देहात में मोटर साईकिल पर जाते हुए सडक के दोनों ओर यदि हरे भरे खेत हों तो यात्रा का आनंद दुगुना हो जाता है। कहीं पर किसान खेतों में से खर पतवार निकाल रहा है तो कहीं कटाई – छंटाई चल रही है। कहीं पर कोई हल चलाने के बाद बीडी फूंक रहा है तो कहीं पर खेत में ही चना चबैना चल रहा है। किसानों का अपना अलग किसम का ब्रेक फास्ट जिसे शायद शहर न समझ पाये।
ऐसी ही झिंसी पडती खुशनुमा मौसम की एक दुपहरी, कच्चे रास्ते पर मोटर साईकिल से निकला जा रहा था। एक गुमटी दिखी। सोचा एकाध चाय पी जाय। कुल्हड वाली चाय वैसे भी बहुत सोंधी होती है, वरना शहर में तो उसी जूठे गिलास को सिर्फ गीला भर करके दुबारा प्रयोग करने का चलन है। मोटर साईकिल रोक गुमटी में बने एक पटिया नुमा चबूतरे पर जा बैठा। गुमटी मे कोई ग्राहक न दिखा। दुकानदार बैठे बैठे उंघ रहा था। वैसे भी गाँव में भरी दुपहरिया में चाय कौन पीता है भला ?
चाय मिलेगी ?
बैठिये, बना देता हूँ।
थोडा गँवई मन का आनंद और आस पास के खेतों को निहारने का लोभ छोडते न बना। चाय बनाने को कह दिया। एक अखबार दिखा........हेडलाईन थी - प्रधानमंत्री ने बढती आतंकवादी घटनाओं पर चिंता जताई। खाद्यान्न संकट बढने के आसार। मौसम........
सक्कर जियादे लेंगे कि कम ?
जैसा समझो वैसा बनाओ भई। अपने को सब चलता है।
एक बार फिर अखबारों में खो गया। सूखे की आशंका से अरहर के दाम चढे। शाहरूख ने अमेरिका में हुए अपने अपमान को कबूला.......बिपाशा ने जॉन को किस किया, राखी सावंत ने दुल्हा चुना...... वाईचुंग भूटिया ने न खेलने का मन बनाया।
इस साल तो झूरा पड गया है- दुकानदार ने मेरी तंद्रा भंग करते कहा।
हां, सो तो है।
जाने कईसे बीती इ साल। सक्कर का दाम अबहीं से बादर खोदे लगे हैं।
क्या करेंगे । बारिश नहीं होगी तो दाम तो बढेंगे ही। - मैंने भी हां में हां मिलाई।
असल में पाप बहुत बढ गया है। जेहर देखो, वहीं खून कतल, मार, झगडा। यही सब का न असर है कि धरती मईया कोपा गई हैं।
हां, बात तो ठीक कहते हो।
अच्छा ई बतावें कि आप बम्मई रहते है का ?
उसका इस तरह पूछना मुझे अटपटा न लगा। अक्सर पूर्वांचल के ज्यादातर इलाकों से निकले लोग मुंबई की तरफ ही ज्यादा बसे हैं। सो मैंने कहा - हां, क्यों ?
अच्छा इ जो हिरो हिरोनियन का फोटू है, तो क्या सब अईसे ही दिखती हैं क्या ?
मुझे दुकानदार थोडा रसिक लगा। समय बीताने की गरज से मैंने अखबार को एक ओर परे रखते चुहल की – हां, दिखती तो सब अईसे ही हैं.... काहें ? मिलना-उलना है का ?
दुकानदार एक पल को मुस्कराया और बोला – अरे तो ......कपडा वपडा तो ढंग का पहिनें। देखो तो मालूम पडता है एक कोना अतरा यहां खुला है तो दूसरी का उहां से खुला है।
अरे, उनका मन करे जैसा पहने, तुम क्यों दुबरा रहे हो ? मैने मजाकिया लहजे में पूछा।
नहीं, बात दुबराने की नहीं है। दुकानदार थोडा रूक कर बोला - उ का है कि गाँव में ही एक नई नवेली सादी हुई है। पतोह सायद कोई नये ढंग की है। आई थी तो हाथ में घडी ओडी लगाके आई थी। बस, फिर क्या था ? गाँव वाली औरतन को मौका मिल गया । कोई कहती है कि हिरोईन बनी फिरती है तो कोई कहती है मधुरी दीछित है।
अच्छा !
