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Tuesday, August 11, 2009

फणीश्वरनाथ रेणु और शैलेन्द्र जी की वजह से मुंबई का 'पवई- लेक' कुछ खास है( रोचक वाकये के कारण)।



यूँ तो मुंबई के पवई में कार्यालय होने के कारण रोज ही पवई झील के पास से गुजरता हूँ, पर कल अचानक एक विशेष वजह से मुझे ये पवई झील कुछ अलग लगने लगी। वजह भी कुछ खास ही है। दरअसल कल ही मैंने फणीश्वरनाथ रेणु जी के बारे में ‘रेणु रचनावली’ में एक बात पढी है और उसके जरिये पता चला कि ये वही पवई लेक है जिसके किनारे बैठकर फणीश्वरनाथ रेणु और गीतकार शैलेन्द्र जी बहुत रोये थे।

दरअसल फणीश्वरनाथ रेणु जी ने शैलेन्द्र को इसी पवई लेक के किनारे एक बहुत ही करूण गीत सुनाया था । गीत के बोल ग्रामीण अंचलों का भाव लिये थे जिसमें ससुराल में आई लडकी अपने भाई को याद कर रही है। दरअसल जब पहले अक्सर छोटी उम्र में ही विवाह हो जया करता था तब, बिहार के ज्यादातर हिस्सों में नवविवाहित बिटिया को बरसात में होने वाली कीचड मिट्टी से लथपथ होकर ससुराल में काम करने से बचाने के लिये अक्सर बेटिंयों को सावन मास में नैहर बुलवा लिया जाता था ताकि अभी सुकवार, नाजुक बिटियां बरसात में होने वाली कीचकाच से बची रहें। इस ग्रामीण गीत ‘सावन-भादों’ को फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी बहन से सुना था। इस गीत के बोल थे

कासी फूटल कसामल रे दैबा, बाबा मोरा सुधियो न लेल,
बाबा भेल निरमोहिया रे दैबा, भैया के भेजियो न देल..........
...................

कहते है जब भाव प्रबल हों तो भाषा मायने नहीं रखती। यही हुआ।

बकौल फणीश्वरनाथ रेणु जी – तीसरी कसम फिल्म के दौरान शैलेन्दर जी मुझसे ‘महुआ घटवारिन’ की ओरिजनल गीत-कथा सुनना चाहते थे ताकि उसके आधार पर गीत लिख सकें। एक दिन हम ‘पबई-लेक’ के किनारे एक पेड के नीचे जा बैठे। ‘महुआ घटवारिन’ का गीत मुझे पूरा याद नहीं था। इसलिये मैंने छोटी सी भूमिका के साथ बहन से सुना हुआ ‘सावन-भादों’ गीत अपनी भोंडी और मोटी आवाज में गाना शुरू किया। गीत शुरू होते ही शैलंन्द्र की बडी बडी आँखें छलछला आईं। गीत समाप्त होते होते वह फूट फूटकर रोने लगे। गीत गाते समय ही मेरे मन के बाँध में दरारें पड चुकी थीं। शैलेंन्द्र के आँसुओं ने उसे एकदम से तोड दिया। हम दोनों गले लगकर रोने लगे। ननुआँ ( शैलेन्द्र का ड्राईवर) टिफिन कैरियर में घर से हमारा भोजन लेकर लौट चुका था। हम दोनों को इस अवस्था में देखकर कुछ देर ठिठक कर वह एक पेड के पास खडा रहा। इस घटना के कई दिन बाद शैलेन्द्र के ‘रिमझिम’ पहुंचा। वे तपाक से बोले – चलिए, उस कमरे में चलें। आपको एक चीज सुनाउं।

हम उनके शीतताप-नियंत्रित कमरे में गए। उन्होंने मशीन पर टेप लगाया। बोले – आज ही टेक हुआ है। मैंने पूछा – तीसरी कसम ? बोले – नहीं भाई। तीसरी कसम होता तो आपको नहीं ले जाता ? यह बंदिनी का है.....पहले सुनिए तो .

