सफेद घर में आपका स्वागत है।

Wednesday, February 11, 2009

वैलेंटाईनहा बाबा के लिये पूडी-कढाही के चढावे पर रोचक चर्चा ( बतफोडवा पोस्ट)



आज सदरू भगत वैलेंटाईन डे मना रहे हैं। एक नई नीली रंग की पट्टेदार चढ्ढी, उस पर सेन्चुरी मिल वाली परमसुख छाप धोती, सफेद रंग का कुर्ता, एक नया अँगोछा कंधे पर रख यूँ चले, मानों समधियाने जा रहे हैं। धोती में नील इतना ज्यादा लगवा लिये थे कि लगता था बसपा का बैनर ही कहीं से झटक लाये हैं और वही पहन-ओढ कर निकले हैं। इधर रमदेई भी आज पूरे फॉर्म में थी। नई-नई साडी को बिना एक बार भी पहने धो-कचार कर धूप में सूखा रही थी, जानती थी नई साडी एक-दो बार धोने से कपडे का बल टूटता है और पहनने में नरमाहट बनी रहती है।
बगल वाली जलेबी फुआ ने टोक भी दिया था, काहे नया लूगा को धो रही हो, पहन लो एसे ही....लगेगा बियाह वाली साडी है। चलोगी तो लूगा खसर-खसर बोलेगा सो अलग। तो जानते हैं रमदेई ने क्या कहा - अरे नई साडी खसर-खसर बोलती है इसिलिये तो धो-कचार कर धोती का खसरपन कम कर रही हूँ। मैं तो नहीं पहनती लेकिन मेरे बुढउ मानें तब न। बोल रहे थे हम लोग वेलेंटाईनहा बाबा को मनायेंगे।
वैलेंटाईनहा बाबा ? वो कहाँ के बाबा है ? जलेबी फुआ ने अचरज से पूछा।
अरे जैसे हमारे बरम बाबा, हरसूबाबा, डीह बाबा हैं न, वैसे ही अंगरेज लोगन के वैलेंटाईन बाबा ।
अच्छा, तो उनके लिये ही पूडी- कढाई चढाने की तैयारी हो रही है ।
हाँ, वह सब तो करना ही पडेगा। कढाही चढेगी, परसाद बंटेगा। बाकी सब भी काज-करम होगा। अब तो देखो वैलेंटाईन बाबा कहाँ तक पार लगाते हैं।
सब पार हो जायेगा बहिनियाराम, सब पार हो जायेगा। बस वैलेंटाईनहा बाबा पर भरोसा रखो।
रमदेई और जलेबी फुआ की बातें चल ही रही थीं कि सदरू भगत टहकते-लहकते आँगन में आ पहुँचे। देखा जलेबी फुआ पहले ही से बैठी हैं। रमदेई अलग कपडों को उपर-नीचे अलट-पलट कर सुखा रही है, ताकि कपडे जल्दी सूख जायें। एक गठरी में सिधा-पिसान बाँधा जा रहा है ताकि पूडी-उडी का इंतजाम हो, कढाई चढे। थोडे पुआल भी लिये जा रहे हैं ताकि आग जलाकर कढाई देने में आसानी हो। थोडी देर के लिये सदरू भगत को लगा कि औरतें न हों तो तर-त्यौहार का पता ही न चले। वो तो चार औरतें मिल बैठ कर बोल-बतिया लेती हैं, थोडी लेनी-देनी कर लेती हैं तो पता चलता है कि कोई त्यौहार है। एसे समय बच्चों की कचर-पचर अलग चल रही होती है। किसी का पाजामे का नाडा नहीं खुल रहा तो किसी की सियन खुल गई है। इन्हीं सब बातों में सदरू भगत मगन थे कि बाहर पंडित केवडा प्रसाद की आवाज सुनाई पडी।
अरे भगत......अंदर ही हो क्या ?
अरे पंडितजी। आइये- आइये। कहिये , कैसे आना हुआ। सदरू भगत आँगन से बाहर आते हुए बोले।

