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Saturday, April 25, 2009

ठगित लेखक संघ

ठगित लेखक संघ । नाम सुनकर हैरान न हों ब्लॉगर । इस ठगित लेखक संघ में शामिल होने के लिये लेखक को कोई अपनी ओर से फॉर्म वगैरह नहीं भरना पडता। जिस दिन आप का लेख चोरी हुआ या उठा लिया गया और आपको लगे कि आपकी रचना को किसी ने बिना अनुमति छापकर आप को ठगा है, तभी आप खुद-ब-खुद इस ठगित लेखक संघ में शामिल हुए समझिये :)


               कल अनिल कान्त जी की रचना चोरी हो गई, किसी ने अपने नाम से छाप दिया। अब वे इस ठगित लेखक संघ के खुद-ब-खुद सदस्य बन गये हैं। कई और लोग पहले से ही इस ठगित लेखक संघ के सदस्य बने हुए हैं। आप भी बन सकते हैं। बस, इसके लिये अपनी ओर से कोई प्रयास न करें :)  इंतजार करें कि आप की कोई रचना चोरी हो और आप इस संगठन के सदस्य बनें।  मेरी भी सदरू भगत और केवडा प्रसाद वाली रचनायें जब चोरी हो गईं थी तो मैं भी इस ठगित लेखक संघ में अपने-आप शामिल हो गया था। अपनी ओर से कोई प्रयास नहीं किया था :) जय हो ठगित लेखक संघ की :)


- सतीश पंचम


स्थान – ओबामा के घर से आधी धरती दूर


समय – वही, जब देहात में भरी दुपहरीया सुगनी देवी अपने कमर को थोडा लचका कर, जगह बनाकर वहां  एक पानी का मटका रख  तपती दुपहरीया मीलों चलने की रूसवाई झेल रही है और उधर ठंडे एसी हॉल में  शकीरा के बलखाते लचकीले कमर को देख सीटी बज रही है।


16 comments:

Anil said...

मैं तो बहुत पहले ही इस ठगित लेखक संघ का सदस्य बन चुका हूँ :(

Dr. Amar Jyoti said...

मैं भी।:(

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही सटीक व्यग्य मजेदार लगा . धन्यवाद.

Arvind Mishra said...

ले देकर हम सभी उसी के सदस्य ही तो हैं !

रौशन said...

हम पहले चोरी होने लायक लिखें तब न

ताऊ रामपुरिया said...

भाई इतना अच्छा आप लोग काहे लिखते हैं बिना फ़ालतू में. हमारे जैसे चोरी ऊठाईगिरी के काम करिये फ़िर देखिये वो लोग आपसे डरेंगें.:)

डरने का नही सिर्फ़ डराने का. क्या?

रामराम.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

कौन कहता है कि हमेशा बढिया लिखा ही चुराया जाता है। मेरी एक घटिया पोस्‍ट भी चोरी हो चुकी है। :)

आप देख सकते हैं

यहां

http://hindi.mywebdunia.com/authors/b21uYW1o/?

सतीश पंचम said...

@ सिध्दार्थ जोशी
कौन कहता है कि हमेशा बढिया लिखा ही चुराया जाता है। मेरी एक घटिया पोस्‍ट भी चोरी हो चुकी है। :)

वाह...एक अंदाज ये भी। Nice Humour.

अशोक पाण्डेय said...

ताउ ठीक कह रहे हें। लोहा ही लोहे को काटता है। ठगित लेखक संघ से काम नहीं चलेगा, उठाईगिरी की राह पकड़ लीजिए, फिर देखिए कैसे कोई आता है सेंध लगाने। कहीं डकैत के घर डकैती की बात सुनी है :)

अनूप शुक्ल said...

ब्लाग चोरी बचाने के कुछ सुगम उपाय हमने पहले लिखे थे। अब जमाना बहुत आगे बढ़ गया है लेकिन शायद कुछ उपाय काम आ जायें।
देखिये।

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

हम न बढ़िया लिख पाएंगे न हमारे यहाँ चोरी होगी ..अरे कोई हमारी पोस्ट भी तो चुराओ :-(

रौशन said...

सबका घटिया भी चोरी हो जा रहा है हम वैसे ही पड़े हैं भाई कोई चोरी कर लेता तो हम भी सीना ठोंकते

सतीश पंचम said...

