ठिठोली होनी चाहिये अब तो।


   याद आया मुझे फिल्म परिचय का वह सीन जब गुस्सैल  प्राण के घर के बच्चों को पढाने आए जितेन्द्र खूब जोर से हंसते हैं और नौकर असरानी कहता हैं कि ये क्या कर रहे हैं.....इतना जोर से मत हंसिये। इस घर में हंसना मना है। मुझे जब हंसना होता है तो मैं तो जंगल की ओर निकल लेता हूँ।


       यह सीन मुझे बरबस याद आता है जब कि टीवी पर छिछोरे चुटकुले सुना हंसी बटोरी जाती है। सोचता हूँ कि असरानी ने कितनी सच बात कही थी कि जब हंसना हो तो जंगल की ओर निकल  लो। और मैं इधर जंगल की ओर ही जा रहा था, ब्लॉगरों की बैठक में।


      कुछ को मैं जानता था, कुछ को नहीं। एक दो दिन पहले कल्पतरू पर विवेक जी ने चार पांच लोगों की सूची दी थी कि फलां फलां लोग आ रहे हैं।  मैने  उन लोगों के ब्लॉग खंगाले इस उद्देश्य से कि आखिर ये लोग लिखते क्या हैं। इनका चिंतन मनन किस तरह का है और उसी दौरान मुझे रश्मि रविजा और आभा जी के ब्लॉग पढने का मौका मिला। इन लोगों के सुघढ लेखन और अच्छी लरजती बातें पढ अच्छा लगा। सूरज प्रकाश जी को पहले से पढता रहा  हूँ, मुंबई टाईगर को भी यदा कदा पढता ही रहता हूँ। सो, कुछ इत्मिनान था कि चलो इन्हीं लोगों से तो मिलना है। कैसी हिचक। लेकिन अचानक विवेक जी ने कहा कि चौदह-पंद्रह लोग आ रहे हैं तो थोडा ठिठक सा गया। कौन  लोग होंगे। कैसे होंगे, थोडा बहुत पढ लेता उनके बारे में तो थोडा कम्फर्ट रहता। पर सोचा, ऐसा भी क्या झिझकना.......चलो मिलते हैं, देखूं तो सही कि वह लोग मेरी तरह ही 'रूक रूक कर बौद्धिक अय्याशी' करते हैं या 'सदाबहार बौद्धिक अय्याश' हैं।
   खैर, घर से बोरिवली तक मुंबई लोकल ट्रेन में गया । ट्रेन में एक व्यक्ति को कुछ अंगरेजी की लिखावट पढते देखा जो कि कापी मे पढ-पढ कर मुस्करा रहा था। थोडा सा ध्यान दिया तो वह किसी स्कूल की कापी थी जिसमें किसी बच्चे की लिखावट थी। मेरे द्वारा इस तरह से उस कापी में झांकते देख वह व्यक्ति खुद ही बताने लगा
  - मेरी लडकी ने लिखा है, पहिली में पढती है।
मैं मुस्करा पडा।............मुस्कराते हुए ही पूछा -  आज तो संडे है, उसकी छुट्टी होगी।
- हां, पण अभी उसको ट्यूसन के लिये छोड के आया। ये बुक उसका मेरे बैग में छूट गया है। अबी काम पे जाता है मै, तो साथ में ये बुक भी इदर ही मेरे साथ रै गया।   
- अच्छा अच्छा।
वह व्यक्ति पुलकित हो फिर उसी बुक के एक एक अक्षर को पढने लगा।

