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Monday, September 7, 2009

हर ब्लॉगर के लेखन की एक अपनी शैली है, पोस्ट देखते ही कह सकते हैं कि किसने लिखा है।



       हर ब्लॉगर की एक  अपनी शैली  है। कई बार पोस्ट को देखते ही पता चल जाता है कि किसने लिखा होगा इसे।   डॉ अनुराग अपनी पोस्ट में त्रिवेणी लिखते हैं, डॉ. अमर इटालिक स्टाईल में  लिखते हैं तो ज्ञानदत्त जी की  पोस्ट दार्शनिक फ्लेवर लिये होती है। नाम देखने की जरूरत ही नहीं पडती। पता चल जाता है कि किसकी पोस्ट  है ये। इसी तरह मेरी भी एक अपनी  शैली है।

            कई  बार आपने मेरे यहां देखा होगा कि अपनी पोस्ट के नीचे मैं  स्थान और समय कुछ अलग ढंग से  बदल बदल कर  लिखता हूँ।  इस तरह स्थान और समय लिखने की आदत मुझे अपने स्कूली दिनों में पडी जब मित्रों के बीच हम लोग क्लास में पढाई के दौरान ही मजाकिया चिटों का आदान प्रदान करते थे। मुझे याद है जब मैंने पहली बार अपनी पंजाबी के पिरियड में पर्चा पास किया था। पर्चा क्या था एक उलूल जूलूल लिखा कागज था। बचपन के दिन थे, सो पंजाबी की क्लास में  गुरमुखी में ही मैंने एक साथी को लिखा

-----तेरी पैँट थल्ले जा रही ए….
थां – पंजाबी मिस दी क्लास
समां – क्लास खतम होण तो पैलां

            पर्चा पाते ही सुक्खी ( शायद सुखविंदर नाम था उसका) ने पर्चे के पीछे मुझे गाली लिख मारी थी और मैं ही ही करके हंस रहा था। फिर तो यह चलन क्लास में चल पडा था। सुबह सुबह पर्चा देने लेने की शुरूवात अमरीका ( अमरीक सिंह ) नाम का लडका करता था। हाथों हाथ होते होते वह पर्चा सबको जब तक मिल नहीं जाता था तब तक क्लास डिस्टर्ब रहती थी। सोडी मिस तो हमारी इन हरकतों से इतना तंग आ गई थीं कि कुछ बच्चों के घर वालों को बुलावा भेज दिया गया था कि – असी तुआडे पुतर दियां हरकतां वेख के तंग आ गए हां…..छेती वड्डी मैडम नुं मिलो।

  पर्चा मिलते ही सब की सिट्टी पिट्टी गुम। उस समय उस परचे के नीचे मैंने लिखा था

 थाँ – वड्डी मैडम दी कुर्सी दे साहमणे…..
कदे – जदों वड्डी मैडम नां होण औह वेले….

     आज वह सिग्नेचर स्टाईल मैं अपनी लगभग हर पोस्ट में इस्तेमाल करता हूँ। कई पोस्टों में मैं स्थान और समय जान बूझ कर नहीं लिखता। क्योंकि कुछ पोस्टें अलग भाव लिये होती हैं और स्थान और समय लिखने से पोस्ट से ध्यान बंटने की संभावना रहती है। कई बार मैं समयाभाव के कारण भी स्थान और समय नहीं लिख पाता क्योंकि बदल बदल कर स्थान और समय लिखने के लिये भी सोचना पडता है :)

   लवली जी और अशोक पाणडेय जी ने मुझे एक दो बार टोका भी है   ( कैसेनोवा वाली पोस्ट पर भी) इस बात  के लिये कि स्थान और समय क्यों नहीं लिखा।  खैर, कोशिश करूँगा कि अब से अपने सिग्नेचर में स्थान और समय लिखा करूँ…….उसी क्लास वाली सिग्नेचर स्टाईल में  -

-----तेरी पैँट थल्ले जा रही ए….
थां – पंजाबी मिस दी क्लास
समां – क्लास खतम होण तो पैलां  :)

- सतीश पंचम

32 comments:

Nirmla Kapila said...

