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Thursday, February 19, 2009

'मनबोध मास्टर की डायरी' तो कमाल की है - पेश है अनोखा मजेदार अंश


कल ट्रेन में बैठे-बैठे एक अच्छी रचना पढने का मौका मिला। किताब थी विवेकी राय रचित 'मनबोध मास्टर की डायरी' । उसमें एक जगह बताया गया कि किस तरह लेखक एक बैंडबाजे वाले की खोज में चले और उन्हे पढे लिखे बैंडबाजे वालों के एक दल के बारे में जानकारी मिली। एक जन ने बताया कि -

स्कूल के मास्टर लोग शादी-विवाह में बैंड बजाने का काम करने लगे हैं। ..... ये लोग बजनिया नहीं हैं लेकिन पेट और परिस्थिति जो न करावे । इनमें बीएड, बीपीएड, विद्यालंकार, शास्त्री, आचार्य सभी शिक्षित लोग हैं। इनके एक रात का सट्टा भी ज्यादा नहीं है - बस पांच सौ रूपये रात समझिये।

सभी अध्यापक हैं ?

'पूरा स्टाफ समझिये । वह जो बडा सा ढोल होता है और जिसे ड्रम कहते हैं तथा जो इतने जोर से बजाया जाता है कि उसकी आवाज से घर की खपरैल तक खिसकने लगती है। उसे अंग्रेजी के लैक्चरर बजाते हैं। संस्कृत वाले पंडित जी तमूरी पिटपिटाया करते हैं। ......इतिहास के अध्यापक शक्सफोन और नागरिक शास्त्र के अध्यापक बल्टहार्न बजाया करते हैं। कमाल का काम है कारनट का। सो इसे गणित और विज्ञान के अध्यापक बजाते हैं। हिन्दी विभाग यहाँ भी उपेक्षित है। हिन्दी टीचर को झाँझ मिली है। बजती तो खूब झमाझम है पर अन्य सुरीली आवाजों के आगे उसकी क्या बिसात है ? अर्थशास्त्री वाले मसक बजाते हैं। एक बार हवा भर दी तो बस उंगलीयाँ भर हिलानी है। ......महत्व का काम पीटी टीचर का है।......यहाँ डांसर बिना बैण्ड अधूरा लग रहा था। बाहर से रखने पर अपनी मौलिकता जाती रहती। इसीलिये शारिरिक शिक्षक ने इसमें अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार यह दल तैयार हो गया।

......तो ये बाजा बजाना औऱ अध्यापन कैसे एक साथ कर लेते है ?

बाजा वे गर्मी की छुट्टियों में ही बजाते हैं। प्रायः हमारे यहाँ लग्न विवाह के दिन उसी लम्बी छुट्टी में पडते हैं। अध्यापकों के पास शिमला, नैनीताल मे तरावट लेने के लिये जाने भर तो पैसा होता नहीं। .....सो एक दो महीने का धन्धा उठा लेते हैं।......

.......इनको बारात में ले जाने से कई समस्यायें हल हो जायेंगी। बैठे बिठाये सफेदपोश बाराती मिल जायेंगे। ......बाजा बजाने के बाद जब कपडे बदल कर ये लोग महफिल में बैठते हैं तो महफिल उग जाती है। वह खादी की चमक, वह टोपी-चश्मा, वह भव्य व्यक्तित्व तथा मुख पर विद्या का वह प्रकाश। बारात में बैंड बाजे के साथ कोई बोलता आदमी भी होना चाहिये। यहाँ दर्जनों मिल जाते हैं। संस्कृताध्यापकों को तो बारात में शास्त्रार्थ का एक नशा जैसा है....।

......कर्मकांड की समस्या भी हल। द्वार पूजा से लेकर विवाह तक के सारे काम संस्कृताध्यक्ष से करवा लिजिये। अगर बाजा बजते में कोई मौका आ गया तो उन्हें छुडाया भी जा सकता है...तमूरी ही तो बजाते हैं।

लेखक ने इतना जानकर सोचा कि इन अध्यापकों वाले बैंड बाजे से किस तरह बात की जाये - पढे लिखे लोग हैं। सो लेखक ने कई मजमून बनाये -



- क्यों महानुभाव आपकी एक रात की सेवा का क्या पुरस्कार होता है ?

