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Saturday 14 February 2009

गिलास के भीतर बेलन से कुचकुचाया हरा मसाला, ढेलेदार नमक और तहरी


इस बार इलाहाबाद में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के यहां जाने का मौका मिला अल्लापुर में । उनके रहने के तौर-तरीकों को ध्यान से देखने में कई अलग चीजों से वास्ता पडा। इन्हीं में से एक जगह मसाला कुचकुचाते रामकिसुन मिल गये। एक गिलास में हरा धनिया, लहसुन, मिर्च डालकर उसे बेलन से गिलास में ही कुचकुचा रहे थे। बगल में ही रेडियो पर बज रहा था - राम करे ऐसा हो जाये......मेरी निंदिया तोहे लग जाये.... मैं जागूं तू सो जाय......मैं जागूं......
वहीं एक तरफ दीवाल पर सिंहासन पर बैठे हुए सम्राट अशोक का चित्र टंगा था । देखते ही लगता था कि कोई बंदा यहां पर सिविल सर्विसेस की तैयारी में सम्राट अशोक को आदर्श मान रहा है। जरूर IAS, PCS बनना चाहता है। दूसरी दीवाल पर नियॉन, ऑर्गन, क्रेप्टॉन से सुसज्जित Periodic Table । शायद Chemistry की तैयारी भी चल रही है। एक जगह घी, तेल, चावल, दाल आदि को रखे देखा। उन्हीं के बीच चॉक से लिखा था Welcome 2009. कुछ पुराने पोस्टर या चित्रों के फाडे जाने या हटाये जाने के अवशेष दिख रहे थे। एक जगह विवेकानंद का चित्र था। बगल में अखबार की कोई कटिंग चिपकी थी जिसमें एक शख्स की Black and White फोटो दिखी । पूछने पर पता चला एक बंदा यहां का सिविल सर्विसेस में चुना गया था। इसी कमरे में रहता था। सो, हम लोगों ने उसके सम्मान में अखबार में आये उसके चित्र को कटिंग कर यहां चिपका दिया है। छात्रावास मैनेजर कमरा देने से पहले ही हिदायत दे देता है, इस कटिंग को हटाना नहीं। दीवाल पर चिपके रहने देना है।
तहरी बनाई जा रही थी। उन्हीं सब के बीच कुछ हंसी-मजाक वाला बतकूचन भी चल रहा था। विषय था कौन....कहां.....क्या........कैसे..... । हर बात के पीछे हंसी ठट्ठा जमकर हो रहा था।
एक बोले - अरे रामकिसुन जी, आप तो खाली एक अढैया खा लोगे और लगोगे सोने। थाली भी नहीं सरकाओगे कि कम से कम वही सरका दें। बाद में भले सुबह उठ कर सूखी कटकटा गई जूठी थाली को एक घंटा मांजोगे।
- अरे तो क्या हुआ। मांजते तो हैं न। मेरा तो ये मानना है कि खाना खाओ तो वहीं सो जाओ। थाली सरकाना मतलब एहसान फरामोश हो जाना है। कि, खा लिये और सरका दिये।
मैं रामकिसुन जी की खाना खाने और थाली न सरकाने के पीछे छुपे दर्शन को देख थोडा दंग था। हंसी-मजाक भी दर्शनशास्त्रमय हो उठा। तभी एक और विषय उठा - नमक । दरअसल बगल के कमरे से कोई छात्र नमक लेने आ पहुँचे। उनके यहां नमक खत्म हो गया था। मैंने देखा नमक के नाम पर बडी-बडी डली थी डिब्बे में । मैं पूछ बैठा - अरे भई, ये तो पहले पुराने समय में मिलने वाला नमक है, बडे-बडे ढोके वाला। अब भी मिलता है क्या। ये तो आयोडाइज्ड नमक नहीं है।
एक बोले - यहां किसको बच्चा होने जा रहा है जो आयोडीन वाला नमक खाये।
सभी फिर एक बार ठठाकर हंसे ।
अरे भई, सस्ताहवा नमक लिये, ढेला फोडे, डाल दिये। एतना सोचने लगे तो कर लिये तैयारी कम्पिटीशन की।
फिर भी, क्या अब भी ये मिलता है, मैंने तो समझा था बंद हो गया होगा।
बंद तो नहीं हुआ लेकिन अब भी बडे-बडे डली या ढेले के रूप में गांव देहात में बिकता है। गांव से आ रहे थे तो मय झोला-झक्कड यह ढेलेदार नमक भी टांग लाये थे।
दूसरे छात्र बोले - अरे बस नमक। और वो ससुराल से खटाई और घी लेते आये वह क्यों नहीं बताते।
पता चला जिस छात्र के बारे में बातें हो रही थीं उसकी शादी हो चुकी है और दो बच्चे भी हैं। पत्नी सुदूर देहात में अपने दो बच्चों के साथ है और ये महाशय यहां कम्पिटीशन की तैयारी कर रहे हैं। पत्नी का चयन शिक्षामित्र के रूप में गांव में हो गया है और कुछ खर्चा पानी घर का वह ही उठाये हुऐ हैं।
तो बात चल रही थी नमक के ढेले पर। कि......नमक का ढेला फोडा, दाल में डाला, दाल तैयार। तभी एक गांव-देहात का एक छात्र मजे लेकर कुछ गाने लगा। प्रहलाद नामक एक छात्र को चिढाते बोला -
अरे कहा है न-

