मेरा मानना है कि हिंदी पट्टी के मीडिया कर्मी ज्यादा संख्या में होने से एक प्रकार की मुसीबत सी हो रही है। एक इमेज सी बनती जा रही है यू पी बिहार के बारे में कि ये लोग ऐसे होते हैं..वैसे होते हैं। रहने का ढंग नहीं जानते है आदि...आदि...।
अब इसे मैं एक प्रकार का दुर्भाग्य ही मानूंगा कि हिंदी पट्टी के ज्यादातर लोग नेशनल न्यूज चैनलों में हैं। अक्सर न्यूज जब भी बिहार के बारे में चलाई जाती है तो एक दरिद्रता का वरक लपेट कर पेश की जाती है। लेकिन बार बार इन्ही प्रदेशों से खबरे दिखाये जाने पर एक प्रकार की नेगेटिव इमेज बनना लाजिमी है।
सवाल यह उठता है कि क्यों कैमरा हिमाचल को फोकस नहीं कर पाता....क्यों कैमरा तमिलनाडु या उडीसा को फोकस नहीं कर पाता। क्या देश के बाकी इलाके अपने खान पान और साडी-मीनाकारी-पच्चीकारी वगैरह दिखाने के लिये ही बने हैं। क्या बाकी जगह कैमरा यही बताने के लिये है कि कन्याकुमारी का यह पेय फेमस है, केरल की यह कला उत्तम है……क्या वहां खबरें नहीं होती….वहां मर्डर या अपराध नहीं होते ? क्या वहां कोई अप्रिय घटना नहीं घटती ?
कभी रूट लेवल पर काम करते हुए कैमरे का फोकस एडजस्ट किया जाय तो देश में दिखाने के लिये बहुत कुछ है। लेकिन हिंदी पट्टी के होने के कारण पत्रकार भी अपने क्षेत्र से हट नहीं पाते और बार बार घोल-घाल कर वही सब दिखाते रहते हैं। यह इमेज ही है जिसके कारण हिंदीभाषी अक्सर अपमानित होने को अभिशप्त होते जा रहे हैं। उधर राजू श्रीवास्तव जैसों के गंवई चुटकुले भी हिंदी पट्टी को एक लंठ मान पेश किये जाते हैं। जब कोई इन प्रदेशों से कहीं नौकरी आदि के लिये जाता है तो उसे अन्य समस्याओं के अलावा एक नेगेटिव छवि को लेकर भी चलना पडता है।
नेगेटिव इमेज बनने का एक उदाहरण और ।
जब सुबह टीवी ऑन करो तो सबसे पहले गुडगांव या नोयडा की खबर होती है कि वहां फलां ट्रक लुढक गया या फलां एक्सिडेंट हो गया या कि फलां जगह वारदात हुई है। अब चूँकि नोयडा या गुडगांव का रास्ता मिडिया वालों के रास्ते में पडता है तो सुबह सुबह न्यूज चलनी शुरू हो जाती है औऱ वह भी ब्रेकिंग न्यूज का ठप्पा लगाये। तो इमेज ये बन रही है कि नोयडा-गुडगांव काफी असुरक्षित है...जबकि लोग यह नहीं सोच पाते कि आखिर सुबह सुबह न्यूज पहले वहीं की क्यों फ्लैश होती है।
मैं पत्रकारिता से नहीं जुडा हूँ, न ही मैं कभी गुडगांव या नोयडा गया हूँ। लेकिन जिस तरह से चींटियों की कतार देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां चींटियों का घर होगा और उसके कतार की दिशा में ही कोई मीठा या खाने योग्य सामग्री है तो उसी आधार पर कह रहा हूँ कि मीडिया तंत्र का जमावडा एक गुच्छे के रूप में जरूर नोयडा या गुडगांव के आसपास है। आधुनिक शब्दावली में इसे ही हब कहा जाता है। चींटियो की कतार अपने आवागमन से सुबह छह बजे खुद ही लाईव हो जाती है :)
