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Sunday 12 July 2009

अरे इंद्र, भले ही पानी न बरसाओ ,एक कप चाय तो पीकर जाओ


अरे इंद्र, भले ही पानी न बरसाओ
एक कप चाय तो पीकर जाओ


सुना है गुजरात में सुरापान से कई जानें गई हैं
मदिरा रानी वहां बिन कहना माने गई हैं
खेतों में पानी नहीं और तुम मदिरा छलका रहे हो
तुम तो इंद्र बेहया पर बेहया हुए जा रहे हो
चलो कोई बात नहीं
एक कप चाय तो पीकर जाओ
और सुनाओ


कल शाम ही बताया था किसी ने
अगली जंग पानी को लेकर होगी
दरारें जमीन पर सूखी बर्फी रचेंगी
सफेद कटी बर्फी पर गिध्द मंडराते दिखेंगे
औऱ जब बूँदों के बंटवारे होने लगेंगे
तब
पानीदार आदमी भी धीरज खोते लगेंगे
लाठियों को न तेल अभी से पिलवाओ
अरे इंद्र, एक कप चाय तो पीकर जाओ
और सुनाओ


किसान हलकान है अपने खेतों को देखकर
कजरी गाय भी परेशान है बछिया को लेकर
पानी ढूँढती एक मईया,
सिर पर धरे गगरा लेकर
और
बिलखती चुनिया
सानती मिट्टी अपने पेटों पर


शर्म हो, तो कुछ पानी बरसाओ
बेशर्म हो तो
एक चाय तो पीकर ही जाओ

इतना हक तो तुम्हारा भी बनता है।



- सतीश पंचम

समय - वही, जब शिक्षक बने विजय माल्या क्लास में शराब के गुणों पर लेक्चर दे रहे है और छात्र बने इंद्र दूध पी रहे हैं :)

12 Comments:

Udan Tashtari said...

शायद मान जाये!! सुन्दर रचना!!

विनोद कुमार पांडेय said...

वाह सतीश जी,
कितना सुंदर रचना किया आपने.
व्यंग और सच्चई का बढ़िया समागम...
काश इन्द्र देवता आपकी बात मान जाए..तो
अगला प्रयास हम भी करे..
बहुत बधाई !!

महेन्द्र मिश्र said...

आपकी मानकर इन्द्र देवता खूब पानी बरसा रहे है . वाह भाई

Shefali Pande said...

सुंदर रचना बधाई ....

सागर नाहर said...

सतीशजी,
इंद्र देवता को चाय ब्रुक बॉण्ड की रेडलेबल की ना पिलाना, आज ही पाबला जी बात कर रहे थेकि इस चाय में खतरनाक केमिकल होते हैं।

:) :)

सतीश पंचम said...

सागर जी, अगर इंद्र जी पिछले हफ्ते मेरे यहां आते तो वही पाबला जी द्वारा बताई ब्रूक ब्रांड की रेड लेबल वाली चाय पीते लेकिन गनीमत है कि अभी पिछले हफ्ते ही वह चाय खत्म हुई है और फिलहाल नब्बे रूपये पौवा की ताजमहल पीकर खुद को शाहजहां समझ रहा हूं :)
अब तो बाघ - बकरी चाय लेने की सोच रहा हूँ....सुना है कि इसको पीकर बाघ और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते हैं और एक दूसरे को हाय - हैल्लो करते हैं। इंद्र जी औऱ विजय माल्या दोनों को ही यही चाय पिलाने की इच्छा है :)

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर रचना !!

डा. अमर कुमार said...


हुँह, एक कप चाय पीकर तो जाओ..
हम अभी इतने गये बीते नहीं हैं, कि इत्ती सी कविता से मेरा सिंहासन हिल जाये
बड़े आये.. चाय पीकर जाओ
आयेंगे गर तुम पकौड़ी सकौड़ी भी खिलाओ
वोट बाँट कर और नोट काट कर.. वह सोंधा सँतोष नहीं मिलता
एक कप चाय पीकर तो जाओ.. आयेंगे पर, पकौड़ी सकौड़ी भी खिलाओ

डॉ. मनोज मिश्र said...

अच्छी रचना ,भला चाय पीने के बहाने ही अपना काम हो जाये.

सतीश पंचम said...

अमर जी, आपने पकौडी सकौडी की बात की तो मुझे सकौडा याद आ गया जो कुंभ के मेले के समय इलाहाबाद में अलोपीगंज के हनुमान मंदिर के ठीक सामने खाया था।
सकौडी के बजाय सकौडा नाम सुनकर पहले तो समझ ही नहीं आया कि ये क्या है....पूछने पर पता चला कि पालक वगैरह डालकर रसेदार के साथ खाया जाता है।
विस्तृत विवरण ज्ञान जी दे सकते हैं। सकौडा से पानी बरसाने का उपाय हो जाय तो एक सकौडा डे आयोजित करने की सोच रहा हूँ :)

शोभना चौरे said...

bahut achhi rachna

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

इन्द्र का राज्य स्वयं ही पानी की किल्लत झेलता प्रतीत होता है।
खबर है देवता तीन दिन से नहाये नहीं हैं! :)

बातें, जो जाने की जल्दी मचा रही हैं.....

कुछ बातें जल्दी मचाती हैं कि मैं जा रही हूँ......मैं न रूकूंगी। समय भी उन्हें ऐसा करने के लिये उकसाता रहता है कि कह दो कि देर हो रही है.......बहुत रूक लिये......हम जा रही हैं........अब न रूकेंगी.............ऐसी ही बातों को देखने पढने के लिये इस राह से गुजर सकते हैं जहां समय को एकबारगी धकियाया जा सकता है कि समय तुम बीत गये तो क्या हुआ ? ठहरने की सांकल तो अब भी खटखटायी जा सकती है......

ऐसी ही बीते-अनबीते पलों को इन लिंक्स के जरिये देखा जा सकता है ।

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