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Friday, February 6, 2009

दीवाल पर लिखी एक इबारत का सच - आँखन देखी

    यहाँ देखौआ, छेकौआ के लिये कमरा मिलता है। जी हाँ, ऐसा ही तो लिखा था शारदा मंदिर के पास वाले दुकानों के सामने। साथ चल रहे परिचित ने बताया कि यहाँ पर अब लडका लडकी को एक दूसरे को देखने दिखाने के लिये कमरे मिलते हैं, यानि देखौआ। पसंद आने पर विवाहोपयोगी लडका-लडकी के परिवार के बीच कुछ उपहार( लेन-देन) आदि का आदान-प्रदान होता हैं जिसका अर्थ होता है इस जोडे को हमने छेंक लिया है- यानि कि छेकौआ।  परिवार के लोग भी साथ होते है। मित्र बता रहे थे कि विवाह आदि तय होने के लिये अब ऐसे स्थल ज्यादा उचित माने जाने लगे हैं।

   मैं सुनता जा रहा था और मंदिर के आस पास की दुकानों में नजर भी दौडाये जा रहा था। मैंने अनुमान लगाया कि इस प्रकार के मिलन स्थल का निर्माण बढने के पीछे आये सामाजिक बदलाव ही हैं। पहले केवल घर वालों की रजामंदी से विवाह संपन्न हो जाता था। लडका न लडकी को देख पाता था, और लडकी न लडके को। दोनों एक दूसरे को विवाह होने के बाद ही देख पाते थे। लेकिन धीर-धीरे यह कलुषित प्रथा बंद होती गई और लडका-लडकी को देख कर ही विवाह आदि संपन्न होने लगे। ये देखौआ-छेकौआ वाले नवनिर्मित कमरे, उसी बदलाव के मर्मस्थल हैं।

    आज भी सुदूर देहात में जब कभी तिलकहरू लोग आते हैं तो उनके आने और जाने तक स्वागत सत्कार आदि में पूरे कुनबे को ही बटुर कर एक जगह उपस्थित रहना पडता है। स्वागत आदि में कोई कमी न रह जाये। घर की महिलाओं को भी सहेजना पडता है कि देखो बच्चों को ज्यादा डिस्टर्बेंस न करने दो। तिलकहरू लोग आ रहे हैं। लडका देखने आ रहे हैं, ये न हो.....वो न हो। मेरी नजर दुकानों में रखी चीजों पर पडी। कहीं सिंदूरदान रखा है, कहीं माँग-टीका। एक ओर सस्ती किताबों की दुकान भी है जिसमें ज्यादातर व्रत-जप आदि के लिये उपयोगी किताबें ही ज्यादा नजर आ रही हैं। सँतोषी माता कथा, विवाहोपयोगी गाली गीत, गाली सागर, सत्यनारायण कथा, हरितालिका कथा और ऐसी ही अनेकों किताबें। मैं आगे बढा।

एक सज्जन जो बहुत आतुर होकर हमारी ओर देख रहे थे उनसे मित्र ने पूछा - एक कमरा

मिलेगा ? देखौआ के लिये।

कितने लोग होंगे ?

यही कोई आठ-दस लोग।

   आईये देख लिजिये। छोटा कमरा दो सौ एक रूपये। और बडा चाहिये तो तीन सौ एक रूपये।
मैं राउण्ड फिगर से एक रूपये ज्यादा लेने के पर कुछ सोचने लगा। ये क्या बात हुई दो सौ एक, तीन सौ एक.....यानि एक ज्यादा ही रहे। तभी बात कुर्सी गद्दे की होने लगी। एक कुर्सी पाँच रूपये, एक गद्दा छह रूपये। पाँच घण्टों का चार्ज।

ठीक है। चलो दिखाओ।

  हम आगे बढे। इधर हॉल में कई लडकियाँ अपने परिवार के साथ बैठी थीं। हमारे पहुँचते ही उन सबकी नजर हमारे उपर पडी। शायद उन्हें लगा हम लडके वाले आ गये हैं, जिसका कि वे इंतजार कर रहे हैं। लडकियाँ सहम कर सिर से ढरके पल्ले को ठीक ठाक करने लगीं। अन्य साथी औरतें अपने आप को यथावत रखते हमारी ओर इस तरह देख रही थी मानों कुछ ढूँढ रही हों......उनकी आँखे शायद भावी दुल्हे को खोज रही थीं। लेकिन जैसे ही हमारे साथ उस शख्स को देखा जो कि कमरे किराये पर देता है......वह अपने आप पहले जैसे सहज हो गये। उन्हें पता चल गया कि यह भी हमारी तरह देखौआ-छेकौआ के लिये कमरा बुक करने आये हैं।