यूं तो हर गली या मुहल्ले में मीडिया वाले मिल जाएंगे लेकिन नेशनल लेवल पर कोई तुरंता प्रसारक या OB Van उनके लिये शायद उस हद तक उपलब्ध न हो। अगर हो भी तो इतना दबाव तो नहीं ही होगा कि कोई नई खबर जल्दी फ्लैश करो...... जबकि हब होने से गुडगांव या नोयडा इस मामले में प्रसारण कर देते हैं। इन मुद्दों पर थोडा सा ध्यान भर देने की जरूरत है। बाकी चीजें तो खुद ब खुद समझ आ जाएंगी।
और अंत में शरद जोशी के लापतागंज की तर्ज पर मीडिया के बारे में अपने शब्दों में कहूं तो
- यहां सब बिज्जी हैं..... थोडा सा ध्यान दिया जाय तो बिज्जीपन नजर आ जाता है कि कितने बिज्जी है :)
( यह लेख मैने रवीश जी की एक पोस्ट में जो टिप्पणी दी थी उस पर आधारित है । इस मुद्दे पर चर्चा, प्रतिक्रिया आदि को जानने के लिये रवीश जी के ब्लॉग में जाया जा सकता है । मैं यहां व्यक्तिगत होकर पोस्ट नहीं लिख रहा हूँ बल्कि इस पोस्ट को समस्त नेशनल ( ? ) हिंदी पट्टी के पत्रकारों के लिये ही समझा जाय । रवीश जी के बोलने बताने के तौर तरीकों को मैं भी काफी पसंद करता हूँ, लेकिन कहीं न कहीं यह मुद्दा रह रह कर मन में करक रहा था, सो पोस्ट के रूप में लिख रहा हूँ )
- सतीश पंचम
दुर्गम और रोमांचक - त्रियुण्ड
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आज ऐसी जगह पर चलते हैं जहाँ जाने का साहस कम ही लोग जुटा पाते हैं। क्योंकि
इसके लिए दमखम व प्रकृति से लड़ने की ताकत की जरूरत होती है। यह जगह मैक्लोडगंजसे मात...
1 hour ago


19 Comments:
अच्छा मुद्दा उछला है...। पर मैं मानता हूँ कि अच्छॆ और खराब लोग क्षेत्र देखकर पैदा नहीं होते। सभी प्रकार के लोग इस समाज में बराबर घुले-मिले हैं। जैसे मूर्खों का कोई अलग गाँव नहीं बसता उसी प्रकार बुद्धिमान भी एक ही जगह नहीं पाये जाते।
सतीश जी यही शिकायत हम लोगो को भी है, हमारे यहां जब भी कोई रिपोर्ट भारत के बारेआती है तो हमेशा नारात्मक होती है, झुग्गी झोपडी दिखाना, सडक पर सोये लोगो को दिखाना, भिखारी दिखाना, ओर हमे उस रिपोर्ट से ज्यादा उन केमरा मेन पर ज्यादा गुस्सा आता है जो उसे खींच कर विदेशो मे बेचते है ओर कुछ पेसो के लिये देश की छवि खराब करते है, ओर ज्ब कोई जर्मन हम से इस बारे बात करता है तो हम उसे सही बात समझाते है, वेसा ही हालआप ने अपने ही देश मै बताया, आप का दर्द समझता हुं, क्योकि मै खुद बिहार जाने से डरता हुं जब कि वहा मेरे बहुत से दोस्त है, आप ने बहुत सुंदर लिखा, काश मिडिया वाले समझे इस दर्द को.
धन्यवाद
सही विषय चुना...चिन्तन मांगता है.
