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Wednesday, April 15, 2009

बादलों को धो पोंछ कर साफ कर दिया (तारा रम पम)

बादलों को धो पोंछ कर साफ कर दिया
झक् बगुले की पांख सा लगने लगा बादल
तभी
सूरज बोल पडा
अरे उनको ड्राई क्लिनिंग करना पडता है
इतना भी नहीं जानते
कहीं तुम कवि तो नहीं
ऐसा काम वे ही करते हैं।


तभी
किसान बोल पडा
धो पोंछ कर साफ करे बादल मेरे किस काम के
बादलों के उजाले से मेरे सूखे खेतों खलिहानों में
भूख और उदासी की काली परत जम जाती है
इतना भी नहीं जानते
कहीं तुम कवि तो नहीं
ऐसा काम वो ही करते हैं

तभी
एक मंदिर दिखा
मंदिर परिसर से एक फूल तोड
सुंगंध ले उसकी मन बहलाने लगा
तभी
देवता बोल पडे
अरे वो फूल सुगंध लेने के लिये नहीं हैं
वो हैं मेरे शीष चढने के लिये
मेरी पूजा अर्चना के लिये
इतना भी नहीं जानते
कहीं तुम कवि तो नहीं
ऐसा काम वे ही करते हैं


तभी
एक नेता मिला
उसे नमस्कार किया
प्रत्युत्तर में उसने भी नमस्कार किया
चलते चलते उसने कहा
लगता है तुम कवि हो
नेताओं को आजकल सामने से
कोई नमस्कार नहीं करता
ऐसा काम कवि ही करते हैं।


- सतीश पंचम

स्थान – वही, जिसे कभी दहेज में दिया गया था
समय – वही, जब खेतों में गेहूँ की ओसाई, वोटों की बंटाई और एक नल के नीचे तरी लेते बच्चों की छपछपाई चल रही है।

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10 comments:

अशोक पाण्डेय said...

रचना बहुत अच्‍छी लगी।
खेतों में गेहूँ की ओसाई, वोटों की बंटाई और एक नल के नीचे तरी लेते बच्चों की छपछपाई वाले समय में ही तो हम भी जी रहे हैं।

Anil Pusadkar said...

सच को बयां करती बेहतरीन रचना।

जितेन्द़ भगत said...

बेचारा कवि‍, अपनी भूमि‍का की तलाश में काफी कन्फ्यूज्‍ड हो गया है, वो भी क्‍या करे, चीजें ही अपनी भूमि‍का बदलने लगी है:(

डॉ .अनुराग said...

कविता के भावः ओर उसमे संवाद की अदायगी दिलचस्प है .चौपाल ,घेर ..सब याद आये ,आप उस नगरी में कैसे रहते होगे यही सोचता हूँ...एक गाँव वाला अभी भी आपके भीतर बसता है

महामंत्री - तस्लीम said...

बहुत खूबसूरत बिम्‍बों का प्रयोग किया है। दिल से वाह निकल रही है।

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तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

mehek said...

bahut hi achhe bhav,dil ko kahi chu gayi kavita.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

यह तो कवि की कविता हो गयी।
आजकल इसका चलन नहीं है।
आजकल कविता कवि नहीं करते।
चिठेरे और टिपेरे करते हैं कविता।
ओसाई, बंटाई, छपछपाई के प्रतीक तो इण्टरनेटीय युग में पुराने हो गये!

आलोक सिंह said...

बहुत अच्छा लिख दिया आपने कही आप कवि तो नहीं हो गए .
समय का वर्णन बहुत अच्छा है "खेतों में गेहूँ की ओसाई, वोटों की बंटाई और एक नल के नीचे तरी लेते बच्चों की छपछपाई चल रही है"

Syed Akbar said...

बहुत खूब....

दिगम्बर नासवा said...

करार व्यंग मारा है आपने.............समाज पर..........और नेताओं पर..........
शशक्त रचना..........और आपका शब्द संसार लाजवाब है

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