
कल ही मैं राजेंद्र यादव की लिखी ‘अपने पार’ कहानी संग्रह के आलेख को पढ रहा था। शीर्षक था – कहांनियां, जो शायद मैं न लिखूँ।
राजेंन्द्र यादव जी लिखते हैं - ......यों मुहावरों में ही बोलूँ तो किसका गरेबान नहीं फटा.....किसकी अलमारी में कंकाल नहीं रखे.....और किस पुरूष में हर खूबसूरत लडकी के साथ सोनेवाला गुहा मानव नहीं बैठा ? लेकिन वह सब कहीं लिखा जाता है ? अपने गन्दे लिनिन चौराहे पर धोने में क्या लाभ ? …..आखिर लेखक की एक सामाजिक प्रतिष्ठा है, उसके नाते रिश्तेदार हैं, हर नायिका के चित्रण पर आँखे तरेरती पत्नी है...सभी कुछ लिखेगा तो लोग क्या कहेंगे ? बेटे-बेटी किसके आगे मुँह दिखाएँगे ? कौन उसे अपने घर बुलाकर चाय पिलायेगा ? हम मध्यवर्गीय संस्कारों और सामन्ती नैतिकता के शिकार, रूसो की आत्मस्वीकृतियों जैसा साहस कहाँ से लाएंगे ? और जो आज ऐसा कर रहे हैं, उनकी मिर्गी के दौरे जैसी चेहरे की विकृति को कौन अपना कहना चाहेगा ?
लेकिन यह सब कोई सामाजिक प्रतिज्ञा नहीं, केवल एक सवाक्-चिन्तन है।
आगे राजेंद्र यादव जी लिखते हैं –
....आखिर आल्डस हक्सले नाम के उस लेखक ने बहुत सोच समझकर ही तो ‘गॉडेस एंड द जीनियस’ उपन्यास में लिखा है कि ‘मैं विश्वास करके अपनी बेटी को किसी कैसेनोवा ( इश्कबाज इंसान) के हाथों सौंप सकता हूँ , मगर अपने भेद किसी उपन्यासकार के हाथों नहीं पडने दूँगा.....’
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राजेंद्र यादव की लिखी इन बातों को जो कि कई साल पहले लिखी गई थीं ( 'अपने पार', राधाकृष्ण पब्लिकेशन), को यदि आजकल के विवादित रियलिटी शो ‘सच का सामना’ के आलोक में पढें तो कुछ बातें आज की ही कही हुई लगती हैं । राजेंद्र यादव द्वारा लेखकों के बारे में लिखा यह वाक्यांश कि - कौन उसे अपने घर बुलाकर चाय पिलायेगा ?..... और जो ऐसा कर रहे हैं, उनकी मिर्गी के दौरे जैसी चेहरे की विकृति को कौन अपना कहना चाहेगा ? एकदम से उस बहस को टच करता लग रहा है जो आजकल ‘सच की बाउंड्री लाईन’ डिफाईन कर रहे हैं। उन बहसों मुबाहिसों से कितना सच निकल पाता है ये तो वक्त ही बतायेगा लेकिन मुद्दे की बात तो यही है कि क्या अब लोग ऑल्डस हक्सले के कथन ‘बेटी और भेद’ को झुठलाने लगे हैं ? क्या अब अपने भेद खोलना इतना सहज हो गया है ? क्या कैसेनोवा के मुकाबले उपन्यासकार ज्यादा भरोसेमंद साबित हो रहे हैं।
शायद हां।
क्योंकि, अब उपन्यासकार बाजार में एंकर की शक्ल ले बैठे हैं, जो कि कहांनियों को तोडते मरोडते है, कल्पना की उडान में सच का पेंदा लगाते हैं। अब एंकर की शक्ल में आये ये नव उपन्यासकार पोलीग्राफ टेस्ट रिपोर्ट लेकर जांचते हैं और तौलते हैं कि इस सच को कितनी कीमत मिले? भरोसे को तोडने की कितनी कीमत मिले ?
उधर कैसेनोवा, परेशान है.....उसकी कीमत क्यों नहीं लगती ?
बाजार ने उसे भी निराश नहीं किया । चांद और फिजा की कहानी की शक्ल में उसे भी भरपूर Face value दिया। इन नव उपन्यासकारों पर, इन नये कैसेनोवा पर पैसे ने जो भरोसा दिखाया है, वह ऑल्डस हक्सले के बेटी और भेद कथन को सीधे सीधे झुठलाता लग रहा है। तभी रियलिटी शो का रूपांतरित नवउपन्यासकार एंकर सामने बैठी हुई बेटी के सामने ही पिता से पूछता है - क्या आपका संबंध अन्य महिलाओं से है ?
बेटी सर झुका कर देखती सुनती है और उधर भेद खोल रहा पिता ऑल्डस हक्सले को कुहनी मारने के बाद कहता है - हां....।
पहले पैसों के मुकाबले इज्जत पर भरोसा था। उसे जाजिम बिछा कर बैठाया जाता था, लेकिन अब जाजिम ही हटा ली गई है । पैसा अब उस जाजिम में समेटा जाने लगा है जिस पर कभी इज्जत बैठा करती थी।
- सतीश पंचम
स्थान - वही, जहां चौबीस घंटे में दो बार समंदर की बांछे खिलती है
समय - वही, जब नागपंचमी के दिन नाग का बिल समझ चूहे के बिल में दूध उडेला जा रहा हो और चूहा सोच-सोच परेशान हो - ये साल में एक दिन बारिश सफेद क्यों होती है :)


11 Comments:
इस हेर-फेर में कई लोग हैं?
आज आपने पोस्ट पब्लिश होने का समय/स्थान नही लिखा :-)
अंदाज पसंद आया.
@ लवली कुमारी
आज आपने पोस्ट पब्लिश होने का समय/स्थान नही लिखा :-)
लो जी, मय-समंदर हमने समय और स्थान लिख दिया है।
याद दिलाने का शुक्रिया :)
खुल्ला खेल फर्रुक्खाबादी होता है टेलीवीजन पर आजकल!
:-)
बिल्कुल खुल्लम खुल्ला कार बार है.
रामराम.
आज के पच्चीस वर्ष पहले एक मौहल्ला हुआ करता था जहाँ सभी के राज साझा थे। लेकिन आज हम सब सात पर्दों में बन्द हैं। ऊपर से हँस रहे हैं और अन्दर से रो रहे हैं। उपन्यास भी कम हो गए हैं जिन्हें पढकर स्वयं को रेखांकित कर लिया जाए। ऐसे में टीवी ही माध्यम है स्वयं को जानने का, तो लोग लग गए उसे भुनाने में। हमारे अन्दर कितनी खूबसूरती है इसे निकालने का प्रयास नहीं है अपितु कितनी बदसूरती है इसे ही निकालने का प्रयास है। समाज को बदशक्ल करने का एक जीवन्त प्रयास किया जा रहा है। भोजन गृहण करना सुंदरता है तो वह सार्वजनिक होता है लेकिन मल त्याग करना गंदगी है इसलिए यह एकान्त में होता है,
अब यदि इसे भी सार्वजनिक किया जाएगा तो समाज तो संडाध मारने ही लगेगा न?
सही बात साहब जी एकदम सही लिखा है आपने जो बाते बहुत समय पहले लिखी गयी थी आज सच हो रही है .
mrs ajeet gupta se shmat hoo.u nhune bhut kuch kha diya hai .
नतमस्तक हूँ इस दृष्टि पर ! पहले क्यों नहीं पढ़ा?
sir ji u r style guru ! i just read ur comment on kasba . wat a blast !!
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