पत्रकारिता जो प्रतिबद्धता और मेहनत मांगती है और जो स्तर होना चाहिये पत्रकारों का, वह कहां दीखता हैं। किसी समय अखबार मेँ दिग्गज थे, कभी टीवी में प्रतिभा आती दीखती थी। अब सब भेड़िया धसान है। सरकारी प्रेस विज्ञप्ति और पकी पकाई खबर का मुंह जोहती पत्रकारिता! हुंह!
बाकी ब्लॉगिंग में इतने टूल्स हैं कि इण्डिपेण्डेण्ट ब्लॉगर से उम्मीद की जाये!
आपका कहना सही सतीश जी।बिहार को आज अराजकता का पैमाना साबित किया जा रहा है।किसी दूसरे प्रदेश के नेताओं से भी इस मामले मे जवाब मांगे जाते है तो वे बिहार और यूपी से अपने प्रदेश को अच्छा बता कर खुद को क्लीनचीट दे देते हैं।एक बार और नोयडा और गुड़गांव वाली बात भी लगभग सही ही है।वंहा रहने वाले सभी पत्रकार ज़रूरी नही कि हिंदी पट्टी के हो मगर वो देश की राजधानी के करीब होने के कारण वंहा सभी न्यूज़ चैनल मे पत्रकारो की फ़ौज़ जमा है और खबर नही होने की स्थिति मे वो निकल पड़ते है गुड़गांव,नोयड़ा,फ़रीदाबाद और आसपास की छोटी-मोटी खबर को राष्ट्रीय खबर बनाने के लिये।बहुत गौर से देखे तो इसके लिये ज़िम्मेदार वही टी आर पी है।आपने सही कहा कि उडीसा,झारखण्ड और आपने हमारे प्रदेश छत्तीसगढ का नाम नही लिया लेकिन वो भी नज़र नही आता है।यंहा की बड़ी से बड़ी से खबर स्क्राल या फ़ाईल फ़ूटेज के भरोसे जगह बना पाती है।मै राजधानी रायपुर मे रहता हूं यंहा कितने न्यूज़ चैनल वालों ने स्टाफ़ रिपोर्टर रखे हैं?दरअसल यंहा जैसी हालत और शहरो और प्रदेशों की भी है,स्टाफ़ ही नही है जंहा वंहा की खबरे मांग-मांग कर दूसरे-तीसरे दिन एकाध मिनट के लिये दिखा कर एहसान कर देते हैं और जंहा भीड़ है वंहा की सड़ी से सड़ी खबर देश की सबसे बड़ी खबर हो जाती है।दिल्ली मे वृद्ध या महिला की हत्या होती है तो एंकर चीख चीख कर कहता है दिल्ली महिलाओं के लिये वृद्धों के लिये सुरक्षित नही है।और दूसरे शहरों मे होते रहे कत्ल पे कत्ल,रिपोर्टर नही तो खबर नही।एक बार हम लोग महामहिम राज्यपाल से मिलक्र उन्हे ज्ञापन सौंपने गये थे केंद्र सरकार द्वारा रेग्यूलेटरी बोर्ड बनाये जाने की पहल के विरोध मे।शुरु मे तो उन्होने कुछ नही कहा मगर मुम्बई के आतंकवादी हमले पर की रिपोर्टिंग को सही ठहराने की कोशिश करते हमारे साथियों की जमकर खिंचाई की।इलेक्ट्रानिक मीड़िया के साथियों के सवाल करने के तरीको पर तमाम किस्से कहानियां,चुटकुले प्रचलित है मगर जब राज्यपाल ने आपबीती बताई तो सब खामोश हो गये।उनके भाई की पूर्वोत्तर मे हुई वारदात मे मौत के बाद आप कैसा महसूस कह रहा स्टाईल के सवाल हुये थे।इस बात का जैसे ही उन्होने ज़िक्र किया,सब खामोश हो गये।उन्होने तब सवाल किया कि क्या छत्तीसगढ मे नक्सल हिंसा के अलावा कुछ और नही हो रहा है?तब उन्होने वही सवाल किया था जो आज आप कर रहे हैं,छतीसगढ को राष्ट्रीय खबरो मे जगह क्यों नही मिलती?सब उठ कर चुपचाप चले आये थे और जवाब तब भी वही था और आज भी वही है टी आर पी।शायद मै ज्यादा लिख गया हूं,कोई बात बुरी लगी हो तो आशा है अन्यथा नही लेंगे आखिर मै भी उसी जमात का ही हूं,और बराबार का दोषी भी।