आज से आपकी शैली पर भी नज़र बनी रहेगी फिर हमे भी जल्दी से पता चल जायेगा कि ये पंचम जी हैं। बिलकुल सही कहा आपने । क्या आप् पंजाब मे भी लिखते हैं?

सतीश पंचम said...

निर्मला जी, मैं पंजाबी में लिखता नहीं केवल पढता हूँ। गुरमुखी में लिखने की आदत अब छूट सी गई है।
घर में बच्चों को अब भी थोडा बहुत पढा दिया करता हूँ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सतीश जी, किसी भी रचना में तीन गुण आवश्यक हैं. इन्हें पहचानने के लिए सत्यम् शिवम् सुंदरम् को उलट दीजिए। सब से पहले वह सुंदर होना चाहिए ताकि पाठक आकर्षित हो सके, दूसरा उसे समाज के लिए कल्याणकारी होना चाहिए तीसरे वह यथार्थ आधारित होना चाहिए। लेकिन स्थाई वही रचनाएँ होती हैं जिन में तीनों गुण होते हैं। पुराने पाठक को पहली चीज दिखाई ही नहीं देती।

बी एस पाबला said...

ਸਾਨੂੰ ਪਤਾ ਹੈ ਇਸ ਤਰਹ ਦੇ ਕੱਮ ਪੰਜਾਬੀ ਹੀ ਕਰ ਸਕਦੇ
ਬਾਕੀਆਂ ਦੀ ਤਾਂ ਪੈਂਟ ਹੀ ਥਲੇ ਚਲੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ
ਥਾਂ, ਸਮਾਂ ਕੋਈ ਭੀ ਹੋਵੇ :-)

बी एस पाबला

Arvind Mishra said...

अरे मैंने तो इसे गौर ही नहीं किया था -और पाबला जी ने क्या गोजा है गलियाँ तो नहीं हैं ?

Fauziya Reyaz said...

aapko padh kar school ke din yaad aa gaye...

बी एस पाबला said...

जी मिश्र जी
आप ठीक समझे, ये गलियाँ हैं यादों की

:)

बी एस पाबला

समयचक्र said...

मेरी क्लास में लडके लड़कियो पर इसी तरह पुर्जी फेका करते थे जिन्हें हम सभी लव पुर्जी बोलते थे ..... लिखकर उसकी पुडिया बनाकर जिस पर फेकना होता था फेक देते थे .

खुशदीप सहगल said...

अरविंद मिश्रा जी को बड़ी जिज्ञासा है, पाबला जी ने क्या लिखा है..सिर्फ उनकी सुविधा के लिए अनुवाद कर देता हूं...वैसे मैंने गुरमुखी भाषा कभी पढ़ी नहीं है, एक दोस्त ने एक बार अक्षर लिख कर दे दिए थे...उन्हीं से थोड़ा-बहुत पढ़ना सीख लिया..वैसे अनुवाद गलत हो तो पाबलाजी या पंचमजी दुरूस्त कर देंगे...साणूं पता ए, इस तरह दे काम पंजाबी ही कर सक दे ने...बाकियां दी ते पैट ही थले चली जांदी ए...समां चाहे कोई वी होए...

संजय बेंगाणी said...

शैली तो सबकी अपनी अपनी होती है, हस्ताक्षरों की तरह.

ताऊ रामपुरिया said...

-----तेरी पैँट थल्ले जा रही ए….
थां – पंजाबी मिस दी क्लास
समां – क्लास खतम होण तो पैलां :)
बहुत बढिया जी.

पाबलाजी गालियां तो नही दे गये कहीं?:)

रामराम.

सतीश पंचम said...

@ Pabla ji,

Aisa nahi hai ki is tarah ke majak sirf punjabi hi karte hain, Bachpan me sab log is tarah ke harkaten karte rahe hain. Mere ek classmate Anil vishwakarma ne to parents bulaye jaane par class ke hi dusre ladke vijay tivari ke bade bhai ko apna chacha bana kar le gaya tha :)

Vaise main UP ke jaunpur se belong karta hu. Guru Nanak school me pade hone ke karan Punjabi option liya tha isliye shayad mere likne me bhi kahin Punjabipan aa jata hai :)

Office me hindi font install na hone se Roman me likh raha hu :)

बी एस पाबला said...

