सफेद घर में आपका स्वागत है।

Tuesday 18 August 2009

नेता रीलोडेड विथ NDTV

आज एनडीटीवी पर कोसी में आई बाढ के एक साल पूरे होने पर एक रिपोर्ट देख रहा था। इस रिपोर्ट को देख कर एक साल पहले का दृश्य सजीव हो उठा। लोगों की त्रासदी और नेताओं के दोगलेपन को उजागर करती रिपोर्ट देख मुझे एक साल पहले की वह खबर याद आई जिसमें नेताओं द्वारा राहत कैम्प से तब तक कोई राहत नहीं दी जाती थी जब तक कि कोई नेताजी उसका उदघाटन न कर दें। अखबारों मे कहीं कहीं इस बात की चर्चा हुई थी तब। उसी बात पर मैंने एक पोस्ट लिखी थी। पेश है वही पोस्ट फिर एक बार -

- नेताजी रीलोडेड



बाढ राहत केंद्र में मधेपुरा के बोदर ने अपनी टांग खुजाते हुए कहा - ससुर पेट चुरूर मुरूर कर रहा है, कुछ बांट ओंट नही रहे हैं। सहरसा से आये रामलवट यादव ने कहा - जी तो हमारा भी ठीक नहीं है......आज चार दिन हो गया पेट में एक दाना नहीं गया है, जाने का कर रहे हैं ई राहत उहत वाले कि अभी तक किसी को अंदर केंद्र में जाने ही नहीं दे रहे। इतने में शोर हुआ कि नेताजी आय गये हैं - अब सब कोई अपना पत्तल - कुल्हड, गिलास- उलास संभाल लिजियेगा, कोई किसी को धक्का उक्का न दे, और हाँ जैसे ही नेताजी फीता काटें तो सब लोग ताली जरूर बजाइयेगा।

रामलवट समझ गये कि क्या होने वाला है.......मन ही मन बोले.......अरे तोरी बहिन क भकभेलरू ले जाय........ससुर अबहीं घाटन करेंगे तब जाकर दाल ओल बंटेगा। बोदर की समझ में न आया कि आखिर ये फीता-कटन्नी क्यों हो रही है, और हो रही है तो नेता ही क्यों काट-कूट रहा है.......आज तक तो न सुना था कि कभी बडे लोग कोई गत का काम किये हों। रामलवट यादव के कान के पास मुंह ले जाकर बोला - ई फीता उता काहे काट रहा है? और काट रहा है तो दाल ओल उसके काटने के बाद ही मिलेगा ऐसा क्यूँ , क्या फीता काट कर उसी दाल में डालेगा क्या। रामलवट ने बोदर की बात पर हल्के से मुस्कराते हुए कहा - अरे तुम नहीं जानते- ये घाटन नेता हैं, हर जगह कैंची लेकर चलते हैं, जहां देखते हैं कोई नया काम हो रहा है, फट से घाटन करने के लिये फीता काट देते हैं। बगल में खडे लालराज कोईरी जो थोडा पढे जान पडते थे, बोले - अरे भाई घाटन नहीं, उदघाटन कहो। रामलवट ने लालराज की बात को फटाक से खतम करने की ईच्छा से कहा - हाँ वही....वही घाटन । ईधर लालराज सोच में पड गये कि ये निरा चुघ्घड तो नहीं है क्या...........बता रहा हूँ उदघाटन तो कह रहा है हाँ वही घाटन....लालराज ने चुप रह जाना ठीक समझा।

