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Monday 7 September 2009

यमराज के ब्लॉगर बनने के बाद यह रही यमराज की पहली पोस्ट।


       यमराज को लगता है कुछ काम धंधा नहीं है। रोज आ जाते हैं घूमते टहलते।  उस दिन तो हद हो गई। कहने लगे कि फलां ब्लॉगर के प्राण हरने हैं, तुम भी साथ चलो।

मैंने कहा – क्यों ब्लॉगरों में सिर फुटौवल करवा रहे हो।

यमराज ने भृकुटी टेढी करते कहा  -  क्यों ? क्या मेरे साथ चलने से तुम्हें कोई परेशानी है ?

मैंने कहा - यदि किसी ब्लॉगर के प्राण लेते समय बाकी ब्लॉगर  लोग मुझे तुम्हारे साथ देख लेंगे तो कल को आरोप लग सकता है कि मैं ही हूँ जो ब्लॉगवार छेडे हुए हूँ और इसी के चलते एक ब्लॉगर को किसी भैंसे पर बैठ कर आये हुए गुंडे से मरवा चुका हूँ।  तुम तो उसके प्राण ले निकल लोगे, बाकी के ब्लॉगर मेरी जान खाएंगे….रोज दस-बीस  Anonymous टिप्पणीयां देते रहेंगे।

तो  दे  ही रहे हैं,  ले लेना। कुछ तुमसे ले तो नहीं रहे।

अच्छा ठीक है। तब यमराज जी आप ही ब्लॉगर क्यों नहीं बन जाते। आपके पास तो मरण से संबंधित रोचक संस्मरण होंगे। आपको भी पता चल जायेगा कि ये ब्लॉगर प्रजाति कितनी चालू हैं।

  ये आईडिया बुरा नहीं है। जरा अपना गोद-यंत्र देना तो – यमराज ने गदा को नीचे रखते हुए कहा।

यमराज का इतने जल्दी ब्लागिंग के लिये तैयार होना कोई हैरत की बात नहीं है। जबसे उन्होंने देखा  कि यमराज के आने के बावजूद ब्लॉगर भीष्म पितामह की तरह तब तक अपने प्राण नहीं त्यागता जब तक कि उसकी पोस्ट को शत्रु पक्ष और मित्र पक्ष दोनों  की ही  टिप्पणीयाँ न मिलें, तब से यमराज और व्याकुल हो उठे कि आखिर ये ब्लॉगिंग है क्या चीज ?
    
      मुझसे थोडी बहुत  तकनीकी जानकारी लेने के बाद यमराज जी तो एकदम रौ में आ गये और फिर उन्होंने लिखी अपनी पहली पोस्ट……..जिसका शीर्षक था  - 

                                                     'ब्लॉगिंग के बदलते आयाम'

      यम हैं हम……हम हैं यम। जहां जाते हैं लोगों के प्राण सूख जाते हैं। जिसकी ओर नजर उठा कर देखते हैं उसे काठ मार जाता है। लेकिन जाने क्यों मैं इन दिनों अपने उस प्रभाव को बरकरार नहीं रख पा रहा हूँ। विशेषत: तब जब किसी ब्लॉगर के प्राण हरने हो।
       
        ये ब्लॉगर भी कम्बख्त बडे चालू टाईप होते हैं। कुछ ब्लॉगर तो एक प्रोफाईल सही रखते हैं  बाकी दो प्रोफाइल फर्जी रखते हैं।  प्रोफाइल देख कर एक दो जगह गया था प्राण हरने, पता चला कि जिंदादिल सिंह के प्राण हरने थे वहां कोई जिंदादिल कौर नाम की महिला ब्लॉगर है औऱ एक जगह तो जिंदादिल की कौन कहे कोई मुर्दादिल ब्लॉगर भी नहीं मिला। कम्बख्तों ने खामखा दौडा दिया। भैंसा मेरा अलग परेशान था। उसे भी आश्चर्य था कि ये ब्लॉगर इतने चालू टाईप के कैसे होते  हैं।

       खैर, एक जगह मैं IP Address देख कर प्राण हरने गया था। जाने पर पता चला कि वह IP Address तो  भले ही फलां जगह का दिख रहा है लेकिन असल में वह ब्लॉगर Router के जरिये धरती के उस पार अमरीका से ब्लॉगिंग कर रहा है। मैं ब्लॉगरों के इन पैंतरों से इतना तंग आ गया कि सही  Router और IP Trace करने के चक्कर में मैने Networking  की क्लासेस भी Join की। जब मैं भैंसे पर बैठ अपनी गदा लेकर क्लास पहुंचता था तो नये नये बचकुंडे मुझे Fancy dress कहकर चिढाते थे। मैं वह भी झेल गया। लेकिन मै यह नहीं झेल सका कि कोई मेरे भैंसे को  सलमान खान कह कर  चिढाये। माना कि मेरा भैंसा कुछ नहीं पहनता पर रहता तो शरीफों की तरह है।
  