मैं ट्रेन में बैठे बैठे आसपास का जायजा लेने लगा लगा। कहीं पर स्टे ऑन शक्तिवर्धक कैप्सुल का विज्ञापन था तो कही पर रत्न-माणिक और भाग्योदय करने वाले विज्ञापन। लोगों और आस पास के माहौल को देखते ताकते बोरिवली स्टेशन आ गया।
    बोरिवली स्टेशन से तय स्थल की ओर बढ चला। रास्ते में एक जगह रूक कर चाय पी। नेशनल पार्क के भीतर जाने पर कुछ वहां के  आदिवासी महिलाओं एंवं बच्चों  के द्वारा इमली और अमरूद बेचते देखा। अमरूद के बगल में ही नमक की पन्नी भी दिखी। पूछने पर पता चला कि तीन मूर्ति मंदिर डेढ दो किलोमीटर अंदर है और पैदल जाना पडेगा। निजी वाहन हो तो उससे भी जा सकते हैं। अब वहां निजी वाहन कहां तलाशूं. सो, चल पडा ग्यारह नंबर की बस के जरिये पैदल। दोनों ओर हरे हरे पेड, झुरमुट और पक्षियों का कलरव। जी खुश हो गया। कहीं कहीं युवा- बच्चे सडक पर क्रिकेट खेल रहे थे तो कही पर यूँ ही बैठे समय व्यतीत कर रहे थे। कुछ युवा जोडे एक दूसरे के पंजों को आपस में फंसाये चल रहे थे।


      आस पास से गुजर रही कारों के प्रति संशय होता कि क्या पता इनमें भी कोई ब्लॉगर बैठा हो जो तीन मूर्ति की ओर चला जा रहा है। आस पास की हरियाली देखते जैन मंदिर पहुंचा तो याद आया कि सब टीवी पर तारक मेहता का उल्टा चश्मा में जेठालाल की पत्नी दया अक्सर जेठालाल को जय जिनेंन्द्र कह कर ही प्रणाम करती है।



       ऑफिस जाते समय मेरी श्रीमती जी ने जेठालाल की पत्नी दया की देखा-देखी मुझसे भी कई बार यूं ही मुस्कराते हुए जय जिनेन्द्र कह ठिठोली की है। जैन न होते हुए भी मैं हाथ जोड जय जिनेंन्द्र  कह बैठता हूँ। यूं भी कोई भी मंदिर, मस्जिद या चर्च के सामने से गुजरते हुए हाथ सीने की ओर बढ ही जाते हैं चाहे वह किसी भी धर्म के क्यों न हों। यहां भी वही हुआ।  मंदिर के गेट पर पहुचते ही हाथ खुद ब खुद सीने पर श्रद्धावश चले गये। भीतर मंदिर में जाने पर विवेक रस्तोगी जी मिले। परिचय हुआ। तब तक आलोक नंदन जी भी आ गये। बातचीत करते हुए हम लोग जैन मंदिर के हॉल में चले जहां पर की बैठक तय की गई थी। खिडकियां खोली गई। पंखे चलाये गये। और फिर थोडी बातचीत, थोडी सोच मुद्रा, थोडा इधर उधर फोन-फान । और शुरू हुआ धीरे धीरे लोगों का आना। सूरज प्रकाश, अविनाश वाचस्पति, रश्मि रविजा, शमा, फरहीन, रूपेश श्रीवास्तव, अजय , विमल, राज सिंह, शशि सिंह, सभी लोग आते रहे, महफिल जमती रही।

   
    इधर महाबीर जी (मुंबई टाईगर) और विवेक रस्तोगी जी काफी व्यस्त थे। कभी ब्लॉगरो के लिये पानी, कभी चाय, बिस्कुट , समोसे, वगैरह आदि का प्रबंध करते रहे। बीच बीच में समय निकाल कर हम लोगों के बीच भी आ बैठते और पूरी तन्मयता से बातचीत का रस लेते और रह रह कर अपने विचार भी बताते जाते ।
   
     इधर अविनाश वाचस्पति जी काजू ले आये थे और उधर राज सिंह जी ढेर सारी पान की गिलौरीयां ले आये थे। हंसी मजाक के बीच बातचीत का सिलसिला चलता रहा। इसी बीच एडम जी स्केच भी बनाते जा रहे थे।



