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Friday, June 5, 2009

मुंबई लोकल यात्रा मे एक रंग ये भी है - वाकया

अक्सर मुंबई लोकल के फर्स्ट क्लास में सफर करता हूँ लेकिन वहां पर वह बात नहीं दिखती जो सेकंड क्लास में सफर करने से दिखती है । फर्स्ट क्लास में तो लोग अपनी किताबों में खोये रहते है या फिर मोबाईल पर 'कॉपर आज उपर जायेगा'....' स्टील नीचे जायेगा' जैसी बातें करते रहते हैं । लेकिन सेकंड क्लास में आते ही नजारा बदल जाता है। कोई हनुमान चालीसा की छोटी वाली किताब लिये पढ रहा है, कोई क्रॉस वर्ड भर रहा है। कभी कभी पिच्च से थूके जाने की आवाजे सुनाई पडती हैं तो कभी गाली गलौज, धक्कम धुक्की के हंगामें में सुनाई पड जाता है – तू उतर….....तेरे को देखता हूँ।

कल मुंबई लोकल के सेकंड क्लास के डिब्बे में सफर करने का मौका मिला। इन्हीं सेकंड क्लास के डिब्बों में कई भजन मंडलियां गाते बजाते चलती हैं। ये भजन मंडलीयां रोज आने जाने वाले यात्रियों से ही बना एक ग्रूप है। ऐसे ढेरों ग्रूप हर फेरी में दिख जाते हैं। रेल में लोहे की दीवार ढोलक बन जाती है तो सामान रखने वाला कैरियर भगवान की तस्वीर लटकाने के काम आ जाता है। उस कैरियर में अक्सर फूल-मालायें भी V आकार में लटकती मिल जाती है जिसका मतलब है कि इसके पहले वहां कोई भगवान लटके होंगे । गंतव्य स्थान आने पर तस्वीर तो उतार ली गई लेकिन हार को वहीं लटकता छोड चल दिये होंगे। अब वो हार सारा दिन अप डाउन करता रहेगा ।

ऐसे माहौल में ही एक शख्स की बातें सुनी। जो शायद कोई घरों वगैरह में पेंटिंग करने वाला काम करता था। अपने साथी को वह जिस अंदाज में बाते बता रहा था कि बस सुनते रहो औऱ गुनते रहो। कुछ बातें भद्दी अवश्य लगें पर यही तो है लोकल बातचीत की एक झलक। जरा यहां बातचीत का मुखडा देखिये….

अरे यार हम कहा जब अटेंडम आप ने बुलाया तो हम अटेंडमै आ गये। लेकिन पहुँचने पर वो औरतीया बोली कि अभी साहब की छुट्टी नहीं है , फिर कभी बुलाएंगे। अभी कलर बिलर नहीं करवाना है।

क्या बात कर रहा है ?

हां यार, ऐसे ही बोली। अरे .... हम कहा – मैं दूसरा मिला मिलाया काम छोडकर आप का अटेंडम कलर करने चला आया और आने पर बोल रही हो कि ऐसा नहीं वईसा…..तो ये तो ठीक नहीं है।

तब ?

तब क्या…..बोलने लगी कि नहीं हमारे वो बोले थे इसलिये मैंने आपको फोन करके बुलाया था लेकिन अभी उनकी छुट्टी नहीं है इसलिये फिर बाद में फिर बुलायेंगे तब कलर बिलर कर देना।

हम कहा अब क्या कहूँ……..बिलेपारले वाला काम छोड कर अटेंडम आप के यहां आ गया, अब वापिस जाउंगा तो सेठिया मोछ मोटवायेगा।

तब ?

तब क्या, हम कहा हमारा खोटी हुआ है आने जाने का…….है कि नहीं…….आप आने जाने का और टाईम का कुछ पईसा दे दो।

तब?

तब क्या…..लगी तीन तिंया बोलने बतियाने। अरे ऐसे कैसे दे दें, अभी कोई काम भी नहीं किये और लगे पैसे मांगने।

तब ?

अरे तब क्या……हम भी तो वैसही घाघ बतासू है……धर लिये तो धर लिये……….हम कहा ऐ…….आप काम करवाये या न करवायें……अटेंडम बोलीं है आप तो मैं आया हूँ अपना पुराना काम छोडकर…….और आने पर बोल रही हो कि अभी नहीं तो फिर कभी तो मेरा जो नुकसान हुआ उसका कुछ भरपाई करो।

हां, बात तो सच है । फिर क्या हुआ ?

अरे , वही कहा है न…..कि …..न नंगा नहाना न खुल्ले में लगाना…….बस वही हाल ।

माने ?

अरे, ऐकदम फराडिया औरतीया थी यार……तीस रूपया पकडा कर बोलती है लो अपना आने जाने का भाडा किराया ले लो। अरे हम कहा इस तीस रूपल्ली का क्या करूं…… पुडिया बना कर गां* में डालूं ।

तब ?

अरे, तो कहा है न कि भागते भूतवा की भगही भली। हम कहा लाओ…..दो……अब तो अटेंडम मर रहे होंगे तब भी मैं बुलाने पर मूतने तक न आउंगा।

ऐसा ?

हां और क्या…….मैं भी मुंडी नीचे किये चल दिया। नीचे उतर कर गेटवा पर आया तो क्या देखता हूँ कि उ औरतीया का आदमी चढ्ढी पहिने फुलवारी में पानी दे रहा है। हम कहा जा साले…….घर में रह के औरतीया को अटेंडम बाजार भाव पता करने को रख छोडा है और इहां ससुर पाईप लेकर फुलवारी बगईचा सींच रहा है।

अरे तो बोले नहीं कुछ ?

