तो ?
-अरे हम हैं यम.....तुम्हारे प्राण लेने आये हैं।
-देखिये यमराज जी, अभी अभी एक पोस्ट पब्लिश की है ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत वाले इसे दिखाते ही होंगे......टिप्पणीयां भी बस आने वाली ही हैं......चौबीस घंटे और रूक जाइये.....उसके बाद प्राण ले लो चाहे मेरी पोस्ट डिलीट ही कर दो....कोई फर्क नहीं पडता.....एक ब्लॉगर होने के नाते इतना तो हक बनता ही है।
-ये ब्लॉगर क्या चीज है ?
-यमराज जी, ब्लॉगर नहीं पता आपको......बडे वाहियात किस्म के हैं आप । आज के जमाने में आपको पता होना चाहिये कि एक ब्लॉगर क्या चीज है .
-वो चीज.....मेरा मतलब वो ब्लॉगरी इसी दुनिया में मिलती है या कहीं और से आती है।
-जी आती तो इसी दुनिया से है पर हर ब्लॉगर अपने आप को अलग ही दुनिया का मान कर लिखता है।
-अच्छा।
-हां और क्या ?
-तो तुम भी कुछ लिख रहे हो क्या।
-हां....मैं भी कुछ लिख ही रहा हूँ......पोस्ट अभी अभी पब्लिश की है। जरा पढिये तो.......।
-अरे ये क्या लिखा है तुमने.......गुलजार के गीत पर आधारित पोस्ट......एक ही लट सुलझाने में सारी रात गुजारी है.....अरे पहली बार मोहब्बत की है।
-यही तो है मेरी पोस्ट का विषय......कि कैसे खूबसूरत गीत गुलजार जी लिख रहे हैं कि बस मगन हो सुनते रहो।
-इसमें मगन होने की क्या बात है। लट तो मैने भी बहुत सुलझाई है।
-तो क्या आपने अपनी यमराजिन जी के लट सुलझाये हैं ?
-अरे नही....कभी सुना है कि मेरी कोई यमराजिन वगैरह भी है ?
-तब ?
-अरे मैं अपनी लट खुद सुलझाने की बात कर रहा हूँ।
-कुछ समझा नहीं ?
-अरे इसमें समझना क्या है ? मेरे बालों को देख कर समझ नहीं आ रहा कि इतने बडे मुकुट को संभालने के लिये बडे बालों की पैकिंग लगती है ताकि मुकुट हिले-डुले नहीं बल्कि बालों में एक जगह स्थिर रहे।
-अच्छा तो इसी लिये पौराणिक कैरेक्टरों के बाल इतने बडे बडे होते थे......ग्रेट। लेकिन इसमें लट सुलझाने की बात कहा से आ गई।
-अरे तुम नहीं समझोगे......जरा गुलजार का गाना फिर बोलो तो.....
-एक ही लट सुलझाने में सारी रात गुजारी है.....पहली बार मोहब्बत की है।
-हां....तो तुम्हारे कवि ने पहली बार मोहब्बत की तो लट सुलझाई.......मैं भी तब लट सुलझाता हूँ जब मुझे किसी के प्राण हरने हों और लगे कि इसके प्राण कुछ और देर रहने देना चाहिये ।
-ऐसा कब लगता है आपको ?
-फिल्मों में।
-मतलब ?
-अरे भाई, जब फिल्मों में कोई मरने वाला होता है तब वह बेटे का इंतजार करता है। बेटे के आते ही वो एक दो बात बोलकर टैं बोल जाता है। बेटे के आने और उसके प्राण अटकाने के बीच मैं अक्सर अपनी लट सुलझाता रहता हूँ। मुझे भी उस शख्स से प्राण हरने तक वक्ती मुहब्बत सी हो जाती है कि कम से कम अपने बेटे को तो देख ले।
-ओह तो वह आप ही थे जो बेटे को मिलवाकर ही फिल्मी बाप या मां के प्राण हरते थे।
-हां और क्या......तुम लोग नाहक ही डायरेक्टर को क्रेडिट देते रहते हो। हां...आगे क्या लिखा है
तुम्हारे कवि ने ?
तुम्हारे कवि ने ?
-लिखा है कि –
याद है पीपल के घने जिसके साये थे
गिलहरी के जूठे मटर हमने खाये थे
ये बरकत उन हजरत की है
पहली बार मुहब्बत की है......
