दरअसल हाल ही में एक आयोजन के सिलसिले में फाईव स्टार होटल में जाने का पहली बार मौका मिला । पहुंचते ही महकते माहौल ने मधुमास को सामने ला दिया। फूलों की पंखुडियों से सजे थाल जब चलते हुए अगल बगल दिखते थे तो लग रहा था जैसे चित्रलेखा फिल्म का कोई सीन फिल्माया जा रहा है। बेल-बूटे, लतादार सीढीयां और फूलों की झालर….वाह क्या कहने।
थोडी देर बाद जब भोजन आदि का समय हुआ तो देखा कहीं पर दिमाग को मेंटल करने वाले कांटिनेंटल खाने की टेबल है तो कहीं पर जापानी Sushy. एक जगह भिंडी सकुचाई सी दिख रही थी तो उसके बगल में ही सीना चाक किये चाईनीज । खाने गया तो होटल में पतली, छरहरी ललनाएं बात बात पर मुस्कराते कह रहीं थी कि Do You Want more sir…..Will u please…..Its Continental……oH, Its delicious….can u try this….. तो मुझे लगा कि आज तक मेरी पत्नी ने इतने प्यार से भोजन के लिये कभी नहीं कहा…… कभी भूल से कह भी दिया जरा रोटी बढाना तो उलटे कह देंगी कि सामने ही तो है, हाथ बढा कर ले क्यों नहीं लेते और इन्हें देखो, कितने आग्रह से कह रही हैं कि ये भोजन अच्छा है..इसे भी ले लो…वह भोजन भी ले लो…। सोचता हूँ अगर पत्नी को घर मे हर खाने पर ग्यारह सौ रूपये देने लगूँ तो शायद वह भी मुझे इसी तरह आग्रहपूर्वक खिलायेगी……अरे एक और रोटी लिजिये……आपने तो कुछ खाया ही नहीं……. :)
खैर, थोडी देर बाद जापान के डिश ‘Sushi’ को खाने का तरीका बताते मित्र ने कहा, इसे थोडा सा बगल में रखी चटनीनुमा चीज के साथ मिलाकर एक ही कौर में खा लो फिर बताओ कैसा है। सोचा, जब फाईव स्टार का है तो अच्छा ही होगा…बेधडक बगल में रखी चटनी जैसी चीज को रख Sushi को मुँह में रख लिया…..उसके बाद…..लगा जैसे कि कोई सन्न करने देने वाली चीज आ गई है…….इतना तेज स्वाद, इतनी तेज गंध कि दिमाग भन्ना गया…..। दुबारा खाने की हिम्मत न पडी। पूरे पांच मिनट बाद उस चीज का भन्ना देने वाला असर उतरा। मित्र महोदय मेरी हालत पर मजे ले रहे थे। और मैं सोच रहा था यार, फाईव स्टार में इतना अजीब टेस्ट वाला खाद्य पदार्थ भी होता है क्या ? मैं तो नाहक ही अपने नुक्कड के समोसे वाले को सडे आलू इस्तेंमाल करने के लिये भला बुरा कह रहा था। आज पता चला कि उससे भी बुरा कोई टेस्ट हो सकता है। नेट पर तलाशने पर पता चला कि यह जापानी चीज है जो बहुत पसंद की जाती है, लेकिन मैं तो दुबारा न खाने की कसम खा चुका हूँ। ( बगल में ही Sushi उसका चित्र भी लगा है)आयोजन का दौर चल ही रहा था कि सोचा एक बार बाथरूम हो आया जाय। वहां जाने पर पूरा बाथरूम खाली था। महंगे एअर फ्रेशनर ने वहां भी मधुमास को ला रखा था। आठ दस ओबामा दीवालों पर चल रहे थे। दरअसल मझोले आकार के बाथरूम में करीब आठ दस LCD लगे थे जिनपर CNN चैनल चल रहा था । LCD के किनारे सुनहरे फ्रेम से मढे गये थे। देखने पर लगता था कि दीवाल में कोई चलती फिरती पेंटिंग है। सोचा आया हूँ तो शौचालय का इस्तेमाल कर लूं। अंदर जाकर जब सिटकनी लगाई तो देखा कि पानी का तो कोई इंतजाम ही नहीं है यहां। टॉयलेट पेपर दीवार से लटक रहा है। अब क्या करूँ ? टॉयलेट पेपर देख कर तो मेरा मन बिदक गया। मन मसोस कर बिना कुछ करे धरे ही बाहर आ गया। मन ही मन कहा- साले, पानी की बाल्टी या मग ही रख देते। लेकिन क्यों रखेंगे….अंग्रेजीयत को ठेस न लगेगी।
उस वक्त मुझे अपने बचपन के मित्र रामधारी की याद हो आई जिसे हम धरीया कह कर बुलाते थे। गांव में खेलते-खेलते जब अचानक उसे प्रेशर आ जाता तो खेल छोड कर खेतों के एक ओर जाकर वह निपटान करता और वहीं जमीन पर पडे ढेले का इस्तेमाल सफाई के लिये कर वह फिर खेलने आ जाता। एक दो बार देखने के जब सबको पता चला कि ये शौच के बाद ‘ढेलउवल’ करता है, पानी का इस्तेमाल नहीं करता… तो सभी आपस में कहते इससे दूर रहो……बहुत फूहड है…..गंदा है….ये है वो है….। उसकी माँ भी रामधारी को गुस्सा करती थी कि – ‘केत्थो लायक नहीं है इ निमहुरा….( किसी लायक नहीं है ये नासपीटा…’) . लेकिन अब पता चल रहा है कि और किसी लायक रामधारी हो या न हो, फाईव स्टार होटल में रहने की लायकी उसमें बचपन से थी, तभी तो हम जिस ‘ढेलउवल क्रिया’ को फूहड मानते थे, गंदा मानते थे वही सब कुछ यहां फाईव स्टार में टॉयलेट पेपर के रूप में मान्य है।
सोचता हूँ, आज अगर रामधारी की माई फाईव स्टार होटल में इस्तेमाल होने वाले इन टॉयलेट पेपर्स को देखती तो जरूर अपने बेटे को इंटेलेक्चुअल, गुणी और हाई क्लास का मानती औऱ कहती – मेरा बेटा फाईव स्टार वाले बडे बडे लोगों की तरह रहता है………. है कोई मेरे बेटे के बराबरी का पूरे गाँव में :)
- Satish Pancham
स्थान – वही, जहां बेल-बूटों और लताओं से सजी सीढियों पर मेरे पैर रूके से जा रहे थे।
समय – वही, जब मैं फूलों से सजे थाल के बगल से गुजर रहा था और बगल से ही एक भौंरा भनभनाते हुए कह रहा था – Sushi खाओगे Sushi :)


22 Comments:
सतीशजी, अपने एसएम कृष्णा और शशि थरूर भी ढेलउवल है का..भला होई प्रणब ददुआ का, दोनों को फाइव स्टरवा से बाहर ले आइबो...पाबलाजी आज वी कोई चाण चाड़ना जे या नहीं...
