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Sunday, August 16, 2009

आखिर ऐसा क्या है फिल्म 12 Angry Men में जो कि मैनेजमेंट में Decision Making पढाने के लिये इस फिल्म का इस्तेमाल किया जाता है ? आईये जानें।


आखिर ऐसा क्या है फिल्म 12 Angry Men में जो कि Managerial technique of Decision Making पढाने के लिये इस फिल्म का इस्तेमाल किया जाता है। आईये जानें। कल्पना करें कि आप जिस टीम में काम करते हैं वहां कई तरह के लोग हैं किसी का कुछ बैकग्राउंड है तो किसी का कुछ। किसी की अपने निजी जीवन में कुछ घटनाएं घट चुकी हैं जो कि उन्हे आजीवन उनके Decision making पर असर डालती हैं और वो पूर्वाग्रह या Prejudice के तहत अपना निर्णय लेते हैं।

वहीं इसी टीम में कुछ एसे लोग हैं जो कि हवा का रूख देख कर फैसला करते हैं। दूसरों को देखकर फैसला करते हैं कि उन्हें क्या पसंद है, क्या नहीं। कहीं वो नाराज तो नहीं हो जाएंगे मेरे निर्णय लेने से। कुछ ऐसे सदस्य भी होते हैं जिनका कि अपने पर कॉन्फिडेंस नही होता और हर डिसिजन लेने से पहले अपने सिनियर का मुंह ताकते हैं। इस टीम में ऐसे भी हैं जो कि केवल अपनी नौकरी करते रहने के लिये ही टीम में बने रहना चाहते हैं। उन्हें जो कहा जाता है वही करते हैं। अपने से इनिशियेटिव लेने की उनमें क्षमता ही नहीं होती।


यह फिल्म 12 Angry Men इन्हीं सब परिस्थितियों को एक जगह एक कमरे में लाकर पेश करती है। इस 12 Angry Men का ही हिंदी Version है एक रूका हुआ फैसला। कहानी के अनुसार एक बच्चे पर अपने पिता की हत्या का आरोप होता है। कोर्ट आदेश देती है कि बच्चे ने हत्या की है या नहीं ये फैसला एक 12 सदस्यी जूरी पर छोडा जाय। कोर्ट के आदेश के तहत फैसला एकमत से होना चाहिये।





सभी 12 सदस्य एक कमरे में बंद हो जाते हैं। उन्हें बाहर जाने की तब तक इजाजत नहीं है जब तक कि फैसला न हो जाये। शुरूवात में ही कई सदस्य उस कमरे को कोसते दिखते हैं जिसमें वह बंद हैं। पंखा नहीं चल रहा, गर्मी है ये है वो हैं। यानि वह सब कमियों की बातें करते हैं लेकिन जिस बात पर Decision लेना है वही नहीं करते। कुछ देर बाद सभी सदस्य एकसाथ बैठते हैं। शुरूवात में ही कोर्ट में चले इस बच्चे के केस को ध्यान में रखते हुए जूरी मेंबर आपस में वोटिंग करते हैं कि बच्चा Guilty है या नहीं। कोर्ट में चली बहस और अपनी जो कुछ भी आधी अधूरी जानकारी के तहत 11 सदस्य बच्चे को Guilty मानते हैं, दोषी मानते हैं लेकिन एक सदस्य बच्चे को दाषी नहीं मानता।

बाकी के सदस्यों की भौंहे टेढी हो जाती हैं इस एक सदस्य के प्रति। वह उसका मजाक उडाते हैं कि 11 सदस्य एकमत हैं लेकिन अकेला वही है जो बहुमत के खिलाफ है। तब उस पर लोग दबाव डालते हैं कि अब वह भी एकमत से शामिल हो और बच्चे को guilty माने और हम सभी इस बंद कमरे से बाहर निकले। हम सभी को अपने अपने काम निपटाने हैं। किसी को फिल्म देखने का वक्त हो रहा था तो किसी को कुछ। लेकिन चूंकि फैसला कोर्ट आदेश के तहत एकमत से होना चाहिये अत वह बारहवां सदस्य अपने सहमत न होने का कारण बताता है और हर एक प्वॉइंट को तफ्सील से रखता है। लेकिन फिर भी जूरी के सदस्य उससे सहमत नहीं होते। वह चाहते हैं कि जल्दी से फैसला हो और उन्हें घर जाने मिले। कुछ बहस और झडप के बाद वह बारहवां सदस्य एक प्रस्ताव रखता है कि अब तक मैने जो यहां बात बताई है उसके बाद भी आप लोग सहमत नहीं हैं। इसका काट ये है कि एक बार और वोटिंग करवाई जाये और यदि एक और वोट बच्चे को निर्दोष माने तो बहस जारी रखी जाय। इस बार वह बारहवां सदस्य खुद से ही वोटिंग में हिस्सा नहीं लेता।