-अच्छा तो गिलहरी के जूठे मटर खाने से तुम्हारे कवि को प्रेयसी मिली।
-हां, लिखा तो ऐसा ही है।
-हमम्.....मैं भी सोचता हूँ कि यमराजिन को ला ही लूँ......लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा कि मेरी यमराजिन मुझे मिलेंगी कहां।
-तो आप भी गिलहरी के जूठे मटर क्यों नहीं खाते ?
-खा तो लू पर तुम्हारे शहर के बडे बडे मॉल तक में चूहों के जूठे मटर मिलते हैं.....गिलहरी के जूठे मटर मिलना तो दूर की बात है।
-हां, ये बात तो है......न जाने कैसे चूहे हर 'पेटीपैक माल' में मुंह मार लेते हैं और वह जूठा हो जाता है।
-पेटीपैक माल ?
-अरे पेटीपैक माल नहीं जानते ? जो माल कारखाने से आने के बाद अब तक खोला न गया हो...जिसकी सील न खुली हो उसे पेटीपैक माल कहते हैं। और मटर तो 'पेटीपैक प्रजाति' की है। बिना उसके खोल निकाले मटर खाई नहीं जाती ।
-ओह......नया शब्द है शायद .......पेटीपैक ?
-हां....कुछ ऐसा ही समझो। अरे आपने तो नई पोस्ट के लिये और कन्टेंट मुहैया करवा दिया। अब ऐसा किजिये कि ये पेटीपैक शब्द पर एक पोस्ट ठेल दूँ तब आप मेरे प्राण लिजिये। तब तक टिप्पणीयां भी आ जायेंगी।
-ये क्या नई बला है। तुम्हारी पोस्ट पर आई टिप्पणीयां क्या तुम्हारे प्राणों से ज्यादा महत्व रखने लगी है।
-जी, कुछ ऐसा ही समझिये।
-अच्छा तो मेरी एक टिप्पणी अभी लो।
-बताईये
............ और यमराज जी ने टिप्पणी की -
............ और यमराज जी ने टिप्पणी की -
..........कल को तुम यदि तुम मर जाओ तो तुम्हारे पोस्ट और टिप्पणीयों का क्या होगा। तुम्हारी टिप्पणीयां तो सर्वर पर ही पडी रहेंगी न। तुम्हारे ब्लॉगर साथी कुछ कुछ दिनों बाद घूम फिर कर आएंगे और कहेंगे कि कुछ लिखो.....लिखते क्यों नहीं.....पर तुम होगे तब न। ऐसे में तुम्हारी टिप्पणीयां वगैरह कहां जाएंगी ?
- यमराज की बात सुनकर मैं सोच में पड गया हूँ.........सोचता हूँ कह दूँ कि मरने के बाद जो भी टिप्पणीयां आएंगी वह 'व्योम' में चली जाएंगी लेकिन अब सोचता हूँ.......टिप्पणीयां 'व्योम' में ही जाएंगी इसकी क्या गारंटी है......सर्वर तो अब भी अप ही है.......जिस दिन सर्वर डाउन हुआ......समझिये कि सारी टिप्पणीयां व्योम की ओर चलीं :)
...... और हम अब चले नहाने......श्रीमती जी कब से कह रहीं हैं कि संडे है तो क्या नहाने का भी संडे मना रहे हो ? .....सोचता हूँ कि पत्नीयों की उलाहना भरी बातें कभी 'व्योम' में क्यों नहीं जातीं,..... ढंग से ब्लॉगिंग भी नहीं करने देतीं ये क्या किसी यमराज से कम हैं :)
...... और हम अब चले नहाने......श्रीमती जी कब से कह रहीं हैं कि संडे है तो क्या नहाने का भी संडे मना रहे हो ? .....सोचता हूँ कि पत्नीयों की उलाहना भरी बातें कभी 'व्योम' में क्यों नहीं जातीं,..... ढंग से ब्लॉगिंग भी नहीं करने देतीं ये क्या किसी यमराज से कम हैं :)
- सतीश पंचम
स्थान - मुंबई ।
समय - वही, जब कडाके की ठंडी 'पूस की रात' में 'हल्कू' और उसका कुत्ता 'झबरा' खेतों की रखवाली के लिये आम के सूखे पत्तों का अलाव जलाकर गर्माहट महसूस कर रहे होते हैं इस फिक्र में हैं कि इस फसल से पाई-पाई जोडकर मालगुजारी चुकानी है और तभी कहीं दूर एक गीत बजता है......रात के ढाई बजे......कोई शहनाई बजे........दिल का बाजार लगा....धेला-टका-पाई बजे।
चित्र - साभार Flicker.com से
चित्र - साभार Flicker.com से


15 Comments:
subhah subhah kaha yamraaj ke darshan ho gaye,soch ke hi dar lagta hai,post likha aur koi tipani aane se pehle yumraj utha ke le gaye, iske jaisi badi naainsaafi koi aur nahi hogi,yumraaj ji ko blogger ka shaap bhi lag sakta hai:)
हिन्दी के एक पुरोधा ब्लॉगर की एक छोटी सी मुलाक़ात यम् से ! अब कलयुग जाने वाला है !
