सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, June 28, 2009

'मीडिया और साहित्य' से संबंधित परिसंवाद में पूछा गया 'बलॉग और साहित्य' से संबंधित एक प्रश्न और उसका अनोखा उत्तर

गिरिजेश राव, जी ने मेरी एक पुनर्प्रकाशित पोस्ट पर दी गई टिप्पणी में पूछा था कि ये 'रीठेल' क्या है ? यह सवाल सुनकर कल ही साहित्य अकादमी में हुए एक रोचक वाकये की याद आ गई।


हुआ यूँ कि कल ही मुंबई में मेरी बात साहित्यकारों के चुप्पीकरण के बारे में पुष्पा भारती जी से हुई थी । मौका था साहित्य अकादमी के परिसंवाद का, विषय था 'मीडिया और साहित्य'। किसी बात पर उन्होंने कहा कि साहित्यकार चुप है मीडिया की बदलती भूमिका पर, समाज में आये बदलाव पर। इस पर मैंने उनसे साहित्य अकादमी के परिसंवाद में सवाल जवाब के दौर में पूछा कि - आप कह रही हैं साहित्यकार चुप है लेकिन साहित्यकार चुप नहीं हैं। माध्यम ढूँढे जा चुके हैं। कई ब्लॉग लिखे जा रहे हैं। तब उन्होंने कहा कि ब्लॉग को मैं साहित्य नहीं मानती। वहां मैंने पढा है कि लोग लिखते हैं 'बडी टेंशनात्मक स्थिति है'। ये 'टेंशनात्मक' क्या है ? कितने लोग ब्लॉग पढते हैं। ब्लॉग पढा जाता है अमिताभ बच्चन का। मैं ब्लॉग को साहित्य नहीं मानती।


पुष्पा भारती जी ने भले ही ब्लॉग को साहित्य का दर्जा देने से इन्कार कर दिया । लेकिन मेरा मानना है कि ब्लॉग एक बहता साहित्य है। वह ठहरा हुआ साहित्य नहीं है। यहां नये नये शब्द गढे जा रहे हैं। भले ही उन पर अंग्रेजियत की छाप दिखती हो पर यही इसका गुण भी है जो सबको साथ लेकर चलता है। मेरा मानना है कि जब किसी बहते पानी को एक जगह रोकने की कोशिश की जाती है तो वह धीरे-धीरे जमा होकर उपर उठने लगता है और अपने निकलने का रास्ता तलाशता है। इन्टरनेट ने उसी रास्ते का काम किया है। ब्लॉग के रूप में एक रास्ता दे दिया है जिससे कि पानी बहने लगा है। हां इस ब्लॉग साहित्य में कई चीजें अच्छी नहीं होती, कई पोस्ट एक बार पढने के बाद बोझिल से लगने लगते हैं पर क्या साहित्य में ऐसा नहीं है। कई ख्यातनाम किताबें हैं जो अच्छी तो हैं पर उनमें ही कहीं कुछ पन्ने बोझिल हो जाते हैं। तो फिर ब्लॉग साहित्य के साथ ये सौतेला व्यवहार क्यूँ। यहाँ भी एक से बढकर एक लेख मिल जाते हैं तो वहीं एक से बढ कर एक कूडा करकट भी मिलेंगे ही। इन्हें आपको नजरअंदाज भी करना पडेगा क्योंकि यह तो हर क्षेत्र की बात है, वहाँ भी आपको अच्छे बुरे से साबका पडता होगा।

लोग कह सकते हैं कि ब्लॉग जगत में गुटबाजी चलती है ( कुछ हद तक सच भी मानता हूँ) लेकिन, क्या गुटबाजी साहित्यकारों के बीच नहीं चलती?

अभी हाल ही मे राजेंद्र यादव जी ने जून 2009 के संपादकीय में कहा कि - पत्रिकायें साहित्य के पहिये हैं। किताबें व्यक्तिगत या सार्वजनिक संग्रहालयों में ही पडी रह जातीं, अगर पत्रिकाएं उन्हें अंधेरे बंद कमरों से खींचकर बाहर खुली हवा में न ले आतीं। साहित्य के लिये पुस्तकों तक जाना पडता है, पत्रिकाएं उन्हें हम तक लाती हैं, बहसें और सूचनाएं देती हैं, नायक और खलनायक बनाती हैं वे साहित्य को गतिशील बनाती हैं।


मैं राजेंन्द्र जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ। यहां पर मेरा यह भी मानना है कि ब्लॉग भी वही काम कर रहा है। उसने वही काम पत्रिकाओं के साथ किया है। बल्कि पत्रिकाओं से बढकर ही। उसने साहित्य और पत्रिकाएं, दोनों को ही खींचकर खुली हवा देने का काम किया है। इस मायने में ब्लॉग साहित्य और पत्रिकाएं दोनों के लिये ही पहियों का काम किया है। संक्षेप में कहूँ तो ब्लॉग एक त्वरित साहित्य है। इसके बहते रहने में ही सुंदरता है। साहित्यकार गण, हो सके तो इस ब्लॉग जगत की फुलवारी को सींचने का काम करें, इस फुलवारी को देख कर नाक भौ सिंकोडने से फुलवारी को यदि मुरझाना ही होता तो ये कब की मुरझा चुकी होती, पर दिन ब दिन इसमें एक से बढकर एक फूल खिल रहे हैं, कुछ खर पतवार भी हैं, कुछ बेल बूटे भी हैं पर सब मिलकर फुलवारी के ही तो हि्स्से हैं।


- सतीश पंचम
( 'मीडिया और साहित्य' से संबंधित परिसंवाद शनिवार 27 जून 2009 को मुंबई में हुआ था, यह पोस्ट उसी परिसंवाद पर आधारित है )

16 comments:

Arvind Mishra said...

