सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, July 5, 2009

दूल्हों के प्रकार के बारे में मिली एक रोचक जानकारी - बर, बरूल्ली, जरनाठ.....और एक हाल ही में जुडा एक नया नाम........हँसो मत यार नामकरण का सवाल है।:)

साहित्यिक रचनायें पढते हुए कभी कभी कुछ रोचक जानकारीयां भी मिल जाती हैं। अभी शनिवार को ही अमरकांत जी की साहित्य अकादमी पुरस्कृत रचना ‘इन्हीं हथियारों से’ पढ रहा था। राजकमल द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास के एक प्रसंग के द्वारा दुल्हों के बारे में एक रोचक जानकारी मिली है। प्रसंगानुसार घर के बच्चे, घर की बूढी दादी जीरादेवी से दूल्हों के प्रकार के बारे में पूछते हैं। उन्हें दादी ने पहले भी ये बातें बताई हैं लेकिन बच्चे, दादी के पोपले मुँह से मजाकिया तौर पर फिर दुल्हों के प्रकार के बारे में जानना चाहते हैं ।

तब दादी जीरादेवी अपने पोपले मुंह से बताना शुरू करती हैं–

- “ तो ए बाबू सुनो । शादी –ब्याह की सबसे अच्छी उमिर होती है सोलह से बीस बरीस तक। इस उमिर के दुल्हा को ‘बर’ कहते हैं। ‘बर’ को देखकर सबका जी जुडा जाता है। दुल्हन का दिल भी उल्लास से भर जाता है।

अब आगे बढो। बीस से पच्चीस बरिस के दुल्हा में वह बात नहीं, फिर भी कोई हरज नहीं। इस उमिर के दुल्हा को बर नहीं ‘बरूल्ली’ कहते हैं। अब पच्चीस से आगे बढो।

पचीस से तीस बरीस तक के दुल्हे का चेहरा रूढ होने लगता है। मूँछ के बाल कडे हो जाते हैं। बोली भी रूखी और कडकीली हो जाती है। इस उमिर के दुल्हा को ‘बरनाठ’ कहते हैं।

तीस से चालीस बरिस का दुल्हा को ‘जरनाठ कहते है। इस उमिर में देह, बोली – किसी में भी नरमाहट नहीं रहती। चमडी एकदम मोटी हो जाती है। इस उमिर का दुल्हा बडा चालाक हो जाता है, हमेशा अपने मतलब की बात सोचता है। रात-बिरात घुमक्कडी करने लगता है। कई चक्करों में रहता है, ए बिटिया। बीबी से हराठी-मुराठी की तरह ब्यौहार करता है। हमेशा जली-कटी सुनाता है।

हाँ, ए बिटिया, चालीस से आगे के दुल्हा को ‘खुरनाठ’ कहते हैं। इस उमिर में शरीर और मुँह फैल जाता है।चेहरे पर एक दो गहरी लकीरें दिखाई देने लगती हैं जैसे कच्ची सडक पर बैलगाडी की लीक। अधपके, मूँछों के बाल झाडू के सींकों की तरह फरकने लगते हैं। वह बुढौती को छिपाने के लिये इतर-फुलेल , खिजाब लगाता है। उसके गले मे बलगम भर जाता है और वह हमेशा खुर-खुर किये रहता है। वह सबको गुस्से से घूर-घूर कर देखता है। सबसे टोका टोकी करता है। उसकी दुलहन उससे बहुत डरती है।

अमरकांत जी ने जीरादेवी के मुँह से इतने विस्तार से ये विवरण दिये हैं कि आखिरकार मानना ही पडता है कि पुराने जमाने के बुजुर्गों की भी एक बौध्दिक सोच होती थी जो अपने आप में एक अलग ही गरिमा लिये रहती थी।

बहरहाल, ये बातें पढते हुए अचानक ही मुझे समलैंगिक विवाह वाला मुद्दा भी याद आ गया। मैं अब सोच रहा हूँ कि समलैंगिक विवाह से जन्मे इस नये किस्म के दुल्हे का क्या नामकरण किया जा सकता है।
उम्र की सीमा का लोप कर दिया जाय तो जहाँ तक मेरा ख्याल है जीरा देवी के द्वारा बताये गये ‘बरूल्ली’ दुल्हे की तर्ज पर समलैंगिकों के लिये नया नाम होमुल्ली कैसा रहेगा ?



