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Sunday, June 28, 2009

आतंकवादी लोग भारत को अपनी मौसी का घर मानने लगे हैं। विश्वास न हो तो खुद ही देख लो


अभी ऐक आतंकवादीजी रास्ते मे मिल गये - मैने पूछ लिया - कहाँ जा रहे हो ?

मौसियाने जा रहा हूँ।

मतलब ?

अरे यार अपने खाला के घर जा रहा हूँ, कुछ बम-वम फोडना है कि नहीं।

मैने कहा यार समझ नहीं आ रहा कि ये तेरा कौन सा मौसीयाना है।

तो बोला - अरे हमारी माँ कई बहने हैं, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भारत.......सब अपुन की माँ की बहने है, तो क्या है कि अपनी एक माँ को छोड बाकी अपुन की मौसी लगेंगी। तो अभी जा रहा हूँ....मौसीयाने बम फोडने। तूम आते हो तो चलो।

मैं सकपका गया.....मैने कहा - यार मैने ये तो सुना था कि आतंकवादीयों ने यहाँ अपनी खाला का घर समझ रखा है, लेकिन नहीं जानता था कि....इतनी शिद्दत से तुम इसे अपनी खाला का घर मान बैठे हो।

मानना क्या है - मानों तो वादी नहीं तो आतंकवादी।

वादी मतलब ?

वादी शब्द बहुत सारे बोरबचन का पर्यायवाची शब्द है - जैसे उदारवादी,समतावादी,समाजवादी,संघर्षवादी,जनवादी,राष्ट्रवादी।

तो तुम्हें ये सब बोरबचन लग रहे हैं।

नहीं बोरबचन तो अपने गुरू श्री लादेन को लगता था, मुझे तो ये वादी वाले शब्दों से लगता है कि कहीं लोकतंत्र के हसींन वादीयों मे घूम रहा हूँ। कोई कुछ बोलने वाला नहीं, कोई कुछ कहने वाला नहीं। कभी कोई केस हो जाय तो हमारे हमदर्द भी यहीं से निकल आते हैं ये कहते हुए कि हमें मुठभेड पर शक है। विश्वास न हो तो कसाब और उसके वकील को देख लो। जिस तरह से इस केस में वादी और प्रतिवादी का खेल खेला जा रहा है, उससे मुंझे तो लोकतंत्र मे ये वादी शब्द बहुत अच्छा लग रहा है।

मैं सोच मे पड गया - सचमुच आजकल ये इतने सारे लोकतंत्र के पवित्र नामों वाले वाद जैसे राष्ट्रवाद, समाजवाद,जनवाद आदि उन्होंने अपना अर्थ और महत्व किस तरह खोया है, और उस अर्थ को खोने मे हमारे ही लोगों का कितना बडा हाथ है, चाहे वह कसाब के वकील के रूप में कोई शख्स हो, या फिर कोई अंतुले जैसा बकवकीया नेता जो मुठभेड पर ही सवाल उठा रहा हो, फिर इतने सारे आतंकवादीयों को ये देश आतंक के लिये हसीन वादी क्यों न नजर आये। सुना है कि कसाब के वकील ने जज पर ही आरोप लगा दिये हैं कि वो वादी को लेकर पक्षपात कर रहे हैं। जज द्वारा आपत्ति जताने पर वकील ने माफी तो मांग ली, पर क्या सचमुच ये वकील अब वकील कहलाने लायक है जो कि सब कुछ जानते समझते हुए भी फर्ज के नाम पर कुछ भी कहे जा रहा है ?

