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Monday, September 21, 2009

हंस के सितंबर अंक में नामवर सिंह रहे राजेन्द्र यादव के निशाने पर । बहुत दमदार रहा सितंबर अंक का संपादकीय ।


      इस बार हंस का संपादकीय पढा तो लगा कि राजेन्द्र यादव ने नामवर सिंह को सही तरह से निशाने पर लिया है औऱ न सिर्फ निशाने पर लिया बल्कि तीर भी जमकर चलाया।  मुद्दा था हंस की गोष्ठी में नामवर सिंह द्वारा अतिथि संपादक अजय नावरिया पर किया गया कटाक्ष।
    जिसके जवाब में  संपादकीय की शुरूआत ही राजेन्द्र यादव जी ने एक तीखे तीर से की है। राजेन्द्र यादव लिखते हैं -

   …….  हरिशंकर परसाई की एक लघुकथा है – सुबह सुबह एक नेताजी तलवार लेकर बैठ गए. आज तो अपनी गर्दन काटकर ही रहूंगा। आसपास के लोग जितना ही समझाने की कोशिश करते, उतनी ही उनकी जिद बढती जाती कि नहीं, आज तो यह गर्दन कटकर ही रहेगी। लोगों ने पूछा कि कोई तो कारण होगा  ? झल्लाकर बोले कि – ‘यह भी कोई गर्दन है जिसमें सात दिनों से कोई माला ही नहीं पडी……अब इस गर्दन की खैर नहीं है….’

      राजेन्द्र यादव जी आगे लिखते हैं कि -   मैं सोचता हूँ कि नामवर जी को भी क्या कभी ऐसी पवित्र बेचैनी होती होगी कि दो दिन हो गए, किसी ने अध्यक्षता करने नहीं बुलाया ? वे हर गोष्ठी को शाश्वत अध्यक्ष या अंतिम वक्ता होते हैं। कोई हर्ज नहीं, वे अध्यक्ष हों। श्रोता उम्मीद करते हैं कि वे जरूर कोई नई विचारोत्तेजक बात कहेंगे या अप्रत्याक्षित बात कहेंगे, मगर नामवर जी हैं कि हर बार उन्हें निराश करते हैं या क्षुब्ध छोड जाते हैं।  एक खिसियानी या परम संतुष्ट मुस्कुराहट के साथ लगभग यज्ञध्वंसी गणेश की तरह । मैंने दसियों साल पहले उन्हें आर्थर कॉयस्लर के शब्द उधार लेकर ‘इंटेलेक्चुअल कॉलगर्ल’ कहा था। उनका यह रूप सचमुच पेशेवर हो उठता है जब वे किसी अफसर या राजनेता की पुस्तक का विमोचन कर रहे होते हों – उस समय वह अफसर कवि, मुक्तिबोध से कम नहीं होता, कहानीकार हुआ तो प्रेमचंद के बाप की जगह कहां गई  है……….
 
      उल्लेखनीय है हंस की एक गोष्ठी में नामवर सिंह जी ने अतिथि संपादक अजय नावरिया के बारे में कहा था कि – मैं कहता हूँ राजेन्द्र , इन लौन्डों को मुंह मत लगाओ, ये तुम्हारे हाथ काट डालेंगे। …….. इसी मुद्दे को लेकर राजेन्द्र यादव जी ने अपने संपादकीय में नामवर सिंह को जमकर घेरते हुए लिखा है -
 
    सारा हॉल उस समय स्तब्ध हो गया था  कि नामवर सिंह जी ने यह क्या कह दिया। कौन सी भाषा बोल रहे हैं आचार्य ?  यह पहली बार नहीं हुआ था, अगर मंच पर मैं हूँ और अंतिम वक्ता नामवर जी हों तो यकीन मानिए, वे इसी तरह के कमाल दिखाते रहे हैं। सब लोग मजा लेते हैं, बल्कि ये दो नाम देखकर उन्हें निश्चय हो जाता है कि आज विचार के क्षण नहीं, मनोरंजन और फुलझडियों का जायका मिलेगा। पहले मैं भी मजा लेता था, लेकिन अब चिंतित हूँ कि बुढापे में नामवर जी को ये क्या हो रहा है ? इसबार इसलिये और भी अखरा कि उन्होंने दूर-पास से आने वाले सैंकडों श्रोताओं को निराश ही नहीं किया उनके साथ क्रूर मजाक भी कर डाला।
  
   आगे राजेन्द्र यादव जी लिखते हैं – नामवर जी मेरे बडे हैं और मैंने उन्हें वही सम्मान और उनकी विद्वता को श्रध्दा भाव दिया है। हमारी दोस्ती भी सन 1952 से शुरू हुई है । सच है कि इतना पुराना दोस्त न उनके पास कोई है, न मेरे । मैं उनकी विद्वता, अध्ययन और स्मरण शक्ति के आगे हमेशा नतमस्तक रहा हूँ, मगर क्या करूँ आज वे जहां पहुँच गये हैं वहां उन्हें देखकर तकलीफ होती है – दरवाजे पर बैठा एक बूढा है जो हर समय घर की बहू-बेटियों को टोकता या कोसता रहता है।
  