- सतीश पंचम

स्थान - फुहार लूटती मुंबई
समय - वही, जिस दिन हाईकोर्ट का समलैंगिकों के पक्ष में फैसला आ जाये और उसी शाम पप्पू पास हो जाये :)
क्रिटिकल समय - पप्पू ने पास हो जाने के बावजूद मिठाई नहीं बांटी, ताकि लोगो में उसके बारे में कोई गलतफहमी न हो :)

12 comments:

गिरिजेश राव said...

अध्ययन की कमी घातक होती है। अगर मैंने आप की यह पोस्ट नहीं पढ़ी होती तो अगली लंठ चर्चा में यह 'वर वर्गीकरण' आ जाता। लोग कहते उड़ा लिया। बाल बाल बचे!

केवल होमुल्ली से काम नहीं चलेगा और भी बताइए। दादी वाला वर्गीकरण भी obsolete हो चुका है। 16 साल में शादी करने जाएंगे तो पुलिस धर दबोचेगी। नए जमाने के हिसाब से 'सामान्य दुल्हों' का वर्गीकरण भी बताएँ।

ओखली में सिर दिया है तो मूसल मार से बचने की कोशिश न करें।

गिरिजेश राव said...

पप्पू ने ते गजबे हँसाया।

डॉ. मनोज मिश्र said...

सही कहा, लेकिन देश के संविधान का तो पालन करना ही होगा?

अशोक पाण्डेय said...

नए किस्‍म की दुल्‍हन का नामकरण करने में कुछ मदद जरूर कर सकता हूं :
चंद्रमुखी, सूर्यमुखी और ज्‍वालामुखी के तर्ज पर चंद्रमुखा, सूर्यमुखा और ज्‍वालामुखा :)

:)
नए किस्‍म की दुल्‍हन के लिए एक शब्‍द और पहले से ही मौजूद है - मउगा। मसलन पुराने किस्‍म की दुल्‍हन के लिए पहले कहा जाता था - फलाना के मउगी। नए किस्‍म की दुल्‍हन के लिए कहा जाएगा - फलाना के मउगा :)

ताऊ रामपुरिया said...

अशोक पांडे साहब के साथ सहमत हैं जी हम तो.:)

रामराम.

satyendra... said...

बहुत खूब

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

समलैंगिक वर वधु (या वरु-वधा - to make it different?) पर जितनी पोस्टें ठिल गयीं उतने तो व्याह ही न हुये होंगे! :)

राज भाटिय़ा said...

आप का लेख पढ कर सोच रहा हु कि सही कहा,अशोक पाण्डेय जी की बात से सहमत हो जाये

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बर, बरुल्ली, बरनाठ, झरनाठ।
होमुल्ली, मउगा, मेहरा,
:)ये हम कहाँ जा रहे हैं?

डॉ .अनुराग said...

शादी की बात कौन कर रहा है ??????.कानून ने सम्बन्ध को आधिकारिक कहा है ....इसमें शादी का जिक्र तो कही नहीं ....वैसे उनकी अगली मांग एक साथ चार लोगो से शादी की हो सकती है

डा० अमर कुमार said...


मस्त है, सतीश भाई,
श्री अमरकाँत जी सौजन्यवश इस वर्गीकरण का एक अँतिम विश्लेषण छोड़ गये ।
पिता की आयु के समकक्ष दुहेज़ू दूल्हे को बप्पहिया कहा जाता था ।
तानेबाजी में या बेटी को कोसते समय कुभक्खा होता था, " वर नहिं बप्पहिया ’ मिलेगा कुलक्षणी को ! "
और बेचारी लड़की की रूह काँप जाती थी ।
लाओ, हम्मैं शबासी देयो ई बात पर !

डॉ. दलसिंगार यादव said...

सतीश जी,

इस हिसाब से तो अब 'बरों' की शादी नहीं हो रही है। 'बरुल्ली' और 'बरनाठ' ही शादी कर रहे हैं। अच्छी पोस्ट। भाषा तो मज़ेदार है ही। पूर्वी लोगों को तो खास मज़ा आएगा।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.