   सभी ब्लॉगर अपनी बात भी रख रहे थे और रह रह कर बगल में बैठे  ब्लॉगर से कुछ पूछ पुछौवल भी कर ले रहे थे। कुछ बातें जैसे कि यूनिकोड के बारे में चली, तो  कुछ माईक्रोचर्चा ब्लॉगिंग के बौद्धिक अय्याशी होने पर भी चली इसके साथ ही साथ ब्लॉगिंग के खाये पिये अघाया होने जैसी बातों पर भी बातें निकली।  कमेंट में nice या फिर Very Nice लिखकर कमेंट करने वालों  पर भी हल्की फुल्की मजाकिया बात निकली। 
   
      इसी दौरान हंसी मजाक के कई मौके आए। जैसे कि जब राज सिंह जी ने अविनाश वाचस्पति जी से पूछा कि - आप नुक्कड पर तो हो ही, और कहां हो आप।
  अविनाश जी ने फरमाया एक तो पिताजी हैं।
हांय, क्या क्या।
एक तो पिताजी है, और भी ब्लॉग है जैसे कि तेताला ......
अरे भईया मैं पूछ रहा हूँ कि आप नुक्कड के अलावा कहा रहते कहां हो आप तो बता रहे हो कि.....पिताजी हैं..
  इतना सुनना था कि बगल में बैठी फरहीन जी ठठाकर हंस पडीं। दरअसल अविनाश जी अपने ब्लॉग पिताजी के बारे में बताना चाह रहे थे और राज जी उनका पता ठिकाना पूछे जा रहे थे। अब हो गई गफलत :)

  खैर, अविनाश जी ने एक रोचक बात बताई कि उन्हें ब्लॉगिंग के जरिये मोबाईल सस्ते में कैसे मिला। दरअसल, कहीं उन्होंने जानना चाहा कि कौन सा मोबाईल लूं तो ठीक रहेगा और इसी क्रम में उन्हे मोबाईल के फीचर के बारे में जानने का मौका मिला। इसी दौरान एक ऐसे शख्स ने मोबाईल बेचना चाहा क्योंकि  कैमरा मोबाईल उसके ऑफिस में अलाउ नहीं था। चालू हालत में वह मोबाईल उन्हें सस्ते में मिल गया।  लोगों से जानकांरी और जरूरतों को बांटने का जरिया कैसे बना ब्लॉगिंग यह इसका उदाहरण ही है।
     
      सूरज प्रकाश जी ने भी अपने अनुभव बांटे कि कैसे वह एक्सीडेंट का शिकार हुए और कुछ ही घंटों में मित्रों के ब्लॉग के जरिये यह बात सबको पता चल गई। यही नहीं, 28 लोगों ने रक्तदान के लिये आगे भी आए।
      
      तो इसी तरह की बातें साझा हुई हैं मुबई की ब्लॉगर-बैठकी में। यह एक तरह से गेट टुगेदर ही था। एजेंडा जानबूझ कर तय नहीं किया गया था कि पहले सब एक दूसरे को जान पहचान लें तो बात आगे बढेगी। बीच में समय निकाल मैं मंदिर के भीतरी हिस्से में चला गया। कुछ फोटो आदि खींची। मोबाईल के जरिये ही फोटो खींच रहा था सो जैसे तैसे धुंधली-धूसर तस्वीरें खींच-खांच कर वापस आया तो यहां चला-चली की बेला थी।
   मैं भी आलोक नंदन जी के साथ चल पडा स्टेशन की ओर..........। 


- सतीश पंचम 
 



43 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

मुंबई में है यही व्‍हाइट हाउस
जिसके प्रेसीडेंट सतीश पंचम
एक हिन्‍दी ब्‍लॉगर हैं
किए उन्‍होंने ब्‍लॉगर मिलन के
किस्‍से उजागर हैं
अभी और करेंगे
और ब्‍लॉगर भी कहेंगे
हम तो दिल्‍ली पहुंचकर ही
विचारों की नदिया को
कहेंगे कि बहो बहो खूब बहो

हिमांशु । Himanshu said...