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आपकी बात में दम है।
जिस तरह से नौएडा का निठारी और आरुशि कान्ड मिडिया ने महीनों उछाला वह आपके निष्कर्षों को सत्य साबित करता है।
हालत सभी जगह एक जैसे ही हैं, लेकिन अधिकतर स्थानों पर ताज़ा खबरों के लिए त्वरित तकनीक की अनुपलब्धता जिम्मेदार है।
किसी स्थान की प्रसिद्ध वस्तुयों जैसी सॉफ्ट न्यूज़ तो बस ज़ायका बदलने के लिए होती हैं।
वैसे पोस्ट का मर्म विचारणीय है, जो शीर्षक से प्रतीत हो ही रहा है।
बी एस पाबला
मुद्दा सही है लेकिन, इन प्रदेशों के लोगों का जागना बड़ा जरूरी है। वरना छवि अच्छी बने या बुरी हिंदी पट्टी का तो, बुरा ही होता रहेगा। जमकर होगी तो सिर्फ राजनीति
वैसे थोड़ा हटकर बात ये कि भले ही अपनी टीआरपी या पाठक संख्या बढ़ाने के लिए हमारा चैनल सीएनबीसी आवाज़ उत्तर भारत के राज्यों की तरक्की की संभावनाओं पर उत्तर उदय चला रहा है। हिंदुस्तान अखबार का उत्तर प्रदेश-बिहार की तरक्की की संभावनाओं पर समागम अभी खत्म हुआ है।
अमूमन आपसे असहमति कम बनती है सतीश जी ...पर आज आपकी आधी बात से सहमत हूँ आधी से नहीं ..पहला तो रविश जी ने जो बात कही है वो बिलकुल वाजिब है के एक खास जगह की लड़कियों को अमूमन इसी नज़र से देखा जाता है ...खुद मैंने अपनी आँखों से अंसल प्लाजा दिल्ली खेलगांव में कुछ लड़को को जो अच्छे खाते पीते परिवार के लग रहे थे ..भद्दी टिपण्णी करते देखा है ....अब आपके मुद्दे पे ....मेरा मानना है बाजारवाद का जोर सभी पेशो में आया है ..हां कुछ पेशो में इसका अपराध ज्यादा हो जाता है ..खास तौर से ऐसे पेशे जो सार्वजनिक मुद्दों से जुड़े है ...आज कल जिस रफ़्तार से डोनेशन कोलेज आ रहे है उसी रफ्तार से चैनल भी आने लगे है .... किसी खास जगह का पत्रकार ऐसी सोच लेकर आता है ..ऐसा नहीं है .....दरअसल हमारे पूरे समाज का एक चरित्र डिस्टर्ब हो गया है ....किसी भी पेशे में लोग समाज से ही आयेगे ...हां दिल्ली में एक रात लाईट न आने पर मीडिया शोर मचायेगा ....पर आस पास के शहर जो पूरे दिन में केवल आठ घंटे लाईट में जीते है .उन पर बहसे नहीं चलेगी ........दरअसल सारा मुद्दा ब्रेकिंग न्यूज़ का है .....बिना सत्यता जाने ...पहले खबर देना .....दूसरा मेरा मानना है की कुछ पेशो में एक ज्यादा संवेदनशील ..... ज्यादा पढ़े लिखे आदमी की जरुरत होती है जैसे पत्रकारिता में ...वो कम हो रही है........हां कैमरा बहुत सी जगह फोकस नहीं कर रहा है .भेड़ चाल का शिकार हो रहा है ये दुःख है ....शायद वो आम आदमी की समझ को कम करके आंकता है ...एक आत्मनिरीक्षण की जरुरत तो है ...ये भी तय है की निजी बातचीत में सभी जिम्मेवार पत्रकार ऐसे महसूस करते है ओर कई बार अपने लेखो में लिखते है पर चैनल में शायद पुरजोर आवाज नहीं उठा पाते ..दुःख इसलिए भी बढ़ जाता है की अमूमन पत्रकारों ने कुछ साल काम करने के बाद अपने चैनल बना लिए है जाहिर है बाजारवाद का जोर उनके जमीर को समय के साथ उतना मुखर ओर पाक साफ़ नहीं रखता जितना वे चैनल शुरू करते वक़्त होता है ....पर तहलका की रिपोर्टिंग अब भी उम्मीद जिलाए रखती है ...