शुशी सोया सॉस मे डुबो कर वसाबि के साथ खाने पर हम भी सन्ना ही गये थे मगर लोग बड़े शौक से खाते हैं, जाने कैसे.
बढ़िया रहा संस्मरण.
ओहो ए शुशी भी न, अब हम याद रखेंगे, चलो आज आपके साथ फ़ाईव स्टार होटल का भी अनुभव हो गया। :)
धरिया जैसे लोगों की ही जरुरत है शायद इन फ़ाईव स्टार होटलों में और हवाई जहाजों में या फ़िर हम लोगों को धरिया बनने की।
अच्छा संस्मरण
बढ़िया रहा संस्मरण
बढिया रहा आपका ये लहजा सोचने का जो कि आपने फाइव स्टार होटल में भे बरकरार रखा
आज तक मै तो कभी ऐसे महगे होटल में गया नहीं , अच्छा है आपने बता दिया शौच क्रिया बाहर से ही कर के जाना अच्छा रहेगा :)
mazedar anubhav:)
Your experience related to toilet of Five Star Hostel.
MY EXPERIENCE
With kind courtesy of my company, I got opportunity to stay in Grand Hyatt Hotel (Five Star or Seven Star Hotel not sure). There were no lock or latch in the door of the bathroom.
The room was on twin sharing basis and the privacy of person inside bathroom was entirely left to mercy of other occupant of the room.
हम्म...एक बात गाँठ बाँध ली ...
फाईव स्टार होटल में बाथरूमबाज़ी से बाज आना चाहिए
कसम से आपके दोस्त के इन्वेंशन पे कोई कोपी राइट ले सकता है .....चीन वाले लाइन में आजकल पहले खड़े है
मक्की की रोटी ओर सरसॊ का सांग, साथ मै मुक्का मार कर तोडा हुआ प्याज... इस के सामने सारे फ़ाईव स्टार फ़ेल.... क्योकि इन मे दिखावा नही.हम ने देखा है इन फ़ाईव स्टार जाने वालो को इन चीजो पर लार टपकाते.
आप ने बहुत सुंदर लिखा, खास कर चाईनिश वाली बात बहुत अच्छी लगी, एक दो बार हमे भी जाना पडा इन होटलो मै, लेकिन सब कुछ दिखावा लगा, ओर हम भुखे ही वापिस आ गये
बहुते बढ़्या.. आपके साथ हमने भी 5* का आनन्द ले लिया .. :)
हम तो ५ स्टार होटेल हो, अमरीका हो, कनाडा हो या हवाईजहाज एक पानी की बोतल लेकर ही जाते है !
videshi shaili par achha ktksh .mjedar post.
सुशी के बाद सूसू!?
मज़ा आ गया आपके अनुभव पढ़ कर।
रही बात 'ढेलउवल क्रिया' की
तो कहते हैं ना
हमाम में सब ...
बी एस पाबला
खुशदीप जी ने याद किया!
अहा!!
बी एस पाबला
How much you and friends could really eat from the total quantity served? That is the real issue. How much food is everyday wasted like this, that u can imagine now!
रोचक :)
ढेला का अभिनव प्रयोग बचपन में हमने भी देखा है। लेकिन कर नहीं पाये थे।
अब टॉयलेट पेपर से जूझना पड़ता है तो हालत खराब हो जाती है। घर आकर नहाना पड़ता है।
अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...
मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी"में पिरो दिया है।
आप का स्वागत है...
ये ढेलउवल तो नहीं, हमारे गाँव में तो सागौन के पत्तों का व्यवहार अलबत्ता होता था।
रही बात फ़ाइव स्टार खाने की, तो बतकुचनी पतोहू और चटोरिया जबान का भरोसा नहीं कब धोखा दे जायें।
सतीश बाबू, फाइव स्टारी सुशी और शशि में कोई ज्यादा फर्क नहीं है. दोनों तेज़, दिमाग भन्ना देने वाले हैं. फाइव स्टारी सुशी का स्वाद अपने अकेले चखा और फाइव स्टारी शशि का स्वाद पूरा देश चख रहा है.
इग्यारह सौ रुपये में भोजन मुबारक!
बाकी टॉयलेट पेपर के रूप में खेत के बैंगन के पत्तों का प्रयोग कहीं सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला" ने भी बताया है! :)
Post a Comment