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Friday, July 3, 2009

हाय दईय़ा....दुल्हन को तो दाढी-मोंछ है। अरे नासपीटे, तैने ईतना भी पता न चला कि लडके को ही दुल्हन बना लाया। तभी कहूँ दुल्हन तन कर क्यों चल रही है :)


मुंह दिखाई के समय दूल्हन का घूंघट हटा कर जैसे ही जलेबी फूवा ने मुंह देखा, चौंक कर पीछे हट गईं - हाय दईय़ा....दुल्हन को तो दाढी-मोंछ है। कौन गांव की ले आया रे........अरे नासपीटे..........तैने ईतना भी पता न चला कि लडके को ही दुल्हन बना कर ले आया। तभी मैं कहूं..दुलहिन ईतनी तन कर क्यों चल रही है।
उधर घरातीयों में अलग चर्चा चल पडी - अरे यार ये दोनों लडका की आपस में ही शादी .......... कुछ समझ नही आ रहा।
कल्लू काका बोले - अरे कुछ ना समझो तो ही अच्छा है..........ससुरे न जाने आजकल के छोरे कौन खेल.....खेल रहे हैं कि सब खेल ही गडबड हो गया है, सुनील की शादी अनिल के साथ, रमेश की शादी उमेश के साथ और तो और पहलवान विजयलाल की शादी पहलवान अजयलाल के साथ.........अब जाने ई लाल लोग कौन पहलवानी करेंगे कि एक और लाल रचेंगे।
ईधर हलवाई जो अब तक अपना माल असबाब लौटने के लिये समेट चुका था, मजदूरी की राह तकता उकडूं बैठ कर लोगों की बातें सुन रहा था, उसके बगल में ही बाजा बजाने वाले बैठे कान खुजा रहे थे मानों कह रहे हों - लडके-लडके की शादी हो या लडकी-लडकी की, अपने को तो बस बजाने से मतलब है। हलवाई के मन में अलग शंका घर कर रही थी - शादी तक तो ठीक है....मिठाई बनाने का आर्डर मिल गया, लेकिन पहले जो किसी बच्चे - ओच्चे के जन्म होने पर नामकरण वाला आर्डर मिलता था वो तो अब मिलने से रहा, जाने कौन विधी से विवाह करा लाये कि लडके-लडके की शादी हो गई......हूंह।
ईधर पंडित केवडा प्रसाद को घेरकर गांव के लडके अलग मजाक कर रहे थे....और पंडित थे कि बस हें...हें करके खींस निपोर रहे थे।
दीनू बोला - पंडित चच्चा, ई बताईये कि आप तो हर विवाह में यही कहते हो कि - प्रण करो कि मैं एक पत्नी के रूप में पति का साथ निभाउंगी........तो ये बताओ उन दोनों में पत्नी कौन था और पती कौन।

सुनकर पंडित केवडा प्रसाद बोले - अब मैं का जानूं कौन पती था और कौन पत्नी, उन दोनों में जिसको अपने आप को पती समझना हो पती माने, जिसे पत्नी मानना हो वो पत्नी माने, हमको तो जो कहा गया वही करे हम......और एक बात कहूं.......तूम जो ईतना भचर-भचर कर रहे हो, कल को का पता तुम ही कोई लडका ले आओ और कहो कि पंडितजी ईस हरिप्रसाद की शादी मुझ दीनूलाल से करवा दो तो हम मना थोडे करेंगे।
सुन कर दीनू थोडा पीछे हटा तो झटकू आ पहुंचा, उसने अपनी टांग खुजाते हुए कहा - लेकिन ये बताओ कि - उन दोनों के बीच क्या-क्या होगा ?
क्या होगा माने ? अब पंडित जी को दूसरी शंका हुई कि न जाने अब ये चर्चा कौन तरफ ले जाना चाहते हैं........अब यहां से चलना चाहिये.......लेकिन क्या करें, अभी तक घराती लोगों की तरफ से विदाई दक्षिणा नहीं मिली है।