पर मानिए या न मानिए एक सच हमें स्वीकारना पड़ेगा भावनायो को परे रखकर .कुछ जगह हालत उतने बेहतर नहीं है
हां ये बात जरूर इस देश के सभी मर्दों पर लागू होती है .....
"बिहार यूपी की यही समस्या है। यहां लड़के को होनहार बनना ही सीखाया जाता है। बाकी संस्कार नहीं दिये जाते। ज़्यादातर लड़के घर से ही ऐसी निगाहों का संस्कार पा जाते हैं, जिनके सहारे वो हर दिन आस-पास से गुज़र रही लड़कियों का पीछा करते रहते हैं"
ओर अक्सर इस प्रवति को मैंने कई बार पोस्टो में उठाया है .....
अनुराग जी,
मेरा मानना है कि हर जगह अच्छे बुरे लोग होते हैं। हिंदी पट्टी तो यूं ही बदनाम है। यह स्थिति पूरे भारत में है।
मुंबई में लोकल ट्रेन में दरवाजे पर लेडिज डिब्बे की ओर उल्टे मुंह करके शोहदे खडे होते हैं। लेडिज डिब्बे को भिन्न भिन्न नाम से बुलाते हैं।
याद किजिये 31 दिसंबर की रात यहां कैसे हजारों की भीड औऱ सुरक्षा के बावजूद एक महिला के कपडे तार तार कर दिये गये।
चलती लोकल में बलात्कार की घटनाएं हों या सुमद्र तट पर बनी चौकी में नाबालिग से बलात्कार की घटनाएं...हर जगह इस प्रकार के दुश्चरित्र मिल जाएगे।
मैं इन घटनाओं को बेहद अफसोस जनक और दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूँ। यह घटनाएं मुझे अक्सर सालती भी रही हैं कि यहां क्या कभी इंसानो के रहने लायक जगह भी है या नहीं।
खैर, दुख तो तब होता है जब कलम का इस्तेमाल दुहरे मापदंडों से किया जाता है औऱ वह भी बिना यह जाने कि इससे बाकी लोगो पर क्या असर पड रहा है। पत्रकारिता भी उसी परले दर्जे की लंठई का नमूना बनती जा रही है और उसी से मेरा विरोध है।
अनिल जी ने बहुत कुछ खुल कर कह दिया है कि जहा रिपोर्टर होते हैं वहीं की खबर बनती है, रिपोर्टर नहीं तो खबर नहीं ।
उपर जाने वाली सीढ़ी पर ग्रीस लगा है इसलिए सोचने का समय नहीं है बस्स्स...बकवास करो और चलने बनो..यही नारा है आज के चैनलों का..दर्शक का कया है वह बेचारा तो अंधा-बहरा-बुद्धिहीन है ही...
