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Thursday, June 25, 2009

मैकूलाल की बिजनेस पॉलिसी

कॉरपोरेट स्टाईल की फंड रेजिंग से आपका कभी वास्ता पडा हो तो आप अच्छी तरह कुछ बातें जान समझ सकते हैं जिसका कि दूसरा नाम ही है- चालाकी । यह चालाकी एक सोचे समझे गुच्छे का रूप होता है जो लटकता तो रहता है पर आसानी से नहीं दिखता। आप ने एक फार्म भरा कि सिर्फ एक क्रेडिट कार्ड चाहिये, कुछ दिन बाद आपको एक औऱ वैल्यू प्लस कार्ड मिलता है यह कह कर कि आपको हमारी सर्विस अच्छी लगी होगी, यही सोचकर हम ये कार्ड भेज रहे है.....आपने अच्छा किया जो ECS का फार्म भरा। आपको लाईन में लगने की जरूरत नहीं। आपकी सुविधा का ख्याल रखते हुए प्रोसेसिंग फीस आपके सेलरी अकाउंट से ले ली जायेगी।
जब कोई ग्राहक अड जाता है कि बिना कहे तुमने कैसे इतना सब दे दिया और पैसा भी काट लिया तो बैंक आपको खेद है का एक सूचना देकर आपको दी गई क्रेडिट लिमिट खत्म कर देता है औऱ आपके अकाउंट के उपयोग न करने पर आप का अनयूज्ड पैसा अपने क्रेडिट पूल में डाल देता है। जैसे ही कोई ग्राहक मिलता है तो बैंक आपके द्वारा छोडे गये क्रेडिट मनी को किसी और को जारी करता है, अपने उसी क्रेडिट पूल के जरिये जिससे आपको पहले क्रेडिट कार्ड दिया गया था। यानि कि एक की जूठन ( कैंसल्ड क्रेडिट लिमिट ) के जरिये दूसरे का पेट भरने वाली पॉलिसी।

वहीं दूसरी ओर मैकूलाल वो बेल शरबत वाला है जिसे मैदागिन ( बनारस) में देखा है । एक गिलास बेल रस पीने के बाद जैसे ही ग्राहक खाली गिलास सामंने रखता है कि तुरंत मैकूलाल और एक कल्छुल बेल रस खाली गिलास में उडेल देता है। ग्राहक ना ना करे तब तक गिलास फुल्ल।

अब।

ग्राहक झख मारके बेल रस पीता है और जो अडियल ग्राहक मिल जाता है तो मैकू बहस भी करता है कि आप ही ने गिलास सामने पीने के बाद इस तरह रखा जैसे और मांग रहे हो....तो हम तो भर दिये। अब पी लो।

इतने पर भी जब ग्राहक नहीं पीता औऱ सिर्फ एक गिलास का पैसा देकर चल देता है तो उसके पीठ घुमाते ही मैकूलाल उसी जूठे गिलास की बेल रस को फिर से उसी मटके में उडेल देता है जिसमें से कि बेल रस निकाल कर दिया था। जूठे गिलास वाले बेल रस को मटके में डालकर फेर फार कर पूरी कायनात को एक सा करने के बाद मैकूलाल आवाज लगाता है - ठंडा बेल तरावट दार।

शायद इसे ही कहते हैं कॉरपोरेट कल्चर का ठेला संस्करण ।

- सतीश पंचम

5 comments:

Anil Pusadkar said...

ठेला संसकरण के जनक मैकूलाल को भी सरकार कभी न कभी कैबिनेट मंत्री का दर्ज़ा देगी लगता है,कार्पोरेट वालो को तो मिलना शुरू हो गया है।

ताऊ रामपुरिया said...

भाई इन सारे कार्पोरेटियों ने जितने भी नायाब आईडिया हैं ये सब इन ठेलों और फ़ेरी वालों से ही लिये हैं. बहुत अच्छा लिखा.

रामराम.

अशोक पाण्डेय said...

बड़ा होनहार जान पड़ रहा है मैकूलाल। किसी दिन किसी बड़े कारपोरेट घराने के मालिक के रूप में पहचाना जाएगा :)

डॉ. मनोज मिश्र said...

अरे वाह बहुत बढियां लिखा है आपनें .

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

वाह! मैक लाल, फूंफां बैंक के सी.एम.डी। सेलरी ९०,०००,००० डालर सालाना! :)

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