रेकार्ड शुरू हुआ –

अबके बरस भेज भईया को बाबूल
सावन में लिजो बुलाय रे
लौटेंगी जब मेरी बचपन की सखियां
दिजो संदेसा भिजाय रे.....
.................
.......
बीते रे जुग कोई चिठिया न पाती
ना कोई नैहर से आए रे...
अबके बरस भेज भईया को बाबूल

कमरे में ‘पबई-लेक’ के किनारे से भी मर्मांतक दृश्य उपस्थित हो गया। हम दोनों हिचकियां लेकर रो रहे थे............................।


आज फिर उसी पवई लेक के किनारे से गुजरा हूँ। कुछ अपनापन सा लगने लगा है।

( इस घटना की जानकारी –साभार, ‘रेणु रचनावली’, राजकमल प्रकाशन से)

- सतीश पंचम

17 comments:

Arvind Mishra said...

भावनात्मक उद्वेग/उद्रेक के लिए संक्रामक है यह दृष्टांत -जब मैं भी पवई लेक देखता था तो कुछ अव्यक्त सा रह जाया करता था -यह तो रुलाती है !

Nirmla Kapila said...

भावनत्मक प्रसंग मन को छू गया आभार्

गिरिजेश राव said...

मैं क्या कहूँ? मेरी आज की पोस्ट में भी बहन और भाई का लोकगीत अंश !

अरविन्द जी आत्मा वगैरह की बात करते हैं। सचमुच ही कुछ चढ़ गया है क्या मेरे उपर ? रेणु ? लेकिन परती परिकथा और मैला आँचल पढ़े तो जमाना हो गया।

शायद रेणु के अपने परिवेश से घनघोर जुड़ाव की बिमारी से मैं भी त्रस्त हूँ। उन्हों ने तो साक्षात देखा था, मैं तो इस इंटरनेटी जमाने में बरसों पहले सुनी और दबी हुई को निकाल कर इस्तरी वगैरह कर सुना रहा हूँ।

आत्मा ?

मुनीश ( munish ) said...

mast blog ! maha mast intro kavita !!

अमिताभ मीत said...

Behtareen post. Shukriya.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर प्रसंग की चर्चा की आपने. शुभकामनाएं.

रामराम.

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

निशब्द हूँ ...आज यह भी नही कहने का मन हो रहा समय और स्थान बताइए.

Pankaj Mishra said...

भावनत्मक प्रसंग मन को छू गया

डॉ .अनुराग said...

आपकी तरह मै भी रेनू का बहुत तगड़ा फेन हूँ....शैलेन्द्र जी का भी....तीसरी कसम की बनने पूरी कहानी नया ज्ञानोदय अथवा कथादेश में पढ़ी थी पुराने अंक खंगालिए

Manish Kumar said...

इस प्रसंग को यहाँ बाँटने के लिए आभार। अच्छा लगा जानकर !
कुछ साल पहले इसी पोवई लेक के किनारे अपनी कुछ शामें गुजरीं थीं। वो वो मंज़र आज फिर याद हो आया।

अशोक पाण्डेय said...

मन में कहीं गहरे तक उतर गयीं ये बातें। लवली जी ठीक कह रही हैं ..आज यह भी नही कहने का मन हो रहा कि समय और स्थान बताइए..।

सतीश पंचम said...

@ लवली जी और अशोक जी,

कभी कभी स्थान और समय लिखने से पोस्ट की मूलभावना से ध्यान बंटने की आशंका रहती है, यही सोचकर स्थान और समय का उल्लेख जानबूझकर नहीं किया।

गिरीन्द्र नाथ झा said...

सतीश जी शुक्रिया। महत्वपूर्ण और भावपूर्ण जानकारी के लिए।

Satish Chandra Satyarthi said...

भावपूर्ण पोस्ट........

Satish Chandra Satyarthi said...
This comment has been removed by the author.
काजल कुमार Kajal Kumar said...

यूँ तो मैं फ़ि‍ल्मों का शौकीन नहीं हूं पर ‘महुआ घटवारिन’ वाला ही गीत है जि‍सके कारण 'तीसरी कसम' मैंने पता ही नहीं कितनी बार देखी है...

देवेन्द्र पाण्डेय said...

पवई झील अब प्यारी लगने लगी।

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