चिन्तनपरक ! रीठेल को राव साहब ने अपना लिया होगा ! ज्ञान जी ने कई नायाब शब्द दिए हैं ! यह हिन्दी साहित्य किस चिडियां का नाम है वह जो हिन्दी के विभागों में पढाया जाता है या पुष्पा भारती धर्मयुग के पन्नो में लिखती थी -शायद उन्हें मेरा नाम याद हो -जब जाय अदमसन पर एक लेख पर उनके साहित्य को मैंने आडे हाथों लिया था ! ये खत्म हो चुके लोग हैं उन्हें यहाँ तवज्जो न दें !

Arvind Mishra said...

मीडिया लिखें ! वर्तनी कृपया सुधारें !

सतीश पंचम said...

अरविंद जी, ध्यान दिलाने के लिये शुक्रिया। वर्तनी सुधार दी है।

गिरिजेश राव said...

एक तरफ रीठेल, टेंसनात्मक, धमकात्मक. . . जैसे शब्दों की रचना तो दूसरी तरफ इतनी सतर्कता कि वर्तनी दोष पर संकेत !

इतना जीवंत और नवोन्मेषी जगत है यह। यह अगर साहित्य नहीं है तो साहित्य की परिभाषा बदलनी पड़ेगी। साहित्य तो 'सहित' शब्द से बनता है। सबको समाहित करे और सबके लिए हितकारी हो, साहित्य तो इसी को कहते हैं। अब चाहे वह ब्लॉग में दिखे या वाराणसी स्टेशन पर रात में होने वाले हरि कीर्तन में! :)

साहित्य माध्यम का मुहताज नहीं।

बालसुब्रमण्यम said...

ब्लोग एक लचीला माध्यम है, उसका उपयोग साहित्य रचने के लिए भी किया जा सकता है। उसमें लिखी सामग्री साहित्य की कोटि में भी आ सकती है।

जिस तरह सभी पुस्तकें साहित्य नहीं होतीं, उसी तरह सभी ब्लोग भी साहित्य नहीं हैं, न ही सभी ब्लोग कचरा ही हैं।

इसलिए इस तरह के स्वीपिंग स्टेटमेंट न करने में ही बुद्धिमानी है।

रही बात रीठेल और टेंशनात्मक जैसे शब्दों की, यह भाषा की सजीवता के द्योतक हैं, इनका तो स्वागत करना चाहिए।

यदि आप निराला, नागर्जुन, आदि बड़े कवियों की रचनाएं पढ़ें, तो उनमें भी ऐसे सैकड़ों शब्द मिल जाएंगे जो आपको किसी भी शब्दकोश में नहीं मिलेंगे।

आखिर साहित्य होती क्या चीज है, वही न जिसमें भाव हो, जो किसी जाति की आकांक्षाओं को व्यक्त करती हो। तो ऐसी काफी सामग्री आपको ब्लोगों में भी मिल जाएगी।

यदि यही सामग्री किसी पत्रिका में छप जाए, तो कई लोग उसे साहित्य के रूप में पहचान लेंगे। ब्लोग में छपने पर लोग धोखा खा जाते हैं।

इसमें उस सामग्री का कोई दोष नहीं है, दोष है ब्लोग माध्यम का, जो बिलकुल नया है, और पुराने लोग उसे ठीक से अब तक समझ नहीं पाए हैं, उसी तरह जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी के समय के पुराने साहित्यकार छायावादी रचनाओं के सौंदर्य को नहीं पहचान पाए थे।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

यह री-ठेल मैने अपनी २४ अक्तूबर २००७ की पोस्ट के लिये प्रयुक्त किया था। मुझे कॉपीराइट क्लेम करना चाहिये?! :)

सतीश पंचम said...