       खैर, ये तो ब्लॉगरों की बातें हैं। अब मैं इन्सानों की बात बताता हूँ। न न….आप ये मत पूछना कि ब्लॉगर क्या इन्सान नहीं होते ? होते हैं पर वो Virtual World के होते हैं यानि कि - हैं लेकिन नहीं हैं……..हैं भी और नहीं भी। अब छोडिये भी आप लोगों को गूढ ब्लॉगात्मिक बातें क्या समझाउं।

       हां, तो एक दिन एक जगह प्राण हरने जा रहा था। रास्ते में ही एक घर सदरू भगत का पडा। सदरू भगत की पत्नी रमदेई अपनी फाफामउ वाली पतोहू को डांट रही थी। उसका डांटना देख मेरा भैंसा बिदक गया और चलते चलते एक खोह में जा घुसा। मैं किसी तरह गिरते गिरते बचा हूँ।
   
        फाफामउ वाली पतोह का डांटने का कारण भी बडा अनोखा था। गाँव देहात में होता यह है कि जिस किसी  नई नवेली विवाहित महिला को किसी पडोसी महिला से बात करनी होती है  तो  वह तरकारी बनाते समय एक लोटा पानी अलग से  कडाही में  डाल देती है। जिससे कि कडाही में पानी खौल खौल कर जलता रहे और तरकारी बनने का समय बढ जाय। और यही वह Extra Extended समय होता है जब घर की नई नवेलियों को अगल-बगल वालीयों से बातचीत करने का Talk Time मिलता है।

           सास रमदेई इन सब पैंतरों से वाकिफ थी, आखिर उसने भी तो अपने समय इसी तरह का Talk Time Recharge किया होगा। सो, शुरू हो गई फाफामउ वाली पतोह पर राशन पानी लेकर। तुझे आग लगे…..तू मर जाये….तू ये हो जाय……। बताओ भला, अब मैं सिर्फ कडाही में एक लोटा पानी बढा देने के कारण किसी के प्राण कैसे लूँ।

        अब यही सब देख ताक कर परेशान हूँ। सोचता था कि किससे यह सब बातें कहूँ। जो देखा सुना वह सब बताने को जी मचल रहा था तो एक ब्लॉगर मिले सतीश पंचम।  वही सब कुछ सीखा पढा कर मुझे भी ब्लॉगर बनवा दिये वरना मैं भी था  देवता कभी काम का । चित्रगुप्त का फोन आता रहता है कि महाराज कहां ब्लॉगिंग के चक्कर में पडे हो, यहां डेली डेडली अकाउंट पेंडिंग होता जा रहा है।

       आज कल अपनी गदा, जो  कि  इस्तेमाल न होने के कारण शो-पीस बन कर रह गई है उसे टटोल रहा हूँ कि क्या इस पर कोई पोस्ट लिखी जा सकती है ?


- यमराज

स्थान-  वही , जिसकी पक्की सडकों पर चलने से मेरे भैंसे के खुर घिस गये।

समय – वही, जब मैं किसी के प्राण लेने पहुँचु और वह सूफीयाना अंदाज में गीत गाता मिले -
            आज दिन चडिया तेरे रंग वरगा.....रब्बा तैनुं दिल दा वास्ता


चित्र - साभार Flicker.com से

8 Comments:

Udan Tashtari said...

यमराज भाई

आपका हिन्दी ब्लॉगजगत में स्वागत है. अब नियमित लिखें और प्राण हरें.

हम टिपियाते रहेंगे इसलिये हमें बक्शें. बाकी जिसे चाहें, ले जाये. बाई वन गेट वन की स्कीम है..एक ले जाओगे, एक साथ फ्री भिजवायेंगे.


और हाँ, कृप्या वर्ड वेरीफीकेशन न लगाना वरना प्राण हरना तो दूर, टिप्पणी को तरस जाओगे, चेता रहा हूँ.

कोई आपको गाली न बके, इस हेतु मॉडरेशन ऑन कर लो.

जय हो यम..

सादर!!

सतीश पंचम said...

@ समीर जी,

यमराज भाई

आपका हिन्दी ब्लॉगजगत में स्वागत है. अब नियमित लिखें और प्राण हरें.