हां, भाई। उसका तो अब घर से बाहर निकलना जैसे अपाढ हो गया है। सास अलग ताना मारती है कि उसके इस तरह घडी पहन कर आने के बाद उसका नाम घडीवाली पड गया है।
मैं सोच में पड गया। ऐसा भी होता है क्या ? घडी पहन लेने भर से नाम पड जाता है। तो 'मूर्ति प्रदेश' की एक माया यह भी रही। पतोह जो केवल घडी पहनने भर से ही बदनाम हो रही है।
बात कहां से चली थी हिरोईनों से, उनके कपडे पहनने के ढंग से और अब देखो बात गाँव की पतोह पर आकर टिक गई है। कुछ और बातों का सिलसिला चला। चाय तब तक बन चुकी थी। कुल्हड को उल्टा कर उसमें से आँवे की राख को दुकानवाला झटक कर निकाल रहा था।
तभी न जाने कहां से एक कुत्ता आ गया। मेरे पैरों के पास आकर कुछ सूँघने लगा। मेरे मन में शंका हुई । पता नहीं ये कैसा कुत्ता है ? पैर को एक तरफ मोड कर थोडा सरकने को हुआ।
काटेगा नहीं। पालतू है।
सुनकर थोडा निश्चिंत हुआ।
लिजिये - चाय भरी कुल्हड मेरी ओर थमाते दुकानदार ने कहा।
चाय थामने के बाद एक पल को चाय के थोडे ठंडे होने का इंतजार कर ही रहा था कि तभी एक महिला सिर पर झौवा ( घास वगैरह रखने वाली टोकरी) रखे कहीं से आती दिखी। गुमटी के पास आकर एक पल को रूकी और फिर अंदर गुमटी में आ गई।
चाह चाही।
बईठो....... देते हैं।
वह महिला गुमटी मे एक ओर रखे ईंट के टुकडे पर जा बैठी। बैठने के लिये जगह खाली थी पर फिर भी वह वहां पर नहीं बैठी। जमीन पर पडे ईंट के उपर बैठने से मुझे थोडा अटपटा लगा। सोच में पड गया, हो सकता है कोई लाज लिहाज की बात हो ।
चाय की चुस्कियां लेते रहा। रह रह कर उस महिला की ओर कनखियों से देख लेता था। उसका ध्यान चबूतरे पर से आधे झूलते अखबार पर था। वह एक पल को रूकी और दुकानदार से बोली – अखबार ले लूँ पढने के लिये ।
आंय.......हां ले लो - दुकानदार अचानक जागते से बोला हो जैसे।
महिला ने अखबार को आगे बढ कर ले लिया। कुछ देर उलट पलट कर देखती रही और फिर वापस करते बोली – आज एहमा, गुम हुए लोगन का फोटू नहीं है का ?
अब क्या मालूम । जो है सो वही है- दुकानदार ने जान छुडाने की गरज से कहा।
वह महिला अब भी थोडी देर उलट पलट कर अखबार देखती रही, कुल्हड में रखी उसकी चाय ठंडी हो गई थी। थोडी देर देखने के बाद अखबार वापस उसने वहीं रख दिया जहां से लिया था। साडी की कोंछ में से एक रूपये का सिक्का निकाल उसे दुकान पर रखे दूध के टोप पर रखते हुए बोली - चाह रख लिजिये। पीने का मन नहीं है।
अरे तो मत पियो, पईसा तो मत दो। बिना पिये पईसा दे रही हो !
नाहीं, रखो।
इतना कह कर बिना कुछ बोले वह महिला अपने झौवे को उठा चलती बनी।
मैंने कहा – बडी अजीब है। चाय भी नहीं पी और पैसा देकर चलते बनी।
उ चाय पीने थोडी न आई थी। उसका लडका घर छोड कर चला गया है। कभी कभी आ जाती है इस ओर अखबार में उसे ढूँढने।
मैं सोच में पड गया, ये महिला क्या जाने कि बिना पैसा खर्चा किये अखबारो में किसी का फोटू नहीं छपता। और अगर छपता भी है तो कोई विशेष कारण से।
अखबारवाली नाम पड गया है इसका।
क्या ?