सब मेरे लिखे के पीछे पड़ गए भई!! :-))
सतीश जी की शैली की बात कीजिए ना!

वैसे मेरा मतलब कुछ और था :-)
बाद में बताऊँगा
हा हा

बी एस पाबला

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प क्लास रही होगी वो ...हाय हमे भी अपनी एक क्लास याद आ गयी ....कभी उसका किस्सा भी सुनायेगे .पर आज आप दिल ले गए हजूर ......

हिमांशु । Himanshu said...

आपकी प्रविष्टियाँ तो निश्चय ही स्थान और समय के आपके विशिष्ट उल्लेख के कारण पहचान ली जाती हैं ।

रोचक प्रविष्टि । धन्यवाद ।

खुशदीप सहगल said...

पाबलाजी, आपने तो राज़ दबा कर और उत्सुकता जगा दी है, वैसे किसी ने गौर नहीं किया अनजाने में पंचमजी ने भी एक राज़ खोल दिया है, जनाब को ऑफिस टाइम में भी ब्लोगिंग पर हाथ साफ़ करने का मौका मिल जाता है. अरे यह मैंने क्या लिख दिया...पंचमजी कहीं आपका बॉस भी आपका ब्लॉग तो नहीं पड़ता. वैसे अपने पाबलाजी हैं ना, ज़रूर ओदा वि कोई चंगा जिया तोड़ दस देणगे...

डा प्रवीण चोपड़ा said...

वाह जी वाह, बहुत बढ़िया लिखा है --हमें भी अपने स्कूल के दिनों वाली चिटें याद आ गईं ----अकसर इन पर कार्टून भी बना दिये जाते थे जिस के नीचे किसी सहपाठी का नाम लिख कर खुश हो लेते थे। अच्छे दिन थे।

दिगम्बर नासवा said...

SHAILI SE PAHCHAAN BANTI HAI .... SAHI KAHA .......

Udan Tashtari said...

जो भी हो..यह सिग्नेचर शैली बहुत रोचक है:

थां – पंजाबी मिस दी क्लास
समां – क्लास खतम होण तो पैलां

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

ਮੈਨੂਂ ਬਡ਼੍ਆ ਅੱਛਾ ਲਗਦਾ ਯੇ ਜਦ ਹਿਨ੍ਦੀ ਪਂਜਾਬੀ ਮਿਕ੍ਸ ਦੀ ਗੱਲ ਹੋਨ੍ਦੀ ਯੇ!
ਪਬਲਾ ਜੀ ਨਚਾਨ੍ਦੇ ਪਯੇ ਨੇ, ਔਰ ਲੋਗ ਨਚਦੇ ਹਨ! :)

बी एस पाबला said...

ਗਯਾਨ ਜੀ ਵੇਖਿਓ,
ਕੋਈ ਨਾ ਕੋਈ ਤੁਰਿਆ ਔਂਦਾ ਹੁਣਾ ਲਾਠੀ ਲੈ ਕੇ ਗਾਲਾਂ ਕਢ੍ਦਾ
:-)

ਬੀ ਏਸ ਪਾਬਲਾ

सतीश पंचम said...

अब ट्रांसलेशन की बारी मेरी

ज्ञानजी बोलदे ने - ਮੈਨੂਂ ਬਡ਼੍ਆ ਅੱਛਾ ਲਗਦਾ ਯੇ ਜਦ ਹਿਨ੍ਦੀ ਪਂਜਾਬੀ ਮਿਕ੍ਸ ਦੀ ਗੱਲ ਹੋਨ੍ਦੀ ਯੇ!
ਪਬਲਾ ਜੀ ਨਚਾਨ੍ਦੇ ਪਯੇ ਨੇ, ਔਰ ਲੋਗ ਨਚਦੇ ਹਨ! :)