       राजेन्द्र यादव जी ने अतिथि युवा संपादक अजय नावरिया और नामवर सिंह के विचारों के संदर्भ में बच्चे का उदाहरण देते हुए कहा है कि – बच्चे के पास अतीत नहीं , सिर्फ भविष्य होता है – एक अनजाना, अनागत । अतीत तो उसके दिमाग में हम भरते हैं।  इतिहास, धर्म, संस्कृति  सब यथास्थिति को बनाए रखने के उपकरण हैं। …….युवा के पास अपना निजी या समाज को लेकर एक सपना होता है, इस सपने को रंगरूप देते हैं पुराने अनुभव, उदाहरण और तुलनाएं या विचार….मगर जो यथास्थिति से चिपके रहते हैं या अतीत को ही अपना भविष्य बना लेते हैं तो उन्हें युवा कहना शर्मनाक है – उनकी जगह या तो धर्म में है या सास्कृतिक राष्ट्रवाद में । हमारी समस्या अतीत यानी यथास्थिति को लेकर नहीं, इसके आगे या पार जाने की है…..
  
      और भी कई बातों का जिक्र किया है राजेन्द्र जी ने जिन्हें आप हंस के  सितंबर अंक में पढ सकते हैं। पुरानी और नई पीढी के बीच के द्वद्व को बखूबी उकेरा गया है ।  कुल मिलाकर हर बार की तरह हंस का संपादकीय दमदार लगा है।


- Satish Pancham

स्थान - वही, जिसे मायानगरी कहते हैं।

समय - वही, जब घडी की दो सूईयां आलिंगनबद्ध हो -  दो बजकर बाईस मिनट बता रही हों और तीसरी सूई सोचे कि आखिर वह इतना तेज क्यूँ चलती है :)

14 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

इन बूढ़ों ने लड़ाई झगड़ों से फुर्सत ले कुछ सार्थक भी लिखा हो तो भाई बताना.

sanjay vyas said...

हंस को हम सिर्फ राजेन्द्र जी के सम्पादकीय के कारण लगभग नियमित खरीद रहें है.अरसे से हंस में रचनात्मक लेखन का पक्ष कमज़ोर हो गया है.याद आता है जब हिंदी की सर्वाधिक चर्चित कहानिया हंस से ही प्रकाशित हुई.बरसों पहले हंस में ही छपी सृंजय की 'कामरेड का कोट' कहानी याद आती है जो अपने समय में अत्यधिक चर्चा और विवाद में रही.
इस एक आदमी की ऊर्जा को फिर भी सलाम करता हूँ.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

हंस देखे बहुत दिन हो गए। चलिए आप के सौजन्य से इसे पढ़ते हैं।

Pankaj Mishra said...

वाकई बढिया सम्पादकीय लिखा गया है

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बड़ों की बड़ी बात। भले ही वह वस्तुतः छोटी हो लेकिन मौके के हिसाब से बड़ी बन जाती है।

अफसर और नेता होना साहित्यकारिता के लिए डिसक्वालिफिकेशन है, अयोग्यता है। राजेन्द्र यादव जी ने अच्छी बात बता दी।:)

Arvind Mishra said...

अब आपने जब इतना बता दिया है तो काफी है !

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

Intellectual Call girl दमदार जुमला है। "वैचारिक भांड़" या "वैचारिक चारण" से कहीं ज्याद तिलमिलाऊ।

पर ये शब्द धनी लोग हैं - उनसे प्रयोग कर सकते हैँ। हमारे पास तो शब्दों का ही टोटा रहता है। :(

नामवर सिन्ह के बारे में और जानने का मन हो रहा है।

विपिन बिहारी गोयल said...

नामवर सिंह और अज्ञेय जैसे साहित्यकार हमारे जोधपुर विश्व विद्यालय में रहे यही हमारे लिए गर्व की बात है

मुनीश ( munish ) said...

come on brother ! These are all outdated and out of context people. they have had enough fun . itz time for us . kick them out if u wanna remain fresh . they are all alike...sullen and always complaining. they have never been happy during last 25 years at least.

डॉ .अनुराग said...

अमूमन हर बार मै राजेंदर यादव जी की बात से सहमत नहीं होता हूँ परन्तु इस बार उन्होंने जो कहा है वो सच है ....माना किसी व्यक्ति ने किसी शेत्र के लिए बहुत कुछ किया है ....पर इसका अर्थ ये नहीं की वो उसे बिगाड़ने के लिए भी स्वतंत्र है ....सत्ता ओर यश के मोह इन्सान को किसी भी उम्र में हो सकता है ....ओर ज्यादा पढ़े लिखे लोगो में अंहकार भी पोलिश होता है .....

अरुण राजनाथ / अरुण कुमार said...

ज्ञान जी की 'वैचारिक भांड' वाली बात जम रही है. मैं अगर इसे 'वैचारिक रांड' कहूं तो कैसा रहे?

Murari Pareek said...

achchha hai namwar se mile to sahi hum!!

हिमांशु । Himanshu said...

दो खूँटे - हिलते ही नहीं, उखड़ते ही नहीं ।

Pankaj Upadhyay said...

hindi magazine mein 'Aha Zindagi' hi padhta tha.. sonchta hoon 'hans' start kar hi dee jaye.. :)

thanks

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