हाय राम,
आईल कइसन बेला,
हमरे नौ-नौ गदेला ( बच्चे)
बलम मोरे फोडें ढेला..... बलम मोरे फोडें ढेला


उसका इतना कहना था कि सब लोग फिर एक बार हंस-हंसकर लोट पोट होने लगे। दरअसल यह गीत बिरहा वाला गीत है और एक पत्नी के दर्द को बयान कर रहा है कि मेरे नौ-नौं बच्चे हो गये हैं और आमदनी का ये हाल है कि पति मेरे ढेला फोडने वाला काम कर रहे हैं। ढेला फोडना यानि निरर्थक काम करना।
मैं भी सोच में पड गया कि यार ये तर्ज तो काफी छांट कर लाया है पट्ठा। यहां तो सचमुच प्रहलाद पतिदेव घर से लाये हुए नमक का ढेला फोड रहे हैं, निरर्थक सरकारी नौकरी के लिये प्रयत्न किये जा रहे हैं जिसकी आशा अब बढती उम्र के कारण क्षीण होती जा रही है और वहां पत्नी है कि अपने बच्चों को लेकर किसी तरह चल रही है।
यह बैठकी काफी देर तक चली। अब तो पोस्ट भी लंबी हो चली है......चलिये बंद करता हूँ न आप लोग कहेंगे, क्या ढेलेदार पोस्ट है.....ससुर फोडते रह जाओ, कुछ न निकले :)

- सतीश पंचम

13 Comments:

Arvind Mishra said...

अपने अल्लापुरी दिनों की याद दिला दी ! अल्लाह आबाद रखें ! नया नाम तो जानते ही होंगे अल्लाह पुर का !!

उन्मुक्त said...

विद्यार्थी जीवन की याद आ गयी।

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

ओह, यहां मेरे आसपास यही वातावरण है। गांव से आये ढेरों छात्र। हर दिन ठेले पर सामन रख डेरा बदलते नजर आते हैं।
बहुत अपनापे का लेखन है आपका।

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छा लिखा है....

pankajrago said...

मै तो अब भी वैसे हु हा ये अलग बात है कि अल्लापुर मे नही दमन मे हु

अवाम said...

ये मैं अविनाश दस के लिए लिखा है ताकि आप लोग उस लड़की के बारें में भी जान सकें. आप लोगों को इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि ये टिप्पणी मैंने उनके ब्लॉग पर दिया है जो छपेगी नहीं. इसलिए आप लोगों को कर रहा हु. वो तो केवल सकारात्मक टिप्पणियां ही पोस्ट कर रहे है आपने ब्लॉग पर.


पिछले जितने दिनों से यह प्रकरण सतह पर आया है उस दिन से आप जो कम कर रहे है वो ये कि आप आपने पक्ष में एक लॉबी तैयार करने कि कोशिश कर रहे है. आप स्त्रीवादी बनते है और स्त्री स्वतंत्रता कि बात करते है. ताकि उसके पीछे अपनी छुपी हुयी इच्छाओं को पूरा कर सकें. मैं आप से भी मिला हूँ और आप से ज्यादा उस लड़की को. लेकिन ये मत समझियेगा कि वो अकेले है. आपको मिले कमेन्ट में कहां गया है कि ये सफलता पाने का शोर्ट कट है. ऐसा बिना उस लड़की को जाने लोग कैसे कह सकते है. आप लॉबी बनते रहिये. मुझे बहुत दुःख है. जो आपने किया. ये अभी आपके साथ कुछ भी नहीं हुआ है. आप दूसरे कि कमियों का पर्दाफाश करते है और ख़ुद कि कमिया जब उजागर होने लगी तो लॉबी बनाने लगे. जो सच है उसे उजागर कीजिये. आप बहुत पाक साफ है तो आप उसी दिन खुल कर मीडिया के सामने क्यों नहीं आए. ब्लॉग का सहारा क्यों ले रहे है. शब्दों का जल तो बुनने आपको आता ही है और उसी से आप लोगों को गुमराह करने कि कोशिश कर लोगों कि भावनाओं से खेल रहे हैं. और जो anonymous है, जो आपके साथ है वो खुल कर क्यों सामने नहीं आता है. क्या उसके पास दम नहीं है. और ये अब अनुमति देकर क्यों कमेन्ट स्वीकार कर रहे है पहले तो ऐसा नहीं था. इसका मतलब आप दोषी हैं.

