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Monday, August 17, 2009

शादी ब्याह में होने वाले झगडे टंटे, बेबात के बात और असवारी में बैठी दुलहन



शादी विवाह में झगडा टंटा होना, नाराज होना , बेबात के ही अपने आपको अपमानित समझना खूब देखा गया है। इन्ही मुद्दों को घेरती एक दिलचस्प कहानी फिर पढने मिली। कहानी है 'मुखिया साहब' जो कि 'फिर बैतलवा डाल पर' कहानी संग्रह में से है, प्रकाशक हैं - भारतीय ज्ञानपीठ। यूं तो इसे पहले भी पढ चुका हूँ लेकिन जब दुबारा पढा तो कुछ और बातों पर नजर पडी और मजा कुछ दुगुना हो गया। कहानी लिखी है गाजीपुर के डॉ विवेकी राय जी ने। विवेकी राय जी लिखते हैं –

जिस बरात में हम लोग गये हुए थे, एक खानदानी रईस की थी। विदा-विदाई में खूब नाटक हुआ और होते होते दिन के दस बज गये। बिना ठीक से सोचे कि कहां जाना है, छुट्टी पाते ही हम लोग साइकिल की सीट पर बैठ गये।

उपर दहकता सूरज, नीचे तेज, उजली और चमचमाती धूप। पछिवहीं लूचि की आँच। आज मालूम हुआ कि ऐसी खडखडिया दोपहरी में भी चला जा सकता है।

लेखक विवेकी राय आगे लिखते हैं कि जब हम काफी थक गये तो एक गाँव में सोचे कि चलो यहां मुखिया जी के यहां रूक कर कुछ खा पी लिया जाय। पूछकर मुखिया के दरवाजे की ओर बढे। पर यह क्या ? पचीस-तीस हाथ लंबी बैठक में दर्जनों चारपाईयों पर बहुत-से लोग बैठे थे। कुछ लोग नीचे भी बैठे थे। सभी खामोश। जैसे बैठाये गये हों। अपराधी जैसे चुप। माजरा क्या है ? सामने जाकर लौटना भी उचित नहीं है। बैठक के पास पहुँचे। संयोग से उन बैठे लोगों में मेरे एक पहचानी मित्र मिल गये। साईकिल खम्भे से टिका दी गई। मित्र के पास जा बैठे। हम लोग भी चुपचाप बैठे। इतने में बाजा बजाने वालों का दल आया। वह लोग भी एक कोने में चुपचाप बैठ गये। चुप्पा लोगों की संख्या बढती जा रही थी।


धीरे से आँख चारों ओर दौडायी। वह पीली धोती और लाल कुरता पहने कौन ? उमर पन्द्रह-सोलह साल की। आँख में हलका काजल और पैर में महावर। यह तो दूल्हे का बाना है। इधर साफ-सुथरा पहने लोग। उधर कुछ बूढे बाबा । तमाखू चढाकर लाया गया। एक बाबा पीने लगे। गोरे, लम्बे, उजली और बडी-बडी मूँछें, एकहरा शरीर, आयु 60 के लगभग, चेहरा खिंचा हुआ, आँखें चढी हुई।

तब तक एक डोली आयी। फाल बढाते, हूँ-हूँ-हूँ करते करते , एक हाथ में सोटा थामें कहार। आँखें उधर खिंची। तब तक मानो बम फूट गया।

खबरदार! ऱख दो वहीं।

देखा बूढे काका थे। हुक्का चारपाई के पाये से टिका दिया और खडे हो गये।

देखें कौन माई का लाल घर में ले जाता है ? बडे विदा कराने वाले हुए।

एक आदमी ने धीरे से हाथ पकडकर बैठाया । कहार रूक गये। डोली रख दी गई ; ठीक बैठक के सामने जहाँ धूप की उजली आग जमीन और आसमान के बीच में कस गयी थी।