आना क्या, बस जब से ये सुना कि तुम वैलेंटाईनहा बाबा को कढाई चढाने जा रहे हो, हम तो दौडे चले आये। पानी भी नहीं पिया, पैर देख लो अभी भी धूल से अंटे पडे हैं।
हाँ, कढाई चढा तो रहा हूँ। सुना है बहुत पहुँचे हुए बाबा हैं। बहुत पढे लिखे कालेज के छोकरा-छोकरान तक उन्हें मानते हैं।
कालेज के छोकरा-छोकरान बाबा लोग को मानते हैं ? विसवास नहीं होता भगत। देखा नहीं था हरकिरत का लडका जो शहर में पढ रहा था, गाँव आया तो हम लोगों को पिछडा कह रहा था। कहता था कि क्यों पाथर को पूजते हो। कहीं पाथर पूजने से दुख दुर होते हैं। ये बाबा ओबा लोग कुछ नहीं होते बस बेकार के लोग होते हैं। और आज देखो, सब पढुआ-ठेलुआ लोग वैलेंटाईन बाबा को एकदम मान ही नहीं रहे बल्कि उनके लिये मार भी खा रहे हैं। बदनामी झेल रहे हैं। हर जुलुम हँस कर झेल रहे हैं ।

सच कहते हो पंडितजी। मैं तो समझता हूँ कि जितना हम लोगों के देसी बाबा लोगन में शक्ति है, उससे कहीं ज्यादा विदेसी बाबा में शक्ति है। देखा नहीं, क्या बडे, क्या बूढे सब के सब वैलेंटाईनहा बाबा को मान रहे हैं। सुना है वह एसे बाबा हैं कि उनके लिये गुलाबी रंग की चड्ढी का चढौवा लगता है।
अच्छा।
हां और क्या ? एसे वैसे बाबा थोडे न है।
लेकिन आज तक तो हम लोग अपने यहां चढावे में कोपीन अ लंगोट छोड कुछ चढाये ही नहीं हैं। लंगोट चढाते थे तो एक सिरा एक ओर बाँध देते थे और दूसरा दूसरी ओर। अब इ गुलाबी चड्ढी का चढावा कैसे चढेगा बाबा को।
बस वही मैं भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि वैलेंटाईन बाबा का चढौवा गुलाबी चड्ढी कैसे अर्पित किया जाता है, कैसे चढाया जाता है।
अभी यह चर्चा चल ही रही थी कि कुछ लोग भजन गाते हुए बगल से निकले -

वैलेंटाईन बाबा, तेरो अजब है हाल
रे बाबा, तेरो अजब है हाल
मांगे न मोती, नाहीं हीरा
नाही मांगे गहना-गुरिया ,
मांगे चड्ढी-पुआल रे बाबा
तेरो अजब है हाल
रे बाबा......

- सतीश पंचम

7 comments:

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

एतना जीभ तोरत हयें सदरू भगत। अरे सीधे बोलें "बलटिहान बाबा"। अन्तत: गंवई वेलेण्टाइन बालटी भर पूरी-तरकारी चढ़ाने से मन जायेगा! :)

satish said...

सही है ज्ञानजी। वैलेंटाईन के झोंक में मैंने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया कि बलटिहान बाबा भी शब्दावली बन सकती है। आज आपकी शब्दों का टोटा वाली पोस्ट देखी है। आपके इस बलटिहान बाबा वाले नामकरण से तो कत्तई नहीं लगता कि कभी शब्दों का टोटा पड सकता है।

आलोक सिंह said...

बहुत बढ़िया रचना बा , जय हो वैलेंटाईन बाबा के

डॉ .अनुराग said...

एक आद गोली या इसाभ गोल की भूसी भी खिला देते.....

ताऊ रामपुरिया said...

वाह जी, सदरू भगत और रमदेई थोडॆ अंतराल बाद आये . पर आये पूरे फ़ार्म मे हैं दोनो.

जय हो बलटीहान बाबा की. :)

रामराम.

Harkirat Haqeer said...

हैप्‍पी वैलेन्‍टाइन डे.....!!!

pankajrago said...

Very funny post sir

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.