अभी हाल ही में एक सरसरी नजर मैंने अब तक हंस के अपने पढे गये कन्टेंट्स पर डाली है । कभी उसमें बुजरी ( अवधी गाली) जैसी कहानी छपी है तो कभी उसका आवरण चित्र मन मोह रहा हैं। और सबसे बढ कर हंस का संपादकीय है। सुना है कि कई लोग हंस केवल इसलिये खरीदते हैं क्योंकि उसका संपादकीय बहुत बढिया होता है।
इसी प्रक्रिया में मेरी नजर एक निर्मम पत्र पर पडी जो हंस के संपादक राजेन्द्र यादव के नाम एक पाठक अरविंद गुर्टू ने दिल्ली से लिखा था और जिसे हंस के जुलाई 2009 अंक में पाठकों के पत्र वाले हिस्से में छापा गया था। इस पत्र को पढने के बाद एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में उठा कि आखिर राजेन्द्र यादव ने क्या सोचकर इस पत्र को छापने की अनुमति दी होगी। क्या हंस के संपादक के मन में यह प्रश्न नहीं आया होगा कि इससे उनकी छवि धूमिल हो सकती है ? उन्हें कैसा लगा होगा जब वह पत्र उनकी आँखों के सामने से गुजरा होगा ? पत्र की आखरी चंद लाईनें तो एक हिसाब से संपादक के प्रति नफरत की पराकाष्ठा ही दर्शाती हैं।
जरा आप भी पत्र को सरसरी निगाह से देखें……
- पच्चीस वर्ष पूर्व जब आप हंस की डमी बना रहे थे, तब मैं आपके कार्यालय में आकर बडा खुश होता था कि अब साहित्यिक उसर में एक नया पौधा लग रहा है, इसमें खूब सुंदर रचनाएं छपेंगी। हम जैसे लेखक को कोई संबल मिलेगा। पर साहित्य बहुत पीछे छूट गया। हंस ने कभी एक पंक्ति भी नहीं छापी, न लिखने के लिये प्रोत्साहित किया। बल्कि साहित्य क्षेत्र से ही निकाल दिया।
यह कुंठा क्यों इतने विकट रूप में हुई, पता नहीं। मैं अभी तक नहीं समझ पाया। पर मैंने देखा है कि अनेक प्रतिष्ठित हिंदी लेखकों के साथ यही दुर्भाव हुआ है। आज तक किसी संपादक या साहित्यकारों को इतनी गालियां नहीं दी गई जितना कि आपको। बावजूद इसके आप गौरवपूर्ण मुस्कान लिये हंसते रहे और आपने किसी की परवाह नहीं की। आपने शायद विवादास्पद बनने की राह पकडी। मेरा नाटक विवादास्पद बन गया। हांलाकि मैं कभी इसे बनने नहीं देना चाहता था। न कोई मेरा आशय ही था। मैं तो एक साधारण प्रेमकथा लिख रहा था। पर आपने अपनी पत्रिका का लक्ष्य बना लिया कि खुद विवादास्पद बने रहो।
आज तक इस पत्रिका में अच्छी रचनाएं तो जरूर छपीं, पर अच्छे साहित्यकार कभी नहीं छपे। उनको आपने बाहर का रास्ता दिखला दिया। आज भी जब मैं हंस को उलटता-पलटता हूँ तो नए लेखक ही दिखाई देते हैं, जो किसी न किसी ऐसी संस्था से जुडे हैं जो आपकी सेवा या आपकी स्वार्थ स्थितियों को निबटाने में सहायक हों। वे ही आपके लेखक हैं। भले ही आपका मानदंड रचना ही हो, पर आपके वे पनपे हुए पौधे अच्छे साहित्यकार नहीं बन पाए।
मेरी भी यही साध रही कि मेरी रचना हंस में छपे, पर यह साध एक अंतिम इच्छा ही रहेगी, फलीभूत नहीं होगी। यह पत्र भी नहीं छपेगा। जिस तरह एक हिजडे को मरने पर मारते-मारते श्मशान घाट पर लाया जाता है, औऱ दूसरे हिजडे शोक की बजाय उत्सव मनाते हैं, उसी तरह शायद आपकी गति हो।
- अरविंद गुर्टू , दिलशाद गार्डन, दिल्ली
पूरा पत्र पढने पर अब तक आप समझ ही गये होंगे कि पत्र में किस हद तक संपादक के प्रति नफरत है। न जाने और भी कितने पत्र आते होंगे हंस के संपादक के पास। लेकिन जो बात हंस को अलग बना रही है वह है संपादक की साफगोई। छाप दो जैसा है वैसा ही। लोग भी तो जानें कि हंस के प्रति लोगों के मन में क्या भाव है। शायद यही साफगोई है जो मुझे हंस की ओर खींच लाती है।
रचनाएं तो मेरे हिसाब से कुछ अच्छी हैं तो कुछ खराब भी हैं। कहीं कहीं तो बचकाना कहांनीयां भी छापी जाती है जिसमें अधिकतर नये लेखक ही दिखते हैं। और कहीं कहीं ‘बुजरी’ जैसी सशक्त कहानी भी है जिसके लिये दावा किया जा सकता है कि एक बार पढने के लिये शुरू करने के बाद कोई इसे अधूरा नहीं छोड सकता।
सफेद घर में ही बुजरी कहानी की समीक्षा की गई थी। तब एक टिप्पणी आई थी-
Jayant chaddha said...