वोटिंग होती है और आश्चर्यजनक ढंग से एक औऱ सदस्य बच्चे को निर्दोष मानता है। NOT GUILTY वाला वोटिंग पर्चा सबके आंख की किरकिरी बन जाता है। इस बात पर भी बहस होती है कि किसने किया होगा ये एक वोट। तभी वह शख्स जिसने बच्चे के पक्ष में वोट किया था खडा होता है और अपनी बात को रखता है कि क्यों वह बच्चे को निर्दोष मानता है। अब जूरी का फैसला टर्न लेना शुरू करता है 10 लोग बच्चे को दोषी मानते है लेकिन 2 लोग बच्चे को दोषी नहीं मानते।


उन्ही के बीच एक जूरी सदस्य यह कहते हुए लगातार अपनी बात रखता है कि बच्चा दोषी है और रहेगा। पडताल करने पर वह खुद बताता है कि उसके घर में उसका बेटा उसका सम्मान नहीं करता। स्पष्ट था कि वह जूरी मेंबर उस बच्चें में अपने बेटे का अक्स देख रहा था और फैसला भी उसी हिसाब से ले रहा था।



बहस आगे बढती है और फिर उन लोगों की बीच रायशुमारी होती है। अबकी बच्चे को निर्दोष मानने वालों की संख्या बढ जाती है। जूरी का फैसला एक दूसरी तरफ जाते देख एक और सदस्य बच्चे को निर्दोष मानने लगता है। यह सदस्य उस तबके का प्रतिनिधित्व करता लगता है जो कि देखा देखी फैसला करता है। उसका खुद का कोई डिसिजन नहीं होता।


एक सदस्य तब अपना फैसला पलट देता है जब उसे लगता है कि जल्दी फैसला हो जाय तो उसे घर जाने को मिले । सिनेमा की टिकटें उसकी जेब में उमड घुमड रही होती हैं। इस पर एक सदस्य भडक जाता है उस शख्स को कहता है कि उसने अपना फैसला क्यों बदला उसे Explain करे। सिर्फ इसलिये कि सिनेमा देखने उसे देर हो रही है, वह अपना फैसला नहीं बदल सकता।

Explain Me !



बहस और आगे बढती है और धीरे धीरे जूरी पलट जाती है और अंत में फैसला सर्वमान्य ढंग से आता है कि बच्चा निर्दोष हैं।

इस पूरी फिल्म को एक ही कमरे में फिल्माया गया है। फिल्म की जान है इसकी स्क्रीप्ट। औह.......क्या जानदार बात कही – ये शब्द सहसा ही मुंह से निकल आते हैं। उस वक्त का सीन गजब का है जब मनोरंजन टिकट के कारण एक सदस्य फैसला बदलता है।

पूरी फिल्म को एक तरह से आदर्श फिल्म माना जा सकता है जो कि विभिन्न तबके के लोग, उनकी मानसिकता और Decision Making की उनकी क्षमता को पेश कर रही है।


- सतीश पंचम

4 comments:

उन्मुक्त said...

न्यायमूर्ति होमस्, अंग्रेजी में फैसला लिखने वाले न्यायमूर्तियों में सबसे जाने माने न्यायमूर्ति हैं। उनका कहना है,
१ - जज़ वास्तव में फैसला मुकदमों के तथ्यों पर ले लेते हैं फिर उस पर कानून का जामा पहना कर उसका कारण लिखते हैं।
२ - उनके तथ्यों पर लिये गये, अधिकतर फैसले, कानून दायरे के बाहर होते हैं और inarticulate major premise पर निर्भर होते हैं।
मैं inarticulate major premise का ठीक से अनुवाद तो नहीं कर पाउंगा पर यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस प्रकार बड़े हुऐ और हमें कैसा वातावरण मिला।

गिरिजेश राव said...

ऐसे लेखों पर कमेंट कम क्यों आते हैं?
यह भी हो सकता है क्या कि पढ़ने के बाद कहने को कुछ न बचे?

मैं तो अक्सर ऐसी 'भीड़' से रूबरू होता हूँ। अभी हम लोगों ने एक आंतरिक प्रोजेक्ट पूरा किया। 45 दिन चले इस प्रोजेक्ट में फिल्म में वर्णित सारी मनोवृत्तियाँ देखने को मिलीं।

अच्छा होता यदि आप उनको अलग से समझाते ताकि ऐसे मौकों पर काम आता।

इस लेख के लिए बधाई।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

फिल्म की कथा बहुत रोचक लगती है। और यह तो होता है कि जल्दी जान छुड़ाने को कुछ लोग सहज सहमत हो जाते हैं।
अच्छा प्रबन्धक वह है जो इस तरह के लोगों और स्थितियों को पहचान कर दुहे। :)

Vaibhav said...

हिंदी भाषा में यही फिल्म 'एक रुका हुआ फैसला' नाम से बनी है | दोनों ही फिल्म बहुत अच्छी हैं|

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