- सतीश पंचम


समय - वही, जब कसाब अपने वकील से सलाह मशविरा कर रहा हो कि अगला दांव क्या चला जाय और पीछे दीवाल पर सटकर एक छिपकली सब कुछ सुन रही हो और सुनने के बाद कह उठे - इस कसाब की दाल कहाँ बनती है, सोचती हूँ, उसी में शर्म से डूब मरूँ ।

( एक रीठेल पोस्ट)

10 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

सही कहा आपने,
ये उनके खाला ही घर लगता है,
जब देखो धमक पड़ते है,

वैसे सब रिश्तों की एक सीमाएँ होती है,
अगर प्यार से मिलो तो सब प्यार से मिलते है पर अगर इरादें नेक नही है तो
सभी उसी तरीके से मिलने लगते है.

तो ज़्यादा अच्छा होगा सुधर ही जाएँ...

गिरिजेश राव said...

रीठेल क्या है? जरा समझाएँ।

राज भाटिय़ा said...

एक सच.
धन्यवाद

सतीश पंचम said...

गिरीजेश जी, इस पोस्ट को पहले भी एक बार प्रकाशित किया जा चुका है बाटला कांड के बाद, लेकिन हाल ही में कसाब के वकील द्वारा जज पर वादी और प्रतिवादी के बीच पक्षपात का लांछन लगाने पर इस पोस्ट की याद आ गई सो थोडे से बदलाव के साथ इसे पुनर्प्रकाशित कर रहा हूँ।


चूँकि एक बार फिर इसे ठेल रहा हूँ इसलिये अंगरेजी के 'री' और हिंदी के 'ठेल' को मिलाकर रीठेल लिखा है :)

गिरिजेश राव said...

स्पष्टीकरण के लिए धन्यवाद।
इस नए शब्द की सूचना अजित वडनेरकर को दे दें।;)

आप के व्यंग्य से(पर मत समझिएगा, बहुत शानदार लेख है) रोना आ रहा है। क्या लिखूँ समझ में नहीं आ रहा है।

जो चल रहा है, चलने दें और देख कर सिर धुनते रहें। केश मुड़वा लीजिए नहीं तो जिस तरह आप बाल नोच रहे हैं, गंजे हो जाएंगे। छिपकली की जान न लें, बड़ा बवाल हो जाएगा - इंटरनेशनल। कसबवा तो दाल पी मर जाएगा लेकिन हमारी सेकुलरी सरकार को कटघरे में खड़ा कर जाएगा। मुआमला तुरंत टर्न ले अल्पसंख्यक उत्पीड़न का बन जाएगा। आखिर वह इस देश का संख्या में 'सबसे कम'वाला अल्प संख्यक है। ;)

पंगेबाज said...

हमने अपनी टिप्पणी कसाब साहब सारी माफ़ करना काजिम साहब के वकील ब्लोगर दोस्त को भेजी है उनकी अनुमति मिलने पर छापने के लिये आपको दे पायेगे जी :)

बालसुब्रमण्यम said...

कसाब जिंदा रहे इसी में हमारा फायदा है। क्यों? क्योंकि कसाब असली अपराधी नहीं है। असली अपराधी उसके आका हैं, जो पाकिस्तान में बैठे हैं, और जिन्हें अमरीका और पाकिस्तान का शह प्राप्त है।

यदि कसाब को फांसी हो जाए, तो हम सब फोल्स कोंप्लेसेन्सी में आ जाएंगे, कि चलो कसाब को लटका दिया, अब चैप्टर क्लोस।

पर चैप्टर तो असल में खुला का खुला ही रहेगा, जब तक पाकिस्तान रहेगा।

पाकिस्तान अंग्रेजों की कूटनीतिक सफलता है, और हमारे नेताओं की घोर विफलता।

पर पाकिस्तान का बना रहना अनिवार्य नहीं है। भारत एक बार फिर अखंड हो सकता है, यदि हम सब, सरहद के दोनों ओर, इसे चाहने लगे।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

बहुत मस्त!

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत सुंदर लिखा है भाई जी .

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

अभी तो ये इन लोगों के लिए खाला का घर ही है....यदि ऎसे ही हाल रहे तो कहीं सारा हिन्दोस्तान इनके अब्बा की जागीर न बन जाए!!!

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