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Friday, May 29, 2009

हंस पत्रिका का आवरण चित्र बहुत ही दमदार है। बधाई हो हंस ।

क्या आप लोगों ने हंस के मई अंक का आवरण चित्र देखा है ? देखे होंगे तो जरूर मन में चह-चहुक हुई होगी। चित्र ही ऐसा है। यहाँ वह चित्र दे रहा हूँ । आप भी देखें । एक दूल्हा और दुल्हन को दिखाया गया है । दुल्हन पियरी पहने, अपना दांया पैर थोडा आगे की ओर निकाल कर खडी है और दूल्हा अपनी दुल्हन के पैर छू कर आशिर्वाद ले रहा है। एक बार ये चित्र देखा तो बस देखता रह गया। बस यूँ समझिये कि अचंभित हूँ ।

हाँ अचंभित ही कहना उचित होगा। अब तक जो कुछ देखा- सुना है, जो कुछ जाना समझा है ऐसे में परिपाटीयों को ढोते-ढोते छन्नी हो चुके समाज के मंडवे तले का ये द्श्य अचंभित ही करता है ।

चित्र ये रहा -





- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ कभी धर्मेद्र लौहपथगामिनी से चुपके-चुपके पहुँचे थे अपनी सुलेखा के पास प्यारेमोहन बन कर

समय - वही, जब शपथ लिये मंत्रियों के यहाँ मिठाई की बंटवाई, मंत्री न बन सकने वालों के यहां अफसोसाई और वहीं कहीं मिठाई के डिब्बों से चींटियों की कतार बंधी ढोवाई चल रही हो।

19 comments:

Udan Tashtari said...

लेकिन परिपाटी तो चल ही रही है. :)

शरद कोकास said...

भाई यह तो राजेन्द्र यादव जी का "कमाल" है..

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर!

श्यामल सुमन said...

पत्नी का सौभाग्य से मिलता आशीर्वाद।
आगे अवसर न मिले न होगा अवसाद।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.

ताऊ रामपुरिया said...

वाह आपकी नजर भी बडी पैनी है जी? कमाल की जगह जाकर टिकी है.:)

हम तो वैसे ही मेड-इन-जर्मन से आशीर्वाद लेते रहते हैं.

रामराम.

नितिन व्यास said...

बढ़िया

डॉ. मनोज मिश्र said...

वाकई यह तो नयनाभिराम दृश्य है .

संगीता पुरी said...

चित्र तो सचमुच अच्‍छी है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

चित्र धोखा है। एक बार पैर छू कर पूरे जीवन स्त्री को गुलाम बना कर रखो। अच्छा सौदा है। हमारे समाज में ऐसे फर्जी दृश्य बहुत मिलेंगे।

अंशुमाली रस्तोगी said...

अरे ये तो पैर छूते स्वयं राजेंद्र यादव हैं। शायद उनकी जवानी का चित्र रहा होगा।
वैसे हंस के हालिया अंक में कवर पृष्ठ पर डार्विन के रूप में वे स्वयं भी मौजूद थे। बढ़िया है।

राज भाटिय़ा said...

सतीश जी बस यह समय आने ही वाला है....

Desh Premi said...

भइया अ़ब तो पुरा देश महिलाओं के चरण छु रहा है ।
हमारे देश का वर्तमान और भविष्य दोनों ही महिलाओं के हे हाथ में है ....

राष्ट्रहित के लिए आइये आपका स्वागत है मेरे साईट पर http://rashtravad.blogspot.com/
आपने सुझाओं और संवेदनाओं से हमें अनुग्रहित करे।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

यह तो पत्नी का बिछुआ ठीक कर रहा है। जबरी फोटो ले कर राजेन्द्र-यादव-वादी बना दिया है उसको! :D

राजीव जैन Rajeev Jain said...

बहुत खूब

Shefali Pande said...

ये शादी की एक रस्म है ....पति पत्नी के पैरों पर एक सिक्का रखता है जिसे वह तीन बार ठोकर मारती है

सतीश पंचम said...

शेफाली जी, आप ने इस रस्म के बारे में बताकर हमें जो जानकारी दी उसके लिये धन्यवाद। वैसे इस देश में कई व्यवहार ऐसे हैं जो एक क्षेत्र के लोगों के लिये तो सहज होता है पर वही चीज दूसरे क्षेत्र के लोगों के लिये असहय।
मैं महाराष्ट्र का ही उदाहरण दूंगा - ट्रेन वगैरह में या राह चलते जब किसी का पैर किसी से छू जाये तो वह तुरंत उस दूसरे बंदे के आगे हाथ बढाकर माफी मांग लेता है जबकि दूसरे क्षेत्रों में इस तरह किसी का पैर लगना या पैर से छू जाना सामान्य सी बात मानी जाती है।
बस वैसा ही कुछ समझ या जानकारी हमारी भी इस चित्र को देख कर बनी है। पहली नजर में देखने से तो यही लग रहा है कि दूल्हा दुल्हन के पैर छू रहा है।
वैसे कहीं किसी फिल्म में देखा था कि पूर्वी भारत की तरफ कहीं दुल्हन को पीढे/ चौकी पर बैठा कर उठाया जाता है या ऐसा ही कुछ बाद में पता चला कि अब वो प्रथा धीरे धीरे खत्म होती जा रही है। पहले ये होता था क्योंकि बाल्य अवस्था में ही लडकी का विवाह हो जाता था। पीढे या चौकी पर छोटी सी दुल्हन को आसानी से बैठा कर उठाया जा सकता था। अब जबकि विवाह बडी उम्र में हो रहे हैं तो जाहिर है चौकी उठाना थोडा बोझिल कार्य है :)

Neha said...

aisa drisya pahli baar dekhne mila hai......dhanyawaad

दिगम्बर नासवा said...

सतीश जी कोई खुल कर छूता है...............कोई पीछे से.............पर सत्य तो यही है सुखी जीवन का

सतीश कुमार चौहान said...

इन बातो में भी दम होता हैं...
सतीश कुमार चौहान भिलाई
satishkumarchouhan.blogspot.com
satishchouhanbhilaicg.blogspot.com

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