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Saturday 5 September 2009

स्कूल के मास्टर लोग शादी-विवाह में बैंड बजाते हैं

                  पेशे से शिक्षक रहे विवेकी राय जी ने 'मनबोध मास्टर की डायरी' में व्यंगात्मक शैली में बताया है कि किस तरह वह एक बैंडबाजे वाले की खोज में चले और उन्हे पढे लिखे बैंडबाजे वालों के एक दल के बारे में जानकारी मिली। एक जन ने बताया कि -

स्कूल के मास्टर लोग शादी-विवाह में बैंड बजाने का काम करने लगे हैं। ..... ये लोग बजनिया नहीं हैं लेकिन पेट और परिस्थिति जो न करावे । इनमें बीएड, बीपीएड, विद्यालंकार, शास्त्री, आचार्य सभी शिक्षित लोग हैं। इनके एक रात का सट्टा भी ज्यादा नहीं है - बस पांच सौ रूपये रात समझिये।

सभी अध्यापक हैं ?

'पूरा स्टाफ समझिये । वह जो बडा सा ढोल होता है और जिसे ड्रम कहते हैं तथा जो इतने जोर से बजाया जाता है कि उसकी आवाज से घर की खपरैल तक खिसकने लगती है। उसे अंग्रेजी के लैक्चरर बजाते हैं। संस्कृत वाले पंडित जी तमूरी पिटपिटाया करते हैं। ......इतिहास के अध्यापक शक्सफोन और नागरिक शास्त्र के अध्यापक बल्टहार्न बजाया करते हैं। कमाल का काम है कारनट का। सो इसे गणित और विज्ञान के अध्यापक बजाते हैं। हिन्दी विभाग यहाँ भी उपेक्षित है। हिन्दी टीचर को झाँझ मिली है। बजती तो खूब झमाझम है पर अन्य सुरीली आवाजों के आगे उसकी क्या बिसात है ? अर्थशास्त्री वाले मसक बजाते हैं। एक बार हवा भर दी तो बस उंगलीयाँ भर हिलानी है। ......महत्व का काम पीटी टीचर का है।......यहाँ डांसर बिना बैण्ड अधूरा लग रहा था। बाहर से रखने पर अपनी मौलिकता जाती रहती। इसीलिये शारिरिक शिक्षक ने इसमें अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार यह दल तैयार हो गया।

......तो ये बाजा बजाना औऱ अध्यापन कैसे एक साथ कर लेते है ?

बाजा वे गर्मी की छुट्टियों में ही बजाते हैं। प्रायः हमारे यहाँ लग्न विवाह के दिन उसी लम्बी छुट्टी में पडते हैं। अध्यापकों के पास शिमला, नैनीताल मे तरावट लेने के लिये जाने भर तो पैसा होता नहीं। .....सो एक दो महीने का धन्धा उठा लेते हैं।......

.......इनको बारात में ले जाने से कई समस्यायें हल हो जायेंगी। बैठे बिठाये सफेदपोश बाराती मिल जायेंगे। ......बाजा बजाने के बाद जब कपडे बदल कर ये लोग महफिल में बैठते हैं तो महफिल उग जाती है। वह खादी की चमक, वह टोपी-चश्मा, वह भव्य व्यक्तित्व तथा मुख पर विद्या का वह प्रकाश। बारात में बैंड बाजे के साथ कोई बोलता आदमी भी होना चाहिये। यहाँ दर्जनों मिल जाते हैं। संस्कृताध्यापकों को तो बारात में शास्त्रार्थ का एक नशा जैसा है....।

......कर्मकांड की समस्या भी हल। द्वार पूजा से लेकर विवाह तक के सारे काम संस्कृताध्यक्ष से करवा लिजिये। अगर बाजा बजते में कोई मौका आ गया तो उन्हें छुडाया भी जा सकता है...तमूरी ही तो बजाते हैं।

लेखक ने इतना जानकर सोचा कि इन अध्यापकों वाले बैंड बाजे से किस तरह बात की जाये - पढे लिखे लोग हैं। सो लेखक ने कई मजमून बनाये -



- क्यों महानुभाव आपकी एक रात की सेवा का क्या पुरस्कार होता है ?

किन्तु यह बात जँची नहीं। दूसरा मजमून बनाया -

- आपके अनुरंजन कार्य की दैनिक दक्षिणा क्या होगी ?