आपने एक ऐसे विषय पर लिखा है जिसके बारे में सोचते सब है पर व्यक्त नही कर पाते आपने उसे सरल ता से साथ कह दिया मै अभी पिछले कई महीनों से बंगलौर में थी जहाँ दिन में चार घंटे बिजली जाना आम बात है रिक्शे वालो का मनमानी पैसे वसूलना भी आम है और भी बहुत सी ऐसी बाते है जिनमे प्रायः सभी प्रदेशो जैसी समानता है फिर भी वहा कि ऐसी कोई खबर मीडिया में नहीं होती |विडम्बना ही है कि अपने प्रदेश कि छवि बिगाड़ने वाले उस प्रदेश के ही लोग होते है ठीक घर कि उस बहू के समान जिसके शुरुआत में किये गये एक गलत काम से उसकी छबीहमेशा के लिए खराब हो जाती है चाहे वो बाद कितने ही अच्छे काम कर ले|
और क्या वजह है इन बेहूदा चैनलों को उत्तर भारत के एकाध प्रदेशों के अलावा और कहीं नहीं देखा जाता।
बाकी रही बात यूपी बिहार की, तो ये चैनल या तो आजमगढ़-सराय मीर-मोतिहारी के जरायमपेशा लोगों के उपर फोकस करते हैं या यहाँ के बाढ़-सूखे में हाथ फैला कर रिलीफ की भीख माँगते, बोरे लूटते लोगों पर।
जो बिकता है वही चलता है. उत्तर प्रदेश और बिहार के पत्रकारों को पता है कि क्या बिकेगा. हमारे यहाँ लोगों की आदत है खुद को नंगा करके माल कमाने की. विश्वास न हो तो West Indies और अब इंग्लैंड में जा बसने वाले भारत के पुरबिया, नोबेल पुरुस्कार प्राप्त वी. एस. नैपौल ने पहले भारत को ही अपने उपन्यास 'An Era of Darkness' में नंगा करके माल कमाया था.
भैया, यहाँ आने के बाद एक अलग तरह का सुकून मिलता है। सारा विमर्श हो ही चुका है। कहने को कुछ बँचा नहीं। मेरे उपनाम से लोगों को बहुधा दक्षिण भारतीय होने का भ्रम होता है। नौकरी के शुरू के दिनों में एक सज्जन ने तो पूरा इंटरव्यू ही ले डाला। उनका ये कहना था कि कभी हमलोग दक्षिण से माइग्रेट कर गए होंगे। जैसे तैसे समझा पाया तो एक जुमला सुनने को मिला ,"...लेकिन यार इतने प्रोफेशनल तरीके से काम एक बिहारी(उनके लिए लखनऊ के पूरब का इलाका बिहार ही था।) कैसे ...?" बात उन्हों ने बीच में छोड़ दी और मैंने भारत के नक्शे की ओर इशारा कर दिया। ... शायद उन जैसे लोग कभी नहीं समझते।
यह परिचर्चा कितनी जरुरी मुद्दे पर हो रही है. सबकी नज़र चाहूँगा.
सुधार से पहले विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने की जरुरत है.
ज्यादातर हिन्दीभाषी पत्रकार पहले अभाव में जीते हैं फिर धीरे धीरे संपन्न होते हैं. यह भी एक कारण है दृष्टिकोण में दोष का.
(बहरहाल व्यापक चिंतन की जरुरत है.)
सतीश जी आज आपको पढने का मौका मिला इसका श्रेय ज्ञान जी को जाता है...जहाँ आप की समसाद मियां की पोस्ट पढ़ी थी...सच कहूँ आपकी लेखन शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया और उसी के तहत मैं आप तक खिंचा चला आया...ब्लॉग जगत में इतनी बेबाकी और रोचक ढंग से लिखने वाले चुनिन्दा ही हैं...अब तो आना जाना लगा ही रहेगा...आप तो बस लिखते रहिये..क्यूँ की आप दिल से सच्ची बात लिखते हैं..
नीरज
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