कुछ लोग उधर से आये। शायद गाँव के ही हैं। पट्टीदार होंगे। बूढे बाबा के पास बैठ गये। एक ने सुर्ती निकाली। बनाते-बनाते कहा, - लडकी को घर में जाने दें। इसने क्या अपराध किया है ? बेचारी धूप में डोली के भीतर भूख-प्यास और गरमी से मर जाएगी।

मर जाएगी तो मर जाये। इसे लेजाकर वापस कर आओ। कुछ खाने पीने के लिये डोली के भीतर रख दो।


यह ठीक नहीं होगा।

यही ठीक होगा।

अब चुप्पी खत्म हुई। मित्र ने बताया कि ये बूढे गाँव के मुखिया हैं। इनके लडके की शादी थी। बरात करनपुर गई थी। आज सबेरे विदा-विदाई के समय दहेज में कुछ कमी होने के कारण ये नाराज होकर चले आये।

एक मजेदार बात । कुछ लोग उधर से मुस्कराते हुए आते हैं। बैठक में आकर गम्भीर हो जाते हैं। मुखिया को समझाते हैं। चार बात इधर चार बात उधर। फिर उठकर वैसे ही चले जाते हैं। ये मजा लेने वाले लोग हैं। आग लगानेवाले हैं। पट्टीदार लोग हैं। बना खेल बिगाडने वाले लोग हैं।

इधर कहानी आगे बढती है। बहस मुबाहिसा सब बेकार। मुखिया बार बार कह रहे हैं – बप रे बाप। पगडी उतार दी, नाक कटा दी।

लेखक मुखिया से तब कहते हैं - आप के घर की लक्ष्मी है। इसे इस तरह क्यों दुत्कार रहे है।

कौन साला दुत्कारता है। खैरियत इसी मे है कि डोली पहुँचवा दो।

तो इसे अब नहीं लाएंगे ?

जब वक्त आयेगा तो लाउंगा।

जाने दिजिये, जो हुआ सो .....।

खूब बात करनेवाले हो। ओठ काटकर और सिर तोडकर उन्होंने कहा – राजा का धन मुसहर बाँटे ? मेरा लडका है, मैंने खर्च किया है। मैं मालिक हूँ। और बीच में कोई दूसरा कूद पडे ? मेरी इज्जत बरबाद कर मालिक बन बैठे ?

दूसरा कौन गैर है। आपके रिश्तेदार लोग हैं।

रिश्तेदार हैं तो रिश्तेदारी करे कि छुरी पेट में भोंकेंगे। एसे रिश्तेदार को दूर से सलाम।

कौन विदा करा लाया ? मुखिया ने पूछा ।

मैं – लेखक के मित्र ने थोडा सिर झुका कर कहा।

क्यों विदा करा लाये ?

गलती हो गयी।

क्यों गलती हो गयी ?

पुन सन्नाटा। कोई कुछ नहीं बोल रहा है। तभी कोई बोल पडा ।

इसका जवाब मेरे पास है। गमछा बँधा, लमछर कुरता, अँधेड उम्र , घुटने तक धोती, नाटा कद, दोहरा हाड-काठ।

आगे आकर दाहिने हाथ की तर्जनी से हवा में लाईन बनाता हुआ बोला –
देखिये, ये मुखिया हैं। हमारे बडे भाई साहब हैं। अब तक मैं शील संकोच में कुछ नहीं बोल रहा था। अब हद हो गई है। ...........मैं लडकी को घर में ले जाता हूँ । घर में हमारा भी हिस्सा है।

तब पहले बाँट बखरा हो जाए।

हाँ- हाँ जो होता हो सब हो जाय। दोनो भाई सोंटा लेकर मैदान में छरकने लगे। हाँ- हाँ- हाँ कर अनेक लोग धरहर करने लगे। शोर – गुल अजब हो उठा।

