सफेद घर में आपका स्वागत है।

Monday, March 30, 2009

इस चर्चा को समझने के लिए इस पोस्ट के पात्रों की मानसिक स्थिती तक उतर आइये.

गाँव मे कंप्युटर सिखाने के लिए एक सेंटर क्या खुल गया , उठते-बैठते , बोलते डोलते सब कोई आजकल कंप्युटर वाले भाषा मे बोलने लगा है। कडेदीन यादव ने बीडी खेंचते हुए लालता प्रसाद से कहा -

अरे लालता भाई, कल जब कंप्युटर के मास्साब ने कहा की इस्पेस दबाओ तो फट से दबा दिए। सोचा की कोई हमारे से पहले इस्पेस न दाब ले ।

क्या मतलब कडेदीन , ज़रा खुल कर कहो जो कहना है।

अरे कहना क्या, यही कह रहा था की इस्पेस अ जगह दाबने मे तुमसे कोई पार न पायेगा। चाहे कीबोर्ड हो या ग्राम बोर्ड ।

माने ?

माने यही की, ग्राम समाज की जो जमीन छुटी थी की उस पर इस्कूल बनेगा तो उस पर तो तुम लोगों ने गोबर वाले उपले पाथ कर जो बड़ा भीटहूर लगाया है की, अब तो उस जगह पर कुत्ता और कुतियाँ रोज़ सुबह झौंसी खेलते हैं। बच्चे क्या तो पढ़ें और क्या तो गुनें जब उनका इस्कूल ही गोब्डौरे मे बसा हो।

तुम भी कुछ कम नहीं हो कडेदीन । मेरा मुह मत खुलवाओ।

माने ?

माने यही की , तुमने भी तो सर्कारी खडंजा सड़क के ठीक सटा कर अपनी भैंस वाला खूंटा गाडे हो। ये नहीं की अपने दरवाजे पर अपने घर के पास खूंटा गाडो। एक सरकारी खडंजा सड़क क्या घर के पास से निकली , फट से खूंटा गाड कर जगह कब्जिया लिए। भैंस का खूंटा कहने को तो तुम्हारे जगह है लेकिन जब भैंस बैठती है तो पूरी सड़क को छेंक कर । अब बताओ की इस्पेस दाबने मे तुम आगे हो की मैं। मैंने तो सिर्फ़ कीबोर्ड का ही इस्पेस दाबा तुमने तो इस्पेस के साथ साथ शिफ्ट वाला बटन भी दाब दिया है। भैंस के गले की रस्सी इतनी लम्बी बंधी है की कभी भैंस तुम्हारे जमीन पर शिफ्ट हो कर बैठती है तो कभी सरकारी सड़क पर शिफ्ट हो जाती है। लगता है भैंस को भी शिफ्ट बटन के बारे मे जानकारी है।

अभी ये बातचीत चल ही रही थी की कहीं से पंडित केवडा प्रसाद आ गए। आते ही बोले , जुलुम हो गया है त्राही माम त्राही माम।

क्या हो गया। इतना हाँफते कांपते कहाँ से चले आ रहे हैं? कडेदीन यादव ने माथे पर का पसीना पोंछते हुए कहा।

अरे क्या कहूँ। बगल के गाँव सरहदीपूर गया था पंचाईत मे। सुना है वहाँ कोई मंग्तीन आकर जियालाल के होम पर कब्जा कर ली है।

होम पर कब्जा ? सो कैसे ?

वो ऐसे की मन्गतीन को कोई है नहीं। सुना है की उसके घर वाले ने उसके चाल चलन से तंग आकर उसे घर से एस्केप कर दिया है। जगह जगह वो भीख मांग कर मंग्तीन बनी गुजारा कर रही है।

तरस खा कर जियालाल ने एक मड़हे को उसे रहने के लिए दे दिया। लोगों ने जियाल्लाल को समझाया की क्यों काँटा बो रहे हो। जरा सोचो तो, की उसके घर वालों ने उसे क्यों निकाल बहार किया ? उसके कुछ कमी बेसी हो गयी होगी तब न उसे छोड़ा होगा।

तब

तब क्या भाई , जियालाल ने कहा की रहने दो एक मड़हे मे कितना जगह जाता है। यहाँ रहेगी तो कुछ कटिया मचिया , निराई गुडाई मे मदद हो जायेगी। घर के लोगों को भी सुविधा हो जायेगी।

तब ?

तब क्या, कुछ दिन तो ठीक ठाक चला, बाद मे पता चला की उस ने कभी उसको कुछ बोल दिया तो कभी उसको कुछ गाली फक्कड़ दे दिया। काम तो जो था सो वैसा ही चल रहा था। अब रोज़ रोज़ की उलाहना और सुनाई पड़ने लगा । तो भाई जियालाल ने तो पहले तो उसे कंट्रौल बटन की तरह दाबना चाहा की कम से कम अब कंट्रौल मे कर लू न बाद मे तो अपने हाथ से एस्केप हो जायेगी बाद मे और भद्द पिटेगी । लेकिन मजाल है वो माने। एक दो बार बोलने पर तो कंप्युटर के पाज़ बटन की तरह रहती लेकिन फ़िर स्क्रॉल करने लगती। कभी उसके यहाँ तो कभी उसके यहाँ।

माने कोई पाज़ - ब्रेक बटन काम नहीं किया।

पाज़ -ब्रेक की कहते हो , अरे वो तो एकदम आपे से एस्केप हो गयी, कहने लगी की यहाँ रहती हूँ तो मेरा भी कुछ हक़ बनता है। काम करती हूँ , तो खाती हूँ, मुफ्त मे नहीं।

तब ?