अदबुध कहानी... कहानी के पात्र बड़े जाने-चिन्हे से लगते हैं.... कहानी का शिल्प इतना बेजोड़ है की दावा किया जा सकता है की कोई इसे पढता छोड़ उठ जाये...
हंस के कविता वाले सेक्शन को केवल दो पन्नों में जगह मिलती है यह बात थोडा अखरती है लेकिन जो भी कविताएं छपती हैं उनमें एकाध ही अच्छी होती हैं और बाकी तो ज्यादातर केवल ‘कागज कारे’। शायद यही वजह है कविताओं को सस्ते में निपटाने का।
एक कविता फरवरी 09 में मुस्तफा खान साहिल की छपी थी -
ऐसा नहीं है कि
नर्म घास नहीं उगती
नर्म घास उगती है
कत्ल आगजनी के माहौल में
उसकी छुअन दब गई है
वहीं कई गजलें तो गजब होती हैं । जैसे कि आलोक श्रीवास्तव के गजलों की इन लाईनों को ही लें -
मेरे सीने की हिचकी भी, मुझे खुलकर बताती है,
तेरे अपनों को गांव में, तू अक्सर याद आता है।
या फिर शमीम फारूकी की ये लाईनें -
तन्हाईयों में बैठ के पीता रहा हूँ मैं
एक ऐसा जल कि जिसका कोई जाएका न था
……..
वह दिन भी याद है कि इसी शहर में ‘शमीम’
मैं खो गया था और कोई ढूँढता न था।
कुल मिलाकर हंस को मैं ठीक ठाक ही मानता हूँ। अखबारो में यह पढने की बजाय कि शाहरूख खान ने अमेरिका में चेकिंग के नाम पर अपना अपमान होना कबूल किया, सलमान ने चाय पी, फराह ने कन्टेंस्टेंट को फटकारा,राखी सावंत ने स्वंयवर रचाया, हरमन बावेजा ने नई कार खरीदी……. मुझे हंस पढना अखबारों के मुकाबले अच्छा लगता है।
- सतीश पंचम
स्थान – वही, जहां चाय पीने का पैमाना ‘कटिंग’ है।
समय – वही, जब कटिंग पीने के बाद करोडपति सेठ ने चायवाले से कहा – ‘बाघ बकरी’ चाय वापरने का, उसमें ज्यादा टेस्ट होता है, इसमें टेस्ट कम है । चायवाले ने मन ही मन कहा – जब बाघ, एक बकरी को दो रूपये कटिंग के दे रहा हो तो टेस्ट कैसे आयेगा :)
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10 Comments:
मैं भी हंस का कभी प्रशंसक नहीं रहा -कारण है - यह एक खास तरह के सोच के प्रयोजन की पत्रिका रही है -मतलब पूर्वाग्रस्त ! यदि आपको हिन्दुओ की अनेक कारणों से बधिया उखेडनी हो ,लोक जीवन की विकृतियों को और भी विकृत कर उभारना हो तो बेशक आपको हंस अच्छी पत्रिका लगेगी ! यह एक surreal (सडियल-हा हा ) पत्रिका है !
और हाँ यह आम आदमी की बात आम आदमी की बोली भाषा में करने में भी पूरी तरह असफल रही है ! "सुरसरि सम सब कर हित होई " से बिलकुल अलग !