अंश, साभार अनुप जी के ही लेख से ( बहुत मजेदार है, सो कट पेस्ट मार रहा हूँ ....उम्मीद है अनुप जी बुरा मानकर कुछ बोलेंगे नहीं :)

चोरी रोकने का उपाय -

क्लिष्टता का सिद्धांत:यह सिद्धान्त उन लोगों के लिये ज्यादा मुफ़ीद है जो लिखने के साथ-साथ अपने ज्ञान का बोझा भी ढोते हैं। ऐसे ज्ञान-कुली टाइप के लोग अपनी ‘लेखन-सवारी’ के आगे-आगे अपने ज्ञान-पायलट दौड़ा देते हैं। ये ‘ज्ञान-पायलट’ दुनिया-जहान में अपनी ‘लेखन-सवारी’ के आने की सूचना देते हुये उनका डंका पीटते चलते हैं। जैसे किसी नेता की शान में गुस्ताखी हो जाने पर नेता से ज्यादा खून उसके शागिर्दों का खौलता है ऐसे ही लेखकों के लेखन के बारे में कुछ भी कहने पर उनके ‘ज्ञान-पायलट’ टीन-टप्पर की तरह तुरंत सुलग जाते हैं। ऐसे लोगों के लिये ब्लाग चोरी बचाना बड़ा सुगम उपाय है। वे जितनी क्लिष्ट भाषा लिखते हैं उसमें थोड़ी सी क्लिष्टता , बस दाल में नमक बराबर, और मिला दें तो बस उनका काम पक्का समझिये। फिर तो उनके ब्लाग पर चोरी करने वाला उसी तरह बिदकेगा जिस तरह से कानपुर में कोई भी विदेशी निवेशक पूंजी निवेश से घबराता है।

इस तरह की भाषा का नमूना मेरी जानकारी में फिलहाल अभी ब्लाग जगत में कोई नहीं है। ऐसी भाषा दुर्लभ है लेकिन इसकी पहचान यही है कई बार पढ़ने बावजूद आपको यह बिल्कुल न समझ में आये। ऐसी भाषा को ‘राजभाषा‘ नहीं ‘महाराज-भाषा’ कहा जाता। इसका एक उदाहरण मैं श्रीलाल शुक्ल जी के एक लेख से देता हूं:-


“जहां तक सम्पत्ति के किसी अन्तरण के निबन्धन निर्दिष्ट करते हैं कि उस सम्पत्ति से उदभूत आय (क) अन्तरक के जीवन से, या (ख) अन्तरण की तारीख से अठारह वर्ष की कालावधि से अधिक कालावधि तक पूर्णता: या भागत: संचित की जायेगी, वहां एतस्मिनपश्चात यथा- उपबन्धित के सिवाय ऐसा आदेश वहां तक शून्य होगा जहां तक कि वह कालावधि जिसके दौरान में संचय करना निर्दिष्ट है, पूर्वोक्त कालावधियों में से दीर्घतर कालावधि से अधिक हो और ऐसी अन्तिमवर्णित कालावधि का अन्त होने पर सम्पत्ति और उसकी आय इस प्रकार व्ययनित की जायेगी मानो वह कालावधि जिसके दौरान में संजय करना निदिष्ट किया गया है, बीत गयी है।”

यह भाषाई नमूना भारत सरकार के विधि मंत्रालय के एक प्रकाशन से लिया गया था। जाहिर है ऐसी भाषा पढ़ने के लिये नहीं पूजने के लिये लिखी जाती है। आप ऐसी भाषा का अभ्यास कर लीजिये फिर देखिये आपका ब्लाग की सामग्री न रहकर पूजा स्थल बन जायेगा। लोग मत्था टेककर आपके ब्लाग को प्रणाम करने लगेंगे। आपके ब्लाग को देखते ही चोर के अन्दर इतनी पवित्र भावनायें भर जायेंगी कि चोरी जैसी निक्रष्ट भावना उस तरफ़ मुंह भी नहीं कर पायेगी।

shan said...

ये कहां से चुराया हा हा...

सतीश पंचम said...

शान जी,

ये अंश फुरसतिया अनूप शुक्ल जी द्वारा दिये गये लिंक से ही साभार और अधिभार सहित है। भई मुझे तो ये बहुत भाया। उनकी ये पूरी की पूरी पोस्ट ही पूरी-कचौरी है, एकदम धांसू । आप भी जरूर इस लिंक पर जायें।

http://hindini.com/fursatiya/?p=238

अनिल कान्त : said...

itne sare sadasya !!

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