उधर कुछ पढे लिखे घरातीयों के बीच चर्चा चल रही थी, जब से रामदौस ने समलैंगिकता कानून को कानूनी जामा पहनाने की बात की है, लडके तो जैसे बिगडे ही जा रहे हैं.....क्या किया जाय कुछ समझ नही आ रहा।
मास्टर चंपकलाल बोले - अरे कल मैंने कक्षा में दिनेश को हरिलाल के पास बैठने को कहा तो उसने बैठने से इन्कार कर दिया, कहता है हरिलाल उसे छेडता है। बताओ भला, अब किसको कहां बिठाउं कुछ समझ ही नहीं आ रहा है।
अब तक चुप कनवरीया दद्दा खंखारकर बोले - अरे आप को तो केवल बैठाने-उठाने की चिंता हो रही है, मैं सोच रहा हूं यदि यही हाल रहा तो, अपनी चूडीवाली सुगनी फूवा का क्या होगा, वो किसे चूडी पहनायेगी? समझ नहीं आता क्या किया जाय।

उधर पंडित केवडा प्रसाद मन ही मन सोच रहे थे कि पंडिताईन घर पर दान दक्षिणा का इंतजार कर रही होगी, ईधर ये धत् कर्म चल रहा है, जल्दी दान दक्षिणा देने की कौन कहे, कह रहे हैं .....कुछ समझ नहीं आ रहा , क्या किया जाय।
आस पास बैठे लोगों की देह छू -छू कर बोलने लगे - चंपकलालजी आप......, कनवरीया दद्दा आप और संतलाल यादवजी आप........ये बतावें कि अब क्या हो सकता है, शादी-उदी तो विधी का विधान है, उसमें हम और आप क्या कर सकते हैं......विधान बनाने वाले उ बडे लोग हैं......चाहे संविधान बनायें या बिगाडें...हम आप कुछ नहीं कर सकते....क्योंकि होईहे वही जो राम रचि राखा ।

झटकू ने थोडा खुलकर पूछा - राम रचि राखा माने...........कही वो स्वास्थ्य मंत्रालय वाले तो नहीं ?
:)

************************

- यह पोस्ट तब लिखी गई थी जब रामदौस स्वास्थ्य मंत्री थे और समलैंगिक संबंधों को कानूनी जामा पहनाने की बात कर रहे थे, दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद शायद अब जाकर उनके दिल को ठंड पडी हो और महाशय कहीं बैठे बैठे अपलम....चपलम....चपलाई रे.... गा रहे होंगे और बगल ही में कहीं एक लडका रमेश, एक लडके विजय को कह रहा होगा -

चूडी मजा न देगी, कंगन मजा न देगा,
तेरे बगैर साजन ये सावन मजा न देगा :)

सोचता हूँ, वह भी क्या दिन थे जब पुरानी फिल्मों में ननद अपनी भाभी को गाकर बुलाती थी - ओ भाभी आना, जरा दीपक जलाना....आया आया अटरीया पे कोई चोर....आया...आया.

हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब वह ननद अपनी मर्द भाभी को भाभा कहेगी और गायेगी - ओ भाभा आना ..दीपक जलाना......आया आया अटरीया पे कोई बकलोल.... आया.. आया....

तो वहीं, नदिया के पार फिल्म में गीत के बोल बदल उठेंगे - ऐ भौजा तोरे आवन से हमरे अंगना में आया बहार भौजा :)


- सतीश पंचम

विशेष - हाईकोर्ट के समलैंगिकों के बारे में दिये फैसले के बाद नये शब्दों की खोज का बिगुल बज चुका है, भाभी का भाभा......भौजी का भौजा और ननद का ननदा.....इसी तरह के शब्द अब गढे जायेंगे।
प्रश्न यही है कि यदि भाभी का भाभा हो सकता है, भौजी का भौजा हो सकता है तो मामी का मामा तो पहले से मौजूद है, उसके लिये नया शब्द क्या हो :)


28 comments:

Arvind Mishra said...

सामयिक !

Udan Tashtari said...

धांसू...एकदम मौके पर!!

बालसुब्रमण्यम said...

बढ़िया सामयिक व्यंग्य!

Ratan Singh Shekhawat said...

वाह क्या धांसू व्यंग्य मारा है और वह भी एकदम मौके पर |

नितिन व्यास said...

बेहतरीन!! बहुत पसंद आया

विवेक सिंह said...

वैसे इन लोगों को शादी करने की क्या सूझी . यह तो पुराने जमाने का सिस्टम ठहरा !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप को नए शब्दों की तलाश की जरूरत ही नहीं। लोग खुदै ही तलाश लेंगे।

mahashakti said...

बेहतरीन व्‍यंग, इस मुद्दे पर बहुत दूर की सोच बाकी है।

संगीता पुरी said...