क्या बोलेगा ? साले कईसा कईसा केलांट ( client) मिल जाता है। कंटराज (contract) पता करने के लिये कारीगर को घर बुला कर उसका पूरा दिन खोटी कर दिया और पकडा रही है तीस रूपईया । एकरी मां क .....।

अभी ये बातचीत चल ही रही थी कि ट्रेन विलेपार्ले स्टेशन पर पहुँच गई । तभी प्लेटफार्म पर से कोई बंदा चिल्लाया…….अबे चुतिया साले…..सेठिया तेरी मारने के लिये ढूँढ रहा है। जल्दी जा न बाजू वाली बिल्डिंग से आदमी रख लेगा।

अंधेरी स्टेशन पर उतरते ही सोच रहा था – क्या इतनी सारी झाँकी मुझे फर्स्ट क्लास में देखने मिलती ? कदापि नहीं…….वहां पर सोना चढता है ……कॉपर उतरता है तो सीमेंट वोलाटाईल बन जाता है……लेकिन इन फर्स्ट क्लास वाले यात्रियों के मुकाबले , सेकंड क्लास स्टेबल रहता है …….आँकडों में……….कपडों में……..और मिजाज में.....बदल जाता है तो केवल रंग ।



- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ गुणीराम जा पहुँचे थे।

समय - वही, जब महिला आरक्षण बिल अपनी लंबी चादर ओढे हुए थोडा सा सिर बाहर निकाल कर झाँक रहा है।



विशेष - मैं अब भी सेकंड क्लास में यात्रा करना पसंद करता हूँ क्योंकि वहां मुझे मेरे कहानियों के लिये कैरेक्टर , अनुभव और खाद आसानी से मिल जाते हैं। रही बात फर्स्ट क्लास में यात्रा की, सो तो अगर कंपनी की ओर से मंथली पास की इनायत न होती तो वो मेरे बूते से बाहर है :)

मुनीष जी ने टिप्पणी में कहा कि लिटरेरी एंगल से ये लेख ठीक है तो थोडा अचंभा लगा क्योंकि इस तरह का लेखन सस्ताउ किताबों में मिलता है। बहुत कुछ झिझकते हुए ही ये पोस्ट लिखी है। कहीं किसी की भावना आहत हों तो क्षमाप्रार्थी हूँ।
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10 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

आप ने भी अटेंडम सेकेंड क्लास में यात्रा कर ही ली .

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

भाई, हमने तो मुम्बई लोकल में जब भी यात्रा की सैकण्ड में ही की है। और ये तो गप्प खूब चलती है। इस में आधी सच और आधी झूठ भी होता है। आदमी अपने आप को तुर्रम खाँ साबित करने को कथा में अपनी ओर से न जाने क्या क्या जोड़ता जाता है।

मुनीश ( munish ) said...

From a literary angle yes itz a first class piece of writing , but life overall must be hellish in mumbai.I thank Lord for keeping me in Delhi where there is no class difference in METRO rail.

सतीश पंचम said...

द्विवेदी जी, इस बात से सहमत हूँ कि लोकल में गप्प खूब चलती है । सिर्फ सेकंड क्लास ही क्यूँ , फर्स्ट क्लास में भी यह गप्प खूब देखने में आती है। लोग बात करते हैं जैसे कि पूरा शेयर मार्केट थामें हों....कोई कहता है दस टक्का वधेरे जावी छे तो कोई कहता है अमेरिका नो मार्केट क्रेश थई गये अने अइंया पण ऐच हतो....यह बातें अक्सर सुबह साढे नौ के आसपास सुनने में खूब मिलती हैं, क्योंकि दस बजे शेयर मार्केट का टाईम शुरू हो जाता है। चूंकि मेरे ऑफिस जाने का टाईम ही यह साढे नौ से दस के बीच का है तो इस तरह की बातें खूब सुनने में आती है।

शाम तक उन्हीं महाशय को देखता हूँ जो बोल रहे थे मार्केट क्रैश होगा शाम तक कहते हैं Finance report ने संभाल लिया नहीं तो आज तो सर्किट ब्रेकर का चांस था :)



जो शख्स फर्स्ट क्लास के डिब्बे में करोडों के शेयर की बात करता है वो खाउ गली में किसी ठेले पर खडा-खडा खाता दिख जाता है इसी से गप्प के लेवल का अंदाजा लगाया जा सकता है :)

Manish Kumar said...

समाज मे अपने तरह के लोगों की बातें तो हम खूब करते हैं पर अलग वर्ग के बारे में जानना सुनना भी जरूरी है। ऐसी एक झांकी दिखलाने का शुक्रिया !

महामंत्री - तस्लीम said...

हर यात्रा, हर सफर के अपना आनंद है। अच्‍छा लगा आपके मुंह से ये सब सुनना।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

ताऊ रामपुरिया said...

भाई पंचम जी अपुन को तो आपकी लिखने की शैली मे खूब आंनन्द आयेला है..

रही बात गप्पों की तो तो ये पूरा जीवन ही एक गप्प गोष्ठी है..कहीं अहम की गोष्ठी तो कहीं शराफ़त की नकाब ..सो मौके के अनुसार गप्पों का विषय बदलता रहता है. अबकी तो कहीं कोई फ़र्क नही है.

रामराम.

Vivek Rastogi said...

आपने बहुत ही अच्छी झांकी दिखाई है सेकेंड क्लास की।

Shiv Kumar Mishra said...

शानदार पोस्ट है. मुंबई के लोकल ट्रेन के बारे में बहुत सुना है. आपने अपनी पोस्ट में बहुत रोचक अंदाज़ में पेश किया है.

ओम आर्य said...

yahee hakikat hai mumbai local bahut bahut aabhaara jo aapne itanee khubsoorati se jyo katyo rakha.....maine bhi dekhi hai

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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