गजब भयो रामा अजब भयो रे!!
ये भी तो ससुरा पेटीपैक माल ही है. :)
यम् से मुलाकात रोचक रही..टिपण्णी नहीं करनी है तो ना करें ऐसे डराएँ तो नहीं कम से कम..!!
पेटीपैक बहुत बढ़िया बेचारे यमराज जी भी सोच रहे होंगे कहाँ इस ब्लॉगर के चक्कर में पड़ गया, अब देखो शायद रिसर्च करने के बाद यमराज जी भी कोई नया ब्लॉग लिखना शुरु कर दें कि कौन से ब्लॉगर का नंबर है जिससे वह ब्लॉगर अपने पाठकों को पहले ही सचेत कर पाये कि अब आपकी टिप्पणियाँ व्योम में जाने वाली हैं।
सृजनात्मक।
यमराज ने ब्लागर को सावित्री का ही अवतार समझा होगा .. पसीने छूट रहे होंगे उसके !!
हां हां...मेरे पास भी आये थे....मैंने तो कहा ..सर मेरे फ़ौलोवर की लिस्ट में ...घुस जाओ ..जिस दिन लगे कि मैं पोस्ट नहीं ठेल रहा हूं...बस उसी दिन आना.....मुझे पता है...भैंसे पर बैठ कर वो फ़ौलो ही करते रह जायेंगे....और हम रोजिन्ना पोस्ट ठेलेंगे.....
क्या हम यमराज को ही ब्लोगर नहीं बना सकते? एक बार ब्लोगर बना तो पोस्ट लिखने में ऐसा बिज़ी होगा कि लोगों के प्राण हरना भूल जायेगा। यदि ऐसा हो पाए तो सबसे अधिक फायदा मुझे ही होगा।
बढ़िया!
* हर ब्लॉगर अपने आप को अलग ही दुनिया का मान कर लिखता है
* बडे बडे मॉल तक में चूहों के जूठे मटर मिलते हैं..
* पत्नीयों की उलाहना भरी बातें कभी 'व्योम' में क्यों नहीं जातीं, ये क्या किसी यमराज से कम हैं :)
वाह वाह
और यह यमराज को श्राप देने वाली बात!!
अवधिया जी भी ठीक कहते हैं
क्या हम यमराज को ही ब्लोगर नहीं बना सकते?
जो यमराज को बातों में उलझा ले, वह तो काल जयी हो गया!
आप को तो ऑनलाइन शत शत नमन मित्रवर!
और एक पेटीपैक प्रणाम ऑफलाइन के लिये भी! :)
अब आप लोगों की प्रतिक्रिया देख कर लगता है यमराज जी को ब्लॉगर बनाना ही पडेगा। चलिये इसी बहाने कुछ मरण संबंधी रोचक संस्मरण पढने मिल जाएंगे :)
एक बानगी देखिये .......
यमराज जी ब्लॉगर के प्राण हरने आए और पता चला कि वो तो फर्जी प्रोफाईलधारी है। अब यमराज करें क्या...... किसके प्राण लें...... अनाम ब्लॉगरों की तो पूरी फौज खडी है :)
अगली कडी शायद यमराज जी के ब्लॉगर बन जाने पर ही होगी।
पेटीपैक माल एक मौजदार ऍक्स्प्रॅशन बन गया है. यमराज जी को आपने जिस अंदाज़ में पेटीपैक करके वापस भेज दिया वह दिलचस्प है. गुरु यह तो किसी blog का नाम भी हो सकता है. पेटीपैक में बहुत कुछ हो सकता है. पेटीपैक का मतलब यह भी हो सकता है कोई ऐसी चीज़ जिसमे सारे मसाले मौजूद हों.
भाई हमारी तो यमराज जी से पुरानी पहचान है.
रामराम.
भैया मज़ा आ गया...आपकी शैली से
heheheheheeh........ mazaa aa gaya pancham ji
maza aa gaya.....
aayiye ..... aapko ek aur rochak jaankaari milegi.... www.lekhnee.blogspot.com
aur comments ke liye aapka bahut bahut dhamyawaad/.........
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