जब पुष्पा भारती जी ने इस शब्द 'टेंशनात्मक' का उच्चारण किया तभी तुरंत ही मेरे जहन में आलोक पुराणिक, अनूप शुक्ल और ज्ञान दत्त जी का नाम कौंध गया कि इनमें से ही किसी ने इस टेंशनात्मक शब्द का इस्तेमाल किया है ( ऐसा मैं अब तक पढे लेखों और टिप्पणी शैली को ध्यान में रख कर कह रहा हूँ) वैसे इनके अलावा कोई और भी हो सकता है जिसने टेंशनात्मक शब्द इस्तेमाल कर टेंशन दे दिया है, खैर कुछ दिया ही है, लिया तो नहीं :)

ज्ञानजी, मुझे नहीं पता था कि यह रीठेल शब्द आप का ही इजाद किया है वरना लग्गी लेकर ठेलने के लिये आप ही को बुलाता :)

अक्सर आप ही की पोस्ट पर और एक बार शायद समीर जी की पोस्ट पर यह रीठेल शब्द देखा है मैनें।

@ बालसुब्रमण्यमजी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ। इसलिये मैने बडे ही स्पष्ट शब्दों मे कह दिया ब्लॉग एक त्वरित साहित्य है। यहाँ अच्छा भी है और खराब भी हैं।

वैसे आपने बात मार्के की कही कि - दोष है ब्लोग माध्यम का, जो बिलकुल नया है, और पुराने लोग उसे ठीक से अब तक समझ नहीं पाए हैं, उसी तरह जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी के समय के पुराने साहित्यकार छायावादी रचनाओं के सौंदर्य को नहीं पहचान पाए थे।

सतीश पंचम said...

और हां, जहाँ तक कचरे की बात है तो मेरे ब्लॉग पर बहुत सा कचरा पडा है, सोचता हूँ उसे यूँ ही पडे रहने देता हूँ घूर की तरह, सुना है घूरे के भी दिन सालों बीतने पर पलटते हैं और उससे बनी खाद उपयुक्त होती है :)

eSwami said...

घोंघाछाप साहित्यकारों को तो हम कभी के खारिज कर चुके हैं - वो क्या सोचते हैं उससे इधर किसी की सेहत पर कोई फ़र्क नहीं पडता. यदि देश की औसत आयू यूवा है तो वे अपने काम के शब्द गढ ही लेंगे!

हिंदी के नये शब्द इन्टरनेट पर ही गढे गए हैं - तकनीकी शब्दों के लिये नये शब्द बनाने से लेकर - जैसे की संजाल, ई-पता के बाद चिट्ठा,पेल, प्रतिपेल, भौंकाच[भौंक+उवाच] जैसी समझादारी से लेकर बेलौस तक की रेंज है.

राज भाटिय़ा said...

सतीश जी ब्लांग एक चढता सुरज है, ओर मेने देखा है यहा एक से बढ कर एक महान लेखक, कवि ओर रचनाकार है, यानि कल ब्लांग का होगा, छोडिये इन नक चढो को.
धन्यवाद

डॉ. मनोज मिश्र said...

डूबता सूर्य यह कह गया है ,
फिर सबेरे -सबेरे मिलेंगे .

अनूप शुक्ल said...

शानदार पोस्ट! सूत्र-वाक्य जमाऊ हैं:
ब्लॉग एक त्वरित साहित्य है। हालांकि मैं ब्लाग को अभिव्यक्ति का माध्यम मानता हूं। तमाम नये शब्द ब्लागिंग में गढ़े गये और जा रहे हैं। समय लिखेगा इसकी कहानी। अभी से क्या हलकान होगा। पुष्पाजी के कहने से क्या होगा? वे तो ब्लाग लिखती नहीं हैं!

शरद कोकास said...

मेरे यहाँ हिन्दी की तमाम साहित्यिक पत्रिकायें आती है अब कवि -कथाकार सभी नये नये शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं कई आंचलिक शब्द भी है जो अंचलो मे बरसों से प्रचलित हैं लेकिन हिन्दी साहित्य में उनका नाम नही है जैसे एक ठो पान देना ,मेरे लिये चहा मंडा देना ,सब गपड्चौथ है जरा फुनिया देना ऐसे ढेरों उदाहरण दिये जा सकते है

Shiv Kumar Mishra said...

पुष्पा जी के लिए मामला शायद 'टेंशनात्मक' हो चला है. वैसे आपको भी 'ढूँढ-ढाँढ' (सर्च के लिए जो आपने अपने ब्लॉग पर लिख रखा है) शब्द बता देना चाहिए था. और भी शब्द हैं. ऐसा किया जा सकता है. तमाम शब्दों की एक लिस्ट बनाकर उन्हें भेंट कर सकते हैं. आखिर ब्लॉग का मामला अब तक 'जमतात्मक' हो चुका है.

अब यह बात तो न जाने कितनी बार सुन चुके हैं कि ब्लॉग को साहित्य नहीं माना जा सकता है. पुष्पा जी को कोई नई बात बतानी चाहिए.

Nitish Raj said...

अच्छी बात छेड़ी है आपने। पहली बात तो यहां मैं ये साफ कर दूं कि अमिताभ बच्चन के ब्लॉग को मैं साहित्या का ब्लॉग कतई नहीं मानता। दुनिया मानती हो तो माने। दूसरा कि ये कोई ब्लॉगिंग को कोरा साहित्य मान बैठे तो मैं ये भी नहीं मानता। आपसे इस बात पर सहमत हूं किसी हद तक कि अभी तो ये बेहता पानी है, बहूत दूर तलक जाना है। चुनिंदा लोगों को छोड़ दें तो लोग सही मात्रा तक नहीं लगाते हैं।

RAJ SINH said...

मठाधीशों के ' भय ' फूट रहे हैं :) .

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.