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Saturday, June 13, 2009

एक बच्चे का ननिहाल और नई शर्ट ( वाकया )

इस बार गांव गया तो एक चार साल के बच्चे नितिन के निर्मल क्रोध को देखने का मौका मिला । हुआ यूं कि बच्चा नितिन अपने ननिहाल, यानि के मेरे गाँव में रहता है। खूब लाड प्यार में पल रहा है। नितिन की माँ अपने ससुराल में ही है, चार साल के नितिन को जब उसके मामा ने एक पाँच सौ के आसपास की कीमत वाला शर्ट लाकर दिया तो उसे पहनने पर उसके नाना ने कहा कि तुम्हारी तो तैयारी हो गई । अब यही कपडा पहना कर तुम्हे तुम्हारी मम्मी के पास छोड आउंगा।

उस समय तो नितिन कुछ न बोला लेकिन थोडी ही देर बाद एक बच्चे की आवाज आई।

अरे नितिनवा ने देखिये क्या कर दिया है ?

सब लोग दौडे कि क्या हो गया । आशंका सबके मन में जाने कैसे कैसे रूप लेकर आ रही थी। घर के अंदर झांक कर लोगों ने देखा कि नितिन ने अपनी उस नई नवेली शर्ट को हँसुए सो काट-काट कर चिथडें कर डाला था। पहुँचने पर हँसुआ एक तरफ फेंक कर होने वाली पिटाई के लिये जैसे एक तरह से वह अपने को तैयार कर रहा था।

उसकी काजल लगी आँखे देखने पर जाने कैसा तो लग रहा था। विस्मय, डर, आशंका इन सबको मिलाने के बाद एक और चीज दिख रही थी उसकी आँखों मे और वह थी- जिद्द । कि, न रहेगा ये शर्ट और न जाना पडेगा अपने घर।

न चाहते हुए भी, लोगों के रोकते रोकवाते भी मामा लोगों ने उसकी धुनाई कर दी। पिट पिटाने के बाद रात को वही नितिन फिर नाना की थाली के पास आलथी पालथी मार कर बैठ गया और मुंह खोलकर कहा – आ……।

नाना ने भी एक कौर उसके मुंह में डाल दिया। रात को जब सभी बैठे तो इस बात पर लगभग सभी सहमत थे कि बच्चे ननिहाल में रहने से बिगड जाते है। शायद कुछ हद तक ये बात सच भी है। माँ-बाप के यहाँ रहने पर अनुशासन कुछ रहता है जो कि ननिहाल में रहने पर अनुशासन पर लाड-दुलार की परत चढ जाती है ( हो सकता है ये बात सच न भी हो )

खैर जो भी हो, नितिन के चर्चे गाँव में भी खूब हो रहे हैं – पट्ठे ने नई शर्ट फाड डाली।

अब पता चला कि जिद्द चर्चात्मक भी होती है।


- सतीश पंचम

स्थान – मुंबई

समय – वही, जब ठसाठस भरी बस में और सवारी लेने के लिये खलासी आवाज लगाता जाता है और ड्राईवर बस को यूँ ही आगे पीछे करता रहता है कि लोगों को लगे कि बस अब निकलने ही वाली है :)

7 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

आपकी बात सही है, नितिन जैसा ज्यादातर बच्चों का हाल होता है, एक जमाने मे हम भी नितिन थे. मामा का घर छूटना स्वर्ग छूटने जैसा था.:)

रामराम.

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत सुंदर मनःस्थिति का वर्णन किया है भाई जी .नितिन नें साबित किया कि भौतिक चकाचौध उसके प्रेम की बाधा नहीं बन सकते .बढियां पोस्ट . सतीश जी आपका तो मैं इन्तजार ही करता रह गया .आप आये और चले भी गये .अब घर कब आना होगा ?

सतीश पंचम said...

मनोज जी,
यह सच है कि मैं आया और चला भी गया। लेकिन सिर्फ तीन दिन का मौका था सो एक दो दिन तो एकाध बारात में शामिल होने में बीत गये, बाकी जो बचे वो गाँव के बच्चों के साथ धमाचौकडी में बिता दिये।
बारात का विवरण मेरी अगली पोस्ट में दूंगा। कोशिश करूँगा की अगली किसी छुट्टी में मिलूँ।

विनोद कुमार पांडेय said...

बहुत अच्छा वाक़या बताया आपने,
बच्चे थोड़े चुलबुले हो ही जाते है,
ननिहाल के प्यार मे खो ही जाते है,
नाना की दुलार मे,और नानी की कहानी मे,
मज़ा आता है उन्हे शैतानी मे.

अशोक पाण्डेय said...

और अब उस बच्‍चे की जिद पोस्‍टात्‍मक भी हो गयी :):)

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

अरे भैया हमारी नानी वापस ले आओ तो सैंकड़ों शर्टें निवछावर कर दूं। सवेरे नानी लिट्टी गुड़ और कमोरी में गरम किया गाढ़ा ललछरहों रंग वाला डूंड़ी (एक सींग वाली मेरी प्रिय) भैंस का दूध पिलाती थीं।
वह समय कैसे वापस मिले!

रचना त्रिपाठी said...

मुझे याद नहीं है कि मै आज तक अपने ननिहाल में चौबीस घंटे भी रहीं हो,कभी जाना भी हुआ तो एक-दो घंटों में ही लौट आना हुआ। ननिहाल इतना पास जो है।
पापा का भी यही मानना था कि बच्चे ज्यादा समय वहाँ रहे तो बिगड़ जायेंगे। मेरे ६ मामाजी लोग हैं और मजे की बात ये कि मेरी किसी से नही बनती। आप सोच रहे होंगे ऐसा क्यों है? कभी फुरसत में अपने ब्लॉग पर बताउँगी।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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