    तभी मेरी नजर दीवाल पर लगी एक तखती पर पडी जिसपर लिखा था - विवाह कोई कानूनी बंधन नहीं, जन्म जन्माँतर का अटूट बँधन है जिससे पिढियाँ बनती हैं। इसे बहुत कुछ सह कर निभाना पडता है। - प.पू श्री........

   कमरा देख-ताक कर हम मंदिर के प्रांगण में ही एक ओर खडे हो गये और इंतजार करने लगे अपने सगे-संबंधियों का जो कि लडका-लडकी को लेकर अपने-अपने निवास स्थान से चल चुके थे और थोडी ही देर में पहुँचने वाले थे। तभी बगल में किसी के हो-हल्ला करने की आवाज आई। एक शख्स काफी तल्ख लहजे मे किसी से कह रहा था - अरे यार ऐसे थोडी होता है, इतना दो तो शादी होगी नहीं तो दूसरा तैयार है।

   बात शादी के लिये लेन-देन पर आकर बिगड गई थी। जोर-जोर से बोलने वाला शायद लडकी वालों की ओर से था। उसके आगे कहे गये कुछ शब्द भद्दे जरूर थे लेकिन अपने-आप में हकीकत तो उघाड कर रख रहे थे।

   वह कह रहा था - अरे यार झाँ* जल जाता है जब इतनी तैयारी करके ले फाँद कर, गाडी-घोडा करके लडकी लेकर देखने आओ और यहाँ साले गाँ* खोल देंगे कि इतना दो.....उतना दो।

    दूसरा उसे समझा रहा था - अरे, गजब करते हो यार । मंदिर है.....थोडा ख्याल करों।
क्या-क्या ख्याल करूँ। ये मंदिर है इतना तो मैं भी जानता हूँ.....लेकिन वो लोग को समझ है। मुँह खोल रहे हैं दो लाख नकद, चार चक्का अलग......अरे हद है।

   तो क्या करोगे ?  कुछ न कुछ तो देना ही होगा। आगे जाकर कम - ज्यादे करवाया जा सकता है। ऐसा तो है नहीं कि कह दिया और देना ही पडेगा। लडके वाले शुरूवात में कहते ही इतना है कि आखिर में बात कहीं सम पर आकर टिके। मैं हूँ न, चिंता मत करो।

   इस दुसरे शख्स की बातों से लगता था कि यह अगुआ है और इसकी ही अगुआई से बात-चीत चल रही है शादी की। बात को कहाँ संभालना है और कहाँ उछालना ये शख्स बखुबी जानता लगा। तभी वह अगुआ आदमी कुछ धीमी आवाज में बात करने लगा। लेकिन तल्ख लहजे में बोलने वाले की आवाज पर कोई असर नहीं हो रहा था।

   अरे क्या - एक अस्सी और एक-पचासी कर रहे हो। सोनार के यहाँ बैठे हो क्या। सुनकर कपार से ससुर खून चूने लगता है एतना दो ओतना दो।

    तो क्या करोगे, फोकटे में निबाह ले जाना चाहते हो। देखो, जिस समाज में तुम हो, उसी में मैं भी हूँ। इतना जान लो। आज लडकी के बखत देते समय तो ना-नुकुर कर रहे हो। कल जब तुम्हारे लडके का होगा तो पैर जमीन पर न रखोगे। ये कहो, हम लोग हैं जो कह कर दबाये हुए हैं नहीं तो पाँच नगद गिनवाता और चार चक्का पहूँचाने को कहता।

    पहले वाले के चेहरे पर अब भी शिकन ढिली न हुई थी। धीरे-धीरे वह दोनों अंदर कमरे की ओर बढे जहाँ लडका-लडकी के परिजन बात-चीत में लगे थे। इधर मैं भी बाहर की ओर थोडी चहल-कदमी के लिये चला। मित्र ने आँख के इशारे से कुछ कहा - मानों कह रहे हों - देखा यही होता है यहाँ।
  
    मैं चला जा रहा था और नजर आ रही थी वह तखती जिस पर लिखा था - विवाह कानूनी बँधन नहीं है। यह जन्म-जन्माँतर का अटूट बंधन है जिससे पीढियाँ बनती हैं। इसे बहुत कुछ सहकर निभाया जाता है - प. पू. श्री........।


- सतीश पंचम

14 comments:

अनिल कान्त : said...