मैंनु बडा अच्छा लगदा ऐ जद हिन्दी पंजाबी मिक्स दी गल्ल होंदी ए।
पाबला जी नचान्दे पए ने, और लोग नचदे हन :)



पाबला जी बोलदे ने -

ਗਯਾਨ ਜੀ ਵੇਖਿਓ,
ਕੋਈ ਨਾ ਕੋਈ ਤੁਰਿਆ ਔਂਦਾ ਹੁਣਾ ਲਾਠੀ ਲੈ ਕੇ ਗਾਲਾਂ ਕਢ੍ਦਾ
:-)

ग्यान जी वेखिओ
कोई ना कोई तुरिआ औंदा हुउणा लाठी लै के गालां कड्दा
:-)


अब मेरी बात -

आज दी पोस्ट तां रंग बिरंगी हो गई -

कोई गल् नईं....दिवाली आण दो...ऐस रंग च ब्रश पिगो के 'सफेद कर' नु 'रंगीन कर' बणा दिआंगा :)

@ खुशदीप सहगल जी,

मेरे ऑफिस में इतनी छूट तो है कि थोडी बहुत नेट पर तफरीह कर ली जाय, लेकिन यह छूट तभी तक है जब तक कि काम पर असर न पडे। और जहां काम का बोझ हो वहां ब्लॉगिंग को खुद ब खुद धकेल कर मैं बगलिया देता हूँ :)

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

:-)

Ratan Singh Shekhawat said...

पोस्ट के साथ साथ टिप्पणियाँ पढ़कर मजा आ गया :)

खुशदीप सहगल said...

पंजाबियाँ दी हो गई, वाह भई वाह...

डा० अमर कुमार said...


ऒऎ पँचम, तू तो बड्डा छुपा रुस्तम निकला..
मैंनूँ ते इह पोस्ट इब वेख्या.. चल कोई गल्ल णीं !

poemsnpuja said...

हमें भी बचपन याद हो आया, क्लास में चूँकि बोलने की मनाही रहती है तो ऐसे ही चिट बना कर बात करने का सिलसिले पोस्ट graduation तक जारी रहा :) मैंने भी ऐसी कई चिटें रखी हैं आज पढ़ के अच्छा खासा मनोरंजन हो जाता है.
आज पोस्ट और टिप्पणियां दोनों में एक सा रंग है मस्ती का, बचपने का, हुल्लड़ का ...क्या ये आपकी शैली का असर है?

जितेन्द़ भगत said...

दि‍नेशराय जी की बात बहुत अच्‍छी लगी। और आपने भी सही कहा- हरेक की अपनी शैली होती है।

सतीश पंचम said...

@ poemsnpuja

आज पोस्ट और टिप्पणियां दोनों में एक सा रंग है मस्ती का, बचपने का, हुल्लड़ का ...क्या ये आपकी शैली का असर है ?


ओ ना जी, ना....ऐसी कोई गल्ल नहीं है। मैं तो एक गोली भरी बंदूक लेकर सभी ब्लॉगरों को बता रहा था कि हर किसी का अपना स्टाईल होता है बंदूक चलाने का, कोई निशाना साध कर शॉटगन हो बंदूक चलाता है तो कोई यूँ ही क्विकगन मुरूगन बन कर। अभी मैं बंदूक थामे सभी लोगों को बता ही रहा था कि पाबला जी ने ट्रिगर दबा दिया। एक आवाज आई और अरविंद मिश्रा जी ने पाबला जी से पूछा कि कुछ आवाज सी आई है। पाबला जी ने भी कहा वो तो ऐसे ही आवाज शवाज आ गई होगी। कोई पटाखा वटाखा होगा।

तब तक खुशदीप सहगल जी एक फुटेज लेकर आये जिसके अनुसार पाबला जी ने बंदूक का ट्रिगर दबा दिया यह साफ दिख रहा था। खुशदीप सहगल जी फुटेज दिखाते हुए कहने लगे यूँ तो मुझे कैंमरा चलाने नहीं आता पर मेरे मित्र ने बताया कि ऐसे कैमरा चलता है सो मैंने कैमरा चला कर फुटेज दिखाया है। इस फुटेज में साफ दिख रहा है कि पाबला जी ने बंदूक का ट्रिगर दबा दिया और उसी की आवाज आई है।