रास्ते के विवरण शानदार रहे । बैठकी अच्छी रही, आपका आलेख बता रहा है ।

अविनाश जी की टिप्पणी कितनी रोचक है ! आभार ।

Vivek Rastogi said...

अरे वाह सतीश जी बहुत सारी बातें तो मुझे अभी पता चलीं और ट्रेन के किस्से भी... :)

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

हमको तो जी पूरी भरी प्लेटें ही ललचा रही हैं -------जो है सो है !!



बढ़िया विवरण है जी!

राजीव तनेजा said...

आपकी रिपोर्ट बड़ी रोचक रही...पढकर आनन्द आ गया

संगीता पुरी said...

bahut badhiya report.

Udan Tashtari said...

मस्त रिपोर्टिंग...मस्त विवरण.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर रिपोर्ट!

Suresh Chiplunkar said...

जहाँ तक प्लेटों की बात है, दिल तो इधर भी मचल रहा है, यानी कि रस्तोगी जी का इंतजाम अच्छा रहा… फ़ोटो भी अच्छे हैं और रिपोर्ट भी…

पी.सी.गोदियाल said...

कायदे से आपने दी पूरी रिपोर्ट !

Anil Pusadkar said...

अच्छी रिपोर्ट,चलता रहना चाहिये ये मेल-मुलाक़ात का सिलसिला।

rashmi ravija said...

बहुत ही अलग तरह का विवरण रहा आपका...वहां पहुँचने की उद्विग्नता में सचमुच रास्ते की खूबसूरती एन्जॉय करना तो भूल ही गयी...पर आपने भरपूर फायदा उठाया और तस्वीरों से हम भी लाभान्वित हो रहें हैं..
हम्म...तो आप भी औरों की तरह मेरे ब्लॉग के silent reader निकले ..जब पढ़ा तो उपस्थिति तो जतानी थी...हमें(मुझे और आभा जी ) कैसे पता चलता कि आपने हमारा ब्लॉग खंगाल डाला....हाँ खुद का जिक्र आया तो कमेन्ट लिखने में कोई कोताही नहीं की :)

Dr. Mahesh Sinha said...

एक अलग ही रिपोर्ट

अजित वडनेरकर said...

बेहतरीन रिपोर्ट। आनंद रहा।

vimal verma said...

शानदार रिपोर्टिंग ..अच्छा मिलना जुलना हो गया, सबसे मिलना अच्छा लगा....लेकिन जब रात में लौटते हुए बीयावान जंगल का अंधेरा डरा रहा था..हम शॉर्टकट से जब आबादी तक पहुंचे तो तब जाकर मन को सुकून मिला....वैसे मिलन स्थल भी रोचक था।

Mired Mirage said...

बढ़िया रिपोर्ट रही।
घुघूती बासूती

Shiv Kumar Mishra said...

बेहतरीन पोस्ट है. पढ़कर प्रसन्नता हुई.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

संपूर्ण विवरणत्‍मक रिपोर्ट.


हा हा हा Very Nice.

anitakumar said...

आप की ,नही नहीं, आप के द्वारा खीचीं हुई फ़ोटोस बता रही है कि मंदिर बहुत सुंदर है और जाने का रास्ता और भी सुंदर्। इतने साल से बम्बई में रह रहे हैं पर इस मंदिर के बारे में तो पता ही न था। जरा विस्तार से बतायें कि कैसे जाया जा सकता है। ब्लोगर मीट में न आ सके पर मंदिर तो देख ही आयें॥

cmpershad said...

चिट्ठाचर्चा के माध्यम से यहां पहुंचे। पढा था कि जंगल की सैर होगी.....सो हो गई। पांच वर्ष मलाड में रहे पर उस जंगल की ओर नहीं ही गए:)

Shefali Pande said...

badhiya hai tasveeren aur report....