इधर रिश्तेदार लोग भी सामान समेटने लगे। छडी उठा ली गई। झोला संभाल लिया गया। साईकिलें खडखडाने लगीं।, हम लोग भी उठ खडे हुए। कुछ गाँव वाले रोकने मनाने लगे। सब अस्त व्यस्त हो गया ।

उधर दुल्हा सिसकने लगा। कुछ लोगों की नजर इस पर गई और लोग उसे समझाने बुझाने लगे, भैया, तुम काहे को रोते हो ? चुप रहो, चुप रहो।

उसी समय एक मजेदार बात हुई। मौका पाकर घर की औऱतें डोली टाँग ले गयीं और दरवाजे पर लगाकर बहू उतार ली गयी। हवेली मधुर मधुर गीत से गूँज उठी। उस समय तक अभी दोनों भाईयों मे उछल कूद जारी थी। गाली-गलौज और ललकार- फुफकार के बीच जब गीत की ध्वनि कानों में पडी तब मुखिया का सारा ताव जैसे एकदम उतर गया। घर में आग लगने का शाप देते गाँव से बाहर हो गये।

चार बजे भोजन मिला। एक घण्टा आराम कर हम लोग चले। रास्ते में स्टेशन पर कुछ लोग मुखिया की मनावन कर रहे थे। अनमें नाच, बाजा, तम्बू और बत्तीवाले थे जिनका सट्टा बाकी था।

तभी लेखक ने झटके से एक बात सुनी – पक्के उस्ताद हैं, सट्टेवालों को लूटने के लिये कैसा पाखण्ड रचा।

पूरी कहानी पढने के बाद विवेकी राय जी के गहन ग्रामीण समझ और विचार के प्रति कुछ और श्रद्धा बढ गई है। पिछले कुछ दिनों से कोई नई किताब उनकी नहीं पढ पाया हूँ । यूं तो उनसे फोन पर कई बार बात हुई है, लेकिन इधर आयु और अस्वस्थता के चलते उनकी लेखन यात्रा जरूर थोडी बाधित लग रही है। गुरूवर विवेकी राय जी के लिये आशा करता हूँ कि जल्द ही पूरी तरह से सक्रिय हो कर हमें कुछ और ग्राम्य झांकी दिखलाएंगे।




- सतीश पंचम









( 'मुखिया साहब' कहानी अंश- साभार - 'फिर बैतलवा डाल पर' कहानी संग्रह से, प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ,

*आवरण चित्र - साभार , हंस (अगस्त 2008 अंक ) - यहां बता दूँ कि हंस के आवरण चित्र बहुत रोचक होते हैं। इन्हीं मे से एक यह आवरण चित्र अगस्त 2008 अंक का है। पहले भी सफेद घर पर दुल्हन के पैर छूते दुल्हे का आवरण चित्र (जून 2009) पर चर्चा की गई है। इन आवरण चित्रों को देख कर हंस की रचनात्मकता पर मुग्ध हूँ।

4 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अच्छी कहानी से परिचित कराया आप ने। जो कुछ समाज में हो रहा है उस पर इतनी सच्ची कहानियाँ बहुत कम देखने को मिलती हैं।

Arvind Mishra said...

पट्टीदार लोग हैं। बना खेल बिगाडने वाले लोग हैं।
ग्राम्य परिवेश की समझ का उदाहरण ! बढियां कहानी .शुक्रिया !

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

मुझे ग्रामीण परिवेश पर रची गई कहानियां पसंद है...शायद इसलिए भी रेणु मेरे प्रिय रचनाकार हैं.
हंस का इस माह वाला आवरण भी सुन्दर लगा मुझे.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

लगता है कि आपको पढ़ते पढ़ते "हंस" और "नया ज्ञानोदय" फिर से लेने लग जाऊंगा।
मजे की बात है कि मुझे शब्दों का टोटा लगता है और उस दशा में मौन हो सुनना चाहिये, अथवा विवेकी राय जी जैसे को पढ़ना चाहिये।

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