हां, एक दो बार गाँव के लोग इसको अखबार उलटते पलटते देख चुके हैं। सो गाँव में बात फैल गई की बिसनु की माई अखबार पढना जानती है। तब से लोग इसे अखबारवाली बोलने लगे हैं। ये बोलती नहीं बेचारी, सुन लेती है।
खैर, चाय खत्म हो चुकी थी। पैसे चुकता कर मैं फिर से अपनी मोटर साईकिल पर जा बैठा। थोडा ही आगे बढा था कि वह महिला रास्ते में जाती दिखी। साडी से अपनी आँखें पोंछ रही थी। शायद मैंने चाय की दुकान पर कनखियों से ठीक ही देखा था । चाय की दुकान में ही उसकी आँखों के कोर भीग चुके थे, यहां रास्ते पर आते आते छलछला उठे।
मेरे जहन में अब भी अखबार की हेडलाईनें कौंध रहीं थी – बिपाशा ने जॉन को किस किया, राखी सावंत ने दुल्हा चुना......शाहरूख ने अमेरिका में हुए अपने अपमान को कबूला.......।
- सतीश पंचम


14 Comments:
जीवन के विरोधाभाषों को चित्रित करता एक आत्मीय लेख।
उस महिला से बच्चे के फोटो के बारे में पूछना था। मिल जाता तो ब्लॉग पर ही डाल देते।
ओह ! कहाँ की बात कहाँ पहुँच गयी !
@ गिरिजेश जी,
उस महिला से बच्चे के फोटो के बारे में पूछना था। मिल जाता तो ब्लॉग पर ही डाल देते
- गिरिजेश जी, यह सत्य घटना नहीं है। सिर्फ गाँव के जीवन का एक कोलाज भर है।
कई दिनों से ( या कहें वर्षों से) मीडिया के गिरते स्तर से व्यथित सा हूँ....इसलिये इस कोलाज को ब्लॉग के जरिये उतारने की कोशिश की है।
@"चाय तब तक बन चुकी थी। कुल्हड को उल्टा कर उसमें से आँवे की राख को दुकानवाला झटक कर निकाल रहा था।" very minute observation! Details like this lend credibility to ur write-up .Itz a very moving post no doubt . Ur style is 'Jabarjast' !
However, i don't think village folks in U.P. call cheeni --'shakkar' !
जिदंगी का एक पेज ये भी है। ये जिदंग़ी ऐसी क्यों होती है भाई?
@ मुनीश जी,
However, i don't think village folks in U.P. call cheeni --'shakkar' !
जी हाँ मुनीश जी, आपने सही पकडा - U.P. के गाँवों में 'शक्कर' को 'चीनी' कहने का चलन है।
शायद देहाती लहजे को परोसने के चक्कर में 'शक्कर' को 'सक्कर' कह बैठा और 'चीनी' बगल में ताकती रही :)
सुन्दर लगा ..वही मैंने सोंचा आप हाल तक यहीं थे ..गांव कब गए :-) ..आपके लिखने के अंदाज से यह कहानी सत्य घटना जैसी लगी.
अच्छा अंदाज़ है...आजकल के हर तरफ के हालातों को बयाँ करने का
अति सुन्दर! बहुत अच्छी रचना!!
samachar patro ke girte star ko bkhubi chitrit kiya hai .par kahin se to achhi shuruat ho.
बेहद अच्छा लगा पढ़ना ..महसूस हुआ, मानो कोई सामने बैठ ,बतिया रहा हो....! रोज़मर्रा की भाषा ..सहजता से स्थापित हुआ सँवाद ..सबकुछ !
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बहुत सुन्दरता से सटीक चित्रण किया है. आनन्द आ गया.
अखबारवाली।
यह रेखाचित्र तो मन को छू गया मित्रवर। महादेवी जी के पात्रों की याद हो आई।
बहुत खूब सतीश जी एकदम सही चित्राकन गाव के बारे में !
पंकज
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