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Friday, April 24, 2009

प्रधानमंत्री ने लाईन में लगकर वोट क्या डाला......एक टकाटक पोस्ट बन गई।

कल झक्क सफेद कपडों में प्रधानमंत्री को आम जनता के साथ लाईन में लगकर वोटिंग करते देखा। बाकी सब तो ठीक रहा बस एक प्रश्न मन में बंजी जंपिंग करता रहा कि - जो आदमी लाईन में प्रधानमंत्री के आगे खडा था, उसके मन में उस समय क्या चल रहा होगा जबकि उसके ठीक पीछे प्रधानमंत्री खडे होंगे। घर पर उसके चर्चा तो जरूर चली होगी। वह मौजूं चर्चा कुछ ऐसी रही होगी ।

पत्नी बोली होगी – आज दो रोटी ज्यादा खा लो। प्रधानमंत्री तक के आगे तुम खडे थे, और उन्हें अपने से पीछे खडे होने पर मजबूर कर दिया।

वह शख्स बोला होगा – यदि प्रधानमंत्री के आगे- आगे रहने पर दो रोटी ज्यादा खाने का चलन होता तो उनके सभी ड्राईवर तो रोज चक्की पर ही दिखते, क्योंकि प्रधानमंत्री जहाँ जाते हैं , वही ये ड्राईवर लोग हमेशा उनके आगे रहते है।..... आगे रहने की कौन कहे, प्रधानमंत्री के आगे बैठने तक की हिम्मत कर पाते हैं।

पत्नी बोली होगी – तब तो वह चक्कीवाला ज्यादा ताकतवर हुआ। आखिर उसी के चक्की का आटा खाकर ही तो ड्राईवर लोग प्रधानमंत्री के आगे बैठने की हिम्मत करते हैं। तुम तो फिर भी प्रधानमंत्री के आगे खडे ही रहे । लो दो रोटी और खा लो। ना मत कहो। लो खा लो।

पति बोला होगा - नहीं, असली ताकत चक्कीवाले के आँटे में भी नहीं है। ताकत तो उस गेहूँ में होगी जिससे आंटा बना होगा और उसी आंटे को खाकर प्रधानमंत्री के ड्राईवर लोग प्रधानमंत्री के आगे बैठने की हिम्मत कर पाते होंगे।

पत्नी - नहीं, तब तो असली ताकत तो उस किसान में होगी जिसने वह गेहूँ उपजाया।

पति - नहीं असली ताकत उस किसान में भी नहीं है। असली ताकत तो उसके बैलों में है जिन्होंने किसान के खेतों को जोत बो कर गेहूँ पैदा किया और ऐसा ताकतवर गेहूँ पैदा किया कि उसका आंटा खा कर प्रधानमंत्री के ड्राईवर तक प्रधानमंत्री के आगे बैठने की हिम्मत बटोर पाते हैं।

पत्नी - यानि कि बैल से प्रधानमंत्री हार गये । बैल ज्यादा बलवान हुए।

पति - नहीं प्रिये, ……… प्रधानमंत्री का पाला तो ऐसे गेहूँ बोने वाले सैकडों बैलों से रोज ही पडता होगा। असली चिंता तो उन बैलों से है जो गेहूँ की बजाय काँटे बोते हैं। कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर । औऱ गजब की बात है कि इन काँटों से बने आंटे को कई ड्राईवर मिलकर गूंथते हैं। कभी पानी ( शांतिकाल) ज्यादा हो जाता है तो दूसरा ड्राईवर तुरंत थोडा सा धर्म के काँटे को पीसकर उससे बने आंटे को मिला देता है ताकि काँटेदार आंटा अच्छा बने । चारों ओर हाहाकार मचे, सब ओर अराजकता फैल जाय। अब होते होते हो यह रहा है कि यह काँटे वाला आंटा गीला-सूखा……गीला – सूखा करते करते बहुत ज्यादा बन गया है। अब इसे खायेगा कौन।

पत्नी - वही, ढेर सारे बैल जो काँटे बो रहे हैं और इस उम्मीद में काँटे बोये जा रहे हैं कि आंटे का गीला होना…….सूखा होना तो लगा ही रहेगा……गरज इतनी ही है कि आंटा कम न पडे।

- सतीश पंचम
स्थान - प्रधानमंत्री आवास से पंद्रह सौ किलोमीटर दूर
समय - वही, जब EVM पर बटन की दबवाई, चरणबद्ध राजनितिक मनीप्लॉण्ट की रोपाई और लालू की बिन नथुने की फुलवाई चल रही है।

7 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

चारों ओर हाहाकार मचे, सब ओर अराजकता फैल जाय। अब होते होते हो यह रहा है कि यह काँटे वाला आंटा गीला-सूखा……गीला – सूखा करते करते बहुत ज्यादा बन गया है। अब इसे खायेगा कौन।

वाकई एक टकाटक पोस्ट.

रामराम.

डॉ .अनुराग said...

ओर जो उनके पीछे खडा होगा ,उसका क्या ????

सतीश पंचम said...

@ Anuraagji,

PM ke peeche khade hone vaalon ki sankhya karodon me hai. Un karodon ke mukable vah ek aadmi jo PM se aage khada ho, jyada mahtva rakhta hai :)

अजित वडनेरकर said...

सही रहा चिन्तन...

अशोक पाण्डेय said...

आजकल तो इन कांटा बोलनेवाले बैलों की कीमत भी अधिक लग रही है, संख्‍या भी इनकी ही बढ रही है..

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

लाइन और आगे पीछे की बात हो रही है तो मुझे एक लाइन याद आ रही है - मेरे आगे और पीछे नाभिदर्शना महिलायें थीं और तब मेरी उम्र २४ साल थी!
मैं तो उन दोनो के इत्र की गंध से ही बेहोश हुये जा रहा था। गजब का क्लोरोफार्मीय इत्र था उनमें।

अविनाश वाचस्पति said...

सबसे अधिक ज्ञानदान तो

ज्ञानदा ने ही दे दिया है

अपना 24 वर्षीया सच

स्‍वीकार लिया है
बिना यह सोचे ....

बेहोश ऐसे हुए कि
होश में रहे

तब ही तो सारी बातें हिंया कहे।

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