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Sunday, April 19, 2009

चप्पू और दुपहरीया का समय

चप्पू चलाने का तरीका बदल गया है


मानना पडेगा
पहले लोग
चप्पू चलाकर नाव खेते थे
अब नाव चलाकर चप्पू खे रहे हैं



कहते हैं मेगाशिप हैं ये
इसमें चप्पू शो-पीस है
टंगे हुए लाईफ बोट के पास
एक इमर्जेंसी नोट लिखा है
चप्पू
यूज एट लास्ट मोमेंट ओनली



एक और मेगाशिप है
इसमें ढेरों शो पीस हैं
चांदी-सोने के बने
मूर्तियों- तस्वीरों वाले
चप्पू ही चप्पू
शायद इन्हें भगवान कहते हैं
यहाँ भी कुछ अदृश्य सा लिखा है
ठहरो पढता हूँ
यूज एट लास्ट मोमेंट ओनली


वैसे
लाईफ के हर मोड पर
यही लिखा है
यूज एट लास्ट मोमेंट ओनली



चप्पू
चांदी-सोने का है ना
तभी।




- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहाँ की लोकल ट्रेनें धमनी है
समय - वही, जब भरी दुपहरीया एक किसान हल-बैल खोल कर आम के पेड के नीचे सुस्ता रहा हो, छहाँ रहा हो......... पास ही एक कुत्ता, नरम- गीली जमीन पर बैठा , आँख बंद किये, बाहर जीभ निकाले हाँफ - हाँफ कर ठंडक ले रहा हो कि तभी कहीं से आवाज आये - आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाओ। (शायद 'खलल' इसे ही कहते हैं )




8 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

जो चीज इस्तेमाल नहीं होती, वह लास्ट मोमेण्ट पर भी इस्तेमाल नहीं होती। चाहे सोने की हो या चांदी की, धरी रह जाती है!

ravikumarswarnkar said...

आपकी कविताओं का खिलंदडापन मन भा गया....
और शायद असली कविता तो अंत में होती है, जब आप स्थान और समय के बारे में लिख रहे होते हैं...

Babli said...

मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

ताऊ रामपुरिया said...

ज्ञानदत्तजी सही कह रहे हैं.

रामराम.

डॉ .अनुराग said...

वाकई खलल इसी को कहते है ......कविता जानदार है सतीश जी......

महामंत्री - तस्लीम said...

गजब, आपकी सोचने की शैली और लिखने का तरीका लाजवाब है।

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खुशियों का विज्ञान-3
एक साइंटिस्‍ट का दुखद अंत

अशोक पाण्डेय said...

बहुत खूब। ऐसे ही हालात हैं। अब चाहे इन पर हंस लीजिए या रो लीजिए।

Vikram Thakur said...

sir kabhi jaunpur aayie to ye bhi mil jayega

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