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Saturday, August 15, 2009

यह पोस्ट आज के दिन, यानि 15 अगस्त के लिये शायद सटीक हो।



कुछ दिनों पहले New York Times में एक लेख छपा था जिसमें भारतीयों के बढते वर्चस्व को लेकर एक महत्वपूर्ण बात कही गई, कि भारतीय बच्चे अमरीकीयों के लिये एक नये किस्म की चुनौती बनते जा रहे हैं। मेरे पास इस लेख की कतरन एक E-Mail के जरिये आई है, आप भी जरूर उस कतरन को देखें। पहले भी यह पोस्ट प्रकाशित हो चुकी है , लेकिन शायद आज के दिन के लिये ही ये पोस्ट ज्यादा सटीक है।

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"When we were young kids growing up in America, we were
Told to eat our vegetables at dinner and not leave them.
Mothers said, think of the starving children in India
And finish the dinner.'


And now I tell my children:
'Finish your homework. Think of the children in India
Who would make you starve, if you don't.'?"


- Thomas L Friedman












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- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे कि कभी अंग्रेजों ने दहेज में दे दिया था।

समय - वही, जब माउंटबेटन, भारत के गवर्नर बनने के लिये हस्ताक्षर कर रहे थे और बगल में ही एक अर्दली उस कलम को निहार रहा था जिससे कि भारत की किस्मत पर हस्ताक्षर किये जा रहे थे।



11 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

हां हां। देश में खीझ और गर्व करने के लिये बहुत कुछ है। बहुत कुछ।

ताऊ रामपुरिया said...

शायद यही द्वैतवाद है?

रामराम.

सतीश पंचम said...

@ ज्ञान जी,

देश में खीझ और गर्व करने के लिये बहुत कुछ है।



अब वो मूंज की बनी खटिया कहां से लाउं जिसे सिर पर रख कर आधी धूप और आधी छांव में चलते हुए जा सकूं :)

जमाना आजकल ग्रीन प्लाय के बने बेड का है। धूप के छनने का सवाल ही नहीं। सो, अमेरिकी विचारक के उजले नजरिये से ही इस देश को देखने की कोशिश की है।

यूं तो इस देश के नकारात्मक पहलू उसके सकारात्मक पहलुओं से कुछ ज्यादा ही जबर नजर आते हैं। लेकिन जैसा कि मौका है 15 अगस्त का जिस दिन कि हमें गुलामी से आजादी मिली थी, सो उस गुलाम वक्त से अब तक के बदले परिदृश्य को ही Thomas Friedman के शब्दों में पॉजिटिव अप्रोच के साथ पेश करने की कोशिश की है।

अंधेरे पक्ष तो अक्सर उजागर होते रहते हैं, एक नजर उजाले की ओर ही सही :)

गिरिजेश राव said...

बड़े 'करेले' आदमी हो यार !
करेला स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।
शायद मैं बकवास कर रहा हूँ।

जय हिन्द।

सतीश पंचम said...

@ गिरिजेश जी,

आप का ये कमेंट मेरी श्रीमती जी पढ लें तो जिस तरह केमिस्ट्री में टेस्ट के बाद एक CT ( Confirmatory test) किया जाता है उसी तरह आपकी टिप्पणी को CT मान सकती हैं :)

पहले से घर में बदनाम हूँ....जब बोलब तीतै बोलब :)

ravikumarswarnkar said...

आपका अंदाज़ जरा हट कर है...

डा० अमर कुमार said...


बड़बोले डरपोक की आशँकित स्वीकारोक्ति ।
क्या यह अपने बच्चों के भविष्य की परवाह करते भी हैं ?

सतीश पंचम said...

@ डा अमर कुमार
बड़बोले डरपोक की आशँकित स्वीकारोक्ति ।


कुछ हद तक ये बात सच है। विचारक अक्सर बडबोले ही होते हैं। एअरकंडिशंड कमरों में बैठे बोलते लिखते हैं और शांत हो जाते हैं।

लेकिन Thomas L Friedman के विचार मुझे उतने बडबोले नहीं लगते। शायद उनका व्यक्तित्व जितना कि मैंने जाना समझा है, पढा है उससे काफी हद तक सहमत हूँ।

ज्ञानजी की एक पोस्ट के जरिये ही मुझे Thomas Friedman के बारे में पता चला था और उसके बाद तो उनकी कई बातें पढने सुनने को मिली।

दूसरी ओर आपका यह गंभीर प्रश्न उठाना बहुत वाजिब लगा कि - क्या यह अपने बच्चों के भविष्य की परवाह करते भी हैं ?

अनूप शुक्ल said...

जय हो। कल पढ़े थे इसे। मजे आ गये। आज कमेंट पढ़े तो सोचा टिपिया भी दें!

अशोक पाण्डेय said...

भाई पंचम जी, आपकी कलम कहीं चूकती है भला। आपने अंजोरा के साथ अंधेरा की ओर तो इशारा कर ही दिया है, शायद अनजाने में ही सही।

''समय - वही, जब माउंटबेटन, भारत के गवर्नर बनने के लिये हस्ताक्षर कर रहे थे और बगल में ही एक अर्दली उस कलम को निहार रहा था जिससे कि भारत की किस्मत पर हस्ताक्षर किये जा रहे थे।''


वह समय आज भी ठहरा हुआ है। भारत की किस्‍मत लिखनेवाली कलम को भारतीय जनता आज भी उसी हसरत से निहारती है।है।

rosy said...

since long i was away from hindi literature having touch of premchand.just thanks a lot to make me alive again.

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