आपका ये लेख भाई मुझे बड़ा पसंद आया ...चलो कुछ सुधार तो हो रहा है धीरे धीरे .... अब लड़का लड़की एक दूसरे को देख तो पाते हैं शादी से पहले

Anil Pusadkar said...

अफ़सोस अभी तक़ ये सब चल ही रहा है।

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

पोस्ट तो मस्त है।
अब लग रहा है कि संकट मोचन के पास एक दो कमरे का फ्लैट मिल जाये तो देखौवा-छेकौव्वा गेस्ट हाउस खोल दिया जाये! :)

Udan Tashtari said...

प पू श्री लोगों की सीख को कौन सुनता है..देखिये न!! कैसे कमरे किराये पर उठाये जा रहे हैं. हद है भाई!

अजित वडनेरकर said...

आपकी शैली बहुत अच्छी है...अनोखा अंदाज और विषयवस्तु भी शानदार...

ताऊ रामपुरिया said...

आपकी शानदार और जानदार शैली मे "देखौवा-छेकौव्वा पोस्ट. :) मजा आगया भाई अपने को तो. समस्या तो अपनी जगह है ही.

रामराम.

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) said...

आहाहा, कतई मजा आ गया। संग्रहणीय पोस्ट।

शादी-विवाह जैसे सॉलिड बन्धन बाँधने के लिये फेविकोल का काम तो पैसा ही करता है। देखौवा शब्द तो सुना था, छेकौवा का शाब्दिक अर्थ जानकर बड़ी खुशी हुई, यूटिलिटी वर्ड है....

ज्ञान जी के देखौवा-छेकौव्वा गेस्ट हाउस के लिये शुभकामनाएं।

डॉ .अनुराग said...

बहुत दिनों बाद आपकी खालिस अंदाज वाली पोस्ट आई....ठीक वैसी जैसी मुझे पसंद है....पढ़ते ही पता चला जाता है किसने लिखी होगी....

pallavi trivedi said...

बड़ा बढ़िया लेख ! शैली भी बड़ी रोचक है!

सतीश पंचम said...

आप सभी का धन्यवाद मेरी इस शैली में लिखे लेख की प्रशंसा करने के लिये। दरअसल मैं बहुत हिचकिचा रहा था कि कुछ शब्दों को देशज ढंग से रखूँ या नहीं....अक्सर वहाँ पर भदेस शब्दों की भरमार होती है और एक तरह का भद्दापन महसूस होता है। शुक्र है आप लोगों ने इस शैली को पसंद किया। एक बार फिर आप सभी को तहे-दिल से धन्यवाद कहूँगा।

varsha said...

एक लड़की पर क्या गुजरती होगी ये सोचकर की उसके गुणों की कोई कद्र नही है बस पैसे की कद्र है, पैसा हो तो डॉक्टर इंजिनियर आईएस सब मिल जाते हें। पता नही इतना पढ़ लिखकर लड़के भी कैसे अपने आपकी बोली लगवाने को तैयार हो जाते हें।

Neeraj Rohilla said...

पढवईया विद्यार्थी को चार चक्का मिलेगा क्या :-)

बढिया किस्सा रहा...

आलोक सिंह said...

ये हाल तो आज कल हर बड़े मन्दिर के आस पास है देखौवा-छेकौव्वा तो कम २ घंटा में बियाह भी करवा देते हैं , बस पार्टी तैयार हो नाऊ , कोहार, पंडित सब तैयार बैठे रहते है .बस पैसा दिजीये तमाशा देखिये .
रचना बहुत अच्छी थी ..

pankajrago said...

साहाब जी मै भी वहि से हु आप के जन्पद से !!

वाकई कफ़ी नज्दिकता मह्सुस होता है आपका पोस्ट पढ्कर

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