रामलवट जारी थे........तो ऐसा है कि चाहे कैसा भी काम हो, यहां तक कि सौचालय भी खुलवाना हो तो ये घाटन नेता से ही खुलवाये जाते हैं, इधर फीता काटा उधर नया काम सुरू। बोदर को अजीब लगा.....ये क्या कि लोग एक तो पहले से ही परेशान हैं....बाढ....पानी....बरखा-बुन्नी से, उपर से ये घाटन महाराज और तुले हुऐ हैं कि पहले फीता काटेंगे तभी सबको भोजन मिलेगा। बोदर ने गाली देते हुए कहा - मालूम पडता है ऐनके बाप जब ईनको पैदा कर रहे थे तो हाथ में चाकू भाला लिये हुए थे......ससुर क नाती.....आये हैं घाटन करने......अरे पूछो ये भी कौनो बात हुई कि लोग भूख से बेहाल हैं.....आंते कुलबुला रही हैं, ठीक से खडे नहीं रहा जा रहा और ये नेता लोग होटिल से खा पीकर अच्छे से चले हैं कि अब तनिक ईत्मिनान से बाढ राहत केंद्र का उदघाटन किया जाय.......अरे जा घोडा क सार.......कबहूँ तुम पर भी पडेगी......इतना अनेत कर रहे हो तो समझ लो कि उपर वाला भी जब तोहार रसलील्ला खतम करेगा तो फीता काट कर ही करेगा।

तभी नेताजी ने भाषण देना शुरू किया - भाईयो....जब बच्चा जन्म लेता है तो उसके नाभी का फीता काटने के लिये दाई आती है.......बस आप मुझे वह दाई समझ लेना कि जो ये फीता काटकर कुछ सहयोग दे रहा हूँ, आप लोग नाराज न होना.....बात ये है कि ईस तरह फीता काटने से मीडिया और आप लोगों के द्वारा सब को पता चलता है कि यहाँ बाढ राहत सेन्टर खुल गया है ईसलिये हम ये फीता काटन किये हैं वरना हम तो ये न करते.......।इतने में भीड का धैर्य जवाब देने लगा ...... किसी ने चिल्ला कर कहा - अरे ये फीताक्रमी को हटाओ यार...... बहुत पढे हैं बिज्ञान में फीताक्रमी.....गोलक्रमी......सभी ससुरे कीडे होते हैं पेट के........ये भी एक पेट का ही कीडा है जो हमें भूखा रख रहा है......।

इधर लालराज ने मन ही मन कहा - शरीर को तो पेट के कीडे वाले रोग से मुक्ति मिल जाती है लेकिन इस फीताधिराज से जाने कब मुक्ति मिलेगी जो हमारे मरने में भी सहयोग करना चाहता है...............फीता काट कर ।



*फीताक्रमी = Ribbon Worm (पेट का एक प्रकार का कीडा)


- सतीश पंचम


4 Comments:

Pankaj Mishra said...

सतीश जी पहली बार मै आपके ब्लॉग पे यही घटन वाली घटना ही पढ़ा था तब सी आज तक लगातार आपको पढ़ रहा हू आपकी लेखनी में गुदगुदी है !!
पंकज

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

नेता नामक प्रजाति का विकास भारत के प्रजातन्त्र के बनने के बाद बहुत सिस्टमैटिक तरीके से हुआ है। यह इतना विधिवत है कि नेतालाजी में अध्ययन के लिये बाकायदा सफल कोर्स चलाये जा सकते हैं।
और नेता बनने में रिटर्न इतने जबरदस्त हैं कि मास्टर ऑफ नेतालाजिकल स्टडीज (MNS) डिग्री की बड़ी मांग हो सकती है।
विश्वविद्यालय पता नहीं क्यों सो रहे हैं! :)

जितेन्द़ भगत said...

देशज ठाठ लाजवाब लगा।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अजब-अजब लिख डाला आपने। ये नेता होते ही ऐसे हैं। उफ़्फ़्‌..।

बातें, जो जाने की जल्दी मचा रही हैं.....

कुछ बातें जल्दी मचाती हैं कि मैं जा रही हूँ......मैं न रूकूंगी। समय भी उन्हें ऐसा करने के लिये उकसाता रहता है कि कह दो कि देर हो रही है.......बहुत रूक लिये......हम जा रही हैं........अब न रूकेंगी.............ऐसी ही बातों को देखने पढने के लिये इस राह से गुजर सकते हैं जहां समय को एकबारगी धकियाया जा सकता है कि समय तुम बीत गये तो क्या हुआ ? ठहरने की सांकल तो अब भी खटखटायी जा सकती है......

ऐसी ही बीते-अनबीते पलों को इन लिंक्स के जरिये देखा जा सकता है ।

ढूँढ ढाँढ (Search)

Loading...