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

बहुत शानदार,
भड़ास पर रुपेश भाई से इस सम्मलेन का ब्यौरा देखा और अब यहाँ, दिल में एक कसक सी रह गयी कि काश हम भी ...
खैर सभी मित्रों को बधाई
और आनेवाले सम्मलेन का इन्तजार.
जय हो

सतीश पंचम said...

@ रश्मि रवीजा जी,

मैंने आपके और आभा जी के ब्लॉग की कई पोस्टें पढीं और कोई कमेंट नहीं किया इसके लिये क्षमा चाहूँगा।
दरअसल जब मैं आप लोगों के ब्लॉग को खंगाल रहा था, तब मैं Quick glance ले रहा था, लगातार कई पोस्टें पढ रहा था और उस समय मेरा उद्देश्य केवल आप लोगों के बारे में जानने की उत्सुकता थी कि आप लोग क्या क्या लिखते हैं और क्या अनुभव हैं ताकि ब्लॉगर मीट में फेस टू फेस होने पर मैं ब्लैंक फेस न रहूँ :)

वैसे मैं कुछ समय से नियमित ब्लॉगर नहीं हूँ, इसलिये भी अपने आपको अपडेट कर रहा था।
इसे आप मेरा स्वार्थ भी कह सकती हैं :)

अब कोशिश करूंगा कि आप लोगों को पढूँ और उस पर कमेंट भी करूँ......फिर वही कोशिश......ये कोशिश वाले शब्द हमेशा अपने आप में उहापोह का लिहाफ लपेटे होते हैं :)

सतीश पंचम said...

@ अनिता कुमार जी,

अनिता जी, यूं तो नेशनल पार्क जाने के लिये बोरिवली स्टेशन से दस मिनट का पैदल रास्ता है लेकिन यदि निजी कार से जा रहे हैं तो अच्छा रहेगा क्योंकि अंदर छह से सात किलोमीटर की सडक है जो कान्हेरी केव्स ले जाती है। बौद्ध काल की गुफाएं अपने आप में अनूठी हैं। नेशनल पार्क के अंदर जाते ही डेढ किलोमीटर की दूरी पर यह त्रिमुर्ती जैन मंदिर है जहां पर ब्लॉगर मीट हुई थी।
चित्र में जो तीन मुर्ति स्टेशन दिख रहा है वह नेशनल पार्क की टॉय ट्रेन का स्टेशन है जो कि इस मंदिर के सामने ही बना है और केवल नेशनल पार्क के भीतरी हिस्सों का ही यह ट्रेन भ्रमण करवाती है।

वैसे, आपको मेरे कैमरे द्वारा शाम के समय खींची गई तस्वीरे अच्छी लगी यह जान कर सुखद आश्चर्य हुआ क्योंकि मेरे कैमरे को कादर खान रोग है :)

दरअसल एक फिल्म में कादरखान को शाम छह बजे के बाद दिखना बंद हो जाता है और वही हाल मेरे मोबाईल कैमरे का है। इसलिये मैंने अपने कैमरे को कादरखान नाम दिया है :)

सतीश पंचम said...

आप सभी लोगों का आभार जो मेरी इस रपट पर मेरा उत्साहवर्धन किये।

विशेष आभार मैं महाबीर जी(मुंबई टाईगर)
और विवेक रस्तोगी जी को देना चाहूँगा जिन्होंने इस ब्लॉगर बैठकी को सफल बनाने में जी जान से जुटे रहे। अविनाश जी ने भी अपनी ओर से काफी साथ बनाये रखा। उन सभी लोगों का जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस ब्लॉगर मिलन को सफल बनाये रखने में जुटे थे उन सभी लोगों के प्रति मैं हृदय से आभार प्रकट करता हूँ।

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

@ सतीश पंचम,

अच्छा नाम दिया है भइये हमको भी जंच गया !!