किन्तु यह बात जँची नहीं। दूसरा मजमून बनाया -

- आपके अनुरंजन कार्य की दैनिक दक्षिणा क्या होगी ?

नहीं यह भी नहीं जम रहा। अंत में लेखक ने मजमून कुछ इस तरह तैयार किया -

- हमारे यहाँ के माँगलिक कृत्य के सानन्द सम्पन्न होने में आपका जो अमूल्य सहयोग प्राप्त होगा उसकी मुद्रा रूप में कितनी न्योछावर आपकी सेवा में उपस्थित करना हम लोगों का कर्तव्य होगा ?

यह वाक्य कुछ जमा और विशिष्ट बजनियों के गौरव के अनपरूप जँचा।

*******

यह व्यंग्य मैं मनबोध मास्टर की डायरी से साभार पेश कर रहा हूँ। विवेकी राय जी से मैंने एक बार बनारस से ही फोन पर बात की थी, काफी अच्छा लगा था। खुद विवेकी राय जी शिक्षक रह चुके हैं। यह व्यंग्य उन्होंने तब लिखा था जब शिक्षकों की तनख्वाह रोक ली जाती, महीने के पचास साठ रूपये वोतन मिलते थे। आज भी कई शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों को परले दर्जे का कारकून ही समझा जाता है। यह व्यंग्य उसी की याद दिलाता है। विशेष रूप से बाजे का चुनाव शिक्षकों के विषय से मैच कर रहा है - झाँझ - हिंदी विभाग को - बजती तो झमाझम है पर बाकी बाजों के सामने उसकी क्या बिसात...और विशेषकर पीटी टीचर का डांसर बनना तो अहोभाग्य ठहरा :) अर्थशास्त्र का तालमेल जिस तरह मसक बाजा से करते हुए बताया गया उसे बहुत सराहा जा सकता है। आज के आर्थिक मंदी के दौर में जब सभी अर्थशास्त्री एक मेज पर बैठ टिपिर टिपिर आंकडे कंम्प्यूटर पर टिपिकते है तो एसे में विवेकी राय जी का अर्थव्यवस्था के बारे मे यह कहना - मसक बाजा अर्थशास्त्र वाले टीचर बजाते हैं, एक बार हवा भर दो बाद में बस उंगलियां ही हिलानी हैं :D
( हमारी अर्थव्यवस्था भी मसक बाजे की तरह ही तो नहीं, एक बार हवा भरी बाद में उंगली कंम्प्यूटर पर चल पडी, हजारों अर्थशास्त्रज्ञों की तरह :)



- सतीश पंचम

पुस्तक अंश साभार - 'मनबोध मास्टर की डायरी'
लेखक - डॉ विवेकी राय
अनुराग प्रकाशन
चौक, वाराणसी- 221001

8 comments:

Anil Pusadkar said...

सतीश जी मास्टर जी डायरी के बढिया अंश पढने का मौका दिया आपने ,वाकई कमाल की होगी डायरी।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बढिया जी. आभार आपका.

रामराम.

pankajrago said...

कर्मकांड की समस्या भी हल। द्वार पूजा से लेकर विवाह तक के सारे काम संस्कृताध्यक्ष से करवा लिजिये। अगर बाजा बजते में कोई मौका आ गया तो उन्हें छुडाया भी जा सकता है...तमूरी ही तो बजाते हैं।


सतीश जी ,
उपर लीखी लाइन बहूत हसा रही है!!!


Regards,
Pankaj

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

मस्त!
हमारे दफ्तर में सभाजीत है। शादी के मौसम में महीनों गायब रहता है। बैण्डपार्टी में बजनिया है।
बाकी अपना भी मन ढोल बजाना सीखने का हो आया है! :)

डॉ .अनुराग said...

वाकई दिलचस्प है .

pallavi trivedi said...

really interesting hai...maza aaya padhkar.

Smart Indian said...

वर्णन रोचक है। व्यंग्य में सच्चाई है। सुदूर पहाड़ के प्राइमरी शिक्षकों को शादी ब्याह कराते देखा है।

अर्चना चावजी Archana Chaoji said...

मनबोध मास्टर जी का ब्लॉग न खोजना शुरू करती तो यर छूटी हुई पोस्ट न पढ़ पाती

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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