अब सब लोग पाबला जी के पीछे पड गये, ओये सानुं गोली लग जाता तो…..ओये तुमने गोली कैसे चलाई…….औ ट्रिगर क्यूं दबाया। अब पाबला जी क्या कहें----फुटेज मे साफ पता चल रहा था कि पाबला जी ने ट्रिगर दबाया था।

पाबला जी ने तब कहा – मैंने ट्रिगर दबाया ये सच है लेकिन जिस चीज को देखकर ट्रिगर दबाया वह तो कैमरे में नहीं आया ना……वो मैं फिर कभी बताउंगा कि क्यों ट्रिगर दबाया।

इतने में खुशदीप सहगल जी ने फिर पूछा …….आखिर आपने क्या देख कर ट्रिगर दबाया था जो मेरे कैमरे में न आया। मुझे तो अब बडी उत्सुकता है कि वह क्या चीज थी। इतने मे ताउ लट्ठ लेकर आ गये……ओए पाबला…..तन्ने गोली क्यूं चलाई……..।

अब पाबला जी ने कहा – सब मेरे पीछे पडे हो ….गोली क्यों चलाई….ट्रिगर क्यों दबाया…..अरे कोई ये भी तो देखो सतीश पंचम की बंदूक कितनी स्टाईलिश है जिससे गोली चली है। अभी ये बातें चल ही रही थी कि समीर जी भी आ गये…..क्या क्या हुआ कहते हुए…….। सब जानने सुनने के बाद बोले….ओ कोई गल्ल नहीं……लेकिन वो बंदूक बडी शानदार और स्टाईलिश है जिससे गोली चली।

तब तक ज्ञानदत्त जी आ गये। उनके हाथ में भी एक बंदूक थी, ठीक वैसी जिससे गोली चली थी। ज्ञानजी कह भी रहे थे, मुझे तो इस तरह की बंदूक बहुत चंगी लगदी है। ज्ञानजी को ऐसी बंदूक के साथ देख पाबला जी को अपने पर बीती याद आई और कहने लगे…..देखिये भाई ज्ञानजी, आपके पास भी ओही बंदूक है जिससे गोली चली है, देखो कोई लट्ठ लेकर आप को भी खदेड न ले :)

( मेरी इस पोस्ट की पाबला जी एक तरह से जान बन गये हैं ।..... पाबला जी आप बुरा मत मानना मैं तो यूँ ही मौज ले रहा हूँ :) सचमुच ब्लॉगिंग का ऐसा खुशनुमा मजा भी होता है, ये आज जाना।



- सतीश पंचम

स्थान – वही जहां 300 पायलट बीमारी का बहाना कर छुट्टी पर हैं।

समां – वही, जब आकाश में जहाजों की आवाजाही कम देख पक्षीयों को लग रहा है कि शायद आज बैंक हॉलिडे है :)

बी एस पाबला said...

ओए !
पिक्चर चल ही रही है अब तक?

सतीश जी पोस्ट जैसी टिप्पणी लिख कर कह रहे हैं कि इस पोस्ट की जान एक दूसरे तोते में है!
अरे! अब बच्चे की जान लोगे क्या :-)

स्थान: वही, जहां मौज ले कर - दे कर बुरा मत मानना कहा जाता है

समय: वही, जब घडी देख कर लोग कहते है कि अभी तो ........ बजने में 5 मिनट बाकी हैं

बी एस पाबला

Dr. Mahesh Sinha said...

चक दे फट्टे :) पता नहीं सही है या नहीं

SANTOSH KUMAR said...

YAH BAAT TO SAHI HAI SIR,
MUJHE BHI MERE COLLAGE KA FISH POND DAY YAAD AA GAYA, JISME HUM SABHI EK DUSRE K NAAM PAR KUCH NA KUCH LIKH KAR DAL DETE THE, AUR VO SABKE SAMNE PADA JATA THA.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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