नहीं यह भी नहीं जम रहा। अंत में लेखक ने मजमून कुछ इस तरह तैयार किया -

- हमारे यहाँ के माँगलिक कृत्य के सानन्द सम्पन्न होने में आपका जो अमूल्य सहयोग प्राप्त होगा उसकी मुद्रा रूप में कितनी न्योछावर आपकी सेवा में उपस्थित करना हम लोगों का कर्तव्य होगा ?

यह वाक्य कुछ जमा और विशिष्ट बजनियों के गौरव के अनपरूप जँचा।

*******

     विवेकी राय जी ने यह व्यंग्य तब लिखा था जब शिक्षकों की तनख्वाह रोक ली जाती, महीने के पचास साठ रूपये वेतन मिलते थे। आज भी कई शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों को परले दर्जे का कारकून ही समझा जाता है। यह व्यंग्य उसी की याद दिलाता है। विशेष रूप से बाजे का चुनाव शिक्षकों के विषय से मैच कर रहा है - झाँझ - हिंदी विभाग को - बजती तो झमाझम है पर बाकी बाजों के सामने उसकी क्या बिसात...और विशेषकर पीटी टीचर का डांसर बनना तो अहोभाग्य ठहरा :)


चित्र- शिक्षामित्रों के ट्रेनिंग सत्र  का है जो कि मेरे अनुज  ने गाँव में ही एक जगह खींचा था।
पुस्तक अंश साभार - 'मनबोध मास्टर की डायरी'
लेखक - डॉ विवेकी राय
अनुराग प्रकाशन
चौक, वाराणसी- 221001

( पहले भी यह पोस्ट प्रकाशित हो चुकी है, लेकिन आज शिक्षक दिवस पर पुन: प्रकाशित  )

 - सतीश पंचम

8 Comments:

Pankaj Mishra said...

पहले भी पढा था तो बहूत अच्छा लगा था आज दुबारा पढ़के भी अच्छा लगा . वाकई जानदार व्यंग

Nirmla Kapila said...

बहुत तीखा और गहरा व्यंग है और सरकार के मुँह पर तमाचा है आभार और लेखक को बधाई

अरुण राजनाथ उपाख्य अरुण कुमार said...

सतीश जी, शिक्षक दिवस पर यह पोस्ट आपने पढ़वाई. आज का शिक्षक पहले दर्जे का नहीं बल्कि निचले दर्जे का कारकुन है. और अगर किसी प्राइवेट स्कूल में हो तो उसके utpeeran की कोई इन्तहा नहीं.

shama said...

Kitnaa afsos, ki, jo hamaree harek peedhee kee neev rakhte hain, unkee ye durdasha ho..!

http://shamasansmaran.blogspot.com

http://kavitasbyshama.blogspot.com

http://lalitlekh.blogspot.com

http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

Manish Kumar said...

शुक्रिया इस किताब की झलकी से रूबरू करानढ़ के लिए...

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

शिक्षकों की दयनीय स्थिति को चित्रित करती बहुत ही धारदार व्यंगात्मक प्रस्तुति है.....बहुत दुख की बात है कि जिनके कंधों पे देश के भविष्य निर्माण का बीडा है,आज उन्ही लोगों का भविष्य अंधकारमय दिखाई देता है.....

Udan Tashtari said...

आभार इस रोचक पुस्तक की चर्चा का.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

मुझे तो अपना दफ्तर का सभाजीत याद आता है। शादी के सीजन में दफ्तर से गायब हो जाता है और बन जाता है बजनिया! :)

बातें, जो जाने की जल्दी मचा रही हैं.....

कुछ बातें जल्दी मचाती हैं कि मैं जा रही हूँ......मैं न रूकूंगी। समय भी उन्हें ऐसा करने के लिये उकसाता रहता है कि कह दो कि देर हो रही है.......बहुत रूक लिये......हम जा रही हैं........अब न रूकेंगी.............ऐसी ही बातों को देखने पढने के लिये इस राह से गुजर सकते हैं जहां समय को एकबारगी धकियाया जा सकता है कि समय तुम बीत गये तो क्या हुआ ? ठहरने की सांकल तो अब भी खटखटायी जा सकती है......

ऐसी ही बीते-अनबीते पलों को इन लिंक्स के जरिये देखा जा सकता है ।

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