तब क्या, जियालाल को snake सूंघ गया । आँख उज्जर हो गया । ठीक भादों के उजाले की तरह। तब सोच मे पड़े की इसे अब न हटाया तो मेरे बच्चों के जी का जंजाल बन जायेगी। सो उसी की पंचायत मे गया था।

तो क्या हुआ ?

होना क्या था, सब लोग यही बोले की जियालाल को पहले ही कहा गया था। अब भुगतो।

तो क्या वह अब वहीं रह रही है ?

रहेगी कैसे। जियालाल का बड़ा लड़का बड़ा तौकी है। फट से लाठी ले आया और जैसे हम लोग कीबोर्ड पर एन्टर मारते हैं , वैसे ही मड़हे मे जो चीज सामने पड़ी उस पर एन्टर मारता गया ......मारता गया । हांडी कूड़ा , गागर जो मिला सब फोड़ दिया और मड़हे को उजाड़ बिजाड डाला।

तब ?

तब क्या, सब पंचों ने मिल कर उसको samjhaaya बूझाया , उस औरतिया को भी समझाया । की कब तक सब से रार ठानती रहेगी। उसके पति को भी बुला कर पंचों ने सुलह समझौता करवाया । कहा की ले जाओ , अपनी राजधानी को, हर और दनदनाती चली जाती है।

तब ?

अरे तब क्या, बहुत समझाने बुझाने पर वह औरतिया पति के यहाँ जाने को राजी हुई।

चलो अच्छा हुआ। अंत भला तो सब भला । लेकिन भाई, आगे से ध्यान रहना पड़ेगा की होम करते हाथ न जले।

हाँ और क्या ? बिना मतलब का बनर बझौवा बनान इसी को कहते हैं। चलो अंत भला तो सब भला ।

तब तक कहीं से लालता प्रसाद की पत्नी की आवाज आयी - अरे वहीं कर्सरवा की तरह बिलिंक करते रहोगे की वहाँ से एस्केप भी करोगे । ये नहीं की नहान खान का समय हो गया है , तनिक अल्टर सोचें ।

इतना सुनना था की केवडा प्रसाद बोले, चलो लालता भाई अब यहाँ से शिफ्ट हुआ जाय नहीं तो भौजाई कहीं तुम्हारा ही अल्टर न ढूँढने लगें ।

तब तक कडेदीन यादव बोले, लगता है - लालता , तुम्हारा कंट्रौल बटन भौजाई के पास है जो जब चाहे कंट्रौल और एस्केप एक साथ दबा कर तुम्हारा स्टार्ट मेनू चालू कर देती है ।

लालता प्रसाद जो अब तक चुप बैठे थे बोले, - अरे अगर मैं उसकी बातों को न मानु, न तरजीह दू तो मेरी घर गृहस्थी हैंक हो जाए औरजब tak रिस्टार्ट करूँ पता चले ये अपने मायके एस्केप कर गयी है और मैं यहाँ छुछुआ रहा हूँ , कभी दाना पानी के लिए बिलिंक हो रहा हूँ तो कभी नहाने धोने के लिए । इससे पहले की मेरी गृहस्थी हैंक हो मैं तो चला Home. :)

- सतीश पंचम

स्थान - मुंबई

समय - वही, जब खेतों मे गेहूं की कटाई, नौकरियों मे छंटाई और हर ओर वोटों की गन्ने सी चुसाई चल रही है

( पिछले कुछ समय से तनिक ज्यादा ही व्यस्त चल रहा हूँ, सो न तो कहीं लिख रहा हूँ न टिपिया रहा हूँ, बस वोट मांगने वाली गाड़ियों सरीखे कभीं यहाँ लप लपा रहा हूँ तो कभी वहा :)

- कोशिश रहेगी की जल्दी ब्लॉग पर रूटीन मय हो जाऊं :)

6 comments:

Arvind Mishra said...

यह एक नयी बोली भाषा ईजाद हो चली है -मजेदार !

आलोक सिंह said...

बहुत सुन्दर कहानी में शब्दों का प्रयोग बहुत अच्छा रहा है . एकदम ग्रामीण परिवेश एवम बोलचाल में ढाल के लिखा है आपने , बहुत खूब .

ताऊ रामपुरिया said...

आपकी शैली ही निराली है. एक सशक्त प्रस्तुती हमेशा की तरह.

रामराम.

डॉ .अनुराग said...

बहुत दिनों बाद सफ़ेद घर गुलज़ार हुआ .....ओर क्या खूब गुलज़ार हुआ ....आपकी भी एक खास शैली है जो अपने अंदाज में बात कहती है

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee said...

अच्छा आधुनिकीकरण है।

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

हमारा पूर्ण समर्थन आपके साथ है. जल्दी नियमित हो जाइये

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