गजब लिखा है !!

हर्षवर्धन said...

क्लीन बोल्ड ... कउन भवा .. ई तय करब मुश्किल है

Anil Pusadkar said...

सटीक्।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही व्यंग .नाम तो नए अब परिभाषित होंगे ही :)

MANVINDER BHIMBER said...

mai ranju se sahmat hu.....

ताऊ रामपुरिया said...

बस गुरु छा गये,,जबरदस्त.

रामराम.

Abhishek Mishra said...

Aage-aage dekhiye, hota hai kya !!!

राज भाटिय़ा said...

अब तो गाली (गां?) भी सम्मान बढाये गी,

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

आपकी पोस्ट ने निकट भविष्य का सटीक चित्रण किया है.....बहुत ही उम्दा व्यंग्य्!!!

अभिनव said...

मामी का मीमा हो सकता है.. :-)
चिंतनपरक लेख.. सही है..

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

aisa bhi hoga

Shefali Pande said...

एक मेल मिला है .....माँ की सलाह बेटे को ---शादी करने के लिए ....
१९६० की शादी ------अपनी जाति की लडकी से
१९७० -------अपने धर्म की
१९८० ---------अपने स्तर की
१९९० ---------अपने देश की
२००० ----------अपने उम्र की

२००९ -----------------कोई भी हो ....पर लडकी से ही करना ....

Shefali Pande said...

एक मेल मिला है .....माँ की सलाह बेटे को ---शादी करने के लिए ....
१९६० की शादी ------अपनी जाति की लडकी से
१९७० -------अपने धर्म की
१९८० ---------अपने स्तर की
१९९० ---------अपने देश की
२००० ----------अपने उम्र की

२००९ -----------------कोई भी हो ....पर लडकी से ही करना ....

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

क्या धांसू टाईमिंग है........बिल्कुल मौके पर

डॉ .अनुराग said...

ओर सो कॉल्ड इन्टेलेकचुयवल बाजी भी शुरू हो गयी है ..हैरानी तो तब है जब लोग बलात्कार ओर दूसरे अपराध को इससे जोड़ रहे है .जिसका औचित्य समझ नहीं आ रहा है....जैसे कोई क्रान्ति आ जायेगी.....समाज में ...

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

महीने भर में नये गाने, नये कार्ड नये रेस्तरां --- एक नया बाजार सामने आ जायेगा।
यह तो अभूतपूर्व बिजनेस अपार्चुनिटी है! :)

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

बहुत ही उम्दा व्यंग्य्! एकदम मौके पर! गजब!
यदि आप समय निकाल सकें तो समलैंगिकता पर कुछ हमने भी लिखा है, देखिएगा।

रंजन said...

अच्छा है... तैयारी अभी से शुरु करो...

डॉ. मनोज मिश्र said...

बेहतरीन लिखा है भाई .

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

भारतीय कानून ने
एक नई दिशा खोल दी -
अमरीका मँ
अभी तक
इसी मुद्दे के पक्ष और विपक्ष मेँ
दोनोँ तरह के विचार रखनेवालोँ के बीच
सँघर्ष जारी है --
प्राकृतिक बनावट से जो समलैँगिक हैँ उनके लिये आरक्षण अच्छा है
परँतु आगे समाज मेँ
अगर ऐसे लोगोँ की सँख्या बढती गयी तब जो समाज उभरेगा,
उसकी सँरचना
आज के स्त्री / पुरुष लिये समाज से बहुत अलग होगी
ये निस्चित है -
जैसा पस्चिम मेँ
कई परिवारोँ मेँ,
अब साफ, दीख रहा है ...
ना ईश्वर को ही मानो
ना ही पुरातन पँथी,
दकियानुसी
वेद जनित
सामाजिक व्यवस्थावाले
धर्म को ही मानो -
अब तो बस,
कोँग्रेस पार्टी के कानून ही
देस को आगे लिवाने का
महत्त्वपूर्ण काम करेँगे जी ..
और,
ज्ञान जी ,
अमरीका मेँ
नये बिज़नेस के अवसर
ऐसे सिर्फ
"ग़े" लोगोँ के लिये
यात्राएँ
( लक्ज़री क्रूज शीप पर )
भी चल ही रही हैँ -
भारत बदल रहा है
और वो भी बहुत तेजी से ..
- लावण्या

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