मैं हंस के अलावा भी कई पत्रिकाएं खरीदती और पढ़ती हूँ ..मुझे जहाँ तक लगता है उसके अनुसार असहमतियो को जगह मिलनी ही चाहिए वरना बात "अपनी डफली अपना राग" तक सिमित हो जाती है ..बाकि पत्रिका के बारे में मैं कहूँगी अरविन्द जी की एक बात सच है की हंस की दिशा एक पूर्वनियोजित उद्देश्य से अक्सर प्रभावित होती दिख जाती है, पर अगर आप किसी वाद पर जोर देंगे ये बाते सामान्य हो जाएँगी, इसलिए इन्हें नजर अंदाज किया जाना चाहिए.
राजेंद्र यादव हिंदी के सबसे दिलचस्प इंसानों में से हैं उन्होंने हिंदी पट्टी में मार्क्सवादियों के बाद सबसे ज्यादा हलचल प्रस्तुत की है यह सच है कि कभी-कभी वह बेहद कमीनेपर पर उतर आते हैं लेकिन यह भी सच है कि हंस को उन्होंने ऐसे कई लेखकों का प्लेटफार्म बनाया है जिनकी उच्चतर स्तर की रचनाओं को भी हिंदी की उपेक्षा कर दी जाती है क्योंकि इनके पीछे बड़ा नाम नहीं जुड़ा है।
साहित्य के क्षेत्र में गंवार होना कितना अच्छा लगता है...किसी पत्र या पत्रिका का संपादक कोई छंगू-मंगू है या आटे की चक्की वाला लाला...अपने राम को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.
पत्र /पत्रिका खोली, कुछ अच्छा लगा तो पढ़ लिया, नहीं जमा तो चैनल की तरह पन्ना बदला और आगे हो लिए.
अच्छी रचनाएं याद रखीं, ठीक-ठाक को नमस्ते और बाक़ी को राम-राम जी. हमैं कौनौ शेक्सपीयर या कीट्स बनना है जी.
अपनी बात को रखने का सब को अधिकार है, पर चूँकि यह सार्वजनिक मंच है और ऐसे में सार्वजनिक मर्यादोओं का ख्याल रखते हुए बात को रखना ही मैं उचित मानता हूँ।
कुछ टिप्पणीयों के भीतर आरोप प्रत्यारोप का अंश होने और कुछ तल्ख शब्दों के इस्तेमाल ( जो कि शायद पब्लिक में बोलना उचित नहीं) के कारण मजबूरन मैं टिप्पणी मॉडरेशन इनेबल कर रहा हूँ।
उम्मीद है आप लोग इसे अन्यथा नहीं लेंगे।
कथा देश मुझे ज्यादा अपील करती है कंटेंट के तौर पे ....नया ज्ञानोदय भी ...दरअसल जो भी छपा हो सब अच्छा नहीं होता .कई तो बड़े साधारहण कविता ओर कथ्य होते है .....इधर पाखी निकलना शुरू हुआ है..... ..आपको उसमे से फिल्टर करना होता है ..वैसे .सुरभि जी ने बड़े पते की बात कही है ...फिर भी कोई भी साहित्यिक पत्रिका बेहतर ही होगी ....ओर कई बार हंस में भी अच्छी चीजे मिल जाती है जी
इष्ट मित्रों एवम कुटुंब जनों सहित आपको दशहरे की घणी रामराम.
चर्चा अच्छी चल रही है , ओर लेख भी सुंदर है, मेने यह पत्रिका कभी पढी नही, अगर पढी भी होगी तो बचपने मै जो अब याद नही रही, इस लिये क्या लिखू?
आप का धन्यवाद
दुर्गा पूजा व विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं
अब हम क्या लिखें - अर्सा पहले हंस और नया ज्ञानोदय पढ़ा करता था। स्टेशन पर ए.एच.ह्वीलर वाला मेरे आते ही ये दोनो मेरे सामने सरका देता था।
अब न जाने क्यों पढ़ने का मन नहीं करता और शायद वही कारण है कि शब्द भण्डार भी ठहर सा गया है। अब केवल पठन में रैगपिकर बन कर रह गया हूं।
यह जरूर है कि ब्लॉग जगत की शब्द प्रयोग की सीमायें हैं!
और राजेन्द्र यादव के व्यक्तित्व में या उनके प्रति औरों में कुण्ठा/नफरत से अधिक तो हमारे परिवेश समग्र में लोग छुद्र कारणों से मानसिक रुग्णता ग्रस्त दीखते हैं। :)
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