मनोज कुमार said...

सार्थक शब्दों के साथ अच्छी चर्चा, अभिनंदन।

सुरेश यादव said...

बधाई हो अविनानाश जी ,आप की मुंबई यात्रा भी सफल रही.या कहें आप की प्रवल इच्छा ने इसे सफल बना दिया.

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) said...

बहुत बेहतरीन रपट रही...

माइक्रोचर्चा..! वो भी जंगल में.. ऑल इज वेल है न जी?

shama said...

Tasveeren aur vivaran padh maza aa gaya!

http://shamasansmaran.blogspot.com

anitakumar said...

सतीश जी आप का कादरखान सच में बहुत अच्छा काम किया है, रास्ता बताने के लिए आभार, जी कार से ही जाएगें। सोच रहे हैं कि अब बम्बई का ये हिस्सा भी खंगाल लिया जाए।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आह ! समोसे की फोटो...यम यम

sandeep sharma said...

बहुत शानदार रिपोर्ट लिखी है...

हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा said...

भाईसाहब अगली बार आशा है कि डा.रूपेश श्रीवास्तव और फ़रहीन के साथ मैं भी आप सब महान हस्तियों से मिल सकूंगी। चित्र सुंदर हैं
सादर
मनीषा नारायण

RAJ SINH said...

भाई सतीश जी ,
पढ़ तो पहले ही लिया था ,कुछ परेशानियों के चलते टिप्पणी अब दे रहा हूँ . मेरी बदकिस्मती देर से पहुंचा वर्ना आपसे और गुफ्तगू का मन था .
बहरहाल........दोनों ( फ़िलहाल तो ) मुंबई में हैं .चना गुड होई जाये कभवु :) .

और कितनी उम्दा रिपोर्ट ......सब कहा ही जा चूका है .

पंकज said...

रास्ते भी खूब और मंजिल भी और मकसद भी. ये बैठके परवान चढे तो हिन्दी ब्लाग को एक दिशा मिले.

डॉ. मनोज मिश्र said...

वर्ष नव-हर्ष नव-उत्कर्ष नव
-नव वर्ष, २०१० के लिए अभिमंत्रित शुभकामनाओं सहित ,
डॉ मनोज मिश्र

समयचक्र said...

रोचक . नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाये और बधाई

सतीश पंचम said...

ये ब्लॉगर बैठकी भी खूब रही थी। आज जब चारों तरफ पुरस्कारों को लेकर हो रही चांय-चौवा देख रहा हूं तो ये मुंबई ब्लॉगर बैठकी याद आ गई जिसमें न कहीं पुरस्कारों का तामझाम था न कुछ। लोग प्रेम से दरीयों पर बैठ चाय-समोसे का आनंद लिये, बतियाये, परिचित हुए, पानी की गिलौरीयों का लुत्फ उठाये।

बहुत याद आ रही है इस ब्लॉगर बैठकी की :)

सतीश पंचम said...

**पान की गिलौरीयाँ पढ़ें !

डा प्रवीण चोपड़ा said...

बहुत अच्छा लगा यह सब पढ़ कर।

rashmi ravija said...

याद आ रही है...तो फिर से क्यूँ ना आयोजित कर ली जाए ऐसी एक बैठकी..??

वैसे भी घुघूती जी ..आभा जी..ममता सिंह जी कह रही थीं...काफी दिनों से मिले नहीं हैं...जल्दी ही मिलते हैं एक बार फिर से सबलोग.

हमने भी एक पोस्ट लिखी थी...फिर से उसे ढूंढ कर पढ़ी,सारी यादें ताजा हो गयीं
लिंक चिपका दे रही हूँ..:)
घनी अमराइयों के बीच मुंबई ब्लॉगर्स की आत्मीय बैठक

Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता said...

Badhiya hai. Ab nice bhi nahi likh sakte, ki mazak banega...

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