अवाम said...

ये मैं अविनाश दस के लिए लिखा है ताकि आप लोग उस लड़की के बारें में भी जान सकें. आप लोगों को इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि ये टिप्पणी मैंने उनके ब्लॉग पर दिया है जो छपेगी नहीं. इसलिए आप लोगों को कर रहा हु. वो तो केवल सकारात्मक टिप्पणियां ही पोस्ट कर रहे है आपने ब्लॉग पर.


पिछले जितने दिनों से यह प्रकरण सतह पर आया है उस दिन से आप जो कम कर रहे है वो ये कि आप आपने पक्ष में एक लॉबी तैयार करने कि कोशिश कर रहे है. आप स्त्रीवादी बनते है और स्त्री स्वतंत्रता कि बात करते है. ताकि उसके पीछे अपनी छुपी हुयी इच्छाओं को पूरा कर सकें. मैं आप से भी मिला हूँ और आप से ज्यादा उस लड़की को. लेकिन ये मत समझियेगा कि वो अकेले है. आपको मिले कमेन्ट में कहां गया है कि ये सफलता पाने का शोर्ट कट है. ऐसा बिना उस लड़की को जाने लोग कैसे कह सकते है. आप लॉबी बनते रहिये. मुझे बहुत दुःख है. जो आपने किया. ये अभी आपके साथ कुछ भी नहीं हुआ है. आप दूसरे कि कमियों का पर्दाफाश करते है और ख़ुद कि कमिया जब उजागर होने लगी तो लॉबी बनाने लगे. जो सच है उसे उजागर कीजिये. आप बहुत पाक साफ है तो आप उसी दिन खुल कर मीडिया के सामने क्यों नहीं आए. ब्लॉग का सहारा क्यों ले रहे है. शब्दों का जल तो बुनने आपको आता ही है और उसी से आप लोगों को गुमराह करने कि कोशिश कर लोगों कि भावनाओं से खेल रहे हैं. और जो anonymous है, जो आपके साथ है वो खुल कर क्यों सामने नहीं आता है. क्या उसके पास दम नहीं है. और ये अब अनुमति देकर क्यों कमेन्ट स्वीकार कर रहे है पहले तो ऐसा नहीं था. इसका मतलब आप दोषी हैं.

डा. अमर कुमार said...


भई वाह, इस बतरस से भी रस निचोड़ लिया ?
ग़ज़्ज़ब, वैसे अल्लापुर का नया नाम क्या है, बतायेंगे, तनि हमहूँ त जानें ।

डा. अमर कुमार said...


यहाँ न बताने वाला हो, तो मेल बक्सा में प्रकट करिये !

सतीश पंचम said...

अरे भई अल्लापुर का नया नाम मुझे पता नहीं लग रहा। किसी को पता हो तो बताइये। नेट पर छान मारा...ससपरा नेट भी छन्नी हो गया :)

poemsnpuja said...

हमें भी अपने कुछ दोस्तों का कमरा याद आ गया. एकदम आंखों देखा हाल है...वो गिलास भी क्या क्या काम आता है. हमारे दोस्त तो उससे रोटी भी बेल लेते थे.

विनीता यशस्वी said...

Maza aa gaya par ke...

Sushil said...

Satish Ji,

really good post, like it.
I am reading hindi stuff after long time but enjoyed it.

Sushil

बातें, जो जाने की जल्दी मचा रही हैं.....

कुछ बातें जल्दी मचाती हैं कि मैं जा रही हूँ......मैं न रूकूंगी। समय भी उन्हें ऐसा करने के लिये उकसाता रहता है कि कह दो कि देर हो रही है.......बहुत रूक लिये......हम जा रही हैं........अब न रूकेंगी.............ऐसी ही बातों को देखने पढने के लिये इस राह से गुजर सकते हैं जहां समय को एकबारगी धकियाया जा सकता है कि समय तुम बीत गये तो क्या हुआ ? ठहरने की सांकल तो अब भी खटखटायी जा सकती है......

ऐसी ही बीते-अनबीते पलों को इन लिंक्स के जरिये देखा जा सकता है ।

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