अरे का समीरजी, मेरे से आपकी कौनो दुसमनी है का ? काहे यमराज जी को मेरे मत्थे मढ रहे हैं :)

एक तो जहां जाते हैं मुझे कहते हैं तुम भी चलो, तुम ब्लॉगर के कम्प्यूटर का स्विच ऑफ करना मैं उसके प्राण हरूंगा वरना जब तक कम्प्यूटर ऑन रहे ब्लॉगर प्राण छोडने को तैयार नहीं होता :)

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

नमस्कार सतीश पंचम जी। मैं यहां इलाहाबाद का बाशिन्दा हूं। आपकी यहराज जी से खासमखास है, लिहाजा आपसे मैत्री करना चाहता हूं।

वो क्या है कि यहां चार पांच इस टाइप के बन्दे हैं जो यम जी बिना ज्यादा तहकीकत के पकड़ ले जा सकते हैं। आप यम जी का ई-मेल एड्रेस दें तो डीटेल्स भेज दूं।

कृपया हैल्प करें! :)

सतीश पंचम said...

@ ज्ञानदत्त जी,

मैं यहां इलाहाबाद का बाशिन्दा हूं। आपकी यहराज जी से खासमखास है, लिहाजा आपसे मैत्री करना चाहता हूं।


यमराज जी, आप ही से मिलने इलाहाबाद गये थे, मालगाडी मे भैंसे को कुरियर करने के बाबत, कुछ कन्सेशन चाहते थे..... पर पता चला आप गंगा के किनारे तफरीह करने गये हैं तो यमराज ने सोचा आपके घर के बाहर बने ओटले पर बैठ कर सुस्ता ही लिया जाय।

लेकिन यमराज को क्या पता था कि आप काशी की अस्सी और राग दरबारी जैसी क्लासिक जगह पर रहते हैं। सो, आपके बगल वाले बुधिराम यादव जी यमराज के भैंसे को थोडी देर के लिये अपनी भैंस के लिये मांग कर ले गये थे यह कह कर कि अच्छी नस्ल की पंडिया चाही, पता चला यमराज का भैंसा अब भी इलाहाबाद में ही विचरण कर रहा है और यमराज उसे ढूँढ -ढूँढ कर परेशान हैं :)

हो सके तो यमराज जी की मदद करें, वहीं कहीं अल्लापुर में अब भी भैंसा ढूँढ रहे हैं मंगल उर्फ सनीचरा उर्फ जवाहिरलाल को लेकर :)

हिमांशु । Himanshu said...

यम से कहें समभाव रखें । अवधारणा न बनायें । सोच के क्यों जाते हैं कहीं ?

ब्लॉगिंग चित्रगुप्त को भी सिखायें - ये डेडली एकाउंट ही डेड हो जायेगा ।

वाणी गीत said...

यमराज जी की पहली पोस्ट का स्वागत है ...मरते क्या न करेंगे ...जल में रहकर मगरमच्छ से बैर कैसे चलेगा ... स्वागत तो करना पड़ेगा ..!!

ताऊ रामपुरिया said...

यमराज जी आपका ब्लागजगत मे स्वागत है, समीरजी के सुझावो का पालन करें, वर्ड वैरीफ़िकेशन हटाले, और मोडरेशन आन कर लें.यह सबसे जरुरी है.

यहां ब्लागर आपके द्वारा प्राण हरण के डर से डरने वाले नही हैं क्योंकि वो तो ब्लागिंग ही प्राण दांव पर लगा कर करते हैं घर वालों के डर से.:)

रामराम.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

यमराज जी अपना भैंसा ढूंढ़ रहे हैं फटफटा कर; तो फिर क्या?! तब तो वे हमसे दोस्ती करने को हमारे पीछे घूमें!
हम काहे भाव दें उन्हें! :)

बातें, जो जाने की जल्दी मचा रही हैं.....

कुछ बातें जल्दी मचाती हैं कि मैं जा रही हूँ......मैं न रूकूंगी। समय भी उन्हें ऐसा करने के लिये उकसाता रहता है कि कह दो कि देर हो रही है.......बहुत रूक लिये......हम जा रही हैं........अब न रूकेंगी.............ऐसी ही बातों को देखने पढने के लिये इस राह से गुजर सकते हैं जहां समय को एकबारगी धकियाया जा सकता है कि समय तुम बीत गये तो क्या हुआ ? ठहरने की सांकल तो अब भी खटखटायी जा सकती है......

ऐसी ही बीते-अनबीते पलों को इन लिंक्स के जरिये देखा जा सकता है ।

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