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Tuesday 13 October 2009

लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर


छप्पन भोग लगते हैं तुम्हें
गुडहल गेंदे के फूल फबते हैं तुम्हें
लोगों के हूजूम पूजते हैं तुम्हें
 
ऐसे स्थल को छोड क्यों कर निकलोगे बाहर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 
तभी तो,
हर घर में दुग्ध पीते दिख जाते हो
कभी शाक-सब्जी में भी नजर आते हो
बारिश की बूँदों से छपछपा उठी
सूखी दीवाल पर भी दिख जाते हो
 
गदगद हो काई लगी दीवाल को पुजवाकर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 
कब तक यूँ ही भरमाओगे
इत्र फुलेल की छिडक से
कब तक नथुनों को नरमाओगे
भूखे लोगों से हर दिन
कब तक अर्ध्य अर्पण कराओगे
अरे कभी तो तुम लजाओगे
 
क्या लजाना इतना भी है दुश्कर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 
लोगों कहते हैं कि तुम कण कण में हो
नदी, पर्वत, नभ, जल में हो
बस, आज मुझे इतना बता दो
वो गुडहल का फूल सूखा क्यों
कण पराग का रूठा क्यों
जो पडा था तुम्हारे ही गले में
 
जवाब अभी नहीं  तो  दो कुछ ठहरकर
सांझ-गोधुलि या फिर पहर कर
 
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
लगता है पंडों की सोहबत भा गई है ईश्वर
 


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां ओट ( वोट )  पड रहे हैं जिसकी ओट लेकर बडे बडे काम करने का मंसूबा बांधा जायेगा।

समय - वही, जब मंसूबा बांधते समय एक ओर से रस्सी खुल जाय और मंसूबा सोच रहा हो कि अब मैं खुद को कैसे बांधूं : )


**** पंकज मिश्र जी द्वारा टिप्पणी में इस मंदिर के बारे में पूछे जाने पर थोडी बहुत जानकारी ये रही***** यह मंदिर जौनपुर मे है। ध्यान से देखेंगे तो इसके गर्भगृह के बाहर कुछ लोग बैठे या सोये हुए हैं। ये लोग अकारण नहीं सोये हैं। 
दरअसल जौनपुर में शिक्षामित्रों के ट्रेनिंग के दौरान जब महिलाएं ट्रेनिंग कक्ष में ट्रेनिंग ले रही होती हैं, उस वक्त उनके पति पास ही के मंदिर में शरण लेते हैं, बच्चा संभाले हुए या खुद को संभाले हुए। ट्रेनिंग छूटने पर शाम होते ही अपनी अपनी फटफटीया पर लेकर निकल पडते हैं घर को। इस जगह की Exact location तो नहीं पता पर कहीं ब्लॉक वगैरह के आसपास ही है । 


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8 Comments:

Mishra Pankaj said...

वाह आपकी लेखनी का अलग ही अंदाज है ,
वैसे ये मंदिर कहा का है ?

Anil Pusadkar said...

बहुत खूब।एक सच्चा भक्त ही अपने अराध्य से ये सब कह सकता है।ईश्वर से खरी-खरी कहने वाले सच्चे भक्त का नमन करता हूं और उसकी लेखनी का भी।

डॉ .अनुराग said...

निदा फाजली का जन्मदिन अभी आकर गया है ...उन्ही की एक रचना है ....जिसे जगजीत ने भी अपनी आवाज दी है ...आपको पढ़कर वही याद आई ...



garaj baras pyaasii dhartii par phir paanii de maulaa
chi.Diyo.n ko daanaa, bachcho.n ko gu.Dadhaanii de maulaa

do aur do kaa jo.D hameshaa chaar kahaa.N hotaa hai
soch samajhavaalo.n ko tho.Dii naadaanii de maulaa

phir roshan kar zahar kaa pyaalaa chamakaa naii saliibe.n
jhuuTho.n kii duniyaa me.n sach ko taabaanii de maulaa

[saliibe.n=Christian cross; taabaanii - brightness]

phir muurat se baahar aakar chaaro.n or bikhar jaa
phir ma.ndir ko koii miiraa diivaanii de maulaa

tere hote koii kisii kii jaan kaa dushman kyo.n ho
jiinevaalo.n ko marane kii aasaanii de maulaa

सतीश पंचम said...

@ पंकज जी,

यह मंदिर जौनपुर का है। ध्यान से देखेंगे तो इसके गर्भगृह के बाहर कुछ लोग बैठे या सोये हुए हैं। ये लोग अकारण नहीं सोये हैं।

दरअसल जौनपुर में शिक्षामित्रों के ट्रेनिंग के दौरान जब महिलाएं ट्रेनिंग कक्ष में ट्रेनिंग ले रही होती हैं, उस वक्त उनके पति पास ही के मंदिर में शरण लेते हैं बच्चा संभाले हुए या खुद को संभाले हुए।

ट्रेनिंग छूटने पर शाम होते ही अपनी अपनी फटफटीया पर लेकर निकल पडते हैं घर को।

इस जगह की Exact location तो नहीं पता पर कहीं ब्लॉक वगैरह के आसपास है।

यह जानकारी देते हुए इसे पोस्ट में भी अपडेट कर देता हूँ।

Siddharth Kalhans said...

भाई सतीश ईश्वर पर तंज पढ़ कर दिळ खुश हो गया। क्या लिखा है आपने। मंदिर के बारे में जान और उसकी साथर्कता को जान तो और भी मजा आया

Udan Tashtari said...

मस्त भाई..आपका अंदाजे बयां कुछ और!! आनन्द आ गया.

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

सुना है वाराह अवतार में उन्हें कीचड़ इतना पसन्द आया था कि उसी में लोट लोट वंशवृद्धि कर रहे थे। बड़ी मुश्किल से वापस लौटे।
अबकी बेरिया पण्डों की गिरफ्त में हैं तो आसानी से न हिलेंगे वहां से!

गिरिजेश राव said...

ईश्वर से अनुरोध है कि गलत सोहबत में पड़ कर अपना बुढ़ापा न खराब करें।

बातें, जो जाने की जल्दी मचा रही हैं.....

कुछ बातें जल्दी मचाती हैं कि मैं जा रही हूँ......मैं न रूकूंगी। समय भी उन्हें ऐसा करने के लिये उकसाता रहता है कि कह दो कि देर हो रही है.......बहुत रूक लिये......हम जा रही हैं........अब न रूकेंगी.............ऐसी ही बातों को देखने पढने के लिये इस राह से गुजर सकते हैं जहां समय को एकबारगी धकियाया जा सकता है कि समय तुम बीत गये तो क्या हुआ ? ठहरने की सांकल तो अब भी खटखटायी जा सकती है......

ऐसी ही बीते-अनबीते पलों को इन लिंक्स के जरिये देखा जा सकता है ।

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